सोमवार, 13 अप्रैल 2009

बहरे हजज़ के बारे में कई सारी बातें पिछली पोस्‍ट में की थीं, आज उसे कुछ आगे की बात करते हैं ।

कई लोगों को ये शिकायत है कि काफी सारी दूसरी बातें तो हा रही हैं किन्‍तु वो नहीं हो रहा है जो कि होना चाहिये । अर्थात ग़ज़ल की कक्षाएं नहीं लग रहीं हैं । तो उन सभी की शिकायतों को दूर करने के लिये कुछ कुछ कभी कभी ये भी किया जायेगा । दरअस्‍ल में जीवन वैसा नहीं होता है जैसा कि उसे समझा जाता है । जीवन उस ट्रेक पर भी नहीं चलता जिस पर आप उसको चलाना चाहते हैं । मेरे साथ भी वैसा ही कुछ है जीवन मेरे लिये उतना आसान नहीं है जितना दिखाई देता है । एक परेशानी से उबरता हूं तो दूसरी सामने आ जाती है । किन्‍तु फिर याद आती है किसी की कही हुई वो बात कि ईश्‍वर जिसको जितना प्‍यार करता है उसको उतना ही परेशानियां देता है । और फिर नये सिरे से तैयार हो जाता हूं समर के लिये । कई सारे लोग मेरे बारे में जानना चाहते हैं । वे चाहते हैं कि मैं एक पोस्‍ट में अपने बारे में जानकारी उपलब्‍ध करवाऊं । वो पोस्‍ट भी कभी लगाऊंगा और उसका शीर्षक होगा एक असफल कहानी । खैर बस मैं ये बताना चाह रहा था कि मैं जो कभी कभी गुम हो जाता हूं वो अकारण नहीं होता । बस कोई न कोई परेशानी सामने आ जाती है और फिर एक नया युद्ध लड़ने निकल जाता हूं ।

पिछली बार मैंने बात की थी बहरे हजज़ के बारे में और आज उसको ही थोड़ा बढ़ाने का काम किया जाये । बहरे हजज़ की बात करने के पहले कुछ पहले से बताये गये शब्‍दों के बारे में हम फिर से बात कर लेते हैं । जब हम बहरों की बात करते हैं  तो कुछ शब्‍द बार बार आते हैं । जैसे सबसे पहले बात करते हैं मुसमन, मुसद्दस, मुरब्‍बा  की । उनके बारे में पहले ही बात चुका हूं कि यदि हमारे मिसरे में चार रुक्‍न हैं तो हमारी बहर का नाम में मुसमन  शब्‍द लगाया जायेगा । ये इस बात का प्रतीक होगा कि आपकी ग़ज़ल में चार रुक्‍न वाले मिसरे हैं । उसी प्रकार यदि तीन रुक्‍न हैं तो उसको मुसद्दस कहा जायेगा एवं दो रुक्‍न में मुरब्‍बा   नाम होगा । अब बात करते हैं सालिम और मुजाहिफ नामों की । हर बहर के कुछ स्‍थाई रुक्‍न होते हैं । जैसे बहरे हजज़ का स्‍थाई रुक्‍न है 1222 मुफाईलुन । अब यदि कोई ग़ज़ल ऐसी है जिसमें कि सभी रुक्‍न 1222 ही हैं तो उसको हम कहेंगें सालिम बहर । यदि बहर 1222-1222-1222-1222  है तो उसका नाम हो जायेगा बहरे हजज़ मुसमन सालिम । नाम को गौर से देखें तो आप पायेंगें कि चूंकि चार रुक्‍न हैं सो बहर मुसमन  है चारों रुक्‍न 1222 हैं तो ये सालिम बहर है तथा रुक्‍न मुफाईलुन  हैं अत: ये बहरे हजज़ है। तो इस प्रकार नाम हुआ  बहरे हजज़ मुसमन सालिम । यदि किसी ग़ज़ल में रुक्‍न 1222-1222-1222  हैं तो उसका नाम होगा  बहरे हजज़ मुसद्दस सालिम  उसमें केवल मुसमन के स्‍थान पर मुसद्दस आ गया है वो इसलिये कि रुक्‍न अब चार के स्‍थान पर तीन ही हैं । यदि रुक्‍न 1222-1222  हैं तो उस बहर का नाम होगा  बहरे हजज़ मुरब्‍बा सालिम  चूंकि दो ही रुक्‍न हैं इसलिये ये मुरब्‍बा हो गया । आइये अब एक ही बात को तीन प्रकार के मिसरों में ढाल कर देखते हैं कि तीन सालिम बहरें कैसी होती हैं ।

नहीं जाना कहीं भी तुम हमें यूं छोड़कर देखो ( 1222-1222-1222-1222 मुफाईलुन-मुफाईलुन-मुफाईलुन-मुफाईलुन) बहरे हजज़ मुसमन सालिम

नहीं जाओ हमें यूं छोड़कर साजन ( 1222-1222-1222 मुफाईलुन-मुफाईलुन-मुफाईलुन ) बहरे हजज़ मुसद्दस सालिम

नहीं जाना कहीं अब तुम ( 1222-1222 मुफाईलुन-मुफाईलुन ) बहरे हजज़ मुरब्‍बा सालिम

तो ये आपने देखा उदाहरणों से कि किस प्रकार से तीन सालिम बहरें बनती हैं । ये बहरे हजज़ की तीन सालिम बहरें हैं । सालिम का अर्थ ये कि तीनों में ही स्‍थाई रुक्‍न मुफाईलनु  का ही दोहराव किया गया है इसके अलावा कोई भी दूसरा रुक्‍न नहीं है । यदि दूसरा रुक्‍न आ जाता है तो उसको फिर सालिम न कह कर कहा जायेगा मुजाहिफ बहर ।  बहरे हजज़ का स्‍थाई रुक्‍न चूंकि मुफाईलुन है इसलिये बहरे हजज़ में यदि कोई दूसरा रुक्‍न भी उपयोग किया जायेगा तो वो भी इसी प्रकार की ध्‍वनि का ही होगा । या हम ये कह सकते हैं कि मुफाईलुन  में ही कुछ कम बढ़ कर जो रुक्‍न बने और जो लगभग इसी प्रकार की ध्‍वनि उत्‍पन्‍न करे वो ही रुक्‍न यहां पर उपयोग में लाये जाते हैं । मगर उस स्थिति में बहर सालिम न रह कर मुजाहिफ हो जायेगी । अब ये समान ध्‍वनि वाले कितने रुक्‍न हो सकते हैं उनको भी देख लें ।

1  सबसे पहले तो हम ये देखते हैं कि मुफाईलुन  में से एक मात्रा कम करने पर क्‍या क्‍या समान ध्‍वनि वाले रुक्‍न आते हैं।

अ) प्रथम लघु को हटा देना 222 मफऊलुन

ब) अंतिम दीर्घ में से एक लघु को कम कर देना ताकि वो लघु रह जाये 1221 मुफाईलु

स) तीसरे दीर्घ में से एक लघु को कम कर देना ताकि वो लघु रह जाये 1212 मुफाएलुन

2 अब हम ये देखते हैं कि दो मात्राएं कम करके कितने समान ध्‍वनि के रुक्‍न बनाये जा सकते हैं ।

अ) अंतिम दीर्घ को पूरी तरह से हटा देना 122 फऊलुन

ब) एक मात्रा प्रारंभ की और एक तीसरे दीर्घ में से हटाना 212 फाएलुन

स) एक मात्रा प्रारंभ की और एक अंतिम दीर्घ में से हटाना 221 मफऊलु

तो ये होते हैं कुछ समान ध्‍वनि वाले रुक्‍न जो कि बहरे हजज़ में उपयोग किये जा सकते हैं इनके अलग अलग नाम हैं जिनकी चर्चा हम अगली पोस्‍ट में करेंगें । किन्‍तु इनके उपयोग करने की हालत में हमारी बहर सालिम न रह कर मुजाहिफ हो जायेगी ।

अब हम ये सालिम और मुजाहिफ को और समझ ते हैं एक आसान उदाहरण से । जैसे सोना, चांदी, तांबा ये सारी धातुएं हैं शुद्ध धातुएं इनको सालिम धातुएं कहा जा सकता है क्‍योंकि उनके संगठन में एक ही तत्‍व है । किन्‍तु पीतल एक मिश्र धातु है जिसमें एक से अधिक तत्‍व हैं जिनको मिलाकर पीतल बनाया गया है । इसे कहा जायेगा मुजाहिफ धातु । एक और उदाहरण जब आप खाली कोक पी रहे हैं तो आप सलिम पी रहे है किन्‍तु यदि आपने स्‍वाद बदलने के लिये कोक में आरेंज कोला भी मिला कर काकटेल बना लिया तो आपने मुजाहिफ कर दिया । मिश्र करना अर्थात मुजाहिफ कर देना ।

चलिये आज के लिये इतना ही आज मन काफी उदास है किसी काम में मन नहीं लग रहा था सो शायद आज की पोस्‍ट कुछ बोझिल होगी । कुछ दिनों से मन यूं ही सा हो रहा है ।

तरही मुशायरे के लिये अभी केचल एक ही ग़ज़ल मिली है आशा है जल्‍द ही सबका काम मिल जायेगा । मिसरा तो याद ही होगा । कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी । 212 -1222-212-1222 रदीफ है 'की खामोशी' तथा काफिया बनेगा 'अर' ।

इस अंधेरे में उदासी में भी कुछ बातें ऐसी होती हैं जो कि सुकून दे जाती हैं । गुणीजनों की प्रशंसा राह की धूप में साया बन कर सर पर आ जाती है । प्रकाश अर्श के ब्‍लाग पर श्रद्धेय महावीर जी की अपने बारे में लिखी ये टिप्‍पणी मन को छू गई अभिभूत कर गई ये वो एहसास है जो हर उदासी हर अंधेरे पर भारी पड़ जाता है । महावीर जी की उसी टिप्‍पणी के साथ आज का समापन ।

प्रकाश, एक बात पर आप से सहमत नहीं हूं जब यह कहा कि "जब गुरू जी को नवलेखन के लिए सभागार के सबसे अगली पंक्ति मे बैठने को कहा गया तो ...." मैं आप से पूछता हूं कि आपको इस बात में आश्चर्य क्यों हुआ? क्या आपको साहित्य-जगत के दिग्गजों की श्रेणी में सुबीर जी के स्थान में संशय था? मैं पहले भी अन्यत्र कह चुका हूं कि ज्ञान पीठ का जो सम्मान मिला है, वे उसमें संशय या विस्मय की बात नहीं है क्योंकि वे इसके योग्य हैं। भई, कोई अचंभे की बात नहीं है, उनका स्थान तो पहली पंक्ति में होना ही था।

7 टिप्‍पणियां:

  1. गुरूदेव आपने लिखा आज मन उदास है.....बाल्मीकि का मन उदास हुआ तो हमें रामायण मिली (एक अच्छी गज़ल की उम्मीद तो कर ही सकता हूं )...पंत जी ने लिखा है-वियोगी होगा पहला कवि... तो वेदना काव्य का आवश्यक तत्तव जान पड़ती है...साधक नलिनिकांत ने कहा है-संसार मेरा पहला गुरु है जिसने अपने घात-प्रतिघात से काफ़ी कुछ सीखाया है। मैं नलिनिकांत से सौ प्रतिशत राजी हूं। असल में जब मन उदास हो तो या तो इनसान टूट जाता है या उसे भीतर की दृष्टि उपलब्ध होती है। अंतर्दृष्टि का काव्य से गहरा संबंध है... कबीर कहते हैं-
    कर बहियां बल आपनी छाड़ि वीरानी आस
    जाके आंगन है नदी सो कस मरे पियास
    पूछ सकता हूं, गीत-गज़लों की नदियां रखनेवाला प्यासा क्यों है?

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  2. गुरु देव सादर चरण स्पर्श,
    आज की आपकी कक्षा में आपने जो बहरे-हजज के बारे में बताया है मेरे दिमाग में पूरी तरह से बैठ गया है चुकी मेरी पिछली ग़ज़ल भी बहरे-हजज मुसमन सालिम की है तो आज की कक्षा तो मैं पूरी तरह समझ गया ..चुकी ये सारी बातें आपने मुझे बातो बातों में ही समझा दिया था उस वक्त...इस बात को पूरी तरह से जहन में बिठा लिया है मैंने..सालिम मुसद्दस और मुरब्बा के बारे में ...

    गुरु देव आपका मन उदास क्यूँ है मैं समझ नहीं पा रहा हूँ ऊपर वाला आपको कोई कष्ट ना दे कभी और हमेशा ही सलामत रखे यही प्रार्थना करता हूँ ...

    गुरु देव आपके साहित्यक ज्ञान पे कोई शक करे ये कैसा हो सकता है आप तो प्रभु है ... हालाकि मेरे लेखन में थोडी सी बात उस रपट में लोगों को कन्फ़ुसोन में डाल देता है के आपके आगे बैठने पे मुझे आश्चर्य नहीं बल्कि मैं प्रफूल्लित हुआ था और भावबिभोर जो अपने आप में मुकम्मल शब्द है किसी को भी भाव से भरने के लिए अगर मैने ये बात छुपाई के मैं तो ये लिखना चाहता था के आपके आगे बैठने को जब कहा गया तो मेरे आँखें नाम हो गई मैं इतना खुश हो गया था ... आप तो जानते ही है के उस वक्त वहां पे श्रीमती शीला दीक्षित आने वाली थी जिसके चलते लोग ... अपने आपको उनके करीबी बताने में आगे रहने के लिए दिखाने मात्र के लिए आगे वाले सिट पे काबिज थे ... श्रेष्ठ और बिशिष्ट रचनाकार श्री महावीर को सादर प्रणाम करते हुए मैं यही कहना चाहता हूँ के मेरे प्रफूलित और भावबिभोर होने से मेरी आँखे छलक आई थी , मेरे इन दोनों शब्द को उन्होंने समझा नहीं ... हालाकि वो भी सही कह रहे है आपके बारे में और आपके साहित्य के बारे में क्या कोई कहेगा... मेरे इन दोनों शब्दों ने लोगों को कनफुस किया होगा इसके लिए क्षमा चाहूँगा... स्वयम आदरणीय श्री महावीर जी हमेशा आपकी तारीफ़ करते है ... आप तो श्रेष्ठ है उत्तम है इस एक लाबय के गुरु है साथ ही मेरे प्रभु है ...

    भगवान् आपको किसी तरह की कोई परेशानी नहीं दे बल्कि उनको मुझे देदे.. क्या मैं उसका कभी प्यारा नहीं .. आपके ही शब्द में ...

    गुरु जी एक सवाल ...

    हिकारत से यूँ रस्ते में मुझे जालिम ना देखा कर
    मुहबात इस कदर ना कर कोई मगरूर हो जाए...

    इस में हमने यूँ को लघु में लिया है जब की आपने अपने उदाहरण में इसे दीर्घ में लिया है ... क्या इस यूँ को हम मात्र के हिसाब से गिरा भी सकते है ...क्यूँ के यूँ ,ज्यूँ ये सभी तो पहले से ही गिरने के बाद दीर्घ में आते है ?

    आपका
    अर्श

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  3. गुरु जी प्रणाम
    आप आये बहार आई
    बहुत विस्तार से बताया आपने हजज के बारे में
    मैं रविकांत जी की बात से सौ प्रतिशत सहमत हूँ
    इस सहमती का एक बड़ा कारण यह भी है की इस बात को मैंने भी अनुभव किया है
    जब मन उदास होता है तब ही कोई गजल या और कुछ लिख पाता हूँ
    नवरात्र के बाद से मेरे साथ कुछ ऐसा हो रहा है की जिस काम में हाँथ डालता हूँ माँ दुर्गे की कृपा से व आप गुरुजन के आशीर्वाद से सफलता मिली है मगर एक नुक्सान ये है की खुश रहता हूँ जी कारण लेखनी छुट गई है लिखने का प्रयास करता हूँ तो दिमाग में कुछ आता ही नहीं तरही गजल के लिए अब तक केवल काफिया ही सोंचा है क्या करून कुछ लिख ही नहीं पा रहा हूँ
    अगर आपकी पोस्ट न देखी होती तो आज मैं आपको ४ पन्ने की मेल लिखने वाला था क्या लिखता ये तो मुझे भी पता नहीं ...
    बेसब्री से इंतज़ार रहेगा आपकी उस पोस्ट की जिसमे खुद को प्रस्तुत करेंगे
    आपका वीनस केसरी

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  4. गुरुदेव..........आपकी व्याख्या बहुत ही साफ़ है ग़ज़ल के बारे में...........पर लगता है जबतक आमने सामने बैठ कर नहीं समझेंगे समझ आना मुश्किल है .......पर प्रयास जारी है कभी तो सीख ही जायेंगे ...........आपका शुक्रिया हमारे जैसे मूढ़ के साथ माथा ठुकाई का

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  5. देर रात गये अभी लौटा हूँ....विगत दो दिनों से लगातार बाहर था...लगभग 49 घंटे बाद अपने बिस्तर पर हूँ...पहले तो मेल में अपनी उस अदनी-सी ग़ज़ल पर आपके द्वारा इतनी विस्तृत चरचा देख कर ही सारी थकान दूर हो गयी था....फिर अपने इस सबसे प्यारे ब्लौग पर आया तो आपकी उदासी एकदम से इस लैपटाप के स्क्रीन से छन कर यहाँ इस ऊँची पहाड़ी पर मुझे भिगो गयी है...
    हज़ज की इस बारिकी को समझने फिर से आना पड़ेगा, फिलहाल अभी सोच रहा हूँ कि इतनी रात गये आपको फोन करना उचित है या नहीं?
    "एक असफल कहानी" के इस बेमिसाल महानायक से मिलने को बेताब है मन....इतना तो यकीन से कह सकता हूँ, कहानी का शिर्षक भले ही ’असफल’ शब्द से जुड़ा होगा, किंतु उसके नायक के हौसले-विनम्रता-ज़ज्बे और ग्यान के अनूठे भंडार के समक्ष तो ’सफलता’ को नाचना ही होगा....

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  6. जी शुक्रिया, इस पोस्ट के लिये
    मुझे ऐसा लग रहा है, के ये सब याद कैसे रहेगा
    और आपके ब्लाग पर मुझे गज़ल की कक्षाओं के पोस्ट कम ही मिले
    यही एक पोस्ट मिला, बाकी जगह तो मुशायरा ही चल रहा है

    और पोस्ट हों तो बताइयेगा : yogesh249@gmail.com

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  7. बहुत शुक्रिया इस तरह के पोस्ट के लिये। आगे की पोस्ट्स का इंतज़ार है।

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