शनिवार, 5 मई 2012

ग़ज़ल के गांव में आओ सजाएं फिर महफिल, सुख़नवरों चलो मिल के जमाएं फिर महफिल ।

पहले अंकित सफर का मेल आया कि ग़ज़ल के गांव में कुछ सन्‍नाटा सा क्‍यों है, बकौल दादा ए के हंगल फिल्‍म शोल ' ये इतना सन्‍नाटा क्‍यों है भाई ' । और फिर उसके बाद कल आदरणीय राकेश जी का फोन आया कि क्‍या बात है ब्‍लाग पर ख़मोशी क्‍यों छा रही है । जब देखा तो पाया कि सचमुच ही ग़ज़ल के गांव में ख़मोशी छाई हुई है । ख़मोशी के हालांकि अपने कारण भी हैं, किन्‍तु ख़मोशी तो ख़मोशी होती है । ज्‍़यादा देर तक बनी रहे तो दहशत पैदा करती है । तो लगा कि ख़मोशी को तोड़ना भी ज़ुरूरी है । अब तो पांच साल हो गये हैं इस ग़ज़ल गांव को बसे हुए । अगस्‍त में पूरे पांच साल को हो जायेगा ये सफ़र । इन पांच सालों में बहुत स्‍नेह बहुत प्रेम मिला अपनों से । और उसी नेह ने लड़ने का जूझने का हौसला प्रदान किया । और इसी बीच कुछ कुछ ऐसे अनुभव भी होते रहे कि बरबस डॉ राहत इन्‍दौरी साहब का वो शेर याद आता रहा '' मैं न जुगनू हूं, दिया हूं, न कोई तारा हूं, रौशनी वाले मेरे नाम से जलते क्‍यों हैं'' । पिछले एक बरस से एक बड़े व्‍यक्ति की ओर से भी मुझे इसी प्रकार के अनुभव मिले । वे पूरी योजना के साथ कुछ ऐसा कर रहे हैं जो किसी भी 'बड़े व्‍यक्ति' को शोभा नहीं देता । मैं हमेशा से कहता रहा हूं कि मैं कोई बहुत बड़ा जानकार नहीं हूं 'इल्‍मे अरूज़' को । जो जानता हूं, जितना जानता हूं बस उतना ही आप सब के साथ शेयर करता रहता हूं ''दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानों काम'' वाली उक्ति को धन के स्‍थान पर ज्ञान के लिये प्रयोग करते हुए । लेकिन मुझे लगता है कि कुछ अपनों को और कुछ 'बड़ों' को इस काम से परेशानी हो रही है । अपने, अपने तरीके से और बड़े, बड़े तरीके से इस परेशानी को व्‍यक्‍त  करते रहते हैं ।  खैर ये तो सब होता ही है । यदि आप कुछ भी निस्‍वार्थ करने निकलते हैं, कुछ भी अच्‍छा करने निकलते हैं तो ये सब तो होता है । यदि आप घर से शराब की दुकान की ओर जा रहे हैं तो आपके रास्‍ते में कोई अड़चन कोई रुकावट नहीं आती, किन्‍तु, यदि आप घर से पुस्‍कालय की ओर जाते हैं तो आपके रास्‍ते में सौ रुकावटें आती हैं । तो जब रुकावटें आ रही हों तो जान लीजिये कि आप का प्रयोजन अच्‍छा है । वैसे भी हमें सबसे ज्‍यादा भयाक्रांत करती है 'प्रतिभा' । हमें हमेशा से 'प्रतिभा' से डर लगता है । हम चाहते हैं कि लोग यूं ही रहें बस । तो चलिये उन सब 'बड़ों' को और उन सब 'अपनों' को प्रणाम करते हुए आगे बढ़ते हैं । प्रणाम इसलिये कि वो हैं तो हम हैं ।

DSC_8781 ( आदरणीय विजय बहादुर जी की सीहोर यात्रा )

तो जैसा कि बताया जा चुका है कि ब्‍लाग को पांच साल होने वाले हैं । पांच साल होने वाले हैं तो धमाल तो बनता ही है । अब ये धमाल कैसा हो ये आगे देखा जायेगा । मगर ये तो तय है कि पांच साल पूरे होने पर जो तरही मुशायरा होना है वो धमाल और कमाल का होना ही है । तरही मुशायरा जो कि अगस्‍त में होना है इसका मतलब ये कि वो दो साल बाद फिर से बरसात के मौसम पर केन्द्रित होगा । हमने 2010 में 'फलक पे झूम रहीं सांवली घटाएं हैं' के माध्‍यम से पूरे दो तीन माह तक बरसात का आनंद उठाया था । 2011 में हमने बरसात के स्‍थान पर 'और सन्‍नाटे में डूबी गर्मियों की ये दुपहरी' के द्वारा ग्रीष्‍म का आनंद लिया था । इस बार फिर से बरसात को ही विषय बना कर हम पांच साला जश्‍न को मनाएंगे । और हां इस बीच कोशिश ये की जायेगी कि उधर ग़ज़ल का सफर नाम से जो प्रयास हमने शुरू किया था उसको भी फिर से गति प्रदान की जाये । उस ब्‍लाग का स्‍वरूप बदलने के लिये कुछ किया जायेगा । फिर से उसे 'नई खुश्‍बू नये रंग'  के साथ रीलांच किया जायेगा । सुबीर संवाद सेवा को भी पांच साल हो रहे हैं तो पांच साला जश्‍न में यहां भी कुछ नया अवश्‍य किया जायेगा ।

arsh mala हम्‍मम तो अंकित का ये कहना था कि ऊंघती हुई मंडली का जगाया जाये । तो ये जगाने का काम कैसे किया जाये । फिर धर्मेंद्र कुमार सज्‍जन का सुझाव कि इस बार की तरही इस नये जोड़े ( अर्श और माला ) को समर्पित की जाये । अश्विनी रमेश जी ने कहा कि अगला मुशायरा रोमानियत के रंग में सराबोर होना चाहिये । तो  सब बातों पर विचार करने पर ये लगा कि अब तक हमने ऋतुओं पर, पर्वों पर, त्‍यौहारों पर तो खूब मुशायरे किये लेकिन अभी तक हमने कोई भी मुशायरा प्रेम को समर्पित नहीं किया । प्रेम, जो काव्‍य की आत्‍मा होता है । फिर ये कि अर्श और माला भी तो प्रेम पथ पर अपने जीवन की नयी यात्रा का आरंभ करने जा रहे हैं या कर चुके हैं । तो क्‍यों न एक मुशायरा प्रेम को ही समर्पित हो जाये । अब उसके पीछे भी एक और खास कारण है । कारण ये कि मेरे स्‍वयं कि जीवन में भी मई और जून तथा प्रेम का विशेष महत्‍व है । क्‍या है वो आगे बताया जा रहा है ।

bullet वे स्‍कूल के दिन थे । अप्रैल में परीक्षाएं खत्‍म हो जाती थीं और मई में लग जाती थीं छ़ुट्टियां । तब आज की तरह नहीं था कि गर्मी में भी कोचिंग वगैरह करना है । छुट्टी का मतलब छुट्टी । और हर गर्मी की छुट्टी में मुझे प्रेम हो जाता था । उसे किशोरावस्‍था का भावुक आकर्षण ही कह सकते हैं शायद, बजाय प्रेम कहने के । बहरहाल वो जो भी हो, वो हो जाता था । और हर वर्ष मई में किसी नियम की तरह होता था । उम्र शायद 14 से 18 के बीच रहती होगी उन सालों में । और जब प्रेम हो जाता था तो मैं तथाकथित शायर भी हो जाता था । हर साल की एक डायरी बनती थी जो तुकबंदी टाइप की ग़ज़लों से भरा जाती थी । कविता नहीं लिखता था, लिखता तो उस समय भी ग़ज़लें ही था । शुरू की एक डायरी परिवार वालों के प्रकोप के कारण जुलाई आते ही अग्नि देवता को समर्पित हुई । मगर बाद की डायरियां अभी भी सुरक्षित हैं । न कोई बहर का दबाव न कोई कहन का झंझट । लिखे जाओ, लिखे जाओ । दर्द में डूबी हुई शायरी । प्रेम में भीगी हुई शायरी । दर्द और प्रेम उस पर्टिकुलर दिन पर निर्भर करता था कि वो दिन कैसा बीता । क्‍योंकि हर रात को एक ग़ज़ल लिखी (कही) ही जाती थी । जुलाई आती, स्‍कूल खुलते और जीवन में एक डायरी तथा एक प्रेम बढ़ जाता । ये सब कॉलेज तक भी चलता रहा । फिर धीरे धीरे ग़ज़लों में कहन बढ़ती गई और जीवन से प्रेम घटता गया । तो उस प्रेम को हम एक वार्षिक आयोजन कह सकते हैं । किन्‍तु उस समय का किशोर मन तो उसे प्रेम ही मानता था । सोचिये उस किशोर की हालत जो टेलीफोन, मोबाइल, इंटरनेट, कम्‍प्‍यूटर, मोटरसाइकिल से रहित समय में ( तब मेरे क़स्‍बे में केवल दो फोन थे एक पुलिस थाने में दूसरा पोस्‍ट ऑफिस में, पूरे कस्‍बे में केवल चार या पांच मोटर साइकिल और केवल एक फिएट कार थी ।) हर वर्ष पूरे नियम से प्रेम करता था । खैर नियति अपने खेल खेलती है । तब किसको पता था कि प्रेम के माध्‍यम से जो डायरियां भरा रहीं हैं वो भविष्‍य की किस रूप रेखा को तय कर रही हैं । वे ग़ज़लें भले ही ग़ज़लें न हों लेकिन वो आज भी मन को बहुत प्रिय हैं । दो चार महीनों में उनको टटोल लेता हूं । समय का वो हिस्‍सा आज भी मेरी कहानियों में ग़जल़ों में धड़कता है ।

congo तो आइये उन्‍हीं दिनों की याद में, हो जाये एक प्रेमिल मुशायरा । प्रेम के फेनिल झाग से भरा हुआ आयोजन । आयोजन नव युगल के नाम । आयोजन अर्श और माला के नाम । बहुत दिनों बाद किसी युगल का नाम एक दूसरे का पूरक होते देखा है, प्रकाश+माला= प्रकाशमाला । तो ये जो तरही मुशायरा बरसात में होने वाले मुशयरे के पहले 20-20 की तरह होने वाला है इसमें स्‍थायी भाव 'प्रेम' है । शेर जो भी कहें उसमें प्रेम होना चाहिये । इस बार घृणा, नफरत, यथार्थवाद, आद‍ि आदि के लिये कोई स्‍थान नहीं है । बस प्रेम केवल प्रेम । हमें नव युगल को अपनी शुभकामनाएं देनी हैं सो शुभकामनाओं के लिये प्रेम से बेहतर कुछ नहीं होता ।

arsh mala 2 अब ये सोचा कि फिर ये मिसरा क्‍या हो । तो ध्‍यान में आया कि अर्श अभी बैरंग अकेले ही वापस दिल्‍ली लौटे हैं । माला को दो माह बाद दिल्‍ली में आना है । दो माह बाद माला के दिल्‍ली आगमन पर अर्श की भावनाएं जिस मिसरे से व्‍यक्‍त हो जाएं वो मिसरा कुछ ऐसा होगा

प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये  

अब इस मिसरे को खोल कर देखा जाये तो ये सीधे सीधे 212-212-212-212 के वज्‍़न पर है । लिखने में आसान, गाने में सुरीली बहर । जिसमें रदीफ है 'हैं प्रिये'  और काफिया है 'ई' । मेरे विचार में तो ये आसान है । इसमें प्रीत और प्रिये का प्रयोग जान बूझ कर किया है । ये परिमल काव्‍य के वे शब्‍द हैं जो अब विलुप्‍त होते जा रहे हैं । किन्‍तु, ये ही वो शब्‍द हैं जो प्रेम की भारहीनता में बिना कोई अतिरिक्‍त वजन बढ़ाये शामिल हो जाते हैं ।

तो आइये हम सब लोग जो नहीं पहुंच पाये पटना, इस आयोजन में माध्‍यम से अर्श और माला को शुभकामनाएं दें । मई के अंतिम अथवा जून के प्रथम सप्‍ताह में ये मुशायरा प्रारंभ होना है । छोटा मिसरा सरल रदीफ काफिया, मेरे विचार में इतना समय काफी है एक ग़ज़ल कहने के लिये । तो हो जाये प्रेम ............ ।

313754_246969935352871_100001196002719_649486_482754285_nप्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय, राजा परजा जेहि रुचे सीस देई ले जाय

26 टिप्‍पणियां:

  1. बधाई ..सिलसिला शुरू करने के लिए ....

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  2. इस पोस्‍ट में बहुत से प्रश्‍न देख रहा हूँ, कुछ सुलझे, कुछ अनसुलझे।
    फ़ायलुन, फ़ायलुन,फ़ायलुन, फ़ायलुन बह्र तो मस्‍त है।
    अब ग़ज़ल में रस के सम्मिश्रण का एक काम और क्‍यों न कर दिया जाये। संयोग श्रंगार को बॉंध दिया जाये तो शायद यह पहली तरही होगी जो रस आधारित होगी।

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  3. अब ग़ज़ल में रस के सम्मिश्रण का एक काम और क्यों न कर दिया जाये। संयोग श्रंगार को बॉंध दिया जाये तो शायद यह पहली तरही होगी जो रस आधारित होगी।
    तिलक जी आपने तो मन की बात छीन ली । अहा रस आधारित तरही । आनंद आनंद । तो तय रहा कि संयोग श्रंगार पर आधारित तरही ।

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  4. लगता है अंकित को काम लगाना पड़ेगा...आराम से सब ठाले बैठे थे उसे बर्दास्त नहीं हुआ...तरही की घोषणा करवा ही दी इस शैतान ने...हमेशा की तरह जब भी आप तरही की घोषणा करते हैं मन धुक धुक करने लगता है और कहता है प्यारे ये तुझसे होने वाला नहीं पतली गली से कट ले...इस बार भी मन वैसा ही कह रहा है...इसे बांधना और फिर मनवाना थोडा जटिल काम होता है...एक बार मन मान गया तो फिर पौ बारह पच्चीस हो जाती है...मनाने का काम अभी से शुरू कर रहा हूँ और अभी आलम ये है के जितना मना रहा हूँ ये कमबख्त उतना ही भाव खाते हुए बिदक रहा है...

    ये तथाकथित "बड़े" लोग हैं कौन जो आपके कारनामों से व्यथ्तित हैं? तनिक नाम बताइए ताकि उन्हें ज्ञान दिया जाय...वैसे इस तरह के लोगों का जीवन में होना जरूरी है ऐसे लोग आपको कुछ अच्छा और अच्छा करने की प्रेरणा देते हैं...बड़े किस्मत वालों को ऐसे लोग मिलते हैं , आप अगर कुछ अलग करेंगे , मुख्य धारा से अलग बहेंगे तो मानिए के लोग आपके दोस्त तो बनने से रहे तब एक ही और विकल्प बचता है...दुश्मनी का...जो सहज उपलब्ध रहता है...तो दुश्मनों की तादाद में इजाफा होने दीजिये और गुनगुनाइए " यारब मेरे दुश्मन को सलामत रखना , वर्ना मेरे मरने की दुआ कौन करेगा"

    तरही की ग़ज़ल सोचते और कहते वक्त नव दम्पति के लिए दिल से दुआ निकलती रहेगी. इस बार का विषय बहुत ही न्यारा और प्यारा है.

    नीरज

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  5. कर तो चालू सोचना, ले तरही का नाम
    प्रकाशमाला के लिए, करना है कुछ काम
    करना है कुछ काम, उठें जो ठाले बैठे
    नहीं जिन्हें कुछ काम, व्यर्थ भाभी पर ऐंठे
    कह ‘सज्जन’ कविराय, न भैय्या इतना तू डर
    लेकर गुरु का नाम, सोचना चालू तो कर

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  6. बड़ों के लिए भी एक ताजी कुंडली अभी घी में तलकर निकाली है।

    बेटा भी मुझसा बने, यही चाहता बाप
    नहीं बात यदि मानता, देता उसको शाप
    देता उसको शाप, किंतु होनी तो होनी
    इसीलिए हे मित्र, न सूरत रखना रोनी
    कह ‘सज्जन’ कविराय, गोद में कब ये लेटा
    चुनता रस्ता आप, अगर काबिल है बेटा

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  7. बड़े दिनों बाद आज का शनिवार फुर्सत और चिंतन मनन करने को मिला है - पोस्ट और इस मंच का महत्व क्या है और क्यों जरुरी है संवाद जीवन में प्रेमपूर्ण गति बनाए रखने के लिए.

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  8. बालक के प्रेम प्रदर्शन को आश्चर्य से तकते हुए बन्दर और गैय्या वाला चित्र विलक्षण है...आपके जवानी के चित्र आपके बारे में बहुत कुछ कह रहे हैं...हम भी ऐसे ही थे... अंग्रेजी में बोलें तो "नाटी" Naughty...:-))

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  9. आज तो भाईजी मोगैम्बो भी खुश हुआ होगा.. .
    आपकी ’पाती’ क्या आयी बहर लहर-लहर गयी.

    जो साथ हों वो पास में
    जो दूर हों वो आस में.. .

    --सौरभ पाण्डेय, नैनी, इलाहाबाद (उप्र)

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  10. आहा ... मज़ा आ गया ... प्रेक का विषय तो वैसे भी प्रिय विषय है ...
    वैसे .... प्रेम के साथ संयोग श्रृंगार आधारित तरही ... गुरुदेव कुछ विस्तार से बताएं ... हमारी मोटी बुद्धि में देर और खोल के बात बताने में समझ आती है ...

    प्रकाश जी कों पुन्ह बधाई कम से मक दो माह का मुक्त आनद मिलने पे ...

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    1. जी दिगंबर जी, बिलकुल मुझे भी समझना है.

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    2. दिगंबर, सुलभ, प्रेम की दो अवस्‍थाएं होती हैं । एक होती है संयोग और दूसरी होती है वियोग । दोनों अवस्‍थाएं वैसे तो नाम से ही समझ में आती हैं । लेकिन फिर भी समझने के लिये फिल्‍म हिमालय की गोद में का एक ही गीत जो दो अवस्‍थाओं को प्रतिध्‍वनित करता है । लता जी ने गीत गाया है 'एक तू जो मिला सारी दुनिया मिली, खिला जो मेरा दिल सारी बगिया खिली' ये संयोग श्रंगार है । संयोग श्रंगार का मतलब मिलन का श्रंगार
      , मिलन का प्रेम, वस्‍ल का गीत । फिर यही गीत बाद में लता जी ने गाया है 'एक तू ना मिला सारी दुनिया मिले भी तो क्‍या है, मेरा दिल ना खिला सारी बगिया खिले भी तो क्‍या है' ये वियोग श्रंगार है । प्रेम तो इसमें भी है लेकिन ये जुदाई से जुड़ा है । प्रेम की दोनों ही अवस्‍थाओं पर गीत और ग़ज़ल कहे गये हैं । लेकिन एक ही गीत के दो रूप का ये सबसे अच्‍छा उदाहरण है । वियोग श्रंगार का अर्थ जुदाई का श्रंगार, बिछोह का श्रंगार, हिज्र का गीत । अर्थात ग़ज़ल की भाषा में कहें तो वस्‍ल और हिज्र ये दो अवस्‍थाएं मुहब्‍बत की होती हैं । हिज्र या विछोह को भी प्रेम का हिस्‍सा माना गया है । उसका अपना आनंद है । फिलहाल हमें जो ग़ज़ल कहनी है वो वस्‍ल की ग़ज़ल कहनी है ।

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    3. http://www.youtube.com/watch?v=ws2gJQ8iljw
      http://www.youtube.com/watch?v=C_KU80Vwmk0

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  11. स्वागत है - तरही और वो भी सुबीर जी वाली, मन गदगद हो जाता है, प्रीत की अल्पनाएँ सजी हैं प्रिये - आहा क़ाफ़िया / तुकान्त की रेंज जबर्दस्त है :)

    बड़ों की बातें तो बड़े ही जानें और समझें, अपुन तो बस साहित्य-रस का पान करने में इंटेरेस्टेड हैं
    वैसे मोगेम्बो टाइप टिप्पणियों के माध्यम से ठाले-बैठे ही नवरस ग़ज़ल की याद ज़रूर हो आई है

    मिसरा और बह्र तो बहुत आसान है पर श्रिंगार रस आधारित ग़ज़ल, लगता है मुम्बई की गरमी में पसीने निकलवाने का पूरा पूरा इंतेज़ाम कर दिया है पंकज भाई आपने :)

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    1. इच्छुक व्यक्तियों के लिये मेरी पूर्व में कही गयी नवरस ग़ज़ल की लिंक दे रहा हूँ http://thalebaithe.blogspot.in/2011/06/blog-post_29.html

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  12. गुरुदेव प्रणाम,
    प्रीत की अल्पनाएं सजी हैं प्रिये ...
    इस प्रेममय जमीन पर क्या क्या गुल खिलेंगे और उसकी सुगंध से कितने उपवन महक उठेंगे इसका आभास अभी से हो रहा है मगर इस मंच की रीत है कि यहाँ वो होता है जो अपने विराट स्वरूप से हर बार चौकाता है
    किसी ने कहाँ सोचा था कि जो आयोजन ५-६ ग़ज़लों से शुरू हुआ है वह इतना विराट और इतना समृद्ध रूप आकार ले लेगा कि २-३ महीने तक लगातार चलता ही रहेगा ...
    मुझे तो अभी से आभास हो रहा है कि यह मुशायरा ही इतना आगे तक जाएगा कि बरसात के मुशायरे को आगे खिसकाना पड़ेगा :)))

    ये तो थी मिसरे की बात, बाद बाकी "नाम बड़े और दर्शन छोटे" यूं ही नहीं कहा गया है कुछ बड़े नाम कभी कभी इतना छोटापन दिखा देते हैं जो हैरान कर जाता है, विशवास ही नहीं होता कि वो ऐसा कर रहे हैं और जब विशवास करना पड़ता है तो ...

    फोटो झकास है :)))

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    1. //कुछ बड़े नाम कभी-कभी इतना छोटापन दिखा देते हैं जो हैरान कर जाता है, विश्वास ही नहीं होता कि वो ऐसा कर रहे हैं..//
      बहुत कुछ पिरो गये आप वीनस भाई.
      बड़ा नाम आखिर होता क्या है ? वही, कि जिससे प्रेरणा मिलती है. वही, कि जो लकीर खींचने का भान कराते हैं. उनके प्रति हृदय में श्रद्धा उपजती है. इस श्रद्धा का उत्फुल्ल प्रारूप निस्स्वार्थ आत्मीयता होती है. फिर आगे, यही परस्पर उच्च ’प्रेम’ में परिणत हो जाती है. पर जब कुछ कहीं टूटता है तो उसकी कोई आवाज़ नहीं होती, मग़र सुनती हैं पनियायी आँखें जिसके उलट ज़वाब शब्दों में नहीं उजबुजायी आहों में आती हैं.. और दग्ध हृदय तड़प उठता है, ..कैसे कहें हम प्यार ने हमको क्या-क्या खेल दिखाये.. .

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  13. वैसे ग़ज़ल लिखने का टेंशन वो लें, जो शादी में अपने अरमान निकाल नही पाये हमने तो ७ फरवरी से २० अप्रैल तक अपनी सारी ऊर्जा लगा दी है, तो हम तो किसी भी अपराध बोध से ग्रसित नही हैं और अब इतन स्टेमना भी नही रह गया कि ..... :) ;) :D

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  14. धन्यवाद और बधाई एक नया काम सौंपने के लिये।

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  15. अधिक दिनो़ की अनुपस्थिति मे बहुत कुछ पीछ्हे छ्हूट जाता है अर्श और माला की ये सुन्दर तस्वीर देखने से वंचित रह गयी. दोनो को बहुत बहुत आशीर्वाद। खैर उसने अपनी शादी पर तो नही बुलाया लेकिन मुशायरे मे हाजिर होने की कोशिश जरूर करूँगी? बहुत तमन्ना थी बेटा जोर दे कर कहेगा कि माँ आप शादी पर जरूर आना/ लेकिन उसने मैल करके खाना पूर्ति कर दी?दिल को ठेस लगी लेकिन __________ भगवान से प्रार्थना करती हूँ दोनो का वैवाहिक जीवन हर सुख से परिपूर्ण रहे। शुभकामनायें?

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  16. कमाल का तरही मिसरा है... बहुत खूबसूरत ग़ज़लें मिलने वाली हैं.
    प्रकाश-माला! ऊपर वाले ने जब जोड़ी बनाई होगी, नाम भी उसी समय तय कर लिए होंगे. अर्श को बहुत बहुत बधाई.

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  17. सीहोर से हज़ार कोस दूर तक ये तरही जाती है सरदार (गुरुदेव). हर कोई इसी इंतज़ार में रहता है कि कब आएगा अगला तरही मुशायेरा ......... :)

    पांच सालों का ये सफ़र होने को आ गया है, वाह. बधाइयाँ गुरुदेव
    जहाँ तक जलने वालों का काम है वो अपना काम कर रहे हैं, आप इसी कातिलाना अंदाज़ में चलते रहिये.
    'ग़ज़ल का सफ़र' - री लॉन्च होने जा रहा है, वाह एक और खुशखबरी.
    इस बार का मुशायेरा 'प्रेमिल मुशायेरा' होने जा रहा है, सबसे ज्यादा आसानी और दिक्कत अर्श भाई को होने जा रही है, हर शेर लिखते के साथ ही पहले पटना रवाना किया जाएगा, फिर वहां से स्वीकृति मिलने के बाद उसे ग़ज़ल में रखा जाएगा और इनके तो हर शेर पे सबकी निगाहें रहने वाली हैं.

    वैसे इस बार हर बार की तरह एक प्रश्न अभी तक नहीं उठा 'एकवचन' और 'बहुवचन' वाला. ये रदीफ़ में आने वाला "हैं" इस बार कैसे शांत है.

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    1. लगता है आपने ग़ज़ल पर काम चालू कर दिया है वरना एकवचन बहुवचन की बात नहीं करते।
      मालवी में कहावत है 'जो बोले, वो दरवाज़ा खोले' सो मैं तो इस बार चुप हूँ लेकिन आपसे सहमत हूँ। संयोग श्रंगार में अधिकॉंश स्थिति एकवचन की ही रहेंगी लेकिन मिसरों को बंदर गुलॉंट खिलाने का अपना ही मज़ा है।

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  18. सबसे पहले तो नवविवाहित अर्श और माला बहुत बहुत बधाई...अब कुछ अच्छी गज़लें अर्श जी द्वारा रचित होंगी...सुंदर प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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