बुधवार, 11 जून 2008

आइये आज ये गीत सुनें जिसमें है हवा के हल्‍के हल्‍के झौंके और साथ में है पहली बारिश में उठने वाली मिट्टी की गंध

संगीत अगर जीवन में नहीं हो तो जीवन कैसा होगा उसकी मैं तो कल्‍पना भी नहीं कर सकता और उस पर भी अगर लता जी की आवाज न हो तो संगीत कैसा होगा उसकी भी कल्‍पना नहीं की जा सकती है । इस मामले में मैं थोड़ा पक्षपात तो करूंगा कि हर सप्‍ताह में एक गीत जो आपको सुनाऊंगा उसमें लता जी के ही गाने होंगें । दरअस्‍ल में मेरे लिये संगीत शुरू ही होता है लता जी के साथ । उसमें भी मुझे लता जी के 1970 से लेकर 1990 तक के गीत बहुत पसंद हैं । मेरे पसंदीदा संगीतकारों में सबसे ऊपर मदन मोहन जी हैं, ख़य्याम साहब हैं, बर्मन दा हैं, जयदेव जी हैं, राजेश रोशन हैं, सलिल चौधरी जी हैं । इन सभी संगीतकारों के गीत मुझे बहुत भाते हैं । मदन मोहन जी मुझे पसंद हैं क्‍योंकि उन्‍होंने ग़ज़लों को फिल्‍मों में खूबसूरती के साथ उपयोग किया है । तो ख़य्याम साहब के संगीत में एक सुगंध होती है, सुगंध लोबान की जो तन मन में समा जाती है और आप ठगे से रह जाते हैं जब गीत ख़त्‍म होता है । राजेश रोशन जी मुझे पसंद हैं उनके प्रयोगों के कारण । मुझे ऐसा लगता है कि वे बड़े ही होनहार संगीतकार हैं । विशेषकर जूली का गीत ये रातें नई पुरानी तो ..... उफ कुछ नहीं कह सकता उस गीत के बारे में । जयदेव जी के बारे में क्‍या कहूं उनके बारे में कहना तो शायद सूरज को दीपक दिखाना है । तू चंदा मैं चांदनी जैसा गीत रच कर उन्‍होंने शायद एक ऐसा काम कर दिया है जिसके पार जाना संभवत: अब नहीं हो सकता । क्‍या आपने सुना मुझे जीने दो का गीत रात भी है कुछ भीगी भीगी । और सलिल दा वो तो जादू करते हैं संगीत कहां रचते हैं । आखिर में बात बर्मन दा की जिनका गीत मैंने पिछली बार आपको सुनाया था बर्मन दा को मैं पसंद इसलिये करता हूं कि उनकी फिल्‍म का कोई भी गीत कमजोर नहीं होता है, और जिस उम्र में उन्‍होंने रूप तेरा मस्‍ताना प्‍यार मेरा दीवाना गीत रचा है वो तो वे ही कर सकते थे ।

आज मैं सुना रहा हूं राजेश रोशन जी का एक गीत ( मैं यद‍ि ग़लत हो जाऊं तो अनुरोध है कि सुधार दें दरअसल में संगीत सुनने का शौक है पर संगीतकारों के नाम याद रखने में कच्‍चा हूं ) ये गीत कहीं स्‍मृतियों में ऐसा धंस गया है मानो बचपन से जवानी की तरफ जाते किसी किशोर के कलेजे में काजल से रची दो आंखें धंस गईं हों ।  मानो स्‍कूल जाती हुई किसी षोडशी बाला के ह्रदय में साइकल पर जाते किसी किशोर की मुस्‍कुराहट धंस गई हो और दोनों याद कर रहे हैं उन आंखों को और उस मुस्‍कुराहट को अब जीवन की सांध्‍य बेला में । गीत दरअसल में हमारे अवचेतन में होते हैं और जुड़े होते कुछ घटनाओं के साथ कि जब हम वहां मिले थे तब ये गाना पास की पान की दुकान पर रेडियो पर बज रहा था । हम दरअसल में पुराने गीतों को सुन कर अपने अतीत के गलियारे में टहलते हैं । ढूंढते हैं उन निशानों को जो मिट चुके हैं समय की लहर जिन पर पानी फेरती हुई कब की जा चुकी है । ढूंढते हैं किसी दो चोटियों वाली घबराई सी लड़की को कि शायद वो अब भी सहमी सी गुजरती होगी यहां से । गीत हमारे जीवन का हिस्‍सा होते हैं और इसीलिये वो हमारे साथ ही चलते हैं । इस गीत के साथ भी मेरी कुछ कोमल भावनाएं जुड़ी हैं   फिल्‍म है स्वामी   जिसमें का करूं सजनी  और  यादों में वो  जैसे गीत भी हैं । पर मेरा फेवरेट तो ये ही है  लता जी का गाया हुआ पल भर में ये क्‍या हो गया वो मैं गई वो..... । गाने के बारे में क्‍या कहूं बस सुनें और आनंद लें 

3 टिप्‍पणियां:

  1. वाकई ये गीत बहुत सुंदर है।

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  2. बहुत समय बाद यह प्यारा प्यारा गीत सुना.आभार.

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  3. पंकज जी
    बहुत दिनों बाद ये गीत सुना...बहुत अच्छा लगा. ये मेरे कलेक्सन में है लेकिन संगीत का सारा खजाना तो जयपुर में रह गया है... आप ने जिस क्रम में संगीत कारों को रखा है वो बिल्कुल सही है..... मैंने देखा है आप की रुचिया बहुत कुछ मुझसे मिलती हैं शायद इसलिए की पंकज और नीरज दोनों ही कमल के प्रयायवाची हैं...:)
    नीरज

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