मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

होली का तरही मुशायरा :-सनम की गली में जूते खाने आज आ रहे हैं पाठशाला के तीन छिछोरतम विद्यार्थी गौतम राजरिशी, रविकांत पांडे और वीनस केसरी ।

( वैधानिक और संवैधानिक सूचना :- इस ब्‍लाग के लिखने वाले ने किसी प्रकार की कोई भांग या अन्‍य नशीला पदार्थ का सेवन नहीं किया है । और पढ़ने वालों को इस बात पर विश्‍वास करना ही होगा । विश्‍वास न करो तो भाड़ में जाओ । )

हम कल से ही कह रहे थे कि भांग ऊंग खइबे का नाहीं । पर का करें । पाठशाला के ही बच्‍चे बिगड़ गये हैं । कल से ही भंगिया पीके होल मार रहे हैं । सुसुर का नाती इतना बोम मार रहे है कि अब हम क्‍या बताएं । हम कह रहे हैं कि सबका लंबर आयेगा लेकिन नहीं कल से ही जिद पर लगे हैं कि पहले हम पढ़ेंगें । सब कपड़ा उपड़ा फाड़ के खड़े हैं कि हमें जूते पड़वाओ, हमारी टांट पे सिलबिलाहट हो रही है जूते खाने की । अब का बताएं दो तो सादी सुदा हैं, रोज घर में डाक्‍टर के पर्चे के हिसाब से दो जूते सुबह, दो दुपहरिया में, दो शाम को और दुइ ठो रात को सोने के पहले दूध के साथ खाते हैं । लेकिन कह रहे हैं कि ऊ तो घराली के हाथ के जूते हैं । उनमें तो खा खा के टेस्‍ट नहीं बचा । अब तो हमें सनम की गली में ही जूते खाने हैं । हमने इनका ऊपर कहा है कि ये छिछोरतम विद्यार्थी हैं । ये छिछोरतम भी हमारा ही बनाया हुआ शब्‍द है । इन तीनों के लिये केवल छिछोरा शब्‍द छोटा पड़ रहा था । नया शब्‍द बनाना पड़ा, वो कहते हैं न कि आभश्‍यकता ही आभिष्‍कार की मतारी है । अहा अहा देखो तो तीनों को, किस प्रकार से चिंदी से छुपे हुए खड़े हैं ।पूरी पाठशाला की इज्‍जत की चिंदी कर रहे हैं । धन धन हो वीनस कि इत्‍ती भंग पीने के बाद भी कपड़ा नहीं फाड़ा है । बाकी का दोनों को क्‍या बोलें, हमें तो अइसा लग रहा है कि हम भरी जवानी में सूर्पनखा हो गये हैं ।

आज का होली विचार : जब आपका लुच्‍चापन, छिछोराहट और चुरकटयाई आपके चेहरे टपक रही हो तो उनके प्रदर्शन के लिये अलग से कपड़े फाड़ने की कोई आवश्‍यकता नहीं होती ।

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गौतम राजरिशी

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है इतनी हसरत सुनायें तुझको, तुझे बिठा के तेरी गली में

जो हम पे गुजरी, जो हम पे बीती, बगैर तेरे तेरी गली में

अजब कहानी सुताई की है, अजब है किस्सा धुनाई का ये

कभी तो सुनना हम आशिकों से, पिटे जो सारे तेरी गली में

थी टूटी हड्डी, फटी कमीजें, बदन लहू से हुआ था रंगीन

मजाल है इक जरा-सा उफ़ भी किया हो हमने तेरी गली में

वो आशिकी की ही इम्तहां थी, समझ सको गर, तेरी समझ है

थे नासमझ-से तेरे वो भाई सभी मुटल्ले, तेरी गली में

नया पजामा, नया था कुर्ता, चमकती जूती छटक रही थी

मगर धरे रह गये वो सारे टशन हमारे तेरी गली में

वो सजना-धजना, लटें बनाना, इतर-फुलेलों में डूबे रहना

उतर गया है बुखार सारा पड़े वो जूते तेरी गली में

बस इक झलक का था खेल सारा, लड़ाई थी वो बस इक दरस की

तू भाव इतना अगर न खाती, तो यूं न पिटते तेरी गली में

यकीन मानो, तेरी गली की थी सारी रंगत हमारे दम से

न जी लगेगा तेरा कहीं भी जो हम न होंगे तेरी गली में

न बात कोई बनी जो हम से, लिखा ग़ज़ल फिर तड़प के हमने

कि गुनगुनाये इसे तो कोई इसी बहाने तेरी गली में

रविकांत पांडेय

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कसम खुदा की मुड़ाते ही सर पड़े हैं ओले तेरी गली में
उतर गया है बुखार सारा पड़े वो जूते तेरी गली में
ये तेरी सखियां हैं या चुड़ैलें, सनम बता दो जिन्होने मेरा
किया है स्वागत सड़े हुये इन टमाटरों से तेरी गली में
मिले जो गोबर के साथ कीचड़ बने तभी ये महारसायन
नहाके जिसमें मनुज-दनुज सब हैं मोक्ष पाते तेरी गली में
हो चाहे जोगी विरागी या फ़िर यती तपस्वी गुफानिवासी
हुई है खटिया खड़ी सभी की पलक झपकते तेरी गली में
था जिनका दावा महारथी हैं हुआ है उनका क्या हाल देखो
हैं रेंकते अब हिला-हिला सर वो बनके गदहे तेरी गली में

वीनस केसरी

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तुम्हारे अब्बा को भी चेताया, रकीब भेजे तेरी गली में

उतर गया है बुखार सारा पड़े वो जूते तेरी गली में

जो डांस वाले कुकुर थे मुझमे वो मैंने छोड़े तेरी गली में

उछल उछल के धरम जी टाईप जी भर के नाचे तेरी गली में

मिलन में अपने बने थे दुश्मन जो पिछली होली उन्ही को अबके

जमालघोटा मिला के लड्डू है बांट डाले तेरी गली में

कहन  में कचरा  गजल में गोबर रदीफ में खुजली वाला पौडर

किया इकट्ठा रगड़ के फेटा औ फेक आये तेरी गली में

कोई मास्‍साब को नहीं छेड़े, मास्‍साब इन तीनों के तीन शेरों पर कुछ सेंटी टाइप के हो गये हैं । फटे कपड़ों के बाद भी क्‍या शेर निकाले हैं । नाक पोंछ लूं फिर बलैंया लेता हूं तुम तीनों की । गौतम का बस इक झलक का था , रवि का हो चाहे जोगी और वीनस का कहन में कचरा ये तीनों ही शेर हज़ल की एक्‍स्‍ट्रीम को छूते हुए शेर हैं । हज़ल में उस्‍तादाना रंग किसे कहते हैं ये इन तीनों शेरों से पता चल रहा है ।

चलिये आज का मामला तो निबटा अब देते रहिये दाद खाज और इंतजार कीजिये कल का । होली आई रे कन्‍हाई रंग छलके सुना दे ज़रा बांसुरी.........................

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