गुरुवार, 30 अगस्त 2007

सभी का आभार और ये भी कि मास्‍टर साहब रोज़ हाज़री लेंगें ग़ज़ल की क्‍लास में

कल मैंने कुछ बताया था ग़ज़ल के बारे में । काफ़ी लोग हैं जो मेरे बारे में जानना चाह रहे हैं वैसे मैं बता दूं कि मेरे ब्‍लाग पर मेरी संपूर्ण जानकारी है मेरा मोबाइल नंबर और लेंड लाइन नंबर भी वहां है । फि़र भी आज की क्‍लास करने से पहले मैं अपने बारे में बता दूं कि मैं व्‍यवसाय से पत्रकार और कम्‍प्‍यूटर हार्डवेयर तथा नेटवर्किंग का प्रशिक्षक हूं साथ में मैं ग्राफिक्‍स और एनीमेशन का भी प्रशिक्षण देता हूं । पत्रकारिता में मैं चैनलों के लिये फ्री लांसिंग करता हूं । उसके साथ में कवि हूं मंचों का संचालन करता हूं और वहां पर ओज की कविताएं पढ़ता हूं । ग़ज़ल से मेरा जुड़ाव काफी पुराना है वर्तमान में उर्दू अकादमी मप्र से जुड़ा हूं तथा उनके मुशायरों में जाता रहता हूं । वैसे साहित्‍य में मेरी पहचान एक कहानीकार के रूप में है हंस के जुलाई 2004 अंक, कादम्बिनी के मई 2007 अंक, नया ज्ञानोदय के जून 2007 अंक, वागर्थ के अक्‍टूबर 2004 और दिसम्‍बर 2005 अंक आदि में आप मेरी कहानियां पढ़ सकते हैं । अपना एक शाम का पेपर क्षितिज किरण भी निकालता हूं ।
खैर अपने बारे में बाद में भी बताता रहूंगा आज की क्‍लास को शुरू करते हैं क्‍योंकि वैसे भी काफी लेट हो चुके हैं ।
सबसे पहले तो मैं कविता के बारे में बात करना चाहता हूं । इसलिये क्‍योंकि ग़ज़ल भी एक कविता है । डॉ विजय बहादुर सिंह के अनुसार राजनीति में कोई भी सत्‍ता पक्ष और विपक्ष नहीं होता जो भी राजनीति में है वो सत्‍ता पक्ष में ही है दरअसल में तो विपक्ष में होती है जनता । इस विपक्ष में खड़ी जनता के पास विचार तो होते हैं परंतु शब्‍द नहीं होते हैं । ऐसे मैं इस जनता को शब्‍द देने का काम करते हैं कवि । इसीलिये कवि हमेशा ही विपक्ष में होता है । किसी भी समय का इतिहास जानने के लिये उस समय का साहित्‍य पढ़ा जाता है और उससे अनुमान लगाया जाता है कि उस समय का साहित्‍य क्‍या कह रहा है । जब ये कवि जनता के विचारों को अभिव्‍यक्ति दे देता है तो वो जन कवि हो जाता है जैसे दुष्‍यंत जब कहते हैं कि हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिये तो वास्‍तव में वे जनता के भावों को अपना स्‍वर दे रहे हैं या फिर जब दिनकर जी कहते हैं कि ' आज़ादी खादी के कुरते का एक बटन, आज़ादी टोपी एक नुकीली तनी हुई, फैशन वालों के लिये नया फैशन निकला, मोटर में बांधों तीन रंग वाला चिथड़ा' तो ये स्‍वर जनता का होने के कारण लोकप्रिय हो जाता है । या फिर धूमिल जब कहते हैं ' क्‍या आज़ादी तीन थके हुए रंगों का नाम है जिन्‍हें एक पहिया ढोता है, या इसका और भी कुछ मतलब होता है ' तो ऐसा लगता है देश की सौ करोड़ जनता कवि के स्‍वर में सत्‍ता से प्रश्‍न पूछ रही है ।
इतनी बातें इसलिये कर रहा हूं क्‍योंकि मैं चाहता हूं कि आप जब ग़ज़ल लिखना शुरू करें तो बात वो न हो जो घिसी पिटी है वही इश्‍क़ शराब और मेहबूबा, नहीं दोस्‍तों आज का दौर कवि से कुछ और मांग रहा है । आज का दौर हताशा और निराशा का दौर है लोग राजनीति से परेशान हैं और कोई भी जनकवि नहीं आ रहा जो चीख के कहे ' उठो समय के घर्घर रथ का नाद सुनो, सिंहासन खाली करो के जनता आती है' तो मैं आप सब से यही चाहता हूं कि आप अब से जो भी लिखें उसमें आज का चित्रण हो । उन लोगों के लिये लिखें जिनको आपकी ज़रूरत है उन लोगों के लिये मत लिखें जो शराब के घूंट पीते हुए किसी फाइव स्‍टार होटल में आपकी ग़ज़लें सुनेंगें।
एक बार फिर दिनकर जी की पुस्‍तक संस्‍कृति के चार अध्‍याय को संदर्भ लेना चाहूंगा उसमें दिनकर जी कहते हैं 'जिस समाज में कवि उत्‍पन्‍न नहीं होते वो अंधों का समाज होता है, वो बहरों को समाज होता है इसीलिये प्रत्‍येक समाज अपने कवि के आगमन की राह देखता है । राजनीति, तर्क, दर्शन और इतिहास सभी में असत्‍य का समावेश हो जात है किंतु कवि की लेखनी असत्‍य का समर्थन नहीं कर सकती'
इसीलिये मैं लाख मात्रा दोष होने के बाद भी दुष्‍यंत को अपने समय का सबसे बड़ा जनकवि मानता हूं । आप से भी अनुराध है कि कुछ ऐसा लिखें जो लोकरंजन के लिये हो ना कि मनरंजन के लिये ।
पहला लेक्‍च्‍ार इसलिये ग़ज़ल से हटकर दिया है क्‍योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरे छात्र लकीरों पर चलें 'लीक लीक गाड़ी चले, लीकै चले कपूत, ये तीनों तिरछे चलें शायर, सिंह, सपूत' तो आप आपन ग़ज़लों को रवायतों और परंपराओं से अलग कर लें । कुछ ऐसा लिखे जिसमें अपने समय की गूंज हो, आने वाले समय में सैकड़ों साल बाद जब इतिहास का कोई शोधार्थी आपकी कविता को पलटे तो उसे लगे कि उस समय राजनीति का कितना नैतिक पतन हो चुका था उसे ये न लगे कि चारों ओर शराब पीकर लोग अपनी मेहबूबा के साथ्‍ज्ञ पड़े रहते थे ।
तो कल मिलेंगें ग़ज़ल की क्‍लास में कल हम बात करेंगें ग़ज़ल के प्रारंभिक तत्‍वों की और साथ में होंगें कुछ उदाहरण।

7 टिप्‍पणियां:

  1. गुरूजी प्रणाम।

    कृपया हमें भी अपनी क्लास में शामिल कीजिए,
    अच्छा मीटर सच्ची लाईन लिखने के काबिल कीजिए,

    आज से आपका नियमित छात्र।

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  2. धन्‍यवाद अभिनव आप का स्‍वागत है सुबीर ग़ज़ल तथा कविता प्रशिक्षण केंद्र में । आशा है आपको हमारे कंद्र से निराशा नहीं होगी।

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  3. आप की पहली सीख बहुत महत्वपूर्ण है..सच है आज हम जो लिखते है वह मात्र...शराब, शबाब और निजि प्रेम प्रसंगो का ही बखान मात्र होता है।आप सही कहते हैं कवि को जनता की आवाज बनना चाहिए।...आप की अगली पोस्ट की प्रतिक्षा है...

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  4. बहुत अच्छा लिखा है.
    -राजीव भरोल

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  5. जी ...
    समझ में आया
    मानसिक रूप से रचनाकर्म की दिशा तय करना बहुत जरूरी होता है ... मै तैयार हो रहा हूँ

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  6. Bahut sahi kaha guru ji. Lekin mujhe Lagta hai Ki kavi jab shuru karta hai to apne gham se shuru karta hai

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