मंगलवार, 30 अक्तूबर 2012

दिल्‍ली में 'महुआ घटवारिन' का विमोचन और अब वापस दीपावली के तरही मुशायरे की तैयारी ।

तरही को लेकर इस बार लोग कुछ असमंजस में हैं । हालांकि काफी ग़जल़ें प्राप्‍त हो चुकी हैं । मगर फिर भी ऐसा लग रहा है कि मिसरे को लेकर कुछ उलझनें तो हैं । कुछ लोगों ने मिसरे पर अपने सुझाव दिये कि यदि ऐसे की जगह ऐसा कर लें तो । ये बिल्‍कुल ऐसा ही है कि परीक्षा पत्र में आये हुए प्रश्‍न के स्‍थान पर हम परीक्षक से कहें कि यदि हम इसके स्‍थान पर दूसरे किसी प्रश्‍न का उत्‍तर लिख दें तो । टास्‍क में ऑपश्‍न नहीं होते । चुनौती का मतलब ही होता है कि कोई गली नहीं । जो जैसा है वैसा ही किया जाये । जब हम सुविधा की गलियां तलाशने लगते हैं तो हमें उसकी आदत पड़ जाती है । हर बार हर काम में हम अपनी सुविधा तलाशते हैं । कुछ लोगों ने कहा कि 'जो हो रहे तो हो रहे' के स्‍थान पर 'हुआ करे हुआ करे' उनको ज्‍यादा ठीक लग रहा है । बचपन का एक किस्‍सा याद आ गया, स्‍कूल में गणित के मास्‍साब ने कोई प्रश्‍न हल करके उत्‍त्‍र तलाशने को कहा था । मेरा एक मित्र कुछ देर बाद खड़ा हुआ और कहने लगा 'मास्‍साब उत्‍तर में 45 चलेगा क्‍या' । मास्‍साब ने उसके कान उमेंठते हुए कहा 'बेटा ये गणित है किसी होटल का मीनू नहीं है कि साहब आज आलू खतम हो गया है पनीर चलेगा क्‍या '।  मतलब ये कि जीवन भी गणित की तरह ही होता है । इसमें जो उत्‍तर आना है वही आना है । तरही मुशायरा दो प्रकार की परीक्षा होती है । पहली तो कहन और बहर की । दूसरी अनुशासन की । अनुशासन इस बात का कि आप मिसरे को, रदीफ को, काफिया को पूरी तरह से निभा पा रहे हैं अथवा नहीं । साहित्‍य एक कडे़ अनुशासन की मांग करता है । यदि आप अनुशासित नहीं हैं तो साहित्‍य आपको जल्‍द ही खारिज कर देगा । किसी संपादक ने यदि आपसे कहा है कि आपको 20 जून तक अपनी रचना भेजनी है तो ये मान कर चलें कि आपकी रचना 19 जून तक उसके पास होनी चाहिये । यदि आप ठीक 20 जून को उसे फोन करेंगे कि मेरी तो तबीयत ठीक नहीं थी, मेहमान आ गये थे, इसलिये नहीं लिख पाया, 30 तक भेजता हूं, तो जान लीजिये कि अब आप उस संपादक की गुड लिस्‍ट से हट चुके हैं  । बाद में जब पत्रिका में आप अपनी रचना नहीं पाते हैं तो इस बात को लेकर रोना पीटना मत कीजिये कि मेरी रचना तो छापी ही नहीं ।

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(नई दिल्‍ली में महुआ घटवारिन का विमोचन)

इस बार दिल्‍ली में मन को बहुत अच्‍छा लगा । कार्यक्रम बहुत अच्‍छा हुआ । महेश भारद्वाज जी ने जिस प्रकार से कार्यक्रम का संयोजन किया और श्री सुशील सिद्धार्थ ने जिस प्रकार से संचालन किया वो अद्भुत था । हिंदी के लेखक को भी महत्‍व दिया जाने लगा है ये एक सुखद संकेत है । उसके साथ भी ग्‍लैमर जुड़ रहा है । राजेन्‍द्र यादव जी और नामवर सिंह जी की उपस्थिति वैसे भी कार्यक्रम को गरिमा से भर देती है । महुआ घटवारिन को लेकर लिया गया निर्णय सही सिद्ध हुआ ये जानकर मन को अच्‍छा लगा । सामयिक प्रकाशन के साथ जाने का निर्णय सही सिद्ध हुआ । कार्यक्रम के पहले और बाद में गेट टुगेदर में कई लोगों से मिलना हुआ । सौरभ पांडेय जी, सौरभ शेखर से पहली बार मिलना हुआ । मिलकर बहुत बहुत अच्‍छा लगा । सच कहूं तो जो सौरभ पांडेय जी ने कहा कि लगा ही नहीं कि पहली बार मिल रहे हैं वही मुझको भी लगा । अर्श से विवाह के बाद पहली मुलाकात हुई । कुछ लोग जिन्‍होंने वादा किया था कि वो कार्यक्रम में रहेंगे वे वादा करके भी नहीं आये । खैर कार्यक्रम एक अलग प्रकार का अनुभव दे गया ।

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इस बार का भाषण चुटकियों से भरा हुआ दिया । लगा कि गंभीर साहित्यिक भाषण देने का काम तो बाद में उम्र भर करना ही है अभी तो ज़रा कुछ हल्‍का फुल्‍का हो जाये ।

तिलकराज कपूर जी ने एक प्रश्‍न किया था : एक प्रश्‍न निरंतर परेशान कर रहा है कि एक अच्‍छे शेर के मूल तत्‍व क्‍या होते हैं।

यह प्रश्‍न एक पूरे विमर्श पूरी बहस की संभावना से भरा हुआ है । अच्‍छे शेर के मूल तत्‍व क्‍या होते हैं । तिलक जी ने ये भी पूछा कि शेर वो अच्‍छा होता जो केवल प्रबुद्ध लोगों को समझ में आये, या वो जो हर किसी को समझ में आ जाये । ये मूल प्रश्‍न के साथ जुड़ा हुआ एक महत्‍वपूर्ण उपप्रश्‍न है । शेर क्‍यों हो, कैसा हो, ये बात हर किसी को मथती है । आइये इसके उत्‍तर आप और हम मिलकर तलाशने की कोशिश करते हैं । समय परिवर्तन लाता है और समय के साथ हर चीज़ को बदलना होता है । साहित्‍य भी समय के साथ परिवर्तित होता रहता है । साहित्‍य के हर युग में तीन प्रकार के साहित्‍यकार होते हैं । पहले वे जो भूतकाल में उलझे होते हैं । अर्थात जो भाषा, शिल्‍प, कहन, कथ्‍य, विचार आदि सब वही रखते हैं जो बीत चुके हैं । ये यदि 2012 में भी रचना लिख रहे हैं तो इस रचना को पढ़कर, सुनकर ये लगता है कि ये रचना 1962 में लिखी गई हो । दूसरे साहित्‍यकार वे होते हैं जो वर्तमान में रहते हैं । अपने समय पर पैनी नज़र रखते हैं । और सब कुछ अपने वर्तमान समय से ही लेते हैं  । इनका साहित्‍य अपने समय का प्रतिबिम्‍ब होता है । ये साहित्‍य की मुख्‍य धारा होती है । तीसरे वे जो अपने समय से आगे का साहित्‍य रचते हैं । ये बहुत कम होते हैं । ये दुस्‍साहसी होते हैं । वर्तमान समय इनको खारिज करने की कोशिश करता है । उपहास उड़ाता है । किन्‍तु आने वाला समय इनके स्‍वागत में खड़ा होता है । ग़ालिब और कबीर इसी धारा के रचनाकार हैं । इन्‍होंने अपने समय से आगे का लिखा । बहुत आगे का लिखा । तो सबसे पहले तो अप अपने लिखे हुए का अध्‍ययन करें और अपने आप को पकड़ने का प्रयास करें कि आप इन तीनों में कहां हैं ।

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शेर के बारे में मेरा अपना विचार ये है कि शेर का सबसे आवश्‍यक तत्‍व है उसकी मासूमियत, उसकी सादगी । जितनी सहजता के साथ बात कही जायेगी उतनी आनंद देगी । इसलिये क्‍योंकि पूर्व निर्धारित वज्‍़न पर कठिन तरीके से बात कहना सरल है, किन्‍तु, सरल तरीके से बात कहना कठिन है । आप अपने समय की भाषा में बात करिये । जो लोग कहते हैं कि साहित्‍य की भाषा अलग होनी चाहिये, वे साहित्‍य को आम आदमी से दूर ही कर रहे हैं । दोहरा मानदंड नहीं चलेगा । आम आदमी पर यदि आपने कविता लिखी है तो आम आदमी को समझ में भी आनी चाहिये । एक ज़माने में पान वाले, होटल वाले, शेरों के सबसे अच्‍छे मर्मज्ञ होते थे । साहित्‍य को कठिन मत कीजिये । उसे फैलने दीजिये । नीरज जी की मुम्‍बइया ग़ज़लों को मैं इसीलिये प्रोत्‍साहित करता हूं । कि कम से कम नई ज़मीन तो तोड़ी जा रही है । अभी कल ही स्‍व. जगजीत सिंह जी का नया एल्‍बम सुन रहा था उसमें एक गीत है 'तू अम्‍बर की आंख का तारा' उस गीत में ये पंक्तियां आईं-

तुझको सारे मन से चाहा, चाहा सारे तन से

अपने पूरेपन से चाहा, और अधूरे पन से

मैं चौंक गया । चौंक गया क्‍योंकि कुछ नया था । 'चाहा सारे तन से' में जैसे प्रेम का पूरा शास्‍त्र लिख दिया है और फिर अगली ही पंक्ति में 'और अधूरेपन से' । तीन बार पीछे करके पंक्तियों को सुना । तीसरी बार आंखों में आंसू आ गये । साहित्‍य अपना काम कर चुका था । वो सार्थक हो चुका था । 'चाहा सारे तन से' इस आधी पंक्ति में ऐसा क्‍या है जो इसे फिर फिर सुनने पर मजबूर कर रहा है । और ऐसा क्‍या है उस अधूरेपन में जो पूरेपन पर भारी पड़ रहा है । बस ये है कि कुछ नया घट गया है । बहुत सादगी के साथ । बहुत निश्‍छलता के साथ । उस भाषा में जिसे हर कोई समझ सकता हो । इसी एल्‍बम में एक और नज्‍़म है 'जाओ अब सुब्‍ह होने वाली है' उसमें ये पंक्तियां आती हैं

सर उठाओ ज़रा इधर देखो, इक नज़र, आखिरी नज़र देखो

इसमें कोई नई बात नहीं कही गई है, मगर लिखने वाले ने इसमें इतनी सरलता के साथ बात कही है कि बात मन को भा रही है । दो चीजें हैं सरल बात को कठिन तरीके से कहना और कठिन बात को सरल तरीके से कहना । साहित्‍य दूसरे तरीके की मांग करता है । मगर अफसोस ये है कि प्रबुद्ध वर्ग पहले तरीके से लिखने वालों को प्रोत्‍साहन देता है । शेर तो वैसे भी दूसरे और केवल दूसरे तरीके की ही मांग करता है । संप्रेषणीयता दूसरे ही तरीके में होती है । शेर में यदि संप्रेषणयीता नहीं है तो वो कही नहीं पहुंचेगा । तिलक जी ने ये भी पूछा था कि शेर में मुहावरों कहावतों का उपयोग क्‍या उनकी सुंदरता बढ़ाता है । मेरे विचार में शेरों में कहावतों का प्रयोग करने अच्‍छा है ऐसे शेर लिखे जाएं जिनके मिसरे स्‍वयं ही कहावत बन जाएं । बहुत पहले किसी मंच पर वीर रस के कवि द्वारा नारे लगवाये जाने से दुखी होकर एक गीत कहा था जिसका मुखड़ा कुछ यूं था-

उसको कविता कैसे कह दूं जो नारे लगवाती है

कविता तो वो होती है जो ख़ुद नारा बन जाती है

कविता में नारे न हों, कविता स्‍वयं नारा बन जाये ( कवि शैलेन्‍द्र का गीत हर जोर जुल्‍म की टक्‍कर में..... आज नारा बन चुका है )

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(सामयिक प्रकाशन के श्री महेश भारद्वाज जी के साथ )

कुछ प्रश्‍नों के उत्‍तर तलाशने की कोशिश की है, कुछ का आगे कोशिश करेंगे । ग़ज़लें भेजिये और दीपावली के मुशायरे को सार्थक बनाइये ।

मंगलवार, 23 अक्तूबर 2012

''घना जो अंधकार हो, तो हो रहे, तो हो रहे'' अभी तक प्राप्‍त रचनाओं को देखकर लगता है कि मुशायरा रोचक होने वाला है ।

कभी कभी मैं सोचता हूं कि पर्व, त्‍यौहार, उत्‍सव इन सब का प्रयोजन क्‍या है, क्‍यों मनाये जाते हैं ये । और ये कि कुछ पर्व क्‍या किसी धर्म विशेष के लिये ही हैं । बहुत मनन करने पर पाता हूं कि विभिन्‍न धर्मों के अवतारों, पैगम्‍बरों के जन्‍मदिन निश्चित रूप से धार्मिक त्‍यौहार हैं, क्‍योंकि वो धर्म विशेष से जुड़े हैं । किन्‍तु होली, बैसाखी,  वसंत पंचमी,  दीपावली, शरद पूर्णिमा ये धार्मिक त्‍यौहार नहीं हैं । ये तो पर्व हैं । ऋतु पर्व । एक दूसरे से लगभग विपरीत आती हैं होली और दीपावली । लगभग छ: माह के अंतर पर । भारत पर ऋतुओं की विशेष मेहरबानी होती है । हम तेज़ गर्मी भी झेलते हैं और कड़ी ठंड भी । गर्मी और ठंड के बीच आती हैं क्रांतिक ऋतुएं । शरद और वसंत । आनंद की ऋतुएं । वसंत मन में उल्‍लास भरता है, क्‍योंकि ठंड के तुरंत बाद शरीर और मन स्‍फूर्त होता है । सो वसंत में आता है उल्‍लास का पर्व होली । शरद में मन शीतलता की तलाश करता है क्‍योंकि ग्रीष्‍म की तपन भोगा हुआ होता है । सो शरद में आती है दीपावली । वसंत पंचमी और होली युगल पर्व हैं तो श्‍रद पूर्णिमा तथा दीपावली भी युगल पर्व हैं । ये पर्व धार्मिक नहीं हैं, ये मौसम के पर्व हैं । मौसम किसी धर्म के नहीं होते वे सारी सृष्टि के होते हैं । कर्क रेखा और मकर रेखा के आस पास बसे लोगों को ही मौसमों का ये आनंद मिलता है । क्‍योंकि इन दोनों रेखाओं के आस पास ही मौसम अपने सारे रंग दिखाते हैं । शरद, वसंत, शीत, ग्रीष्‍म, वर्षा सब कुछ । तो आइये ऋतु पर्व के आयोजन में सहभागी हों ।

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''घना जो अंधकार हो, तो हो रहे, तो हो रहे''

इस बार का तरही मिसरा जब दिया था तो ऐसा लग रहा था कि कुछ अधिक कठिन हो गया है । लेकिन एक बार फिर रचनाकारों ने मुझे ग़लत साबित कर दिया । पहले ही दिन धड़ाधड़ दो ग़ज़लें आ गईं । और दोनों ही कमाल की । दूसरे दिन दो गीत, दोनों कमाल के । आनंद आ गया । गीतों और ग़ज़लों के दीपकों के साथ इस बार दीपावली का ये पर्व रौशन होने वाला है ऐसा लग तो रहा है । एक व्‍यक्तिगत मेरा मत ये है कि इस बहर और इस मिसरे पर बहुत अद्भुत कुछ गढ़ा जा सकता है । यदि एकाग्र होकर कार्य किया जाये तो कुछ अनोखा रचा जा सकने की बहुत संभावना है । बस एक बात ये है कि सामान्‍य रचना प्रक्रिया से हट कर सोचना होगा । सामान्‍य रचना प्रक्रिया में आपके पास सीमित प्रतीक, बिम्‍ब, उपमाएं और विचार होते हैं । जिनको लेकर हठीला जी कहा करते थे 'अंधा चूहा हमेशा घट्टी (चक्‍की) के आस पास'' । एक समय ऐसा आ जाता है कि रचनाकार भी अंधा चूहा हो जाता है । वो चक्‍की के आस पास ही रहता है । अर्थात उसके पास विचार, शिल्‍प, कथ्‍य सब कुछ पूर्व से निर्धारित हो जाता है । वो विचारों की चक्‍की के दायरे से बाहर नहीं निकल पाता । एक प्रकार की मोनोटोनी उसकी कहानियों में आ जाती है । लेखक बार बार स्‍वयं को दोहराता है । वो नारसीसस हो जाता है । यदि लेखक भी इस प्रकार की आत्‍म रति का शिकार हो जाये तो वो भी स्‍वयं को पसंद करने लगता है और आश्‍चर्य करता है कि दूसरे उसे क्‍यों पसंद नहीं करते ।

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( नार्सिसस एक यूनानी मिथक का पात्र है । एक ऐसा पुरुष, जो  दिन रात अपनी खूब-सूरती पर ही रीझता रहता है । वह जल में अपनी छवि देखता है और घंटों उस छवि को ही निहारता रहता है) 

हर रचनाकार के जीवन में ये नार्सिसिस्‍ज्‍म आता ही है । इसको आत्‍म रति नाम भी दिया गया है । ये एक प्रकार का डिसआर्डर है । आप अपने सबसे बड़े प्रशंसक हो जाते हैं । और हर उस व्‍यक्ति को पूर्वाग्रह से, ईर्ष्‍या से ग्रस्‍त मानते हैं जो आपकी रचनाओं की स्‍वस्‍थ आलोचना कर रहा है । रचनाकार को रचना लिख कर समाप्‍त होने के ठीक तीसरे दिन उस रचना का सबसे बड़ा आलोचक हो जाना चाहिये । तीसरे दिन इसलिये क्‍योंकि कम से कम तीन दिनों तक तो रचना के पूरे होने का मद उसके सिर पर चढ़ा रहेगा । वो उस रचना के प्रभामंडल में रहेगा । तीसरे दिन उसे ज़मीन पर आ जाना चाहिये । आत्‍म रति या नार्सिसिस्‍ज्‍म को आप तीन दिन का ही समय दें । यदि आपने इसे तीन दिन से अधिक समय दिया तो ये आपको खाने लगेगा । इन सबके लिये आपको नई ज़मीन को तोड़ना ही होगा । अपनी रचनाओं के लिये नई पड़त ज़मीन को तोड़ें । उस ज़मीन पर फसल न उगाएं जिस पर आपसे पहले प्रेमचंद, कबीर, गालिब, रेणु, मीर, और जाने कितने कितने फसल उगा कर जा चुके हैं । अपने लिये समय मिलने पर नई ज़मीन तोड़ें । वो ज़मीन जिस पर आप पहली बार हल चला रहे हों, आपसे पहले किसी न हल न चलाया हो । मगर हमारे साथ तो क्‍या होता है कि हम एक ही ज़मीन पर कई कई बार खेती करने लगते हैं । ज़मीन की उर्वरा शक्ति कम होती जाती है । हम समझ भी नहीं पाते कि क्‍या हो रहा है ।

लगता है कि बहुत लम्‍बा प्रवचन हो गया है । तो चलिये अब ग़ज़लें और कविताएं लिख डालिये और भेज दीजिये । इस बीच दो दिनों के लिये दिल्‍ली जा रहा हूं । 25 अक्‍टूबर को शाम 6 बजे दिल्‍ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में श्री नामवर सिंह जी, श्री आलोक मेहता, श्री राजेंद्र यादव, मैत्रेयी पुष्‍पा जी के हाथों नये कहानी संग्रह महुआ घटवारिन का विमोचन होना है । सो बस दो दिनों के लिये वहीं हूं । लौट कर आपसे बातें होंगीं । यदि आप दिल्‍ली में हैं तो अवश्‍य आएं ।

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मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012

लगभग दो माह की चुप्‍पी के बाद आज त्‍यौहारों के मौसम के ठीक पहले दिन आने वाली तरही की चर्चा ।

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नवरात्री पर्व की मंगलकामनाएं

ब्‍लाग को लेकर कुछ लोग कहते हैं कि फेसबुक आने के बाद ब्‍लॉग का क्रेज कम हो गया है । कुछ लोग कहते हैं कि अब ब्‍लॉग ख़त्‍म हो रहा है । लेकिन मेरा ऐसा मानना है कि अभिव्‍यक्ति का सबसे अच्‍छा माध्‍यम यदि इंटरनेट पर कोई है तो वो ब्‍लॉग ही है । एक ऐसा स्‍थान जहां आप कम से कम अपने नियंत्रण में चीज़ों को रख सकते हैं । जहां समान रुचियों वाले लोग एकत्र होकर सार्थक चर्चा कर सकते हैं । फेसबुक और ब्‍लॉग में बहुत अंतर है । मैं फेसबुक को एक 'अराजक उगालदान' कहता हूं । यह टर्म पिछले दिनों कही किसी भाषण में दी थी । कुछ लोगों को ये परिभाषा पसंद नहीं आई । मेरा ऐसा मानना है कि फेसबुक पर गंभीर चर्चा नहीं हो सकती । उसके लिये आपको ब्‍लॉग पर ही आना होगा । फेसबुक तो उन्‍हीं बातों के लिये ठीक है जैसे 'आज मेरे बच्‍चे का जन्‍मदिन है बधाई दीजिये' या 'आज मेरे बेटे ने 90 प्रतिशत में परीक्षा पास की बधाई दीजिये' या बिना मतलब के इमोशनल मैसेज जिनको पढ़कर लोग तुरंत कमेंट्स करें ।खैर ये तो लम्‍बी चर्चा है जिसका कोई अंत नहीं है । चर्चा को यहीं विराम देते हैं इस वाक्‍य के साथ कि 'फेसबुक पश्चिमी संगीत है जिसे सुनकर पैर हिलते हैं और ब्‍लॉग शास्‍त्रीय संगीत है जिसे सुनकर सिर हिलता है' ।

अगस्‍त और सितम्‍बर का मौन इस ब्‍लॉग पर अक्‍सर आता है । कारण क्‍या है कुछ पता नहीं लेकिन होता यही है । इस बार ये मौन कुछ अधिक लम्‍बा हो गया है । चुप्‍पी तोड़ने का सबसे अच्‍छा तरीका है कि एक धमाकेदार तरही का आयोजन किया जाये । धमाकेदार इसलिये कि वैसे भी ये तो दीपावली का, त्‍यौहारों का मौसम है । तो इससे अच्‍छा कोई काम हो नहीं सकता है ।

एक ऐसी बहर पर काम किया जाये जिसका रुक्‍न मुझे हमेशा से बहुत लुभाता है । जैसा डॉ आज़म ने अपनी पुस्‍तक आसान अरूज़ में भी लिखा है कि ये रुक्‍न शिव के डमरू से निकलने वाली ध्‍वनि से उत्‍पन्‍न हुआ है । डमड्-डमड् डमड्-डमड् । शिव तांडव स्‍तोत्र मुझे बचपन से ही अपनी ध्‍वनि के चलते लुभाता रहा । और फिर जब कुछ समझने लायक हुआ तो सबसे पहले इसी को याद किया । इसकी लय में जो आनंद है वह अकल्‍पनीय है । लय के साथ इसको पढ़ा जाये तो अंदर एक ऊर्जा सी पैदा होने लगती है । लघु और दीर्घ मात्राओं की एक के बाद एक आवृत्ति जिस प्रकार की तरंग दैर्ध्‍य को उत्‍पन्‍न करती है वह आत्‍मा की तरंग दैर्ध्‍य के साथ मिलकर अद्भुत बाइब्रेशन को जन्‍म देती है । वाइब्रेशन का ही तो खेल है सारा ।

बहरे हज़ज मूसमन मकबूज़

एक के बाद एक मफाएलुन की चार बार ध्‍वनियां । इस बहर को कई स्‍थानों पर उपयोग किया गया । अलग अलग रसों के साथ प्रयोग किया गया, किन्‍तु, मुझे ऐसा लगता है कि ये बहर सबसे अधिक मुफ़ीद है वीर या ओज रस के लिये । वीर रस की कविता को यदि इस पर लिखा जाता है तो वो लहर की तरह उठती गिरती है और श्रोता को आनंदित करती है । बहुत पहले एक कविता लिखी थी जो कि भारतीय सेना को समर्पित की थी । कारगिल के समय उसका एक दो स्‍थानों पर पाठ भी किया था । इच्‍छा है कि कभी सेना के जवानों के बीच उसका पाठ करूं । कुछ पंक्तियां इस प्रकार थीं ।

कहो  कि आंधियां यहां से मौत की हैं चल पड़ीं

हैं भारती के सैनिकों की टुकडि़यां निकल पड़ीं

वीर रस की कविता में भाव प्रधानता होती है । सो इसमें भी तत्‍कालीन भाव ही थे । जो कारगिल के समय पूरे देश के दिल में थे ।

ये तो हुई अपनी बात मगर इस बार मेरी इच्‍छा है कि ग़ज़लें कुछ अलग भाव भूमि पर हों । दीपावली की बात हो, मगर अंधकार से निर्णायक युद्ध की भी बात हो । कुछ अलग सा हो कुछ हट कर किया जाये । कर्नल गौतम राजरिशी की किसी ग़ज़ल (याद नहीं आ रहा कौन सी)  के मिसरे में से आधा टुकड़ा लेकर ये  मिसरा बनाया है । बहुत मुश्किल है ये जानता हूं । काफिये के साथ निभाना कुछ और मुश्किल है ये जानता हूं । किन्‍तु अब ये ब्‍लॉग पांच साल का हो चुका है । अब भी यदि हम सरल काम करेंगे तो ज़रा मज़ा नहीं आयेगा ।

घना जो अंधकार हो, तो हो रहे, तो हो रहे

अब इसमें क्‍या है कि ये ग़ज़ल से ज्‍यादा गीत की संभावना लिये है । इसमें 'आर' की ध्‍वनि काफिया है और बाकी का सब रदीफ है । मतलब प्‍यार, धार, हार, तार, आदि आद‍ि । काफिये रदीफ के साथ्‍ा कुछ कम हो रहे हैं । क्‍योंकि रदीफ है 'हो, तो हो रहे, तो हो रहे' । ये मिसरा इस बार मेरे अंदर के वीर रस के कवि ने लिखवाया है । इससे हमारे तरही मुशायरों की मोनोटोनी भी टूटेगी । ग़ज़ल तो इस पर बहुत सुंदर बन रही है ये तो प्रयोग करके मैंने देख लिया है किन्‍तु यदि गीत लिखा जाये तो वो भी सुंदर बनेगा ।

बहरे हज़ज की मूल बहर और इसमें बस ये अंतर है कि एक दीर्घ को लघु किया गया है हर रुकन में । और देखिये किस प्रकार पूरी की पूरी ध्‍वनि ही बदल गई है । और इस बहर पर लिखा गया शहरयार साहब का वो रोंगटे खड़े कर देने वाला गीत 'ये क्‍या जगह है दोस्‍तों ये कौन सा दयार है ' । आपको नहीं लगता कि दिल चीज़ क्‍या है की जगह इस गाने को उमराव जान का नंबर वन गाना माना जाना चाहिये । ये वो गाना है जो न केवल सुनने में अच्‍छा लगता है बल्कि फिल्‍म में इसको देखना भी एक अलग ही अनुभव है । डाउन मेमारी लेन का इससे अच्‍छा कोई उदाहरण नहीं हो सकता । बुला रहा है कौन मुझको चिलमनों के उस तरफ । 

तो आने वाले समय अर्थात तरही के पहले के समय में हम कुछ प्रश्‍नों की चर्चा करेंगे जो श्री तिलक राज कपूर जी ने उठाये हैं एक ईमेल के माध्‍यम से । वे प्रश्‍न बहुत ही रोचक हैं तथा उनके उत्‍तर के माध्‍यम से हम कई बातों पर चर्चा करेंगे । तो उठाइये क़लम और हो जाइये शुरू एक सुंदर ग़ज़ल लिखिये और भेज दीजिये ।