शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

चलो सब के हक में दुआ करें, चलो दुश्मनों से वफ़ा करें, नए साल में नए गुल खिलें, नई हो महक, नया रंग हो. आइये आज से शुरू करते हैं नव वर्ष का तरही मुशायरा ।

वैसे तो ये मुशायरा सोमवार से ही प्रारंभ हो जाना था लेकिन नहीं हो पाया तो उसके पीछे कई सारे कारण हैं । सबसे पहला कारण तो ये कि शिवना के आधार स्‍तंभ श्री रमेश हठीला जी जो कि इन दिनों हैदराबाद में अपना इलाज करवाने गये हैं उनके स्‍वास्‍थ्‍य को लेकर एक गंभीर समाचार मिला जो कि मन को दुखी कर गया । किन्‍तु कल जो समाचार मिला वो कुछ राहत देने वाला था । और उसी के कारण आज तरही को लिखने की हिम्‍मत कर पा रहा हूं । दूसरी बात ये कि इन दिनों शहर में म्‍यूनिसिपल चुनाव चल रहे हैं । कल वोटिंग हो गई है । कई सारे मित्र चुनाव लड़ रहे थे सो मित्रों के लिये व्‍यस्‍तता बनी हुई थी । तीसरा कारण ये कि मेरे शहर ने पिछले दिनों इतिहास में पहली बार शून्‍य से नीचे का तापमान देखा जब तापमान शून्‍य से दशमलव तीन डिग्री नीचे ते पहुंच गया । खेतों में बर्फ जम गई, पक्षी मर गये और जाने क्‍या क्‍या हुआ । कड़ाके की ठंड ने सब कुछ रोक दिया है । माइनस0.3 डिग्री तापमान वो भी सीहोर में, ऐसा कभी नहीं सोचा था लेकिन हो गया ।

मुशायरे से पहले एक अनुरोध सब लोग श्री रमेश हठीला जी के लिये दुआ करें कि वे स्‍वस्‍थ होकर जल्‍द घर लौटें, कल रात उनके स्‍वास्‍थ्‍य के बारे में जो सकारात्‍मक समाचार मिला है वो और सकारात्‍मक हो ।

hathila

इस बार का तरही मुशायरा कुछ खास है । खास इसलिये कि इस बार सारी ग़ज़लें यथा रूप का मतलब कि जैसी आईं हैं उनको उसी प्रकार दिया जा रहा है । बहर या कहन में कहीं कोई छेड़ छाड़ नहीं की जा रही है ।ऐसा आप सब लोगों के अनुरोध पर किया जा रहा है । वैसे भी तरही का ये क़ायदा होता है कि उसमें ग़ज़लें उसी तरह प्रस्‍तुत की जाती हैं जिस प्रकार आती हैं । सो इनको हम उसी प्रकार सुनेंगें । और हां सारे शायर अब परिचित हैं सो परिचय नहीं केवल फोटो । और मेरा काम होगा प्रस्‍तुतिकरण का आपका काम होगा टिप्‍पणी का । टिप्‍पणी मेरी नहीं होगी ।

नव वर्ष तरही मुशायरा

DSC_6432

( चित्र श्री बब्‍बल गुरू द्वारा )

नये साल में नये गुल खिलें नई खुश्‍बुएं नये रंग हों

नये साल में नये गुल खिलें, नई हो महक, नया रंग हो

आज हम नये साल की शुरूआत कर रहे हैं दो एक से शायरों से । एक से इसलिये कि ये बहुत ही गुणी शायर हैं । नये तरीके से अपनी बात कहते हैं । मुस्‍तफा माहिर और डा आज़म का नाम हम सबके लिये अपरिचित नहीं है सो इनका परिचय नहीं दूंगा सीधे सुनें इनकी ग़जल़ें ।

mustafa1 hussain

मुस्तफा माहिर

ये भी है कि राह का हुस्न सब, कोई रास्ते का ही संग हो

प ये शर्त भी है निगाह को उसे देख पाने का ढंग हो.

है कमाल तेरी निगाह में, मैं सदा से हूँ इसी चाह में,

मेरी जिंदगानी के फूल पर तेरी चाहतों का ही रंग हो.

मैं हूँ बेहिसी के जहान में, मेरी चाह! रख तू ये ध्यान में,

मेरी सोच की कोई शक्ल हो, मेरे अश्क का कोई रंग हो.

जो कि आँधियों में भी डट सके, जो कभी किसी से न कट सके,

तेरे क़ल्ब का जो छुए फलक , मेरी डोर में वो पतंग हो.

ये सियासतों की हैं कोशिशें, ये सियासतों की हैं ख्वाहिशें,

किसी बात को कोई तूल दे, किसी बात पर कोई जंग हो.

कभी रिश्ते याँ जो बनाईये, तो वो दूर ही से निभाइए,

ये मकां जो आगे बढा लिए, तो गली यकीन है तंग हो.

तुझे वक़्त का भी ख़याल है? अभी चाहतों पे ज़वाल है,

ये न हो जो मुझपे गुज़र गया, वो ही हादसा तेरे संग हो.

तेरी रौशनी के दयार का, मैं हूँ मुन्तजिर तेरे प्यार का,

मुझे इस तरह से नवाजना, जो भी देख ले मुझे, दंग हो.

सभी मुश्किलों को कुबूल कर, मैं भी चल पढ़ा हूँ ये भूल कर,

मेरे रास्तों में बिछी हुई किसी हादसे की सुरंग हो.

चलो सब के हक में दुआ करें, चलो दुश्मनों से वफ़ा करें,

नए साल में नए गुल खिलें, नई हो महक, नया रंग हो.

ajam ji1

डॉ मोहम्‍मद आज़म

कोई यार हो, कोई ख्‍़वाब हो, कोई याद तो मिरे संग हो

मैं उदास हूं, मैं निराश हूं, मिरी जिंदगी में भी रंग हो

रहें साथ साथ यहां सभी, हैं खुदा के बंदे ही जब सभी

न कोई यहां पे दबंग हो, न कोई किसी से भी तंग हो

उसे आज़मा के भी देख ले, तिरा जिस पे अंधा यक़ीन है

तिरा दोस्‍त ही तिरी आस्‍तीं में छुपा हुआ न भुजंग हो

न मलाल हो, न ही रंज हो, नये साल में गये साल का

नई मंजिलों की हो जुस्‍तजू, नया जोश और उमंग हो

कहें 'आज़म' आप ग़ज़ल कोई, रहे आपको ये ख़याल भी

नई फिक्र हो, नई सोच हो, नया रंग हो, नया ढंग हो

तो आनंद लीजिये इन दोनों शायरों की ग़ज़लों का और इंतजार कीजिये अगले अंक का । नया साल शुरू हो गया है सो आप सब को नये साल की मंगल कामनाएं ।

परिवार