लो कल्लो बात, होली तो जे आन ठाड़ी हेगी माथे पे। इभी तक तो हमारे इते पानी गिर रओ है, ने ठंड भी पड़ रई है। कां से मनाएं होली। ऊपर से सुवाइन फूलू के कारण ओर डर लग रओ है। कजाने कब किधर से आके सुवाइन फूलू का भाई-रस चेंट जाए। अपनी मानो तो जे दफा होली की जगे अपन लोग दिवाली मना लेते हेंगे। चोंकि मौसम भी तो बेसा ही हो रिया है। मगर नी नी नी, दिवाली में तो भोत ही खरचा होता हेगा। अपनी तो होली ही अच्छी हेगी कि कुछ मत करो और मना लो। तो जनाब पिरस्तुत हेगी होली की पहली पिरस्तुती । आज कुछेक जन आ रए हेंगे और फिर उसके बाद कल बाकी के लोग लुगाई आएंगे।
आज के दिन सबसे पेले जो आ रिये हेंगे उनको पेले तो नइ आना चइये पर आ रय हैं। चोंकि उनको दो तीन रचना पेलने की बुरी आदत हेगी। तो आज एक पेलेंगे और सियाद कल भी एक पेलेंगे और भगवान आपको नेकी दे कि हो सकता है बासी होली में भी एकाध पेल दें।
राकेश खंडेलवाल
जनाब श्री पंकज सुबीरजी गज़लों वाले श्री गिर्राज महाराज की जय. भईये किताबन की नुमाईश की भागा दौड़ी में भूल गये कि ई होली कौ त्योहार ठेठ ब्रज कौ है. जभी तो रसिया की जगह गज़ल घुसा दयी और तो और सबहीं कू लपेट लियो कि गज़ल लिखो. नांय हम तो न लिखें गज़ल फ़ज़ल. हम तो खालिस रसिया ही लिख भेजिन्गे
जय श्री पंकज जी महाराज, गज़लन की कथा उवाच रहे
नीरज तो ले भगो काफ़िया, तिलक संगठित करें माफ़िया
सौरभ गज़ल घोटवे कूँ सिल बट्टा अपनो जाँच रहे
गज़लन की कथा उवाच रहे
पाँच सेर की चढ़ी कढ़ैय्या, हाशिम के पौ बारह भईया
मोहड़े पे मल रंगे मोहब्बत, सबहों दिखावत काँच रहे
गज़लन की कथा उवाच रहे
गौतम लिखिवे दुई अढैय्य्या, डिम्पल नाचै ता ता थैय्या
अंकित कोशिश करे शेर गिनती में केवल पाँच रहे
गज़लन की कथा उवाच रहे
पूजा लायै बना के डोसा, लाई पारुल बीस समोसा
सब के सब खा कै पंडित जी, पान मसालौ फ़ाँक रहे
गज़लन की कथा उवाच रहे
एक बार फिर बोलो गिर्राज महाराज की जय. बोल श्री राधे.
हमारे ब्रज में होली पे कहो जात है:-
बोल गिर्राज महाराज की जय
जो नहिं बोले, वई में दै
फिर खा लड्डू चार कचौड़ी छह.
कसम से री गंगा मैया की इत्ती बुरी तो कविता लिखी हेगी कि कानन में से रात भर से उल्टी हे रइ हेगी। रात भर जेइ कविता कानन में से हीटती रइ है। चोंकि इनसे कोई कुछ बोल नहीं सकत है तो चाए जो पेल दो। हमऊं सुने रहे कि कोई जब भरिष्ठ हो जाए हे तो वो गरिष्ठ भी हो जाए है । हमाओ डाकटर कह है कि जियादा गरिष्ठ खाबे से पेट खराब होए है। राम जाने अब जियादा गरिष्ठ सुनबे से कजने का होगा। पर भैया अपनी जे कविता फविता जो है वो सब उदर ही रखो अपने अमरिका में । काय कि भारत के लोग लुगाई को अच्छी बुरी की समझ है। तो आगे से इत्ती बुरी कविता लाए तो समझो कि 'वई में दै' ।
होली की सूचना : हमाए इते के परधानमंत्री को केबो है कि बुरी कविता को कचरो भी साफ करबे लाने अभियान चलेगो। अब हम जे बात इस कविता के बाद चौं लिखे जे बात आप खुदई समझदार लोग जान लो।
घूंघट की आड़ से चश्मे का दीदार अधूरा रेता हेगा, जब तक ना पड़े आयकर की नजर काला धन अधूरा रेता हेगा। कोन के रिया हेगा कि काफिया भी नी मिला और बहर भी खराब हो गई हेगी। नहीं हुई हेगी। हमने लिखी है ।
धर्मेन्द्र कुमार सिंह
तुमको भी जरा सी मैं ये भाँग पिला दूँ तो
दिल ने जो कहा मुझसे तुमको भी बता दूँ तो
ये रंग ये पिचकारी सबकुछ मैं छुपा दूँ तो
होंठों की तरफ तेरे मैं गाल बढ़ा दूँ तो
गोदाम है रंगों का हर अंग तेरा गोरी
होंठों से उठाकर कुछ गालों पे लगा दूँ तो
क्या अपनी मुहब्बत में मुझको न डुबो दोगी
तुमको ही ख़ुदा कहके मैं सर को झुका दूँ तो
ग्रन्थों में पढ़ा तुमने मरने पे मिले जन्नत
जन्नत मैं यहीं तुमको जीते जी दिखा दूँ तो
क्या आज ही मल मल के इसको भी छुड़ा दोगी
मैं रंग मुहब्बत का थोड़ा सा लगा दूँ तो
अब भैया अपन को तो जे घझल कुछ खास नी लगी। ( बुरी लगी ऐसा केने से आदमी नराज हो जाता हेगा) काय कि पूरी ग़जल में के रय हैं कि रंग लगा दूं, रंग लगा दूं, पर लगा नइ पा रय हैं। काय हमें तो जे लग रओ है कि जे कछु थोक के भ्योपारी हैं, चोंकि गोदाम की बात तो थोक बाले ही करते हेंगे। अब इत्ती सी बात के लिए पूरी गजल के दी। काय रे लोग लुगाइयों, अपने इते अपने भारत में लोग जने कित्ती तो फुरसत में हो रय हेंगे। झटाक से सोचा ने फटाक से गजल लिख दी। काय कि अब जियादा किछु तो करना नइ है। अपने इते तो थोक में सब लोग लुगाई बैठे ही हैं वाह वाह करबे के लाने । कछु भी पेलो कभी भी पेलो।
सूचना - सिबना परकाशन की तरफ से सभी को सूचति किया जाता है कि इस बार जो भी सबसे अच्छी कभिता पेलेगा उसको सिबना की ओर से 'डाली धतूरे की' और 'पाल ले इक स्वाइन फूलू नादां' के कभर पेज की फोटो कॉपी भेजी जाएगी। सूचना समापत।
दिगंबर नासवा , दिनेश कुमार
अपने इदर होली पे जब तक किसी की लगन नी होय, सादी नी होय तो अपने को तो भैया मिजा ही नी आए है । तो इस बार जो सियादी हो रइ हेगी वो इन दोनों जनों की हेगी।
दिगंबर नासवा
मैं रंग मुहब्बत का थोड़ा सा लगा दूं तो
ये मांग तेरी जाना तारों से सज़ा दूं तो
तुम इश्क की गलियों से निकलोगे भला कैसे
मैं दिल में अगर सोए अरमान जगा दूं तो
लहरों का सुलग उठना मुश्किल तो नहीं इतना
ये ख़त जो अगर तेरे सागर में बहा दूं तो
कुछ फूल मुहब्बत के मुमकिन है के खिल जाएं
यादों के पिटारे से इक लम्हा गिरा दूं तो
उलफ़त के परिंदे तो मर जाएंगे ग़श खा कर
मैं रात के आँचल से जो चाँद उड़ा दूं तो
बातों में तेरी सरसों, खुशबू में तेरी सरसों
मैं सांस न ले पाऊँ गर तुझको भुला दूं तो
तुमको भी मुहब्बत है हमको भी मुहब्बत है
ये राज भरी महफ़िल में सब को बता दूं तो
अब इनको कोन सिमझाए कि मांग को तारों से सजाना तो दूर की बात हेगी, तुम पेले इनकी मांग ही पूरी कर दो। ये जो सादी होती हेगी जे दरअसल में मांग पूरी करने का ही ठेका है। जो आपने मांग भरी है अभी अभी सिंदूर से तो आपका समझाया गया हेगा कि अब आपको मांग भरते ही रेना है। ओर जे सरसों उते धुबई में कां से आ गई रेत में । रेत में सरसों खिला के लोग लुगाइन को भेकूफ बना रय हो। काय का हमें नई पता, हमने फोटो में धुबई देखी हेगी। धुबई में को ई सरसों फरसों नइ खिलती। मियां घर में से चमगादड़ उड़ा रय हो और दुनिया को बता रय हो कि उल्फत के परिंदे उड़ा रय हो। काय क्या हम शकल से ऐसे दिखते हैं। और दिखते हैं तो दिखते हैं पर ऐसे हैं नहीं । और चलो हों भी तो क्या दुनिया को बताओगे। हां नहीं तो।
सूचना : जा बारे को ज्ञानपीठ सिम्मान उते भोपाल के कोउ तिलकराज को दओ जा रओ हेगो। काय कि बे जो हेंगे बे कभ्भी से ज्ञान की तरफ पीठ करके बैठे हेंगे। और ज्ञान को पीट पीट के भगा भी रय हैं। सूचना सिमापत ।
काय के जिनका बड़ा फोटू ते ऊपर लगो हेगो पर पैचान के लिये एक पासपोर्ट साइज को फोटू इतइ भी लगा दओ हेगो कि पैचानने में आसानी रए आपको कि कविता सुनने को बाद किसको मारबो हेगो।
दिनेश कुमार
मैं रंग मुहब्बत का इस दिल पे लगा दूँ तो
अहसास जवाँ रुत का तुमको भी करा दूँ तो
यौवन के मैं आँचल को हल्के से हवा दूँ तो
बादाए जवानी को नज़रों से पिला दूँ तो
फागुन का महीना है, दस्तूर है मौका भी
मैं प्यार के शरबत में कुछ भांग मिला दूँ तो
बेचैन बहुत करती होंठों की तेरे लाली
इस लाली को मैं अपने होंठों से मिटा दूँ तो
तुम सामने हो मेरे मदहोश मेरा दिल है
बाँहों में तुम्हें भरकर दुनिया ही भुला दूँ तो
आँखों में तुम्हारी भी इज़हारे मुहब्बत है
आईना मैं बन जाऊँ और सच को दिखा दूँ तो
रुसवाई तो मुमकिन है महबूब मगर फिर भी
जो तुझ पे ग़ज़ल लिक्खी सर-ए-बज़्म सुना दूँ तो
काय के हमको तो कुछेक लाइनों पे जम के सरम आई हेगी। हमाइ तो इच्छा हेगी कि कुछेक लाइनों को हम कोइ सो सर्टिफिकेट दे दें कि इन लाइनों को केवल भयस्क लोग ही सुन सकते हैं। सुन सकते हैं और सकते में आ सकते हैं। जे बात तो हमको समझनी ही पडेगी के अगले ने अपना कोई पुराना पत्र निकाला है जो जिवानी के दिनों में ( अगर जिवानी आई थी तो) लिखा होगा । पत्र में रदीफ और काफिया फिट कर घझल बना के पेल दिया गया हेगा। आप सब लोग लुगाइन के गले की कसम इत्ती बुरी घझल हेगी कि हमें तो झां तक बदबू आ रइ हेगी। मगर अपने को क्या अपने को तो सुनना है। काय की सजा जो मिली हेगी।
सूचना : अपने इते को खजेलो कुत्तो टॉमी कल से पगरा कओ हे। गुम भी गओ हे। जिस किसी लोग लुगाइन को टॉमी मिले वो टॉमी को लेके इते ना आएं, जब टॉमी दिखे तो बा से अपनी टांग कटवा लें और फिर चौदह इंजेक्शन लगवा लें काय कि जेई टॉमी को इलाज हेगो। सूचना खतम भई।
ज्ज्ज्जे ब्ब्ब्बात, गनेज्जी सियाद अपने इते पेली बार आ रय हेंगे। भोत सारा काम करते हेंगे। इत्ते काम करबे के बाद जब सुस्ताते हेंगे तो ऐसे फोटू खिंचवा लेते हैं।
ई. गणेश जी "बागी"
पत्थर से तेरे दिल को मैं मोम बना दूँ तो
चिंगारी दबी है जो फिर उसको हवा दूँ तो.
इस शहर में चर्चे हैं तेरे रूप के जादू के
मैं अपनी मुहब्बत का इक तीर चला दूँ तो.
क्या नाज़ से बैठी हो फागुन के महीने में
मैं रंग मुहब्बत का थोड़ा सा लगा दूँ तो.
तुम कहते हो होली में इस बार न बहकूँगा
गुझिया व पुओं में मैं कुछ भंग मिला दूँ तो.
गर जेल मुहब्बत है, आजाद नहीं होना
ता उम्र सजा दे दो जो नींद उड़ा दूँ तो.
ये बात समझ लेना चाहत है मेरी सच्ची
सपनों में अगर आकर रातों को जगा दूँ तो.
तू रात की रानी है मैं फूल कनेला हूँ
कैसा वो समां होगा, दोनों को मिला दूँ तो ?
गनेज्जी ने नूं केने तो अच्छी कई है घझल पर अपनी तो किछु भी सिमझ में नइ पड़ी हेगी। काय कि अपने बड़े लोग केते हैं कि जदी कोई बात सिमझ में नहीं आ रइ है तो सिमझो कि कोई भोत बड़ी बात हेगी। तो अपन भी सिमझ रय हैं कि कोई न कोई बडी बात गनेज्जी ने कइ हेगी। अब जे बड़ी बात कोन सी हेगी जे समझने के लिए अपन ने अपने इते के पुलिस बारे को ठेका दे दओ है। काय कि हमे बस जे समझा दो कि गनेज्जी ने कोन सी बड़ी बात के दई है । काय कि कोउ हमउं से पूछ ले कि बताओ तो हम का बताएंगे। हमें किछू किछू लग तो रओ है कि हम किछू बन गए हेंगे। का बन गए हेंगे वो इते नइ बता सकते हैं। पर कोई बात नहीं घझल सुनो और मजे करो ।
सूचना : जा दफा अपने इते को चुनाव हो रओ हैगो कि कौन को जा बार होली पे गधे पर बिठा कर जलूस निकालनो हेगो। हम भी खड़े हैं और हमाओ निसान है खच्चर। तो खच्चर को बटन दबा के गधे को........ हमाओ मतलब है हमें जिताओ। सूचना सिमापत भई ।
उते छत्तीसगढ़ के डाक्टर लोगों ने सुवाइन फूलू से बचबे को नओ तरीको निकालो हेगो। डाक्टर साब भी बा तरीके को ही डेमो आप सभन को दे रय हैं।
डा संजय दानी
मैं हुस्न की इज़्ज़त इस होली में बढा दूं तो
औ अपनी जबीं उनके पैरों पे झुका दूं तो।
मैं रंग मुहब्बत का थोड़ा सा लगा दूं तो,
या इश्क़ का चखना तुमको आज चटा दूं तो।
माना तेरा भाई भी इस शहर का गुंडा है,
मैं उसको शराफ़त की बंदूक थमा दूं तो।
गो तेरा मुहल्ला ये सदियों से शराबी है,
मैं भांग की अच्छाई लोगों को बता दूं तो।
तुम शादी की बातें सुन डर जाती हो क्यूं आखिर
मैं तुमको सुखी, हंसते जोड़ों से मिला दूं तो।
तुम सुख की हवाओं से करती हो मुहब्बत क्यूं,
मैं ग़म के चराग़ों का गर जलवा दिखा दूं तो।
क्यूं होली के दिन तुम यूं आती हो मेरे आगे
दानी मैं नशे में गर ईमां ही डिगा दूं तो।
डाकटर साब को कोउ ने बताओ नहीं हेगों कि पांव में भोत सारे भाइरस होते हैंगे। पैरों में जबीं झुकाओगे तो कोनो भाइरस चिपक जाएगो। और आपके गले की कसम इलाज कराने दूसरे डाकटर के पास जानो परेगो, काय कि आप से तो किछु होबे से रओ। आप तो मरीज को इलाज भी दूसरे डाकटर से मोबाइल पे पूछ पूछ के करते हो। और ईमान से आपको इलाज तो दूसरे डाक्टर भी नहीं करबे बारे, काय कि उनको जे तो पता ही हेगा कि फीस वीस तो किछु मिलने से रही। तो भैया हमें तो आपको जेई सिमझाना है कि पैरों पे ज़बीं वबीं मत झुकाओ ( एक तो कोई हमें पेले जे ज़बीं को मतलब सिमझाए) जहां पे भी आपकी ज़बीं हेगी उसे भंई रेबे दो। काय नुसकान करवा चाय रय हो।
सूचना : सिबना परकासन ने निरनय लियो हेगो कि जो कोई भी सबसे पेले होली पे दाद खाज खुजली देबे टिप्पणी में आएगो उसको सिबना की पुस्तक 'अंधेरी रात की चिमनी' दी जाएगी। चिमनी अलग से दी जाएगी और किताब अलग से। सूचना समापित।
काय कि जे भी पेली बार आ रइ हेंगीं तो जा लाने जे तलवार लेके आईं हैं कि कोऊ अगर दाद खाज ना दे तो तलवार दिखा दिखा के अपनी घझल पे दाद खाज ले लेंगीं।
सर्वजीत सर्व
भीगी हुई आँखों को, मैं हंसना सिखा दूँ तो..?
ग़म सबसे छुपाने की, तरकीब बता दूँ तो ..?
है नूर सा उस रुख पर ,शोखी भी हया भी है
मैं रंग मुहब्बत का, थोड़ा सा लगा दूँ तो ..?
फागुन की हुई आहट ,दर खोल दिया मैंने
फूलों से भरी चादर, आँगन में बिछा दूँ तो ..?
जिन आँखों ने शायद, कोई ख़्वाब नहीं देखा
इक ख़्वाब तिरे जैसा, इनको भी दिखा दूँ तो ..?
कुछ बोल न पाऊं मैं , जब पास हो वो मेरे ,
धड़कन मैं मेरे दिल की, तब उसको सुना दूँ तो..?
क्यूँ चाँद ये शरमीला, अब छत पे नहीं आता
आँचल से अगर अपना, चेहरा मैं छुपा दूँ तो..?
रख रात के शाने पे, सर अपना वो सोया है
चुपके से कहो आ कर, गर इसको जगा दूँ तो ..?
हमें तो इत्ती सी बात पता हेगी कि आपने उते ''दुनिया भर की किताब मेला'' में भोत ही अच्छा सरसों का साग और मक्का की रोटी खिलाई थीं। अब झूठ तो हम कभी बोलते नहीं सो जे बात कि सरसों की साग जो थी वो इस घझल से लाख गुना अच्छी थी। नइ नइ जे बात नइ है कि घझल में कोनो खराबी है। नइ नइ आप तो बुरा मान रहीं हेंगीं। हमने नहीं कहा कि घझल ख्राब है हमने तो इत्ती सी बात कही है कि सरसों को साग जियादा अच्छा था। अब देखो जा में बुरा मानने की कोनो बात नहीं हेगी। आपकी घझल पे दाद खाज खुजली हम सब कुछ दे रए हैं पर बात क्या है कि सरसों की साग की तो बात ही अलग थी। तो हम मन में सोच सरसों के साग को रए हैं और दाद घझल पे दे रए हैं।
सूचना - काय कि हमाए गांव के लोग हमसे के रए हैं कि हम अपने गांव के सबसे सुंदर भ्यक्ति हेंगे। पर फिर भी आप सबके आसिर्वाद की जिरूरत हेगी। हम जो हैं हम फिल्मों में काम करबे जा रय हेंगे। एक फिल्म में हमको काम भी मिला है। भोत सारे घोड़ों के सीन में हम खाल पहन के घोड़े बनेंगे।
तो जे तो हो गई आज की बात । कल मिलते हैं कुछ और लोग लुगाइन के साथ । तब तक देखते रहिए खाज तक।