गुरुवार, 3 नवंबर 2011

दीपावली का तरही मुशायरा पिछले सभी मुशायरों में सबसे सफल आयोजन रहा है । आज सुनिये श्री तिलकराज जी की तीन ग़ज़लें ।

दीपावली का मुशायरा अपनी पूरी सफलता के साथ गुजरा है । जिस प्रकार लोगों ने बढ़ चढ़ कर कमेंट किये और जिस प्रकार से लोगों ने ग़ज़लें कहीं उससे ये तो तय हो गया कि अब ये ब्‍लाग एक कम्‍यूनिटी ब्‍लाग बन चुका है । ये सबका है । जिस प्रकार से लम्‍बी लम्‍बी विस्‍तृत टिप्‍पणियां आईं उससे मुशायरे का आनंद दुगना हो गया । और अब पूरे मुशायरे की एक पीडीएफ पत्रिका डिज़ाइन की जा रही है । प्रयास ये किया जा रहा है कि पत्रिका भी मुशायरे की ही तरह से जानदार और शानदार हो । भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के अभी ग़ज़ल कह नहीं पाये हैं सो आज तिलक जी की ये तीन ग़ज़लें समापन की घोषणा हैं । और हां भभ्‍भड़ कवि को छोड़ा नहीं जा रहा है वे जल्‍द ही अपनी ग़ज़ल के साथ आएंगे ।

deepavali_lampदीप ग़ज़लों के जल उठे हर सू deepavali_lamp 

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( भाई दूज के तिलक के बाद परी और अंकित में मिठाई को लेकर जारी बहस )

Tilak Raj Kapoor 

श्री तिलक राज कपूर जी

तरही तो नहीं लेकिन एक प्रयास किया है मिलता जुलता। इस प्रयास में काफि़या दुगन में प्रयोग किया है और इस प्रकार कि काफि़या का शब्द दोनों जगह एक ही रखा है।
दूसरी पंक्ति की अदायगी कुछ यूँ है कि: फ़ायलातुन्, मफ़ा के बाद विराम लेकर यलुन् फ़ालुन् पढ़ना है। इसमें अगर कोई प्रयोग आपत्तिजनक है तो जानना चाहूँगा। 'झरे' का प्रयोग देशज रूप में है जैसा कि नीरज साहब ने 'स्वप्न  झरे फूल से' में किया था; अनुमत्य़ है कि नहीं, जानना चाहूँगा। मत्ले के शेर में मिसरा-ए-सानी में वाक्य रचना में कोई दोष हो तो जानना चाहूँगा। सुना तो है लोगों को यह कहते कि 'फ़ख्र करता हूँ' लेकिन अधिक सहज लगता है 'मुझे फ़ख्र है'। काफि़या के लिये मुनासिब सभी शब्द लेने का प्रयास किया है। 'मरे' शब्द का प्रयोग केवल इसलिये किया है कि यह भी प्रयोग का अंश है वरना ये शब्द शायरी में इस रूप में काफि़या के अनुकूल नहीं है ऐसी मेरी समझ है। ये ग़ज़ल एक प्रयोग भर है छोटी बह्र में काफि़या दुगन में लेते हुए वाक्य  रचना का एक उदाहरण देने का।
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ख्वाब तो थे हरे, हरे हर सू
शाख़ से जब झरे, झरे हर सू।
वक्त  का फ़ेर, लोग कहते हैं
अब हमें ही 'अरे', 'अरे' हर सू।
लफ़्ज़ तेरे, ज़ुबॉं रहे मेरी
बोल निकलें खरे, खरे हर सू।
हो गये वो जवॉं, समझ लीजे
रह रहे हैं परे, परे हर सू।
ये चला कौन जो सभी देखे
नैन ऑंसू भरे, भरे हर सू।
शम्अ को जो समझ नहीं पाये
वो पतिंगे मरे, मरे हर सू।
हर किसी को समझ मिले ऐसी
पाप करते डरे, डरे हर सू।

है 'सियासत', मिज़ाज़ बकरी का
जो दिखा, वो चरे, चरे हर सू।
थाम लूँ अंगुलियॉं खुदा तेरी
और जीवन तरे, तरे हर सू।
रौशनी राह में बिछाने को
दीप उसने धरे, धरे हर सू।
हुक्म तेरा, अदा करे जब तो
फ़ख्र 'राही' करे, करे हर सू।

वाह वाह तिलक जी सुंदर प्रयोग है । हां एक बात ये कि 'झरे' शब्‍द बिल्‍कुल प्रयोग किया जा सकता है । हिंदी में तो झरे का बहुतायत प्रयोग होता है । पिछले दिनों कहीं किसी ग़ज़ल में इस शब्‍द को लेकर असहमति जताई गई थी किन्‍तु मैं उस असहमती से पूरी तरह असहमत था । झरे शब्‍द हिंदी का देशज शब्‍द है और अपने मूल 'झड़े' की तुलना में अधिक सुंदर है । झड़े को अन्‍य संदर्भ में प्रयोग किया जाता है जहां पर सुंदरता की आवश्‍यकता नहीं हो जैसे ''बाल झड़ गये '' । किन्‍तु यदि सुंदर परिमल वाक्‍य बनाना हो तो झड़े नहीं लेंगे झरे ही लेंगे जैसे ''झर गये हारसिंगार'' ।इसलिये झरे बिल्‍कुल सही है । वहां उस ग़ज़ल में भी था जहां आपत्‍ती लगाई गई थी और यहां भी सही है । बाकी भी जिन बातों को लेकर आपने भूमिका में कहा है, मेरे विचार से वे भी आपत्‍तीजनक नहीं हैं सब ठीक हैं । 

Tilak Raj Kapoor 

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इसके अतिरिक्त  तरही से अलग दो प्रयास और किये हैं जो निम्नानुसार हैं:
एक ग़ज़ल रिश्तों की ज़मीन पर

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और क्या चाहिये मुझे हर सू
अम्न् औ चैन बस रहे हर सू।
वो बसा है हरेक ज़र्रे में
हम उसे ढूँढते फिरे हर सू।
पुरसुकूँ प्यार से भरे रिश्ते
भीड़ में आज खो गये हर सू।
सोचता हूँ बसूँ कहॉं जाकर
काश होते न हाशिये हर सू।
आप रिश्ता निभा नहीं पाये
और बदनाम हम हुए हर सू।
फूल ही फूल बीज कर हमको
खार ही खार क्यूँ  चुभे हर सू।
एक आवाज़ नाम लेती सी
काश 'राही' तुझे मिले हर सू।
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Tilak Raj Kapoor 

एक ग़ज़ल ज़मीनी हालात् पर:

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लोग कुछ हौसले भरे हर सू
मुठ्ठियॉं तान कर चले हर सू।
मैं मसीहा किसे यहॉं समझूँ
हाथ हैं खून से सने हर सू।
वायदे जो न पूर्ण कर पाये
वोट वो मॉंगते दिखे हर सू।

ऑंत खाली लिये नहीं दिखता
शह्र में दीप जल गये हर सू।
कान से कान तक चला क्या  है
बँट गये लोग, एक थे हर सू।
शह्र ये दौड़ते नहीं थकता
ख्वाहिशें ख्‍वाहिशें लिये हर सू।
प्यास धरती की बुझ नहीं पाई,
मेघ तो थे दिखे घने हर सू।
हर दिशा से उठे हज़ारों सुर,
कल तलक थे यही दबे हर सू।
रहनुमा मान लूँ किसे 'राही'
मूल्य ही आज गिर गये हर सू।

अहा तीनों ही ग़ज़लें आनंद दे रहीं हैं । समापन के लिये इससे अच्‍छा और क्‍या हो सकता था । दुगन काफिये के साथ की एक सुंदर ग़ज़ल और उसके बाद दो अलग अलग मूड पर लिखी हुई ग़ज़लें और क्‍या चाहिये हमें । चलिये तो विधिवत समापन घोषित करते हैं हम दीपावली की तरही का । दाद देते रहिये ।

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( हाजमोला की ज़रूरत पड़ने ही वाली है । )

18 टिप्‍पणियां:

  1. तिलक जी की खासियत है कि काफियों का बहुत खूबसूरती से प्रयोग करते हैं और जहाँ बाकी लोग पांच शेर कहने में दिनों लगा देते हैं, तिलक जी सहज में ही ढेरों शेर कह देते हैं. इस बार तो चार गज़ले देखते ही देखते कह दीं.
    और शेर ऐसे ऐसे कि कोई कोट करते नहीं बनता.
    एक गज़ल से एक लेना हो तो:
    "सोचता हूँ कहाँ बसूं जाकर/काश होते न हाशिए हर सू.", "प्यास धरती की बुझ नहीं पाई/मेघ तो थे दिखे घने हर सू." और "है सियासत मिज़ाज बकरी का." लाजवाब हैं.

    तरही बहुत ही खूबसूरत रही है और बहुत ही खूबसूरत ग़ज़लों के साथ अंत भी हो रहा है लेकिन भभ्भड़ कवि का इंतज़ार रहेगा.

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  2. पढ़कर आनन्द आया, पूरा मुशायरा।

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  3. मैं तो मत्ले में ही अटक कर रह गया हूँ, थोड़ा बदल कर समझ रहा हूँ।

    शाख पर थे हरे-हरे हर सू
    ख्वाब जब भी झरे, झरे हर सू

    क्या कह गए तिलक जी, पहले इसको हज़्म कर लूँ फिर आता हूँ।

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  4. तिलक जी साधारण इंसानों की श्रेणी में नहीं आते...वो असाधारण हैं...तभी किसी भी विषय पर वो इतनी सरलता और बहुलता से अशआर कहते हैं के हम जैसे लोग तो अवाक रह जाते हैं...उनके जैसे लोग पुरुष नहीं होते महा पुरुष होते हैं...मेरा और उनका बहुत मजे का रिश्ता है इसीलिए मैं उनके लिए ऐसे उदगार व्यक्त कर पा रहा हूँ...
    " हो गए वो जवान समझ लीजे, रह रहे हैं परे, परे हर सू" से मुझे जगजीत जी की गई मशहूर ग़ज़ल का एक शेर याद आ गया "जवाँ होने लगे जब वो तो हमसे कर लिया पर्दा, हया यखल्ख्त आई और शबाब आहिस्ता आहिस्ता"
    सोचता हूँ बसूं कहाँ जाकर, काश होते ना हाशिये हर सू" और "आंत खाली लिए नहीं दिखता, शह्र में दीप जल गए हर सू" जैसे शेर सिर्फ और सिर्फ तिलक जी ही लिख सकते हैं.
    उन्हें और उनकी लेखनी को मेरा शत शत नमन.
    गुरुदेव, इस से बेहतर तरही का समापन हो ही नहीं सकता. आपको ढेरों बधाई.

    नीरज

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  5. अंकित धन्य है जिसे ऐसी सुन्दर विदुषी बहने मिलीं.

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  6. @नीरज भाई
    जिन्‍नात्‍मा आपको प्रसन्‍न रखे। डर लग रहा हो तो परमात्‍मा कहे देता हूँ।

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  7. बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें !तिलक भाई जी ....
    आप की शायरी पर टिप्पणी करना किसी शायर का काम है | हम तो श्रोता और पढ़ने वालें हैं |
    सुन कर कानो को अच्छा लगे ...और पढ़ कर यह लगे की बस दिल की बात हो गई| और वोही महसूस हुआ |
    खुश और स्वस्थ रहें |

    सुबीर जी को आभार आप से रूबरू करवाने का |

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  8. भाई तिलकराजजी, आज आप अपने कहने के पूरे रंग और शबाब पर दीख रहे हैं. बधाई में क्या कहूँ ! बस मुग्ध हूँ.

    पहली ग़ज़ल के इन अश’आर ने बरबस ध्यान खींचा है -
    वक़्त का फ़ेर..
    ये चला कौन ...

    दूसरी ग़ज़ल तो लाज़वाब है जिसके सभी अश’आर एक से बढ़ कर एक हैं. फिर भी इन अश’आर को मैं चिह्नित करना चाहूँगा -
    वो बसा है हरेक ज़र्रे में...
    सोचता हूँ बसूँ...
    मग़र हासिलेग़ज़ल तो ’आप रिश्ता निभा न पाये..’ है. भाईसाहब, इस शे’र पर मैं एकदम से रुक गया और देर तक गुनता रहा. कमाल.. कमाल.. कमाल...

    तीसरी ग़ज़ल की तासीर ही अलग सी है, जो आपकी सोच का विस्तार बताती है. मतले में आपने जो कमाल कहा है वो शे’र दर शे’र पुख़्ता होता गया है.
    मैं मसीहा किसे... वाह साहब वाह !
    कान से कान तक... बहुत खूब !
    शह्र ये दौड़ते...
    हर दिशा से ...
    जो कुछ बचा था, तिलकजी, मक्ते में पूरा हो गया !

    तीनों ही ग़ज़ल मुझे रुची हैं.

    भाई पंकजजी ने इस मुशायरे में मुझे स्वीकार कर मुझे कई सुखनवर से परिचित कराया है. जिसका मैं दिल से आभारी रहूँगा.
    इस क़ामयाब तरही मुशायरे की समापन की घोषणा आश्वस्तिभरी है.

    भाईदूज की तस्वीरों से अपनत्व सरसता हुआ दीख रहा है. भाई-बहनों को स्नेहाशीष.
    --सौरभ पाण्डेय, नैनी, इलाहाबाद (उप्र)

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  9. @अशोक जी
    आभारी हूँ।
    बस यही कहूँगा कि:
    शम्‍अ जलती है जब तसव्‍वुर में,
    कुछ नया रौशनी में आता है।
    एक शायर कहीं ज़ेह्न में बसा
    इक नया शेर, गुनगुनाता है।

    @सौरभ जी
    आज मैं जो कुछ कह रहा हूँ उस‍के लिये आभारी हूँ प्रोत्‍साहन भरी टिप्‍पणियों का लेकिन उससे अधिक आभार का विषय पंकज भाई का यह ब्‍लॉग ही है। मेरे अंदर का शायर तो बह्र को समझने के प्रयास में बीस वर्ष पहले ही सो गया था। वर्ष 2009 में बस एक दिन यूनीकोड फ़ोन्‍ट पर कुछ तलाशता इस ब्‍लॉग पर आया और एक नयी उर्जा मिली, शायर जाग उठा और बयॉं होने लगा। आज की स्थिति के आप सभी साक्षी हैं।
    मसरूफि़यत नहीं थी मगर सो रहा था मैं
    किसका ख़लल मकाम नया दे गया मुझे।
    ग़ज़ल एक ऐसी विधा है जिसे जितना समझने का प्रयास किया उतना ही और दिखा समझने को। प्रयास जारी हैं।

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  10. अभी से समापन कहाँ गुरुदेव अभी तो भभ्भड कवि और सात गुना सात वाले कवि का आना बाकी है ...
    तिलक राज ने तो आज इतना कुछ दे दिया है की बस आनंद ही लिया जा सकता है ... टिपण्णी करने की तो हमारी कोई बिसात है ही नहीं आज ... पहली गज़ल से बाहर आना ही मुश्किल है आज तो ... बाकी दोनों ग़ज़लें घर ले जा कर पड़नी पड़ेंगी ...

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  11. तिलक जी,
    तरही मुशायरे के लिए एक ग़ज़ल लिख लेने के बाद २७ और शेर लिखना ही कमाल धमाल बात है, और उस पर शे भी एक से बढ़ कर एक और नए नए प्रयोग के साथ
    वाह वा....

    शत शत नमन आपको

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  12. जब तिलकजी को पढ़ा तब समझा
    कैसे गज़लें महकने लगती हैं
    शेर कहते हैं यों चमन में ज्यों
    फ़ाख्तायें चहकनए लगती हैं

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  13. इस बार की दीपावली सिहोर में मनाई तो लगा ही नहीं कि घर से दूर हूँ, लगा कि घर में ही हूँ. परी और पंखुरी तो ज्यादा से ज्यादा मिठाई खिलाने के competition में थी. दोनों को बहुत बहुत प्यार.

    तिलक जी ने अनूठे प्रयोगों से सोच पर बल डाल दिए हैं. वाह वा. प्रयोगों से शेर चमत्कृत हो गए हैं.
    "ख्वाब तो थे....................", मतला लाजवाब है. सुन्दरता चरम पर है.
    "थाम लूं उँगलियाँ ............" उफ्फ्फ्फ़. लफ्ज़ नहीं हैं, इसके लिए. वाह वाह वाह
    "पुरसुकूँ प्यार से भरे रिश्ते........", वाह वा
    "सोचता हूँ बसूँ कहॉं जाकर ......", अच्छा शेर है.
    "कान से कान तक चला क्या है...", बहुत खूब मिसरा है. शेर भी अच्छा बना है.
    इन तीनो ग़ज़लों ने एक नया आयाम दे दिया है.
    बहुत बहुत बधाई तिलक जी.

    गुरुदेव, इस तरही मुशायेरे की पीडीफ पत्रिका का इंतज़ार है, साथ ही भकभौं जी का भी.

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  14. @वीनस
    आभारी हूँ। वातावरण अनुकूल हो तो शेर मॉंद से बाहर निकल ही लेते हैं।
    @राकेश जी
    आभारी हूँ प्रोत्‍साहन के लिये।
    @अंकित
    जि़न्‍दगी का हर पल यूँ जियो कि जैसे इससे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता है। हर पल में आनंद है। भाई ज्‍यादह म्ठिाई खाई तो मेरे जैसे हो जाओगे।

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  15. आदरणीय तिलक जी, दिली दाद कुबूल कीजिए। हर शे’र पूरी ताकत से दहाड़ रहा है। किसी एक को कोट करना बाकियों के साथ अन्याय होगा। क्योंकि हर शे’र अपने अपने जंगल का शे’र है। तीनों ग़ज़लें मुकम्मल हैं दिली दाद कई करोड़ बार कुबूल कीजिए।

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  16. भाई तिलकराज कपूर की ग़ज़लों
    मोहक हैं. बहुत बहुत बधाई.

    आयोजन का समापन न कह कर इसे मैं अगली दीपावली तक स्थग्न कहना अधिक पसन्द करूँगा.

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  17. ये गज़लें पढी तो थी शायद कमेन्ट नही दे पाई वैसे भी तिलक भाइ साहिब की गज़लों पर मेरे शब्द मेरी कलम साथ छोड देती है। गज़लों की शान मे कुछ कहने की हैसियत नही मेरी कलम मे।उन्हें बहुत बहुत बधाई। शुभकामनायें।

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