मुझे भी नहीं पता था कि ये काम मुझे इतना रुचने लगेगा और न ही ये पता था कि इतने सारे छात्र भी मिल जाएंगें । अच्छा लग रहा है अब मुझे बस हाजिरी बराबर भरते रहें और हां अपने प्रश्न ज़रूर भेजते रहें ताकि मुझे भी पता लगे कि बच्चे सीख रहे हैं समझ रहे हैं ।
शेर : वास्तव में उसको लेकर काफी उलझन होती है कि ये ग़ज़ल वाला शेर है या कि जंगल वाला मगर ये उलझन केवल देवनागरी में ही है क्योंकि उर्दू में तो दोनों शेरों को लिखने और उनके उच्चारण में अंतर होता है । ग़ज़ल वाले शेर को उर्दू में कुछ ( लगभग) इस तरह से उच्चारित किया जाता है ' श्रएर' इसलिये वहां फ़र्क़ होता है वास्तव में उसे श्रएर कहेंगे तो जंगल के शेर से अंतर ख़ुद ही हो जाएगा । ये श्रएर जो होता है ये हिंदी के पद के समान ही होता है इसकी दो लाइनें होती हैं इन दोनो लाइनों को मिसरा कहा जाता है श्रएर की पहली लाइन होती है 'मिसरा उला' और दूसरी लाइन को कहते हैं 'मिसरा सानी' दो मिसरों से मिल कर एक श्रएर बनता है । अब जैसे उदाहरण के लिये ये श्रएर देखें 'मत कहो आकाश में कोहरा घना है, ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ' इसमें 'मत कहो आकाश में कोहरा घना है ' ये मिसरा उला है और ' ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है' ये मिसरा सानी है । तो याद रखें जब भी आप श्रएर कहें तो उसमें जो दो मिसरे होंगें उनमें से उपर का मिसरा जो कि पहला होता है उसे मिसरा उला कहते हैं और जिसमें आप बात को ख़त्म करते हैं तुक मिलाते हैं वो होता हैं मिसरा सानी । एक अकेले मिसरे को श्रएर नहीं कह सकते हैं । वो अभी मुकम्मल नहीं है ।
क़ाफिया : क़ाफिया ग़ज़ल की जान होता है । दरअसल में जिस अक्षर या शब्द या मात्रा को आप तुक मिलाने के लिये रखते हैं वो होता है क़ाफिया । जैसे ग़ालिब की ग़ज़ल है ' दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है, आखि़र इस दर्द की दवा क्या है ' अब यहां पर आप देखेंगें कि 'क्या है' स्थिर है और पूरी ग़ज़ल में स्थिर ही रहेगा वहीं दवा, हुआ जैसे शब्द परिवर्तन में आ रहे हैं । ये क़ाफिया है 'हमको उनसे वफ़ा की है उमीद जो नहीं जानते वफ़ा क्या है ' वफा क़ाफिया है ये हर श्रएर में बदल जाना चाहिये । ऐसा नहीं है कि एक बार लगाए गए क़ाफिये को फि़र से दोहरा नहीं सकते पर वैसा करने में आपके शब्द कोश की ग़रीबी का पता चलता है मगर करने वाले करते हैं 'दिल के अरमां आंसुओं में बह गए हम वफा कर के भी तन्हा रह गए, ख़ुद को भी हमने मिटा डाला मग़र फ़ासले जो दरमियां थे रह गए' इसमें रह क़ाफिया फि़र आया है क़ायदे में ऐसा नहीं करना चाहिये हर श्रएर में नया क़ाफि़या होना चाहिये ताकि दुनिया को पता चले कि आपका शब्दकोश कितना समृद्ध है और ग़ज़ल में सुनने वाले बस ये ही तो प्रतीक्षा करते हैं कि अगले श्रएर में क्या क़ाफिया आने वाला है । ग़ज़ल के ठीक पहले श्रएर के दोनों मिसरों में क़ाफिया होता है इस श्रएर को कहा जाता ग़ज़ल का मतला शाइर यहीं से शुरूआत करता है ग़ज़ल का मतला अर्ज़ है । क़ायदे में तो मतला एक ही होगा किंतु यदि आगे का कोई श्रएर भी ऐसा आ रहा है जिसमें दोनों मिसरों में काफिया है तो उसको हुस्ने मतला कहा जाता है वैसे मतला एक ही होता है पर बाज शाइर एक से ज़्यादा भी मतले रखते हैं । ग़ज़ल का पहला श्रएर जो कुछ भी था उसकी ही तुक आगे के श्रएरों के मिसरा सानी में मिलानी है । एक और चीज़ है जो स्थिर है ग़ालिब के श्रएर में दवा क्या है, हुआ क्या है में क्या है स्थिर है ये 'क्या है' पूरी ग़ज़ल में स्थिर रहाना है इसको रद्दीफ़ कहते हैं इसको आप चाह कर भी नहीं बदल सकते । अर्थात क़ाफिया वो जिसको हर श्रएर में बदलना है मगर उच्चारण समान होना चाहिये और रद्दीफ़ वो जिसको स्थिर ही रहना है कहीं बदलाव नहीं हो ना है । रद्दीफ़ क़ाफिये के बाद ही होता है । जैसे ''मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोए, बड़ी चोट खाई जवानी पे रोए' यहां पर ' पे रोए' रद्दीफ़ है पूरी ग़ज़ल में ये ही चलना है कहानी और जवानी क़ाफिया है जिसका निर्वाहन पूरी ग़ज़ल में पे रोए के साथ होगा मेहरबानी पे रोए, जिंदगानी पे रोए, आदि आदि । तो आज का सबक क़ाफिया हर श्रएर में बदलेगा पर उसका उच्चारण वही रहेगा जो मतले में है और रद्दीफ़ पूरी ग़ज़ल में वैसा का वैसा ही चलेगा कोई बदलाव नहीं । अच्छा बच्चों आज का सबक याद कर लेना मास्साब कल रविवार की छ़ुट्टी के बा सोमवार को मिलेंगें इंशाअल्लाह। उड़न तश्तरी ने अपने ब्लाग की पंक्तियों को मास्साब के कहने पर दुरुस्त कर लिया उनको मिलते हैं 10 नंबर ( हम लोग के दादा मुनी वाले) ।
Friday, 31 August, 2007
चलिये आज कुछ ग़ज़ल से संबंधित शब्दों की व्याख्या की जाए
प्रस्तुतकर्ता
पंकज सुबीर
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चलिये आज बात करते हैं ग़ज़ल के या यूं कहें कि कविता के चार प्रमुख स्तंभों की
मैंने पहले ही कहा है कि मैं जितना जानता हूं उतना ही सिखाना चाहता हूं । और फि़र मैं ख़ुद भी एक छात्र ही हूं इसलिये यही कहूंगा कि 'सितारों के आगे जहां और भी हैं' मैं आपको एक राह दिखा रहा हूं इसके आगे बहुत कुछ है ।
बात व्याकरण की हिंदी में अरूज़ जिसका मतलब संस्कृत अरूज़ से होता है, जिसे छंद कहा गया और जिसको लेकर पिंगल शास्त्र की रचना की गई जिसमें हिंदी के छंदों का पूरा व्याकरण है । उर्दू में उसे अरूज़ कहा गया । ग़ज़ल में चूंकि बातचीत करने का लहज़ा होता है इसलिये ये छंद की तुलना में ज़्यादा लोकप्रिय हो गई । पिंगल और छन्द के क़ायदे बहुत मुश्किल होने के कारण और मात्राओं में जोड़ घट को संभलना थोड़ा मुश्िकल होने के कारण हिंदी में भी उर्दू का अरूज़ चल पड़ा । अरबी अरूज़ के पितामह अल्लामा ख़लील बिन अहमद थे जो 1300 साल पहले हुए थे यानि 8 वीं सदी में । वे यूनानी ज़बान को जानते थे अत: उन्होंने अरबी अरूज़ की ईज़ाद में यूनानी छंद शास्त्र की मदद ली हालंकि संस्कृत पिंगल तो उनकी पैदाइश के भी पहले का है और वे उसके जानकार भी थे पर आसान होने के कारण उन्होंने यूनानी अरज़ल की मदद ली । अलबरूनी ने अपनी किताब किताबुल हिंद में लिखा है कि पद बनाने का यूनानी तरीका भी वही है जो हिन्दुस्तानियों का है हिंदी में भी दो हिस्से होते हैं जिनको पद कहा जाता है । यूनानी में पदों को रजल कहा जाता है । वही पर ग़ज़ल में भी हैं । एक क़ामयाब शायर होने के लिये चार चीज़ें ज़रूरी हैं विचार, शब्द, व्याकरण और प्रस्तुतिकरण । विचार तभी होंगें जब आप अपने समय की नब्ज़ से परिचित होंगें । मेरे गुरूवार कहते हैं कि क्यों नहीं देखो राखी सावंत को, देखो और उसमें आज के दौर की नब्ज़ टटोलो कि समाज की दिशा क्या है । आज हम तुलसीदास की तरह ' तुलसी अब का होंइगे नर के मनसबदार' कह कर बचनहीं सकते कवि होने के नाते हमारी जि़म्मेदारी है कि हम समाज पर नज़र रखें । शब्द दूसरी चीज़ है जिसकी ज़रूरत है शब्द तभी आते हैं जब अध्ययन होता है, कहीं पढ़ा था मैंने कि यदि आप एक पेज लिखना चाहते हो तो पहले 1000 पेज पढ़ो तब आप में एक पेज लिख्ने की बात आएगी । तो शब्द जो शब्दकोश से आते हैं उनका शब्दकोश तभी समृद्ध होगा जब आप पढ़ेंगें । यहां एक बात कह देना चाहता हूं कि श्ब्द ना तो उर्दू के, फारसी के या संस्कृत के हों जिनका अर्थ सुनने वाले को डिक्शनरी में ढूंढना पड़े, वे ही शब्द लें जो आम आदमी के समझ में आ जाए क्योंकि कविता उसी के लिये तो लिखी जा रही हैं । जैसे ' सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा, इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जाएगा' इसमें सब कुछ वही है जो आम आदमी का है । बात यूं लग रही है कि प्रेमिका की हो रही है पर सोचो तो बात तो राजनीति पर कटाक्ष भी कर रही है , राजनीति को ध्यान में रखकर ये शेर फि़र से देखें । तीसरी चीज़ है व्याकरण जिसको उर्दू में अरूज़ कहा जाता है वो भी ज़रूरी है क्योंकि जब तक रिदम नहीं होती तब तक तो बात भी मज़ा नहीं देती है तो अरूज़ बिना कविता प्रभाव पैदा नहीं करती । निराला की कविता 'वो तोड़ती पत्थर' नई कविता है जो छंदमुक्त होती है पर छंदमुक्त होने के बाद भी उसमें रिदम है ये रिदम पदा होता है व्याकरण से अरूज़ से जो आपको यहां सीखने को मिलेगा । चौंथी चीज़ है प्रस्तुतिकरण ये तो आपके अंदर ही होता है किस तरह से आप अपनी कविता या गज़ल को पढ़ते हैं वो आप पर ही निर्भर है । वैसे जब ग़ज़ल अरूज़ के हिसाब से होती है तो उसमें लय स्वयं ही आ जाती है । अरूज़ की तराज़ू पर ही ग़ज़ल को कस कर देखा जाता है और कसने वाला होता है अरूज़ी जिसे अरूज़ का ज्ञान होता है । आज के लिये इतना ही , आज मेरे शहर में सुबह सात बजे से लाइट नहीं थी इसलिये आज की क्लास देर से ले रहा हूं । कुछ बच्चों की ग़ैर हाज़री लग रही है उड़न तश्तरी की आखि़र समय में लगते लगते बची । नियमित रहिये । जै राम जी की
प्रस्तुतकर्ता
पंकज सुबीर
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Wednesday, 29 August, 2007
विंडोज़ विस्टा में सिक्यूरिटी पर ज़्यादा ध्यान दिया गया है
स्पाय वेयर एक ऐसा साफ्टवेयर होता है जो कि आप से पूछे बिना ही आपके सिस्टम में आ जाता है और आपकी खूफिया जानकारियां दूसरों को भेज देता है । ये चूंकि जासूस की तरह काम करता है आपके पास वर्ड्स आदि उसको भेजता है जिसने आपके पास इसे भेजा है इसीलिये इसको स्पाय वेयर भी कहते हैं । स्पाय का अर्थ किसी रूप में जासूस भी होता है खूफिया जासूस । विस्टा में सबसे पहले तो विंडोज़ डिफेंडर नाम का एक साफ्टवेयर है जो एंटी वायरस तो नहीं है पर ये अच्छा एंटी स्पाय वेयर तो है । ये नेट से आने वाले स्पाय वेयर को रोक देता है । उसके अलावा एक और प्रोटेक्शन ये भी है कि विस्टा में आपकी अनुमति के बिना कोई भी प्रोग्राम इंस्टाल नहीं हो सकता है । आप कुछ भी डीलिट कर रहे हों या कुछ भी इंस्टाल कर रहे हों पहले एक परमीशन ग्रांटेड का बैनर आ जाता है जिसमें आपको परमीशन देना पड़ती है कि हां मैं ही ये प्रोग्राम इंस्टाल कर रहा हूं । ये इस मामले में मदद करता है कि नेट से आने वाले स्पय वेयर आपको पता ही नहीं चलता कब आपके सिस्टम में इंस्टाल हो जाते हैं पर अब ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि जब भी कुछ इंस्टाल होना होगा परमीशन का बैनर तो आएगा ही और अगर आप परमीशन नहीं देंगें तो मजाल हैं कि कुछ इंस्टाल हो जाए आपके सिस्टम में । इस तरह से ये दो लेवल की सिक्यूरिटी दी गई है आपको विस्टा में हां मगर आपको एंटी वायरस तो फिर भी डालना ही पड़ेगा । मगर मैं आपको बता दूं के विंडोज डिफेंडर भी बहुत अच्छी तरह से काम करता है और काफी ब्लाकिंग करता है । आप सभ भी मेंरी तरह से ही इंटरनेट कीट हैं अत: आपको सलाह दूंगा कि आप भी अपने सिस्टम मे अच्छा एंटी वायरस डाल कर रखें और उसको नेट से अपडेट भी करते रहें ।
अंत में एक बात मेंरे एक मित्र साफ्टवेयर को अंग्रेज़ी में साफ्टवियर लिखते हैं शायद वे समते हैं कि कम्प्यूटर की अंडरवियर साफ्टवियर है ।
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पंकज सुबीर
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सभी का आभार और ये भी कि मास्टर साहब रोज़ हाज़री लेंगें ग़ज़ल की क्लास में
कल मैंने कुछ बताया था ग़ज़ल के बारे में । काफ़ी लोग हैं जो मेरे बारे में जानना चाह रहे हैं वैसे मैं बता दूं कि मेरे ब्लाग पर मेरी संपूर्ण जानकारी है मेरा मोबाइल नंबर और लेंड लाइन नंबर भी वहां है । फि़र भी आज की क्लास करने से पहले मैं अपने बारे में बता दूं कि मैं व्यवसाय से पत्रकार और कम्प्यूटर हार्डवेयर तथा नेटवर्किंग का प्रशिक्षक हूं साथ में मैं ग्राफिक्स और एनीमेशन का भी प्रशिक्षण देता हूं । पत्रकारिता में मैं चैनलों के लिये फ्री लांसिंग करता हूं । उसके साथ में कवि हूं मंचों का संचालन करता हूं और वहां पर ओज की कविताएं पढ़ता हूं । ग़ज़ल से मेरा जुड़ाव काफी पुराना है वर्तमान में उर्दू अकादमी मप्र से जुड़ा हूं तथा उनके मुशायरों में जाता रहता हूं । वैसे साहित्य में मेरी पहचान एक कहानीकार के रूप में है हंस के जुलाई 2004 अंक, कादम्बिनी के मई 2007 अंक, नया ज्ञानोदय के जून 2007 अंक, वागर्थ के अक्टूबर 2004 और दिसम्बर 2005 अंक आदि में आप मेरी कहानियां पढ़ सकते हैं । अपना एक शाम का पेपर क्षितिज किरण भी निकालता हूं ।
खैर अपने बारे में बाद में भी बताता रहूंगा आज की क्लास को शुरू करते हैं क्योंकि वैसे भी काफी लेट हो चुके हैं ।
सबसे पहले तो मैं कविता के बारे में बात करना चाहता हूं । इसलिये क्योंकि ग़ज़ल भी एक कविता है । डॉ विजय बहादुर सिंह के अनुसार राजनीति में कोई भी सत्ता पक्ष और विपक्ष नहीं होता जो भी राजनीति में है वो सत्ता पक्ष में ही है दरअसल में तो विपक्ष में होती है जनता । इस विपक्ष में खड़ी जनता के पास विचार तो होते हैं परंतु शब्द नहीं होते हैं । ऐसे मैं इस जनता को शब्द देने का काम करते हैं कवि । इसीलिये कवि हमेशा ही विपक्ष में होता है । किसी भी समय का इतिहास जानने के लिये उस समय का साहित्य पढ़ा जाता है और उससे अनुमान लगाया जाता है कि उस समय का साहित्य क्या कह रहा है । जब ये कवि जनता के विचारों को अभिव्यक्ति दे देता है तो वो जन कवि हो जाता है जैसे दुष्यंत जब कहते हैं कि हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिये तो वास्तव में वे जनता के भावों को अपना स्वर दे रहे हैं या फिर जब दिनकर जी कहते हैं कि ' आज़ादी खादी के कुरते का एक बटन, आज़ादी टोपी एक नुकीली तनी हुई, फैशन वालों के लिये नया फैशन निकला, मोटर में बांधों तीन रंग वाला चिथड़ा' तो ये स्वर जनता का होने के कारण लोकप्रिय हो जाता है । या फिर धूमिल जब कहते हैं ' क्या आज़ादी तीन थके हुए रंगों का नाम है जिन्हें एक पहिया ढोता है, या इसका और भी कुछ मतलब होता है ' तो ऐसा लगता है देश की सौ करोड़ जनता कवि के स्वर में सत्ता से प्रश्न पूछ रही है ।
इतनी बातें इसलिये कर रहा हूं क्योंकि मैं चाहता हूं कि आप जब ग़ज़ल लिखना शुरू करें तो बात वो न हो जो घिसी पिटी है वही इश्क़ शराब और मेहबूबा, नहीं दोस्तों आज का दौर कवि से कुछ और मांग रहा है । आज का दौर हताशा और निराशा का दौर है लोग राजनीति से परेशान हैं और कोई भी जनकवि नहीं आ रहा जो चीख के कहे ' उठो समय के घर्घर रथ का नाद सुनो, सिंहासन खाली करो के जनता आती है' तो मैं आप सब से यही चाहता हूं कि आप अब से जो भी लिखें उसमें आज का चित्रण हो । उन लोगों के लिये लिखें जिनको आपकी ज़रूरत है उन लोगों के लिये मत लिखें जो शराब के घूंट पीते हुए किसी फाइव स्टार होटल में आपकी ग़ज़लें सुनेंगें।
एक बार फिर दिनकर जी की पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय को संदर्भ लेना चाहूंगा उसमें दिनकर जी कहते हैं 'जिस समाज में कवि उत्पन्न नहीं होते वो अंधों का समाज होता है, वो बहरों को समाज होता है इसीलिये प्रत्येक समाज अपने कवि के आगमन की राह देखता है । राजनीति, तर्क, दर्शन और इतिहास सभी में असत्य का समावेश हो जात है किंतु कवि की लेखनी असत्य का समर्थन नहीं कर सकती'
इसीलिये मैं लाख मात्रा दोष होने के बाद भी दुष्यंत को अपने समय का सबसे बड़ा जनकवि मानता हूं । आप से भी अनुराध है कि कुछ ऐसा लिखें जो लोकरंजन के लिये हो ना कि मनरंजन के लिये ।
पहला लेक्च्ार इसलिये ग़ज़ल से हटकर दिया है क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरे छात्र लकीरों पर चलें 'लीक लीक गाड़ी चले, लीकै चले कपूत, ये तीनों तिरछे चलें शायर, सिंह, सपूत' तो आप आपन ग़ज़लों को रवायतों और परंपराओं से अलग कर लें । कुछ ऐसा लिखे जिसमें अपने समय की गूंज हो, आने वाले समय में सैकड़ों साल बाद जब इतिहास का कोई शोधार्थी आपकी कविता को पलटे तो उसे लगे कि उस समय राजनीति का कितना नैतिक पतन हो चुका था उसे ये न लगे कि चारों ओर शराब पीकर लोग अपनी मेहबूबा के साथ्ज्ञ पड़े रहते थे ।
तो कल मिलेंगें ग़ज़ल की क्लास में कल हम बात करेंगें ग़ज़ल के प्रारंभिक तत्वों की और साथ में होंगें कुछ उदाहरण।
प्रस्तुतकर्ता
पंकज सुबीर
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Tuesday, 28 August, 2007
चलिये आज से शुरू करते हैं ग़ज़ल के बारे में
मैंने कहा था कि कोई भी ग़ज़ल का व्यकरण नहीं सीखना चाहता उस पर काफी टिप्पणियां आईं हैं और उत्साहित होकर मैं आज से शुरू कर रहा हूं । मैं ये तो नहीं कहता कि मैं ग़ज़ल का कोई विशेषज्ञ हूं फिर भी जितना भी जानता हूं उसको आप सब के साथ बांटना चाहूंगा । मेरा ये प्रयास उन लोगों के लिये है जो सीखने की प्रक्रिया में हैं उन लोगों के लिये नहीं जो ग़ज़ल के अच्छे जानकार हैं । वे लोग तो मुझे बता सकते हैं कि मैं कहां ग़लती कर रहा हूं । क्योंकि मैं वास्तव में एक प्रयास कर रहा हूं कि वे लोग जो हिंदी भाषी हैं वे भी ग़ज़ल की ओर आएं । इसलिये क्योंकि मशहूर शायर बशीर बद्र साहब ने ख़ुद कहा है कि ग़ज़ल का अगला मीर या गा़लिब अब हिंदी से ही आएगा । और आजकल मुशायरों में भी हिंदी के शब्दों वाली ग़ज़ल को ही ज़्यादा पसंद किया जाता है । फारसी के मोटे मोटे शब्द अब लोगों को समझ में ही नहीं आते हैं तो दाद कहां से दें । जैसे बशीर बद्र जी का एक शेर है ' रूप देश की कलियों पनघटों की सांवरियों कुछ ख़बर भी है तुमको, हम तुम्हारे गांव में प्यासे प्यासे आये थ्ो प्यासे प्यासे जाते हैं ' ये पूरा का पूरा शेर ही हिंदी मैं है मगर पूरे वज़न में है ये बहरे मुक़्तजब का शेर है । तो अब ये ही होगा आने वाला समय हिंदुस्तानी भाषा का है अब न कुंतल श्यामल चलना है और न ही शबो रोज़ो माहो साल चलना है अब तो वही कविता पसंद की जाएगी जो आम आदमी का भाषा में बात करेगी । मुनव्वर राना और बशीर बद्र जैसे शायरों को उर्दू अदब में बहुत अच्छा मुकाम नहीं दिया जाता है मगर जनता के दिलों में तो उनका आला मुकाम है । इसलिये क्योंकि उन्होने ग़ज़ल को उस भाषा में कहा जिस भाषा में जनता समझ पाए । ये काम तो दुष्यंत ने भी कहा मगर उनकी ग़ज़लों में मात्रा दोष बहुत हैं और मेरे विचार से कविता में भाव और शब्द के साथ व्याकरण भी हो तभी वो संपूर्ण होती है और फिर रह जाता है केवल उसका प्रस्तुतिकरण जो कवि या शाइर पर निर्भर करता है । निदा फाज़ली जैसे लोग हिंदी में ही कह कर आज इतने मक़बूल हो गये हैं । वो लोग जो ग़ज़ल कहना चाहते हैं वो समझ लें कि कोई ज़रूरी नहीं है उर्दू और फारसी के शब्द रखना आप तो उस भाषा में कहें जिस में आम हिन्दुस्तानी बात करता है । मशहूर शायर कै़फ़ भोपाली की बेटी परवीन क़ैफ़ मुशायरों में इन पंक्तियों पर काफी दाद पाती हैं ' मिलने को तो मिल आएं हम उनसे अभी जाकर, जाने में मगर कितने पैसे भी तो लगते हैं ' कहीं कोई कठिन शब्द नहीं हैं जो है वो केवल एक आम भाषा है । एक दो दिन तक तो मैं ग़ज़ल लिखने के लिये आपको तैयार करनी की भूमिका बांधूंगा फिर जब आप तैयार हो जाएंगे तो फिर मैं आपकी क्लास प्रारंभ कर दूंगा । टिप्पणी देने का अनुरोध अब नहीं करूंगा क्योंकि मुझे पता है कि आपको एक बार आदत हो गई तो फिर आप टिप्पणी क्या मेरा मोबाइल नंबर ही मांग लेंगें । एक बात ज़रूर कहना चाहूंगा कि एक सज्जन की टिप्पणी आई है कि आप कितना जानते हैं बहर के बारे में तो मैं ये कहना चाहूंगा कि मैं केवल एक छात्र हूं मैं आलिम फ़ाजि़ल होने का दावा नहीं करता और गर्व भी नहीं करता क्योंकि मैं तो उन पंक्तियों पर विश्वास करता हूं 'देनहार कोइ और है भेजत है दिन रैन, लोग भरम हम पर करें ताते नीचे नैन' में विनम्र हूं और कोई दावा भी नहीं करता हां जितना जानता हूं वो ज़रूर आप तक पहुचा दूंगा ।
प्रस्तुतकर्ता
पंकज सुबीर
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Monday, 27 August, 2007
मुझे नहीं लगता कि किसी को ग़ज़ल का व्याकरण सीखने में दिलचस्पी है
मैंने कहा था कि मैं ग़ज़ल का व्याकरण अब से अपने ब्लाग पर लिखा करूंगा और पूरा व्याकरण लिखूंगा जिसमें उदाहरण सहित बहरें देने के साथ साथ तफ़सील से उनको तोड़ कर भी बताउंगा कि किस प्रकार इनको बनाया गया है । उसके साथ ही मैं ये भी देने का प्रयास करूंगा कि हिंदी और उर्दू के पिंगल में क्या फर्क है । किंतु लगता है कि किसी को सीखने में दिलचस्पी नहीं है मुझे केवल तीन ही टिप्पणियां मिली हैं । मैं इस दुर्लभ विधा को सिखाने की कोई फीस नहीं ले रहा हूं किंतु कम अ स कम टिप्पणियां तो मेरा अधिकार है । फिलहाल मैंने व्याकरण देकर ग़ज़ल सिखाने का इरादा छोड़ दिया है और वो इसलिये कि जब कोई सीखना ही नहीं चाहता तो किसको सिखाया जाए ।
प्रस्तुतकर्ता
पंकज सुबीर
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Saturday, 25 August, 2007
क्या आप भी ग़ज़ल का व्याकरण समझना चाहते हैं
ग़ज़ल को लेकर काफी सारी भ्रांतियां हैं लेकिन एक बात जो ग़ज़ल को लेकर कही जा सकती है वो ये कि ग़ज़ल में कहन बहुत ही सीधी सादी होती है । जिस तरह हिंदी में कविता के लिये पिंगल शास्त्र है वैसे ही उर्दू में ग़ज़ल को लेकर बेहरें होती हैं । और ये आवश्यक होता है कि लिखने वाला उन बेहरों पर ही लिखे उर्दू व्याकरण को उर्दू अरूज़ भी कहा जाता है । ग़ज़ल को मेहबूबा से बातें करना कहा जाता है अब ये बात दो तरह की है अगर ये इश्क हक़ीक़ी है तो मतलब परमात्मा से बातें करना और अगर ये इश्क मजाज़ी है तो मतलब प्रेमिका से बातें करना है । वैसे सूफियों में प्रमिका उस ईश्वर को भी माना गया है और तदानुसार ही ग़ज़लें कहीं गईं हैं । अब बात करें ग़ज़ल की ग़ज़ल जो बहुत सीधे सादे तरीके से अपनी बात कहती है । ग़ज़ल और गीत में फ़र्क़ ये है कि गीत को जहां पूरा का पूरा एक ही भाव को लेकर चलना होता है वहीं ग़ज़ल में हर शेर स्वतंत्र होता है । हर शेर के दो भाग होते हैं पहले भाग को मिसरा उला कहा जाता है तो दूसरे को मिसरा सानी । ग़ज़ल के पहले शेर को मतला कहा जाता है और आखि़र में जो शेर आता है जिसमें शायर का नाम होता है उसे मक्ता कहा जाता है । पूरी की पूरी ग़ज़ल एक ही बहर पे चलती है अर्थात लघु और दीर्घ मात्राओं को क्रम एक सा रहता है यहां हिंदी की तरह जोड़ नहीं चलता । और लघु तथा दीर्घ मात्राओं के छोटे छोटे समेह बनाए जाते हैं जिनको रुक्न कहा जाता है । इन्हीं छोटे छोटे रुक्नों से मिलकर मिसरे बनते हैं ओर मिसरों से शेर और शेरों से पूरी ग़ज़ल । ये रुक्न वास्तव में मात्राओं का एक गुच्छा होता है जिसको एक साथ बोल कर फिर ठहर कर आगे बढ़ा जाता है । उर्दू अरूज़ में बेहरों का ज्ञान होता है । ग़ज़लों में एक फायदा ये है कि यहां मात्राएं उच्चारण के हिसाब ये तय होतीं हैं कहीं दिवाना लिखा जाता है तो कहीं दीवाना । कहीं पर मैं को दीर्घ में लिया जाएगा तो कहीं लघु में और ये आप अपनी सुविधा के अनुसार कर सकते हैं । आज केवल इतना ही लेकिन मैं अब अपने ब्लाग पर उर्दू पिंगल शास्त्र की पूरी माला प्रकाशित करने जा रहा हूं बशर्ते आप सभी का सहयोग तथा उत्साह वर्द्धन टिप्पणियों के रूप में मिले ।
प्रस्तुतकर्ता
पंकज सुबीर
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Friday, 24 August, 2007
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर और संस्कृति के चार अध्याय
वैसे तो मैं दिनकर जी को एक कवि होने के नाते ही जानता था मगर पिछले दिनों मुझे भारत को जानने की उत्सुकता हुई और उसी क्रम मे मैंने भारत एक खोज जैसी कुछ पुस्तकें पढ़ीं । फिर मुझे किसी ने कहा कि भारत को जानना है तो रामधारी सिंह दिनकर की पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय पढ़ो भारत क्या है तुमको ख़ुद ही समझ आ जाएगा । मैंने उसे पढ़ना प्रारंभ किया कुछ ही देर में मेरे लिये मानो सभ्यताओं की परत दर परत खुलनी प्रारंभ हो गई । कितना ज्ञान और कितनी अद्भुत भाषा ऐसा लगता है मानो कोई बाजीगर शब्दों से खेल रहा हो । ईसा पूर्व के 1000 साल से लेकर वर्तमान तक का वर्णन और वो भी इतिहास की शैली में नहीं बल्कि किस्सागो की शैली में करते हुए जब दिनकर जी बढ़ते हैं तो ऐसा लगता है मानो भारत की संस्कृति का पूरा कारवां उनके साथ चल रहा है। कहीं आपको रथों की चाप सुनाइ देती है तो कहीं बोद्ध और महावीर के दर्शन की गूंज । सबसे अच्छी बात ये है कि दिनकर जी कहीं भी किसी को प्रश्नों के घेरे से बाहर नहीं रखते हैं । वे बुद्ध पर महावीर पर हिन्दुत्व पर इस्लाम पर ईसाइयत पर सभी पर सवाल लगाते हुए बढ़ते हैं और साथ में इन सबकी अच्छाइयों पर भी उसी प्रकार प्रकाश डालते हुए चलते हैं । ग्रंथ की विस्तृत चर्चा कभी करूंगा पर अभी तो इतना ही कहना चाहूंगा कि अगर आप भी भारत को जानना चाहते हैं तो एक बार संस्कृति के चार अध्याय ज़रूर पढ़ें।
प्रस्तुतकर्ता
पंकज सुबीर
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अगर आप भी विंडोज विस्टा इस्तेमाल करने जा रहे हैं तो ये जान लीजिये
ये बात मैं एक हार्डवेयर और नेटवर्किंग इंजीनियर की हैसियत से बता रहा हूं और आपसे ये भी कह रहा हूं कि यदि आपको हाड्रवेयर और नेटवर्किंग की कोई भी प्राब्लम हो तो आप कभी भी मुझे संपर्क कर सकते हैं । दरअसल में विस्टा एक ऐसा ऑपरेटिंग सिस्टम है जिसका क्रेज काफी है पर ये अभी समस्याएं काफी पैदा कर रहा है । सबसे पहले तो बात ड्रायवरों की है काफी सारे प्रिंटर और दूसरे सामान ऐसे हैं जिनके ड्रायवर ही नहीं हैं जो विस्टा के साथ काम कर सकें ऐसी हालत में आपका वो हार्डवेयर तो गया काम से । दूसरा प्राब्लम ये है कि अगर आप विसटा का पूरा मजा लेना चाहते हैं तो आपको 64 बिट का विस्टा डालना पड़ेगा और उस हालत में कई सारे साफ्टयेवर ऐसे हैं जो उसके साथ काम ही नही करेंगें । ये बात ज़रूर है कि विस्टा के ग्राफिक्स अदभुत हैं । विस्टा में एक और समस्या जो आ रही है वो ये है कि ये 512 एम बी की रेम पर डल तो जाता है पर प्रापर काम नहीं करता है और फिर इसको इंस्टालेशन के लिये भी करीब 20 जीबी का स्पेस चाहिये अर्थात अगर आपके पास 40 जीबी की हार्ड डिस्क है तो उसका आधा हिस्सा तो विस्टज्ञ ही ले लेगा । साधारण प्रोसेसर अर्थात पेन्टियम 4 पर यदि आप डालना चाहते हैं तो वहां भी समस्या वही है कि काम करने की गति ठीक नहीं मिलती है विस्टा को ड्यूल कोर या कोर 2 प्रोसेसर ही चाहिये ऐसे में सीधा रास्ता तो ये ही है कि आपको नया ही सिस्टम लेना पड़ेगा तभी आप विस्टा के शानदार ग्राफिक्स का मजा ले पाएंगें । शानदार शब्द का प्रयोग मैं जानबूझकर इसलिये कर रहा हूं क्योंकि ये वास्तव में हैं भी । मगर जो सिस्टम आपको चाहिये वो होगा ड्यूल कोर के साथ 1 जीबी रेम कम से कम 80 जीबी की हाड्र डिस्क जिसमें 40 जी बी का सी ड्राइव हो । आजकल मैं जो भी कम्प्यूटर एसेम्ब्ल कर रहा हूं वो इसी कन्फिग्यूरेशन पर कर रहा हूं ताकि सिस्टम विस्टा को सपोर्ट कर सके । शेष कल विस्टा और आफिस 2007 को लेकर आगे की जानकारियां । पंकज सुबीर
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पंकज सुबीर
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Wednesday, 22 August, 2007
जावेद अख्तर द्वारा लगाए गए ठुमके पर अपनी प्रतिक्रियाएं अवश्य दें
मित्रों मैं बहुत व्यथित हूं और मेरी व्यथा है जावेद अख्तर द्वारा इला अरुण के साथ इंडियन आयडोल कार्यक्रम में लगाया गया ठुमका है । मुझे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा है कि जांनिसार अख्तर का बेटा और शायर क़ैफ़ी आज़मी का दामाद और देश का एक मशहूर शायर इस तरह से टके टके के लिये ठुमके भी लगा सकता है । मेरी बात से वो लोग असहमत भी हो सकते हैं जो ये मानते हों कि नृत्य तो एक आनंद की वस्तु है । मगर मेरा कहना ये है कि आनंद की वस्तु तो मन के अंदर से उपजती है और जो पैसों के कारण उपजी हो वो और कुछ भी भले ही हो पर उसे निर्मल आनंद की उपज तो कम से कम मैं नहीं कह सकता सूफियों के यहां पर नृत्य होता है पर वो तो मौत के तसव्वुर में किया गया नृत्य होता है जिसमें मौत के बाद अपनी मेहबूबा अर्थात ईश्वर से मिलने के आनंद में किया जाने वाला नृत्य होता है । अंदर से भावना उठती है और पैर ख़ुद ब ख़ुद थिरकने लगते हैं । उस नृत्य में एक मस्ती होती है । मगर जावेद साहेब आपके तो पैर ही बता रहे थे कि आप जो नृत्य कर रहे हैं उसमें मस्ती तो है पर वो इस नृत्य से मिलने वाले पैसों के आनंद की है । यही मस्ती तो एक तवायफ के नृत्य में भी होती है उसे भी नाच के पैसे मिलते हैं और आपको भी मिले । मैं दुखी इसलिये भी हूं कि मैं भीएक शायर हूं मुशायरों में क़लाम पढ़ने के लिये जाता रहता हूं अभी तक शायर होने के कारण एक ग्रेस एक गरिमा का ऐहसास होता रहा है मुझे और ये ऐहसास लोगों द्वारा किये जा रहे व्यवहार से और भी बढ़ जाता है पर अब, अब तो ऐसा लगता है कि मैं भी भांडों में शामिल हो गया हूं । गरिमा को बना कर रखना हर उस व्यक्ति की जि़म्मेदारी होती है जिस पर लोगों की निगाहें होती हैं । जावेद अख़्तर के ठुमके के बाद मुझे एक शायर के रूप में ऐसा लग रहा है कि मुझे सरे बाज़ार नंगा कर दिया गया हो । आप सब भी क़लम के वीर हैं और आप सब का भी निश्चित रूप से समाज में एक स्थान होगा एक मान होगा सम्मान होगा जो केवल आपके क़लमकार होने के कारण ही होगा । ऐसे में मैं चाहता हूं कि जावेद अख़्तर के ठुमके पर आप अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर भेजें मैं उन सारी प्रतिक्रियाओं को प्रिंट करके जावेद अख़्तर के पास भेजूंगा । ग़ालिब मीर फ़ैज जैसे शायरों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनके बाद आने वाले शायर ठुमके भी लगाएंगें । खैर मन में तो इतना कुछ उबल रहा है कि मैं दिन भर भी लिख सकता हूं पर पहले आपकी प्रतिक्रियाओं में ये देखना चाहता हूं कि मुझसे कितने लोग सहमत हैं । हो सकता है मैं ख़ुद ही ग़लत होउं।
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पंकज सुबीर
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Tuesday, 21 August, 2007
क्या आप भी विरोध के लिये खि़लाफत शब्द का प्रयोग करते हैं
पहले तो काफी समय तक ग़ायब रहने के लिये क्षमा चाहता हूं दरअसल में व्यक्तिगत परेशानियों में उलझ गया था और इसी कारण काफी समय से कोई भी नई पोस्टिंग नहीं कर पाया था । ख़ैर अब सुनिये आज की बात क्या आप भी किसी का विरोध करते समय कहते हैं कि मैं उसकी या वो मेरी खिलाफत कर रहा है अगर करते हैं तो जान लीजिये कि आप बिल्कुल ग़लत कर रहे हैं और ग़लत भी क्या आप तो उल्टा ही कर रहे हैं । दरअसल में खिलाफत शब्द की उत्पत्ति ख़लीफा शब्द से हुई है । इस्लाम में हजरत मुहम्मद साहब को नबी कहा जाता है और उनके बाद जिन लोगों ने इस्लाम की कमान संभाली उन सबको ख़लीफा नाम दिया गया जिसका शाब्दिक अर्थ राजा और धर्म गुरू दोनों का मिला जुला है । लम्बे समय तक ये प्रथा चलती रही ख़लीफा बनाए जाते रहे । शब्द खिलाफत भी इसी ख़लीफा से उपजा है । खिलाफत का अर्थ नेतृत्व होता है । ख़लीफा कर्ता है तो खिलाफत उसकी क्रिया है । अर्थात यदि आप कह रहे हैं कि वो मेरी खिलाफत कर रहा है तो उसका अर्थ ये होगा कि वो मेरा नेतृत्व कर रहा है । हो गया ना एकदम उल्टा । उर्दू में विरोध के लिये मुख़ालफत शब्द होता है खिलाफत नहीं होता है । हजरत मुहम्मद साहब के जाने के बाद क्रमश: हजरत अबू बक्र, हजरत उमर, हजरत उस्मान और हजरत अली खलीफा बने हजरत अली मुहम्मद साहब के दामाद थे । प्रयोग इस तरह किया जाता है कि हजरत उमर की खिलाफत में उस्लाम का प्रचार इन इन देशों में हुआ अब यहां पर खिलाफत का अर्थ नेतृत्व है कि उनके नेतृत्व में इतने देशों में प्रचार हुआ । हजरत अली के पुत्र थे हजरत इमाम हुसैन जिनकी खलीफाई को लेकर इस्लाम शिया और सुन्नी दो धड़ों में बंट गया । पहले पूरी दुनिया के इस्लाम मानने वालों के एक ही ख़लीफा हुआ करते थे मगर बाद में ये परंपरा ख़त्म हो गई । तो ख़लीफा से बने शब्द खिलाफत का जब आप उपयोग करते हैं तो उसका मतलब ये नहीं है कि आप किसी का विरोध कर रहे हैं वास्तव में तो आप उसका नेतृत्व क़बूल कर रहे हैं । तो आज के बाद जब किसी से कहना हो कि मैं आपका विरोध करता हूं तो कहियेगा कि मैं आपकी मुख़ालफत करता हूं ये मत कहियेगा कि मैं आपकी खिलाफत करता हूं ।
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पंकज सुबीर
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Sunday, 12 August, 2007
जागिये कि आज़ादी की शाम न हो जाए, जागिये के देश फिर ग़ुलाम न हो जाए ।
स्वप्न थे दिखाए गए राम राज के, कोडि़यों में बिक रहें हैं नेता आज के ।
राजनीति वैश्यावृत्ति में गई बदल, बिस्तरों के जैसे ये बदल रहे हैं दल ।।
जागिये कि आज़ादी की शाम न हो जाए, जागिये के देश फिर ग़ुलाम न हो जाए ।
लेखक - पंकज सुबीर कवि एवं कहानीकार
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पंकज सुबीर
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