पंकज सुबीर द्वारा प्रेषित किया गया
अगस्त कल से लग रहा है और जाहिर सी बात है कि इसीमें आएगा पन्द्रह अगस्त भी और पन्द्रह अगस्त का मतलब ये है कि सब देश भक्त हो जाओ । दिन भर ऐ मेरे वतन के लोगों टाइप के गाने सुनो और कागज के तिरंगे स्कूटर में लगाओ ताकि सबको पता लगे कि आप भी देश भक्त हो । भले ही आप को ये भी पता न हो कि पन्द्रह अगस्त को देश का संविधान बना था या फिर देश आजाद हुआ था । कोई पूछे तो ये ही कहो कि हां कुछ हुआ तो था पर पता नहीं क्या हुआ था ये तो सब देश भक्त हो रहे हैं तो हम भी हो गए फैशन की बात है । पन्द्रह अगस्त को देश भक्ति का फैशन होता है ।
Tuesday, 31 July, 2007
देश भक्त हो जाने का महीना आ गया है
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पंकज सुबीर
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Monday, 30 July, 2007
वो जानवरों की आवाज़ें निकाल कर उनको पास बुला लेता है
क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में जानते हैं जो जानवरों की आवाज़ इतनी सफाई के साथ निकाल लेता हे कि जानवर भी भ्रम में पड़ कर उसके पास आ जाते हैं । नहीं जानते हैं तो जान लीजिये उस के बारे में ये व्यक्ति वास्तव में न केवल जानवरों की आवाज़ निकाल कर जानवरों को अपने पास बुला लेता हैं बल्कि मोबाइल की रिंगटोन और भ कई तरह की आवाज़ें निकाल लेता है जानना चाहते हैं उसके बारे में तो देखते रहिये सुबीर संवाद सेवा थोड़ी ही देर में आपको मिलेगी उसके बारे में पूरी जानकारी ।
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Thursday, 26 July, 2007
6 अगस्त 1857 को सीहोर में बनी थी सिपाही बहादुर सरकार
पंकज सुबीर सीहोर मध्य प्रदेश दिनांक 27 जुलाई 2007
1857 का हिन्दुस्तान के इतिहास में एक प्रमुख स्थान है अंग्रेज इतिहासकार भले ही कहते रहें कि 1857 में तो राजा और रजवाड़ों ने विद्रोह किया था मगर सच ये ही है कि 1857 का विद्रोह वास्तव में एक जन क्रांति था । मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में तब एक कंपनी तैनात थी तथा यहां पर एक अंग्रेज पोलेटिकल एजेंट फेडरिक एडन पदस्थ था 1 जुलाई को इन्दौर में क्रांति हो जाने के बाद सीहोर में भी इसके संकेत मिल रहे थे मगर भोपाल की तत्कालीन नवाब सिकंदर बेगम अंग्रेजों की भक्त थीं और अस लिये अंग्रेज विश्वस्त थे कि कुछ होगा तो हमें भोपाल नवाब की मदद तो मिलेगी ही । मगर जुलाई खत्म होते न होते तो सीहोर में भी क्रांति की चिन्गारियां फूटने लगीं थीं । इन्दौर से भाग कर भोपाल नवाब की शरण में जा रहे अंग्रेजों को सीहोर के सिपाहियों ने पीटना प्रारंभ कर दिया था नवाब सिंकंदर बेगम ने विद्रोह को कुचलने का प्रयास किया मगर आजादी के मतवाले कब हारने वाले थे । अंतत: 6 अगस्त 1857 को सीहोर जहां पर अंग्रेजों की मध्य क्षेत्र की सबसे बड़ी छावनी थी के सिपाहियों ने क्रांति को पूर्ण कर दिया और सीहोर पर क्रांतिकारियों का कब्जा हो गया । तब सीहोर की कोतवाली पर दो झंडे फहराए गए थे जो सीहोर की क्रांतिकारी सरकार जिसका नाम सिपाही बहादुर था के प्रतीक थे । एक भगवा झंडा था जो कहलाया निशाने महावीर और एक हरा झंडा जो कहलाया निशाने मुहम्मदी । और इस तरह सीहोर में बनी सिपाही बहादुर सरकार जो चलती रही जनवरी 1958 तक तब तक जब तक की हयूरोज ने आकर विद्रोह को कुचल नहीं दिया । कैसे कुचला ये जानें अगले पोस्ट में । तब तक पढ़ते रहें सुबीर इन ब्लाग ।
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Wednesday, 25 July, 2007
श्री पवन जैन ने विश्व हिंदी सम्मेलन में भाग लिया और वे 25 जुलाई को वापस लौटे
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आठवां विश्व हिंदी सम्मेलन : कल्पना लोक में उड़ान की कवायद : श्री पवन जैन न्यूयार्क से लौटकर
आठवां विश्व हिंदी सम्मेलन : कल्पना लोक में उड़ान की कवायद : श्री पवन जैन न्यूयार्क से लौटकर
भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी मध्य प्रदेश में पुलिस हाउसिंग कार्पो के महा निरीक्षक श्री पवन जैन जो स्वयं एक अच्छ्रे कवि भी हैं वे भी न्यूयार्क विश्व हिंदी सम्मेलन में वक्ता के रूप में सम्मिलित हुए थे साथ ही उन्होंने यहां आयोजित कवि सम्मेलन में भी काव्य पाठ किया था। ये रिपोर्ट उन्होंने न्यूयार्क से लौटकर तैयार की है ।
न्यूयार्क में आयोजित आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन का संयुक्त राष्ट संघ के मुख्यालय भवन में जिस शानदार ढंग से आगाज हुआ वह समापन तक आते आते बिखरने लगा । आयेजन समिति के अध्यक्ष विदेश राज्य मंत्री श्री आनंद शर्मा के शानदार भाषण एवं संयुक्त राष्ट संघ महासचिव श्री बान मून के दिल से निकली टूटी फूटी हिंदी और भारत के साथ पारिवारिक रिश्तों के भावनात्मक कथन से लगा कि आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी संयुक्त राष्ट संघ की चौखट पर दस्तक दे रही है । लेकिन आगामी सत्रों में श्रोताओं की घटती उपस्थिति और चर्चाओं में कहीं कहीं गंभीरता के नितांत अभाव से यह लगने लगा कि हिंदी के वैश्विक भाषा के रूप में उभरने का ख्वाब बनने से पहले ही टूटने लगाा है ।
नागपुर के प्रथम सम्मेलन से न्यूयार्क तक आते आते विश्व हिंदी सम्मेलन का सफर 32 वर्ष का हो गया है । हिंदुस्तान में हिंदी की बदहाली देखकर ही आयोजकों के मन में ये ख्ायाल आया कि समंदर पार विदेशों में जहां हिंदी बोली जाती है वहां इसके आयोजनों से शायद हिंदी की दशा सुधर जाए । मारीशस, त्रिनिदाद, लंदन तथा सूरीनाम की अनवरत यात्राओं के बाद विश्व हिंदी सम्मेलन का आठवां पड़ाव विश्व की राजधानी न्यूयार्क में इसी आशा के साथ पहुंचा कि हिंदी श्दि परदेश में सम्मानित होगी तो देश में भी लोगों के दिलों में हिंदी का खोया स्वाभिमान जाग उठेगा । चाहे चिकित्सक डा हर गोविंद खुराना हों या वैज्ञानिक एस. चंद्रशेखर या फिर अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन हमने उन्हें तभी सम्मान के के काबिल समझाा जब नोबल पुरुस्कार मिला और देसरी विदेशी संस्थाओं ने उन्हें सम्मान और शोहरत दी । आज भी लक्ष्मी निवास मित्तल और हिंदूजा जैसे भारतवंशी उद्योगपतियों और इंदिरा नूयी तथा सुनीता लिलियम जैसी प्रवासी प्रतिभाओं का वंदन भारत के छोटे बड़े अखबारों से लेकर जन जन तक पहुच गया है क्योंकि उन्होंने अपनी सफलता के झंडे विदेशी धारती पर गाड़े हैं ।
यूं तो विश्व स्तरीय तमाम बड़े आयोजनों को आलोचनाओं के लंबे घेरे से गुजरना पड़ता है लेकिन शासकीय खर्चे पर दुनिया के कल्पना लोक की उड़ान का आनंद इसमें भागीदारी को विशेष बना देता है । जिन साहित्यकारों की पूछ परख कम हुई उन्होंने रुष्ट मंडली बना कर भारत से ही सम्मेलन के बहिष्कार का नारा बुलंद किया , तो जिन लोगों ने जुगाड़ तुगाड़ सिफारिश और अपनी ऊंची पहुंच के दम पर टिकिट पा लिया वे उद्देश्यों को भूल गये । उद्घाटन सत्र के बाद से ही भारत से आने वाले अधिकांश शासकीय और अशासकीय प्रतिनिधि न्यूयार्क और नजदीकी दर्शनीय स्थलों में हिंदी के भविष्य को तलाश्ने निकल गये । वो तो भला अमरीका और अन्य करीबी देशों में रहने वाले प्रवासी भारतीय हिंदी प्रमियों का कि उन्होंने वक्ताओं को खाली सभागारों में अपना आलेख्ा पढ़ने की जलालत से बचा लिया । करीब ऐक दर्जन शैक्षिक सत्रों में तमाम घंटों की परिचर्चा के बाद ज्ञान का कितना अमृत छलका और अज्ञाना का कितना विष छटा ये अगले विश्व हिंदी सम्मेलन से पहले शायद ही किसी को पता चल पाएगा ।
हमारे मुलक में चयन की प्रकिया हमेशा ही विवादों में रही है चाहे वे कला में हो साहित्य में हो खेलों में हों या पुरुस्कारों में हों । लेकिन इतना तय है कि जितनी राजनीति दन दिनों खेलों कला साहित्य और अन्य दूसरे गैर राजनैतिक क्षेत्रों में हो रही हे इतनी राजनीति तो हमारे राजनितिज्ञ भी नहीं करते हैं । विश्व की दूसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा को आजादी के साठ साल बाद भी अपनी मातृभूतम में हिंदी दिवस हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाड़ा मनाकर याद किये जाने की पीड़ादायी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है हमने कभी नहीं सुनाओ कि रूस में कभी रूसी दिवस इंग्लैण्ड में अंग्रेजी दिवस और जापान में जापानी दिवस मनाया गया हों । इसे मैंकाले की शिक्षा पद्धति की दूरदर्शिता कहें या वर्षों की गुलामी और मानसिक दासता का परिणाम कि भारत की समस्त बड़ी प्रतियोंगी परिक्षाओं में मेडिकल, इंजीनियरिंग एवं विधी के शिक्षण संस्थानों में विज्ञान एवं अनुसंधान के केन्द्रों में अंग्रेजी माध्यम की अनिवार्यता ने काले अंग्रेजो की एक ऐसी पीढ़ी तैयार की है जो हर स्वदेशी समस्या का विदेशी समाधान खोजती है । विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी के भविष्य और भविष्य की हिंदी पर चर्चा एक ऐसी कवायद है जिसमें बीमारी जाने बिना बीमारी के इलाज की कोशिशें जारी हें ।
स्टैच्यु आफ लिबर्टी के शहर में एक वाक्या मेरे साथ ऐसा हुआ जिसे मैं आसानी से भुला नहीं पाऊंगा । समारोह के दूसरे दिन अंतिम सत्र के पश्चात मैं सभा स्थल के डायनिंग हाल में पहुचा वहां जिस टेबल पर भोजन के लिये मैं बैठा वहां एक नौजवान एवं एक बुजुर्ग वार्तालाप मैं मशगूल थे । मै कुछ कुछ उनकी बातें सुनकर दिन भर के सत्रों की बहस की सार्थकता और प्रासंगिकता पर मनन में खोश हुआ अपना खाना खाने में तल्लीन था । यकायक उस नौजवान की रोबीली ने मुझे चौंका दिया उसने एक बड़ी सी प्लेट में कुछ रोटियां लेकर जा रही एक नवश्ुवती की और इशारा कर के मुझसे कहा आप उसे मेरे पास बुला दीजिये। मैं चौंका मैंने कहा आपको उस लड़की से काम है आप क्यों नहीं उसे बुला लाते उसने कहा मैं नहीं कर सकता । खैर साथ में बैठे बुजुर्ग ने उस युवती को आवाज दी और वह लड़की उसकी थाली में रोटी रखकर चली गई । एकाध मिनिट के बाद मैं भोजन समाप्त करके थाली डस्टबिन में रखने के लिये चला तो मैंने दूर से उस नौजवान को देखा मुझे धक्का लगा उस र्गीले नौजवान के दोनों पैर ही नहीं थे । मैं अपराधा भाव से उस नवयुवपक के पास पहुंच कर माफी तो मांग आया पर रात भर चैन से सो नहीं पाया । मुझे ऐसा लग रहा था ककि जैसे हिंदी की विकलांगता को हम जाने अनजाने में समझ ही नहीं पा रहे हैं । अपने लक्ष्य और स्वार्थ के लिये हम पराई भाषा की वैशाखियां लेकर सफलता की सीढि़यां तो चढ़ते जा रहं हैं लेकिन हमारी अपनी हिंदी अपने पचास करोड़ बेटे बेटियों की ओर सहारे के लिये अपलक निहार रही हे । अपने मिथ्याभिमान में हम ये भूल बैठे हैं कि जब हम ही अपनी भाषा का तिरस्कार करेंगें तो गैर कहां उसे सम्मान दे पाएंगे । संयुक्त राष्ट संघ के कपाल पर कल हिंदी का तिलक हो भी जाए तो क्या उसे अपने घर के माथे की बिंदी बनने में अभी बहुत वक्त लगेगा ।
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Tuesday, 24 July, 2007
लग गया चार महीनों के लिये प्रतिबंध कुआरे कुंआरियों को करना होगा चार माह का इंतजार
सीहोर सुबीर संवाद सेवा 25जुलाई 2007
हिन्दू रीति रिवाज के अनुसार अब चार महीनों के लिये शहनाई पर प्रतिबंध हो गया है ये प्रतिबंध दरअसल में केवल इसलिये है क्योंकि चार माह के लिये शादियों पर रोक लग गई है ।वजह ये है कि देवता सो गये हैं और अब वे चार माह बाद देवउठनी ग्यारस पर ही उठेंगें । तब तक के लिये शादी का कोई मुहूर्त नहीं है । ज्योतिषियों के अनुसार शुक्र अस्त हो गया है और सूर्य भी दस दिन पहले ही दक्षिणायन हो चुके हैं इसलिये अब विवाह की शहनाईयां चार माह बाद ही बजेंगीं । सत्रह जुलाई अंतिम मुहूर्त था । ज्योतिषियों का कहना है कि सूर्य कर्क राशि में आ गया है और कर्क सिंह कन्या तुला वृश्चिक एवं धनु के रहने पर इसे दक्षिणायन कहते हैं और मकर कुंभ मीन मेष वृषभ एवं मिथुन में रहने से उत्तरायन कहा जाता है । कर्क से तुला राशि तक सूर्य के भ्रमण करने पर विवाह मुहूर्त नहीं होते हैं इस वर्ष तिथि की घट बढ के कारण सूर्य 17 जुलाई को ही दक्षिणायन हो गया है और इसी कारण भडली नवमी को भी विवाह नहीं हो पा रहे हैं । 21 नवंबर को देवउठनी एकादशी के साथ ही अब शादियां शुरू हो पाएंगीं । गुरूवार पुर्णिमा 29 - 30 जुलाई को साधुऔं को चातुर्मास प्रारंभ हो रहा है ।
ये तो हुई ज्योतिषियों की बात मगर अब बात वही है कि जिनको भाग कर शादी करना है या फिर मीठा मीठा प्रेम विवाह करना है उनके लिये तो भागने का मौका मिल जाना ही सबसे अच्छा मुहूर्त होता है इसलिये वो तो सूरज उत्तर में जायेगा चाहे दक्ष्णि में वो तो रुकने वाले हैं नहीं । उनका तो कहना है कि रोक तो शहनाई पर लगी है हम तो डीजे बजा कर शादी करेंगें हमें कौन रोकेगा ।
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सीहोर में पकडाई नकली घी बनाने की चार फेक्टियां

सीहोर में नकली बनाने के चार कारखाने मिले हैं पुलिस ने चारों पर छापे मार के यहां से काफी मात्रा में नकली घी और पेंकिंग का सामान बरामद किया है डी एस पी विनय पाल के अनुसार ये चारों ही लगभग सभी ब्रांड के नकली घी को बनाने का काम करते थे ।
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Monday, 23 July, 2007
दो सौ लोगों का एकाउंट खुला हुआ है उसके दिमाग के लेजर में
सीहोर सुबीर संवाद सेवा 23 जुलाई 2007
वैसे तो वो एक चाय वाला ही है मगर है कुछ हट कर हट कर इसलिये क्योंकि वो अपने दुकान से उधार चाय पीने वालों का हिसाब किसी डायरी में नोट नहीं करता और कर सकता भी नहीं है क्योंकि वो तो अनपढ है । मगर वो अपना सारा का सारा हिसाब रखता है अपने दिमाग में किस को कब कितनी चाय भेजी किस से कितने पैसे लेने हैं ये उसको मुह जबानी याद रहता है । कोर्ट और बस डिपों के सामने चाय की दुकान चलाने वाले सलीम खां ने कभी भी स्कूल में जाकर किताबी ज्ञान तो हासिल नहीं किया पर उसका दिमाग किसी भी किताब से ज्यादा जानकारियां रख सकता है । मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के सलीम को स्कूल जाने की उम्र में ही चाय की केतली थामनी पडी थी और इसीलिये उसकी शिक्षा कुछ भी नहीं हो पाई । 1990 में जब उसने अदालत और बस डिपो के सामने अपनी खुद की चाय की दुकान खोली तो सबसे बडी परेशानी थी कि ग्राहकों की उधारी कैसे याद रखी जाए अमूमन होता ये है कि चाय की दुकान चलाने वाले छोटी छोटी डायरियां रखते हैं जिनमें वो अपने ग्राहकों का हिसाब रखते हैं मगर काला अक्षर भैंस बराबर सलीम के लिये तो ये मुश्किल काम था क्योंकि लिखना पढना तो उसे आता ही नहीं था । आख्रिरकार उसने इस समस्या का एक हल निकाला और वो ये कि उसने अपने ग्राहकों का हिसाब दिमाग में ही रखना शुरू कर दिया । किसको कहां कितनी चाय दी और किस से कितने पैसे लेने बाकी रह गये हैं ये सारा हिसाब उसके दिमाग में ही रखना शुरू किया शुरू में कुछ दिक्कत आई मगर हिम्मते मर्द मददे खुदा वाली कहावत चरितार्थ करते हुए आज वो ये कला बखूबी सीख गया है । आज उसके दिमाग में उतने ही ग्राहकों के खाते खुले हुए हैं जितने कि किसी एवरेज कंपनी के लेजर में होते हैं । करीब 200 ग्राहकों का हिसाब उसके दिमाग में रहता है और हिसाब भी कैसा कल किसको कितनी चाय दी थी और उसमें से कितना पैसा नहीं आया था हफ़ते भर पहले कौन उधारी कर के गया था और कितनी कर के गया था ये सारी बातें उसके दिमाग में ही रहतीं हैं ।उसकी इस अजूबी याददाश्त के बारे में वकील अनिल दुबे कहते हैं कि ये कुदरत का ही करिश्मा है वहीं डिपो के एकाउन्टेंट एस के जोशी के अनुसार ये एक अजूबा है । जो भी हो पर सलीम का दिमाग तो किसी अच्छे खासे लेजर से कम नहीं है एसा लेजर जो 200 लोगों का एकाउंट मेन्टेन कर रहा है ।
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Friday, 20 July, 2007
और जब फट गया मोबाइल हो गया धमाका
सीहोर सुबीर संवाद सेवा 21 जुलाई 2007
मुंबई बंम कांड के आरोपियों को तो सजा हो गई है लेकिन मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले के अरन्या ग्राम का के एस यादव किस के पास अपने घर में हुए विस्फोट की शिकायत लेकर जाए क्योंकि उसके घर में जो विस्फोट हुआ है वो और किसी ने नहीं किया बल्कि उसके ही अपने मोबाइल ने किया है ।
स्वास्थ्य केन्द्र में कंपाउंडर के पद पर कार्यरत के एस यादव अपने मोबाइल को चार्ज पर लगा कर किसी अन्य काम में व्यस्त थे कि अचानक हुए धमाके से वे हिल गए दौड कर जब वो अंदर पहुचे तो पता चला कि मोबाइल विस्फोट के बाद फट गया है । पूरा कमरा धुंए से भरा देख कर पहले तो उनको कुछ भी समझ में नहीं आया मगर जब धुंआ कम हुआ तो उन्होंने देख कि उनके मोबाइल के परखच्चे उड गए हैं । धमाके से कमरे का सामान भी किर गया और आस पास के लोगों की भीड जमा हो गई । लोगों को उनके पास ही रहने वाले बाबूलाल नेरावले को तो ऐसा लगा कि श्री यादव के घर में सिलेंडर फटा है । के एस यादव के अनुसार वे मोबाइल को चार्ज पर लगा कर अन्य कार्य में व्यस्त थे तब ये धमाका हुआ ।
मोबाइल बम कांड का कारण्ा जो भी रहा हो पर हकीकत ये ही है कि अब धीरे धीरे आधुनिक संचार साधनों के दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं और समय रहते ही चेत जाने की जरूरत है ।
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गाडियां घर से लेने और छोडने जा रहीं हैं सीहोर में शराबियों को
सीहोंर सुबीर संवाद सेवा 21 जुलाई 2007
क्या कह रही है ये तस्वीर जो पुलिस चौकी के ठीक पास ली गई है
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Tuesday, 17 July, 2007
PEENE WALON KO PEENE KA BAHANA CHAHIYE
सीहोर (सुबीर संवाद सेवा 17 जुलाई 2007 )
मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के शराबी इन दिनों मजे कर रहे हैं ये मजे दरअसल में दो आबाकरी ठेकेदारों की लड़ाई के कारण कर रहे हैं ।
क्या आपने कभी ऐसा सोचा है कि जितने पैसे में केवल शराब के साथ आने वाले चना मूंगफली आते हों उतने में शराब ही मिल जाए और वो भी जितनी चाहो उतनी अगर नहीं सुना हो तो सुन लीजिए क्योंकि सीहोर में ऐसा ही हो रहा है और ऐसा हो रहा है दो आबाकरी ठेकेदारों की आपस की लड़ाई के कारण।
सीहोर में इस बार टोकन पद्धति होने के कारण सीहोर की देशी ओर विदेशी मदिरा की दूकानें दो ठेकेदारों को गईं हैं कुछ दूकानें एक ठेकेदार को मिलीं हैं तो कुछ दूकानें दूसरे को । यहीं से असल में शराबियों की पौ बारह हो गई है । अभी एक ठेकेदार की दूकानें तो सजी भी नहीं हैं परंतु दूसरा ठेकेदार जो पहले से ही शहर की कलारियों और विदेशी शराब का ठेका चलाता है उसने प्रतिद्वंदी को मजा चखाने के लिये शराब के रेट गिरा दिये हैं और गिराये भी इतने हैं कि पानी की कीमत में शराब मिल रही है और फिर कहा तो गया है कि पीने वाले को पीने का बहाना चाहिये बस इधर शराब के रैट गिरे और उधर बरसात के मौसम में शराबियों की चांदी हो गई है। पहले से जमे हुए ठेकेदार ने आने वाले को मजा चखाने के लिये पांच रुपये तक में व्यवस्था कर दी है । शराबियों के हुजूम के हुजूम टूटे पड़ रहे हैं । बाकयादा कूपन भी बांटे जा रहे हैं कि हमारी कलारी में अगर आप ये कूपन लेकर आते हैं तो आपको घटी दरों पर पिलवाने की व्यवस्था की जाएगी । इस कूपन पर बाकायदा एक बोतल बनी हुई और लिखा है डिस्काउंट कूपन । अभी तक आपने कपड़े जूते साडि़यों के डिस्काउंट कूपना देखे होंगें पर ये शराब का डिस्काउंट कूपन है । फिलहाल आने वाला ठेकेदार क्या करता है ये तो आने वाले कुछ दिनों में पता चल जाएगा पर जो भी होगा शराबियों का तो भला ही होगा क्योंकि कहावत तो यही है कि दो बिल्लियों की लड़ाई में भला बंदर का ही होता है । अभी तो सीहोर और आस पास के शराबी लगभग मुफ्त की मिल रही शराब का आने वाले साल भर के लिये स्टाक करने में जुटे हुए हैं कौन जाने कब हालत बदल जाएं और शराब फिर से मंहगी हो जाए । हालत ये हो गई है कि बचा कर छुपा कर लोग अपने रिश्ते दारों के पास भी भिजवा रहे हैं कि भाई अभी तो हमारे यहां मुफ्त के भाव मिल रही है सो पी लो जाने कब ये सुहाने दिन चले जाएं।
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Sunday, 15 July, 2007
MAKAN SAMA RAHEN HEN ZAMEEN ME
सीहोर सुबीर संवाद सेवा
मध्य प्रदेश के सीहोर के पास आष्टा में एक बडी ही अजीब घटना हो रही है दरअसल यहां के कुछ मकान जमीन में समाते जा रहे हैं और साथ में एक पूरी की पूरी सडक भी जमीन में समा रही है प्रशासन ने यहां पर व्यवस्था तो बना दी है पर ये कोई भी नहीं बता पा रहा है के ऐसा हो क्यों रहा है आष्टा के वार्ड क्रमांक आठ में काजीपुरा मोहल्ला में धंस रहे मकानों को देखने के वास्ते लोगों की भीड उमड़ रही है ।
यहां नगर पालीका के कर्मचारी तारों से मकानों को बांध रहे हैं पर मकान धंसते ही जा रहे हैं ।
ये दोनों ही मकान अपने सामने वाली कांक्रीट की सडक के साथ जमीन में समा रहे हैं सडक के धंसने के कारण पानी की पाइप लाइन फूट गई है और वहां पर फव्वारा भी चल पड़ा है ।
काजीपुरा में रहने वाले पीरू खां और उनके भाई छोटे खां का मकान धीरे धीरे जमीन में समाता जा रहा हैं और वे कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं ।
तहसीलदार मालती मालती मिश्रा ने भूगर्भ वैज्ञानिकों को बुलाने के निर्देश दे दिये हैं ताकी
इस पहेली को सुलझाया जा सके ।
मगर अभी तो दोनों मकान ओर सड़क बिना किसी बरसात के ही जमीन में जा रहे हैं ।
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पंकज सुबीर
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