मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

होली का त्योहार सामने है रंग गुलाल की दुकानें सजने लगी हैं, आइये अपनी दुकान सजाना भी आज से शुरू करते हैं आदरणीय राकेश खंडेलवाल जी और द्विजेन्द्र द्विज जी के साथ

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मित्रो, परंपराएँ त्योहारों के साथ ही चल रही हैं, और कितने दिन चलती हैं, अब कुछ कहा नहीं जा सकता। असल में एक प्रकार का ठंडापन चारों तरफ पसर गया है। ठंडेपन का मूल है यह भाव कि –ऐसा करने से क्या हो जाएगा ? होली मना लें, मनाने से भी क्या हो जाएगा ? नाच-गा लें, नाच गाने से भी क्या हो जाएगा ? तरही के लिए ग़ज़ल लिख दें, ग़ज़ल लिखने से भी क्या हो जाएगा ?  यह जो भाव है न कि –ऐसा करने से भी क्या हो जाएगा ? यह ही हमको जीवन का आनंद लेने से रोक देता है। यूँ तो कुछ भी करने से कुछ भी नहीं होता, लेकिन उसके कारण क्या हम सब कुछ करना ही छोड़ दें? यूँ तो साँस लेने से भी क्या हो जाएगा? साँस लेने से भी फ़र्क क्या पड़ रहा है। मगर इन सबके बीच में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कहते हैं –कुछ होता हो य न होता हो, हमें तो करना है, हमें तो होली मनाना है, हमें तो आनंद लेना है, हमें तो तरही के लिए ग़ज़ल कहना है। ये दीवाने, पागल, खब्ती, सनकी लोग होते हैं, जो दुनिया को रहने योग्य बनाए रखते हैं। हमारी तरही का काम भी ऐसे ही पागलों से चलता है। जो हर बार तरही की घोषणा के साथ ही बिना यह सोचे कि –इससे क्या हो जाएगा ? ग़ज़ल लिखने में जुट जाते हैं। मित्रो कुछ भी करने से कुछ भी नहीं होता, लेकिन फिर भी जीवन में बहुत कुछ करते रहना पड़ता है। जीवन एक निरंतरता का नाम है। जो मित्र तरही में रचनाएँ भेज देते हैं यह आयोजन असल में उनके ही लिए होता है। जब तक एक भी मित्र रचना भेजेंगे तब तक यह आयोजन चलाने की कोशिश की जाती रहेगी। असल में जीवन उपस्थित का उत्सव होता है, अनुपस्थित का सोग नहीं। हमें उपस्थितों का सम्मान करना चाहिए, उसकी जगह हम अनुपस्थितों की अनुपस्थिति पर प्रतिक्रिया देने में लगे रहते हैं। अनुपस्थिति का अर्थ शून्य नहीं होता। जीवन का कारोबार हमेशा चलता रहता है। एक दिन हम सब अनुपस्थित हो जाएँगे, यह दुनिया फिर भी चलती रहेगी।

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इसे देखेंगे तो अपनी जवानी याद आएगी

आइये आज होली की भूमिका बनाते हैं दो ऐसे रचनाकारों के साथ, जो दो अलग-अलग विधाओं के विशेषज्ञ हैं। दोनो की रचनाएँ 24 कैरेट स्वर्ण से निर्मित होती हैं। चूँकि दोनों की इस बार एक से अधिक रचनाएँ प्राप्त हुई हैं इसलिए हम इनसे शुरुआत भी कर रहे हैं और आगे भी कुछ और रचनाएँ इनकी हम लेंगे। होली का त्योहार सामने है रंग गुलाल की दुकानें सजने लगी हैं, आइये अपनी दुकान सजाना भी आज से शुरू करते हैं आदरणीय राकेश खंडेलवाल जी और द्विजेन्द्र द्विज जी के साथ। आज राकेश जी का गीत और द्विज जी की ग़ज़ल के साथ होली महोत्सव का दीप प्रज्जवलित हो रहा है।

rakesh khandelwal ji

राकेश खंडेलवाल जी

चली फगुनाइ होकर चंद्रिकाए आज रंगों से
नज़ारा देख चैती दूर से ही मुस्कुराते है
हवा मदहोशियों की धार में डुबकी लगा निकली
फिजाये ओढ़ कर खुनकेँ जरा सी लड़खड़ाती हैं
खड़े हो पंक्तियों में देखते हैं खेत के बूटे
सुनहरी शाल ओढ़े कोई बाली लहलहायेगी
उसे देखेंगे तो अपनी जवानी याद आएगी

हरे परिधान में लिपटी हुई इक रेशमी काया
छरहरी ज्वार के पौधे सरीखी लचकचाती है
उसे आलिंगनों में बांध कर मधुप्रेम की धारा
भिगोती और धीरे से ज़रा सा छेड़ जाती है
हुई असफल छुपाने में वो तर होते हुई अंगिया
लजाकर आप अपने में सिमटती थरथराएगी
इसे देखेंगे तो अपनी जवानी याद आएगी

चलेगी नंद की अंगनाइयों से गोप की टोली
गली बरसानिया बादल उमंगों के उड़ाएंगी
दुपहारी खेल खेलेगी नए कुछ ढाल कोड़े के
घिरी संध्या मिठाई की कईं थाली सजायेगी
हुए है आज इतिहासी ये बीते वक्त के पन्ने
छवि, है आस इस होली पे फिर से जगमगाएगी
इसे देखेंगीं तो अपनी जवानी याद आएगी

नहीं दिखती गुलालों की वो मुट्ठी लाल पीली अब
न दिखते नाद में भीगे कही भी फूल टेसू के
न भरता कोई पिचकारी न ग़ुब्बारे हैं रंग वाले
न दिखते मोतियों को झारते वे गुच्छ गेसू के
पुरानी कोई छवि आकर निगाहों में समाएगी
इसे देखेंगे तो अपनी जवानी याद आएगी

अब ऐसे गीत पर क्या कहा जाए ? आनंद का पूरा उत्सव ही है यह गीत तो। होली के माहौल को अपने शब्द रंगों से सजाता, गीत गुनगुनाता हुआ सा यह गीत। हवा मदहोशियों की धार में जहाँ डुबकी लगा कर निकल रही हो। सुनहली शॉल ओढ़े जहाँ बाली लहलहा रही हो, वहाँ अगर अपनी जवानी नहीं याद आए तो क्या याद आएगा। सुनहली शॉल ओढ़े खड़ी बाली का यह मंज़र और इसकी मंज़रकशी…. अंदर तक महुए का रस उतर गया हो जैसे।  “लचकचाती” शब्द….. उफ़्फ़ एक शब्द मानों अंदर तक रसाबोर कर गया हौ जैसे। हरे परिधान में लिपटी हुई काया का छरहरी ज्वार के पौधे सरीखा लचकचाना, वाह ! आनंद और क्या होता होगा। आलिंगनों में बाँध कर मधुप्रेम की धारा जो भिगोती भी है और छेड़ भी जाती है… वाह क्या कमाल है, यह जो रस की गाँठ है यही तो आनंद है और जीवन में रखा क्या है ? लजा कर थरथराती हुई रेशमी काया का अपने आप में सिमटना, उफ़्फ़….. मानों स्मृतियों की गहरी धुंध से निकल कर कोई होली साकार हो गई हो।  नंद की अंगनाइयों से गोप की टोलियों का चलना उमंगों के बादलों का उड़ना और फिर मिठाई की थाली में शाम का ढलना, पूरे दिन का मानों शब्दों से ही ऐसा चित्र खींच दिया है, जो होली के चंदन और अबीर से रँगा हुआ है। और अंतिम छंद में हम सबकी वही पीड़ा, वही व्यथा, जिसका ज़िक्र मैंने आज प्रारंभ में भी किया है। गुलालों से भरी हुई लाल-पीली मुट्ठी, नाद में भींगते टेसू के फूल , पिचकारी, गुब्बारे, यह सब खो गए हैं। और इन सबसे ऊपर मोतियों को झारते हुए गुच्छ गेसू के। वाह यह ही तो कमाल होता है जो राकेश जी जैसे समर्थ गीतकार के शब्दकोश से ही निकल कर सामने आता है। मोतियों को झारते गुच्छ गेसू के, होली के बाद होने वाले स्नान का मानों सजीव दृश्य सामने आ गया हो। कुछ नहीं बला असल में हम जीवन का आनंद लेना भूल गए हैं। ऐसे में इनको कहीं भी देखेंगे तो अपनी जवानी याद तो आएगी ही। बहुत ही कमाल का गीत,वाह वाह वाह।

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​द्विजेन्द्र द्विज जी

न राजा याद आएगा न रानी याद आएगी
मगर भूखे को रोटी की कहानी याद आएगी

हमें रह-रह तुम्हारी पासबानी याद आएगी
निज़ामे-मुल्क से हर छेड़खानी याद आएगी

ज़रा-सा दाँव लगते ही हमें हमसे भिड़ाता है
हमें रहबर! तेरी शोलाबयानी याद आएगी

जो तुमने देश के सीने को इतने ज़ख़्म बख़्शे हैं
हक़ीमों ये तुम्हारी मेह्रबानी याद आएगी

तेरी सब सरहदों को सींचता है ख़ूँ शहीदों का
तुझे कब, ऐ वतन ! यह बाग़बानी याद आएगी

उछलती बच्चियों को देख कर सर्कस में तारों पर
हक़ीक़ी ज़िंदगी की तर्जुमानी याद आएगी

बयाँ होने लगे अशआर में हालात हाज़िर के
सुनोगे जब ग़ज़ल नौहाख़वानी* याद आएगी

कभी थक हार कर हिन्दी और उर्दू के झमेले से
’द्विज’ आख़िर फिर ग़ज़ल हिन्दोस्तानी याद आएगी

(* मृतक के लिए विलाप)

ऐसा लग रहा है जैसे ओपनिंग में एक छोर पर सुनील गावस्कर और दूसरे पर सचिन तेंदुलकर उतर आए हों बल्लेबाज़ी करने। कमाल के बल्लेबाज़ हैं दोनों। पहले सुनील गावस्कर ने गीत में अपना कमाल दिखाया और अब सचिन तेंदुलकर की बारी है ग़ज़ल के साथ सामने आने की। कमाल और धमाल दोनों तय हैं। यह ग़ज़ल ज़रा अलग मूड की है, यह होली की नहीं है यह होलिका दहन की ग़ज़ल है, वह होली जो हममे में से हर किसी संवेदनशील इन्सान के दिल में धधकती रहती है।सच कहा द्विज जी राजा और रानी नहीं याद आते, रोटी की कहानी ही याद आती है। बहुत ही सुंदर मतला है। और पहला ही शेर मानों मौजूदा दौर की पूरी कहानी कह रहा है तुम्हारी पासबानी और निज़ामे मुल्क से छेड़खानी, वाह ! उस्तादों की कहन ये होती है। और अगले ही शेर में रहबर का हमें हमसे ही भिड़ा देना, वाह किसी का नाम लिए बिना “हमें हमसे” कह कर मानों सब कुछ कह दिया है, ग़ज़ल का सलीक़ा यही तो होता है। हक़ीमों की मेह्रबानी का ज़िक्र भी कितनी मासूमियत के साथ अगले शेर में किया गया है सीने को दिए गए ज़ख़्मों का पूरा हिसाब कर देता है यह शेर, ग़ज़ब। और ग़ाफ़िल वतन की आँखें खोलता हुआ शेर कि तू कब तक ग़ाफ़िल रहेगा कि तेरी सरहदों पर ख़ून की बाग़बानी कुछ शहीद कर रहे हैं। तीखी धार वाला शेर। और दर्द से भरा हुआ शेर जिसमें सर्कस के तारों पर उछलती हालात के हाथों में फँसी हुई ज़िंदगी की तर्जुमानी है, आँखों की कोरों को गीला कर देता है। नौहाख़वानी….. ग़ज़ल को सुन कर जब यह याद आने लगे तो सचमुच हमारा समय बहुत कठिन हो गया है यह समझ लेना चाहिए। बहुत ही सुंदर शेर। और मकता तो मानों गज़ल की सीमित कर दी गई दुनिया के सारे दायरे तोड़ देना चाहता है। सच में हम सबको ग़ज़ल हिन्दोस्तानी ही चाहिए। न हिन्दी न उर्दू, बस हिन्दोस्तानी। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल कही है भाई द्विज ने। कमाल के जलते हुए शेर निकाले हैं। वाह वाह वाह ।

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तो मित्रो आज यह दोनो रचनाकार होली का मूड बनाने के लिए आए हैं। अपनी रचनाओं से आपके अंदर दबी हुई होली की फगुनाहट को जगाने के लिए। उस आनंद को जागृत करने जो शीत ऋतु में ठिठुर कर सो गया है। सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर की जोड़ी ने ज़बरदस्त ओपनिंग की है आज। आपका काम है कि हर एक शॉट पर दिल खोल कर तालियाँ बजाना, दाद देना, वाह-वाह करना। क्योंकि यही तो किसी रचनाकार को मिलने वाला सबसे बड़ा ईनाम होता है। और हाँ अपनी ग़ज़ल भी भेज दीजिए यदि आप इस आनंद उत्सव में शामिल होना चाहते हैं तो। यदि आपकी प्राथमिकता में अब ग़ज़ल नहीं है तो फिर वही करिये जो आपकी प्राथमिकता है क्योंकि ग़ज़ल यदि आपकी प्राथमिकता नहीं है, तो ज़बरदस्ती लिखने से कुछ होगा भी नहीं। बहुत से काम होते हैं करने को जीवन में। ग़ज़ल-वज़ल शायरी-वायरी तो फुरसतियों का काम है। कई बार सलाम करने का जी चाहता है उन लोगों को जो सफ़र में कहीं से कहीं जा रहे होते हैं और रास्ते से ही तरही की ग़ज़ल भेज देते हैं। असल में यह मुशायरा उन जैसे पागलों के दम पर ही चल रहा है। ग़ज़ल का कारोबार पागलों के दम पर ही चलता है। ग़ज़ल की दुनिया में अक़्लमंदों के लिए वैसे भी जगह नहीं है।अक़्लमंदों के पास बहुत काम हैं। अभी उनको मोदी, ट्रंप, राहुल गांधी, केजरीवाल, उत्तर कोरिया आदि आदि के बारे में काम करना है, अभी उनके पास ग़ज़ल कहने की फुरसत ही कहाँ है ? मगर हमारा काम तो इसलिए चल रहा है कि हमारे पास राकेश खंडेलवाल जी जैसे वरिष्ठ पागल और भाई द्विजेंद्र द्विज जैसे प्रखर युवा पागल हैं, जो अभी भी दुनियादार नहीं हुए हैं। आज की दोनों रचनाएँ एक डंके की तरह इस कठिन समय में गूँजती हैं, कि निराश होने की कोई ज़रूरत नहीं अभी हम हैं। तो आप इन ग़ज़लों का आनंद लीजिए, वाह वाह कीजिए, और खुल कर इन पर दाद दीजिए। तो देते रहिए दाद । मिलते हैं अगले अंक में।

12 टिप्‍पणियां:

  1. राकेश जी का बहुत ही खूबसूरत गीत और द्धिजेन्द्र जी की बाकमाल ग़ज़ल। बार-बार पढ़कर भी स्क्रीनशॉट ले लिया है स्क्रीन शॉट से पढ़ने से ऐसा लगता है जैसे शब्द घर आ गए हैं किसी वेबसाइट के नहीं रहे। इन दो विद्वानों के लिखे हुए मे से किसी एक पंक्ति या किसी एक शेर की विवेचना करने लायक समझ तो मेरी नही है। दोनों बहुत ही सुन्दर रचनाएँ। वाह वाह वाह।

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  2. गावस्कर और सचिन जैसे दिग्गजों की ताबड़तोड़ ओपनिंग बल्लेबाज़ी और उस पर सुशील दोषी जैसे कमेंटर की लाजवाब कमेंट्री से खेल का मजा आ गया। रन की जगह रंगों की बरसात हुई और हम सब को पूरी तरह भिगो गयी। ओपनिंग देख के अंदाज़ा हो गया कि ये खेल मजेदार होने वाला है। हम तो जी ब्लॉग रुपी टीवी से चिपक के बैठे हुए हैं अगले बल्लेबाज़ की इंतज़ार में। हमने तो जी होली खेलना ही छोड़ दिया है, बस दूर से टी.वी पर खिलाडियों को खेलते हुए को देख के तालियां बजाते हैं अब। गावस्कर की बल्लेबाजी हमेशा की तरह क्लासिक है और सचिन तो कैसे कैसे शाट लगाते हैं देख कर हैरत होती है। दोनों को हमारा सलाम और गाल पर हलके से गुलाबी गुलाल !!

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  3. राकेश जी ने तो इतने सारे रंग भर दिए की तलाशने पर। ही कोई रंग बाक़ी नहि नज़र आ रहा ... सच में गावस्कर वाली शुरुआत है तकनीकी और बाउंड्री के चारों तरफ़ रंगों की बौछार की है राकेश जी ने और इस ज़बरदस्त बल्लेबाज़ी पर हम तो भरपूर आनन्द ले रहे हैं ... होली के रंग में सरोवर हो रहे हैं ... मशायरे की शुरुआत लाजवाब है ... बधाई बधाई बधाई ...

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  4. आदरणीय द्विज जी की ग़ज़ल ने इस मशायरे की दिशा ही बदल दी ... वीर सैनिकों की क़ुर्बानियों को याद किए बिना होली का क्या रंग ... हर शेर झँझोड़ जाता है अंतर्मन को ... अपना गहरा असर लिए आज के माहोल पे सटीक टिप्पणी है हर शेर ... ज़िंदाबाद ... बधाई इस ग़ज़ल की ...

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  5. तरही मुशायरे का बड़ा निराला आगाज़। राकेश खंडेलवाल जी का होली के रंग में डूबा गीत होली के विविध रंगों को उजागर कर रहा है।
    आ0 द्विजेन्द्र द्विज जी की उस्तादाना ग़ज़ल का तो क्या कहना। वाह।

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  6. यहाँ मैं अभी तक ग़ज़ल के मतले पर उलझा हुआ हूँ, यहाँ दो बल्लेबाज़ फुल फॉर्म में पारी का आगाज़ कर चुके हैं।

    तैयार लहलहाती फसल की खुनकों को देख जवानी याद करते हुए खण्डेलवाल sir के गीत का पहला बन्द पहली बॉल पर चार रन लगाता हुआ नज़र आ रहा है। पूरा गीत फाल्गुन और होली के रंगों में सराबोर कर रहा है।आखिरी बन्द में उम्र के साथ रंगों की कमी का अहसास हृदय स्पर्शी है

    आदरणीय द्विज sir की ग़ज़ल वाक़ई तेंदुलकर की तरह सधी हुई शुरुआत है।
    न राजा याद...
    भूखे को रोटी की कहानी याद आएगी
    और
    निज़ामे मुल्क से छेड़खानी..
    वाक़ई लाजवाब मतले हुए हैं

    और अगले शेर में शोलाबायनी करते आज के नेताओं पर सीधा वार हुआ है। लाजवाब शेर।

    शहीदों को याद करते हुए खून से देश की बागवानी का खयाल लाजवाब रहा।
    सभी शेर एक से बढ़कर एक हुए हैं।

    ज़िंदाबाद

    सादर
    नकुल

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  7. द्विज जी ने अपने ही एक मिसरे में ग़ज़ल का सार कह दिया है.
    "बयाँ होने लगे अशआर में हालात हाज़िर के"

    द्विज जी की सभी गज़लें thought provoking होती हैं. कमाल की ग़ज़ल कही है. हर शेर लाजवाब. दिली दाद.

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  8. गीतों के राजकुमार राकेश जी ने हमेशा की तरह शब्दों का जादुई ताना बाना बुना है. जिस खूबसूरती से तरही मिसरे को निभाया है काबिले तारीफ़ है. हार्दिक बधाई.

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  9. माफी चाहूँगा, पोस्ट अभी देखी, मुझे लगा मुशायरा आज से शुरु हुआ।
    आदरणीय राकेश जी कमाल का गीत, कहाँ से लाते हैं इतने सुन्दर भाव और उन्हें वयक्त करते सुन्दर शब्द संयोजन।
    द्विज जी की ग़ज़ल कमाल,
    निज़ामे मुल्क......।वाह

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  10. राकेश खंडेलवाल जी की रचनायें हमेशा ही अभिव्यक्ति की ऊँचाइयों पर ले जाकर मनमोहक दृश्यों में विचरण के लिए छोड़ देती हैं। वैसा ही इस मनभावक गीत में है एक मनमोहक दृश्यावली। वाह, वाह क्या बात है. मन आनन्दित हुआ।

    ​द्विजेन्द्र द्विज जी मँजे हुए ग़ज़लकार हैं और उर्दू पर अच्छा अधिकार रखते हैं। ख़ूबसूरत ग़जल से नवाज़ा है आपने।

    आप दोनों को बधाई और कहने की आवश्यकता नहीं कि इन बधाइयों के मूल में प्रिय पंकज भाई है.

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  11. राकेश खंडेलवाल जी:
    सुंदर शब्द चित्र, बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति। गीत विधा में आप लासानी है; इस महफ़िल में।
    मगर अंतिम बंद पर आते हुए सच्चाई से भी रुबरु कर दिया है। तरही मिसरे के साथ क्या ख़ूब न्याय किया है।

    नहीं दिखती गुलालों की वो मुट्ठी लाल पीली अब
    न दिखते नाद में भीगे कही भी फूल टेसू के
    न भरता कोई पिचकारी न ग़ुब्बारे हैं रंग वाले
    न दिखते मोतियों को झारते वे गुच्छ गेसू के
    पुरानी कोई छवि आकर निगाहों में समाएगी
    इसे देखेंगे तो अपनी जवानी याद आएगी

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