सोमवार, 30 जुलाई 2012

आज एक ही शायर के दो रूप देखते हैं, दो ग़जल़ें एक ही शायर की । भोपाल के श्रीतिलकराज कपूर जी से आज सुनते हैं उनकी दो ग़ज़लें ।

बीतता हुआ श्रावण मास खूब मेहरबान हो गया है । इतना मेहरबान कि मेरे जिले की चार तहसीलें पानी में डूबी हुई हैं । सीहोर में गंगा की सहायक नदी पार्वती और नर्मदा दो प्रमुख नदियां हैं । सीहोर से केवल चालीस किलोमीटर पर स्थित कस्‍बा आष्‍टा शनिवार को  पन्‍द्रह ये बीस फीट पानी में डूब गया था । यही हालत अन्‍य तीन स्‍थानों की भी है । हैरत की बात ये है कि मौसम का रंग क्‍या अजीब होता है, सीहोर के पश्चिम में केवल चालीस किलोमीटर पर आष्‍टा है जहां बाढ़ ने कहर ढा दिया है, उत्‍तर में केवल बीस किलोमीटर पर इछावर में भी यही स्थिति है लेकिन सीहोर में पानी नहीं गिर रहा है । बाकी स्‍थानों पर तीन दिन से लगातार पानी गिर रहा है, कोई मौसम विज्ञानी ही बता पाये कि ऐसा क्‍यों होता है कि मेरा घर छोड़ के कुल शहर पे बरसात हुई ।

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प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये

आज तरही में हम सुनने जा रहे हैं श्री तिलक राज जी कपूर की दो ग़ज़लें । पहली एक वचन में है और दूसरी बहुवचन में । पहली ग़जल़ में उन्‍होंने सोलह श्रंगारों को आधार बना कर खूब प्रयोग किये हैं । बहुत खूब बन पड़ी है ये ग़ज़ल ।

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श्री तिलक राज जी कपूर
श्रंगार रस पर मुसल्सछल ग़ज़ल की बात उठते ही मुझे सोम ठाकुर जी से 80 के दशक में हुई एक मुलाकात याद आई जिसमें उन्हों ने कहा था कि श्रंगार तलवार की धार की तरह होता है। जरा सा चूके कि रचना अश्लील हो जाती है। उस समय तक श्रंगार पर मैनें एक गीत भर लिखा था जिसपर उनका आशीर्वाद प्राप्त  हुआ और सराहना मिली। सोम ठाकुर जी की वह बात निरंतर एक दबाव निर्मित करती रही है प्रस्तु्त ग़जलें कहते समय।
दो प्रयास किये हैं; एक हबुवचन में तथा एक एकवचन में। श्रंगार रस में मुसल्सल ग़ज़ल होने के कारण रस-निरंतरता के साथ विषय-निरंतरता ने एक और चुनौती प्रस्तुंत की विषय चयन की। प्रस्तुत ग़ज़ल बस इस प्रयास के लिये निर्धारित प्रयोग हैं। जहॉं बहुवचन की ग़ज़ल में एक घटनाक्रम की निरंतरता है वहीं एकवचन में कही ग़ज़ल दुल्हन के सोलह श्रंगारों का महत्व  बताती हुई और सोलह श्रंगार के बारे में एक अन्य वैब-साईट पर दिये गये विवरण पर आधारित है।

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रूप-श्रंगार की छवि नयी है प्रिये
देख श्रंगार सोलह कही है प्रिये।

रस्म भर की नहीं ये 'अंगूठी' तो इक
प्यानर विश्वास की बानगी है प्रिये।

माँग 'सिन्दूर' की लालिमा यूँ लगे
ज्यूँ  क्षितिज रेख इसमें भरी है प्रिये।

हो रवि ज्यूँ  सलोना उदय काल में 
तेरे माथे ये बिंदी सजी है प्रिये।

दो कटारें नयन की हैं 'काजल' भरीं
रूप लावण्य से तू ढली है प्रिये।

इस करीने से तुझ पर लगी है 'हिना'
प्रीत की अल्पना ज्यूँ सजी है प्रिये।

वेणियों में गुँथी मोगरे की कली
और 'गजरे' में खुश्बू बसी है प्रिये।

हो गुलाबों पे तारों की चादर बिछी
'लाल जोड़े' में तू यूँ सजी है प्रिये।

'कर्णफूलों' के ये केश बंधन कहें
अप्सरा स्वर्ग से आ गयी है प्रिये।

बाजुओं को कसे 'बन्द बाजू' के हैं
स्वर्ण आभूषणों से लदी है प्रिये।

'मॉंग-टीका' बना पथ-प्रदर्शक तेरा
राह दिखलायेगा जो सही है प्रिये।

सात फेरे लिये अग्नि पावन के तब
पार्वती मान में 'नथ' मिली है प्रिये।

आज से तुम पिया से वचनबद्ध हो
'मंगलम्-सूत्र' आशय यही है प्रिये।

आज दूरी पिया घर की 'बिछिया' पहन
बस विदा की घड़ी तक बची है प्रिये।

मातु सी सास देती बहू को बड़ी
पुश्त-दर-पुश्त 'कंगन' वही है प्रिये।

इक 'कमरबन्द ' में चाबियॉं सौंपकर
सास दुल्हन को घर सौंपती है प्रिये।

एक संदेश दे 'पायलों' की झनक
घर पिया के तू जबसे बसी है प्रिये।

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जब से नज़रें हमारी मिली हैं प्रिये।
धड़कनें साथ चलने लगी हैं प्रिये।

हैं अधर मौन पर बात नयना करें
क्यूँ परिंदों से हम अजनबी हैं प्रिये।

भाव भटका किये, शब्द मिलते नहीं
फ़ाड़ दीं चिट्ठियॉं जो लिखी हैं प्रिये।

बादलों में छुपी हैं हवाओं में हैं
प्रेम पाती तुझे जो लिखी हैं प्रिये।

इश्क औ मुश्क छुपना न मुमकिन हुआ
पर्त जितनी भी थीं खुल गयी हैं प्रिये।

कुछ इशारे हुए ऑंख ही ऑंख में
यार करने लगे दिल्लगी हैं प्रिये।

चुन लिया संगिनी एक को, शेष अब
सिर्फ़ इतिहास की संगिनी हैं प्रिये।

मुद्रिकायें बदलने में शामिल हैं सब
अब न बाधक न बाधा बची हैं प्रिये।

अब हमारा मिलन दूर लगता नहीं
छिड़ रही हर तरफ़ रागिनी हैं प्रिये।

हाथ पैरों सजी ये हिना यूँ लगे
प्रीत की अल्पनायें सजी हैं प्रिये।

भोर की लालिमा मॉंग में सज गयी
संदली पॉंव बिछिया चढ़ी हैं प्रिये।

आज स्वागत तुम्हारा पिया द्वार पर
भोर की रश्मियॉं कर रही हैं प्रिये।

कुछ पहर दूर है एक होने का पल
धड़कनों को बढ़ाती घड़ी हैं प्रिये।

सॉंझ से ही धड़कने लगा है ये दिल
कल्प नाओं की लहरें उठी हैं प्रिये।

एक कोने में सिमटी सी सकुचाई सी
भाव औ भंगिमायें नई हैं प्रिये।

नैन जादू भरे कनखियों से चलें
दो कटारी लगें जादुई हैं प्रिये।

दें निमंत्रण लरजते हुए ये अधर
थाम लो, धड़कनें थम रही हैं प्रिये।

देखिये क्या जतन, काम करता है अब
देह अंगार सी तप रही हैं प्रिये

ये प्रहर रात्रि का आज कर दें अमर
फिर न आयें ये ऐसी घड़ी हैं प्रिये।

भोर अलसा रही है मिलन रात्रि की
देह मादक उनींदी हुई हैं प्रिये।

रात काटी है फूलों भरी सेज पर
तेरी अंगड़ाईयॉं कह रही हैं प्रिये।

दाहिने पॉंव की पैंजनी है कहॉं
बात सखियॉं यही पूछती हैं प्रिये।

दोनों ग़ज़लें बहुत सुंदर बन पड़ी हैं । एक वचन में सोल श्रंगारों को जिस प्रकार से ग़ज़ल में ढाला है वो प्रयास अनोखा है । कुछ शेर बहुत सुंदर बने हैं मंगलम् सूत्र का आशय हो या कि कमरबंद में घर सौंपना दोनों ही प्रयोग मन को छू लेने वाले हैं । भारतीय परंपराओं को बहुत सुंदरता के साथ वर्णित कर रहे हैं । कुछ ऐसा ही सुंदर शेर पुश्‍त दर पुश्‍त चलते कंगनों का बन पड़ा है । पीढ़ी दर पीढ़ी चलती परंपराओं को मनो स्‍वर दे दिया है । बहुवचन की तरही भी सुंदर बनी है चुन लिया एक को में मानों तिलक जी ने हम सब की व्‍यथा को ही शेर में ढाल दिया है । इतिहास की संगिनियों का हुजूम सब के जीवन में होता है । मुद्रिकाएं बदलने में शामिल हैं सब में बाधक और बाधा का प्रयोग खूब है । बहुत सुंदर । आनंदम । वाह वाह वाह ।

शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

आज उम्र के दो विपरीत बिंदुओं पर खड़ी दो कवयित्रियां आदरणीया निर्मला कपिला जी और अनन्‍या सिंह की ग़ज़लें ।

सावन इस समय हमारे अंचल पर पूरी कृपा के साथ बरस रहा है । आज सुबह सुबह से ही रुक रुक कर बरसात का सिलसिला बना हुआ है । बाज़ार में रक्षा बंधन का त्‍यौहार अभी से अपनी झलक दिखाने लगा है । और इधर तरही में भी आनंद का माहौल बना हुआ है । पिछले अंक में गौतम और नीरज जी की जुगलबंदी ने धमाल मचाया था तो आज भी दो कवयित्रिओं की जुगलबंदी होने जा रही है ।

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प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये

आज निर्मला कपिला जी और अनन्‍या सिंह की ग़ज़लें हैं । दोनों की उम्र में बड़ा फासला है । लेकिन एक बड़ी समानता ये है कि दोनों ग़ज़ल कहना लगभग साथ साथ ही सीखना शुरू किया । निर्मला जी पूर्व से कहानीकार हैं, लेकिन यहां आकर उन्‍होंने ग़ज़ल का मात्रिक विन्‍यास सीखना शुरू किया, और ऐसा ही कुछ अनन्‍या ने भी किया । आज ये स्थिति है कि दोनों की ग़ज़लों में बहर की त्रुटि देखने की आवश्‍यकता ही नहीं होती । निर्मला जी की दो साल पहले की ग़ज़लें और आज की ग़जल़ें देखी जाएं तो उनमें ज़मीन आसमान का अंतर आ गया है । इन दोनों ने सिद्ध किया है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती है । आइये सुनते हैं दोनों से उनकी ग़जल़ें ।

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आदरणीया निर्मला कपिला जी

मैने इस बार के मुशायरे के लिये गज़ल तो लिखी है लेकिन इस उम्र मे वो नज़ाकत कहाँ रहती है कि प्रेम पर कुछ सुन्दर सा लिखा जाये।  हल्के फुलके कुछ शेर ।

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कल्पना में तू ही तू बसी है प्रिये
संग तेरे ही मेरी खुशी है प्रिये

ज़िन्दगी मिल गयी प्यार तेरा मिला
रात पहलू में तेरे कटी है प्रिये

चाहता हूँ तुझे इस तरह मैं कि ज्यों
चाँद की लाड़ली चाँदनी है प्रिये

गुलबदन, सुर्ख से होंठ मय से भरे
हर अदा ही मुहब्बत भरी है प्रिये

आज दीपक जलेगा जो बाती मिली
आस जुगनू सी दिल मे जगी है प्रिये

आ चलें चाँद  तारों की महफिल जहाँ
रात चुपके से ढलने लगी है प्रिये

भोर उगती हुयी रात ढलती हुयी
सब मे तेरी कमी ही कमी है प्रिये

इन शरारत भरी आँखों मे कुछ तो है
कौमुदी क्यों तू छलने चली है प्रिये

ये प्रतीक्षा  लगे अब तो मुश्किल मुझे
आज आँखों मे थोडी नमी है प्रिय

अर्श, माला को समर्पित
अर्श, माला की जोडी बनी है प्रिये
प्रीत की अल्पना सी सजी है प्रिये

बहुत बहुत सुंदर ग़ज़ल । ख़राब स्‍वास्‍थ्‍य और दूसरी सारी परेशानियां झेलते हुए जो ग़ज़ल निर्मला जी ने कही है उस गज़ल के लिये क्‍या कहा जाये । भोर उगती हुई रात ढलती हुई सबमें तेरी कमी ही कमी है प्रिये, बहुत सुंदर तरीके से कमी को इंगित किया है । आज दीपक जलेगा जो बाती मिली, में प्रणय की सूक्ष्‍म बातों को इशारों में कह दिया गया है बहुत सुंदर । आ चलें चांद तारों की महफिल जहां, पारंपरिक शेर है जो खूब बन पड़ा है । वाह वाह वाह । 

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अनन्‍या सिंह

ये छुटकी देखते ही देखते कितनी बड़ी हो गई । किसी ने सच कहा कि बेटियां बहुत जल्‍दी जल्‍दी बढ़ती हैं । या शायद ये सच हो कि बेटे और बेटियां दोनों ही समान रूप से बढ़ते हैं लेकिन बढ़ती हुई बेटियों को देख कर उनकी विदाई की घड़ी पास आती लगने लगती है । अनन्‍या ने स्‍वयं मात्राएं गिनना और बहर पर शेरों को बिठाना सीखा है और आज वो बहर में ग़ज़ल कहना अच्‍छी तरह से सीख चुकी है ।

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जिंदगी बिन तेरे नाखुशी है प्रिये।
साथ तेरा मेरी जिंदगी है प्रिये।

मन का दर और आँगन चमक से गये,
प्रीत की अल्पना यूँ सजी है प्रिये।

प्रेम राधा किशन का अनूठा बड़ा,
और अपनी कहानी वही है प्रिये।

राह तकती रही मैं तेरी साँझ भर,
आज खामोश फिर से गली है प्रिये।

दीप रोशन हुए, जब मिले तुम से हम,
ना बची अब कहीं तीरगी है प्रिये।

बाद बरसों तेरी चिट्ठियाँ हैं खुली,
फिर भी खुशबू वही की वही है प्रिये।

बूँद में बस तेरा अश्क़ है दिख रहा,
आज बारिश नही थम रही है प्रिये।

बाद बरसों तेरी चिट्ठियां हैं खुली, में मिसरा सानी क्‍या प्रवाह से आ रहा है, बच्‍ची खूब कह दिया है ये शेर । 'वही की वही' पर तो दिल से बिना प्रयास वाह निकल रही है । ये सहज रवानगी है जो वही की वही के प्रयोग में आ रही है । वाह । राह तकती रही मैं तेरी सांझ भर, में सांझ भर बहुत सुंदर बना है । दिन भर, रात भर जैसे प्रयोग तो होते रहे हैं लेकिन ये सांझ भर का प्रयोग तो अनूठा है । और तिस पर मिसरा सानी में गली की खामोशी क्‍या बात है । मतला भी सुंदर है । बहुत बहुत सुंदर वाह वाह वाह ।

बुधवार, 25 जुलाई 2012

आज प्रेम के दो अलग अलग रंग और अलग अलग मूड को लेकर आ रहे हैं दो अनोखे शायर श्री नीरज गोस्‍वामी जी और कर्नल गौतम राजरिशी ।

इस बार की तरही लगने में दो दिन का विलंब हुआ है । और आज भी ये काम बस भागते भागते ही किया जा रहा है । दरअसल पिछले दस दिनों से कामकाज की व्‍यस्‍तता चरम पर है । एडमीशन की प्रक्रिया अंतिम तिथि होने के कारण पूरा अटेंशन मांग रही है । शरद जोशी जी का निबंध याद आता है जिसमें उन्‍होंने लिखा था कि हिन्‍दुस्‍तान के लोगों को सबसे ज्‍‍यादा डर लगता है फार्म भरने से । आधे से ज्‍यादा भ्रष्‍टाचार की जड़ तो ये फार्म ही है । फार्मों में ऐसी ऐसी जानकारी मांगी जाती है जिसका कहीं कोई लेना देना नहीं होता । शरद जोशी जी का कहना था कि सरकार का बस चले तो वो डाक टिकिट खरीदने पर भी फार्म लगा दे । आपको भरना पड़े कि डाक टिकिट क्‍यों खरीद रहे हैं, किसको भेजेंगे आदि आदि । खैर तो पिछले दस दिनों से बच्‍चों के एडमीशन फार्मों से माथाफोड़ी चल रही है ।  आज समय निकाल कर ये दो ग़ज़लें लगा रहा हूं ।

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प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये

आज दो वर्सेटाइल शायर । वर्सेटाइल शायर इसलिये क्‍योंकि ये दोनों ही अपने हिसाब से ग़ज़लें कहते हैं । अपने हिसाब से प्रयोग करते हैं । और दोनों ही खूब लोकप्रिय हैं । ये दोनों ही पारंपरिक शब्‍दावली को तोड़ते रहे हैं । दोनों ही आम आदमी की भाषा में ग़ज़लें कहते हैं ।  और यही शायद इनकी लोकप्रियता का कारण भी है । तो आइये आज सुनते हैं श्री नीरज गोस्‍वामी जी और कर्नल गौतम राजरिशी की ग़ज़लें ।

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श्री नीरज गोस्‍वामी जी

इस बार की तरही ने दिमाग का पूरी तरह से भुरता बना दिया...हज़ार बार सोच सोच के भी कोई शेर इसमें घुसा ही नहीं...हार कर ये फैसला लिया के इस बार की तरही में भाग नहीं लेना है...और मैं अपने इस फैसले पर दृढ भी था के अचानक कल रात एक मिसरा दिमाग में आया...और मैं उठ कर बैठ गया...नींद में जो कुछ लिखा उसे वैसे का वैसा आपको भेज रहा हूँ...निहायत आम ज़बान में बिना किसी लाग लपेट के शेर कहने की कोशिश की है ।

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हर अदा में तेरी दिलकशी है प्रिये
जानलेवा मगर सादगी है प्रिये

लू भरी हो भले या भले सर्द हो
साथ तेरे हवा फागुनी है प्रिये

बिन तेरे बैठ आफिस में सोचा किया
ये सजा सी, भी क्या नौकरी है प्रिये

पास खींचे, छिटक दूर जाए कभी
उफ़ ये कैसी तेरी मसखरी है प्रिये

मुस्कुराती हो जब देख कर प्यार से
एक सिहरन सी तब दौड़ती है प्रिये

पड़ गयी तेरी आदत सी अब तो मुझे
और आदत कहीं छूटती है प्रिये ?

मन सरोवर में खुशियों के 'नीरज' खिले
पास आहट तेरी आ रही है प्रिये

अहा अहा खूब शेर कहे हैं । पड़ गयी तेरी आदत सी अब तो मुझे में मिसरा सानी जिस रवानी की साथ आता है वो अपने साथ बहा ले जाता है । मतला भी खूब गूंथ कर बनाया है और कन्‍ट्रास का सुंदर उपयोग किया है । सिहरन दौड़ने वाला शेर मामूली सी बात से चौंका देने वाला शेर है । बहुत सुंदर । बिन तेरे ऑफिस में सोचा किया, में एक बार फिर से साधारण सी बात को अपने शेर में उपयोग कर उसको मिडास टच दे दिया है नीरज जी ने । मकते में नाम का उपयोग खूब है । वाह वाह वाह ।

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कर्नल गौतम राजरिशी

लीजिये मेरी तरही पेश है, सुबीर सवाद सेवा पर प्रेम में रसमय हुये माहौल को तनिक अलग-सा रंग देने की कोशिश है कि प्रेम का ये भी तो रंग हो सकता है, शायद थोड़ी-सी मोनोटोनी भी टूटे :-)

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सच कहूँ, तो यहाँ ठीक ही है प्रिये
तू नहीं, ग़म नहीं, दूसरी है प्रिये

तू न करना वरी, बिन तेरे भी यहाँ
प्रीत की अल्पना सज चुकी है प्रिये

चैन से देख पाता हूँ टीवी मैं अब
चैनलों की न डिश में कमी है प्रिये

पार्टियाँ देर तक रोज़ ही चलती है
दोस्तों की घणी कम्पनी है प्रिये

दिन गुज़र जाता है जिन-बियर संग ही
शाम व्हिस्की में फिर डूबती है प्रिये

फेसबुक से अभी, बस अभी फ्री हुआ
आज नाइट मेरी लोनली है प्रिये

मत ले टेंशन ज़रा भी मेरी बातों का
मुझ पे मैजिक तेरा स्ट्रांगली है प्रिये

...और आखिर में ये शेर बतौरे-खास "प्रकाशमाला" के लिए

मॉनसून अब के दिल्ली न आए, तो क्या
मेरी बारिश तो तेरी हँसी है प्रिये

हम्‍मम...., घर परिवार से दूर सीमा पर पदस्‍थ सेना का एक कर्नल ऐसी ही ग़ज़ल लिख सकता है । ये तो मज़ाक की बात । लेकिन अंग्रेज़ी के शब्‍दों का बहुत खूब उपयोग किया है । गौतम ये पहले भी करता रहा है । दूसरी भाषा के शब्‍द साहित्‍य में इस प्रकार आने चाहिये कि वो लगे ही नहीं कि दूसरी भाषा के हैं । गौतम को ये कला आती है । मतला ही ग़ज़ल के मूड को ग़ज़ब तरीके से कह रहा है । मतले को ठीक प्रकार से देखें । बहुत साधारण से शब्‍द, साधारण सी बात, लेकिन मिसरे में असाधारण तरीके से गूंथ दिया गया है । तरही मिसरे पर गिरह भी जबरदस्‍त तरीके से लगाई है । स्‍ट्रांगली मैजिक वाला शेर जिस मासूमियत से भरा है उस पर क़ुर्बान होने को दिल चाहता है । और अर्श माला के लिये लिखे शेर का मिसरा सानी खूब बना है । वाह वाह वाह ।

और अंत में ये सूचना कि आपके इस मित्र का नया कहानी संग्रह महुआ घटवारिन सामयिक प्रकाशन से आ चुका है ।

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शनिवार, 21 जुलाई 2012

गो मुलाकातें अपनी बढ़ी हैं प्रिये, ये नयन आज भी अजनबी हैं प्रिये आइये आज सुनते हैं एक साथ दो शायरों अंकित सफ़र और राजीव भरोल से उनकी ग़ज़लें ।

जैसा कि मैंने पहले कहा था कि इस बार प्रारंभ में तो ग़ज़लें कम ही मिलीं थीं लेकिन उसके बाद एक एक करके काफी ग़ज़लें आती गईं । शुरू में सोचा था कि एक दिन में एक शायर का नियम चला कर काम हो जायेगा, किन्‍तु, अब ऐसा लग रहा है कि एक दिन में दो को ही लेना होगा । अभी भी काफी ग़ज़लें शेष हैं । सो आज से एक दिन में दो ग़जलों को लिया जा रहा है । इस बीच सारे देश्‍ा की तरह हमारे इलाके में भी मानसून की अत्‍यंत कम वर्षा से चिंता की लहर फैली हुई है । मगर जैसा कि अब आने वाला समय है उसमें दो पवित्र महीने एक साथ हैं । पवित्र श्रावण और पवित्र रमज़ान । दोनों महीनों में दोनों तरफ से जब प्रार्थना और दुआ में करोड़ों हाथ उठेंगे तो वर्षा के बादल घिर घिर आएंगे ।

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प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये

आज मुशायरे को आगे बढ़ाते हैं दो दो शायरों के साथ । दोनों ही शायर अत्‍यंत प्रतिभावान हैं और बहुत सुंदर तरीके से बात कहते हैं । नये प्रतीक और बिम्‍बों की तलाश में रहते हैं । आज अंकित सफर और राजीव भरोल की ग़ज़लें हम सुनने जा रहे हैं ।

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अंकित सफ़र

अंकित की ग़ज़लें गूढ़ प्रतीकों की तलाश में रहती हैं । कभी कभी कुछ चौंकाने वाले बिम्‍ब अंकित की ग़ज़लों में आते हैं ।

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गो मुलाकातें अपनी बढ़ी हैं प्रिये.
फिर भी कुछ आदतें अजनबी हैं प्रिये.

उजला-उजला सा है तेरा चेहरा दिखा,
ख़्वाब की सब गिरह जब लगी हैं प्रिये.

ज़िक्र जब भी तेरा इस ज़ुबां से लगा,
शहद सी बोलियाँ लब चढ़ी हैं प्रिये.

यूँ लगे जैसे तेरे तसव्वुर में भी,
खुश्बुएँ मोगरे की गुँथी हैं प्रिये.

दो निगाहें न उल्फ़त छिपा ये सकी,
आहटें दिल तलक जा चुकी हैं प्रिये.

खैरियत सुन के भी चैन पड़ता नहीं,
फ़िक्र में चाहतें भी घुली हैं प्रिये.

ले कई आरजू दिल की दहलीज़ पर,
'प्रीत की अल्पनायें सजी हैं प्रिये.'

बहुत सुंदर शेर निकाले हैं । जिक्र जब भी तेरा इस ज़ुबां से लगा में शहद सी बोलियों की क्‍या बात है । और नीरज जी के ब्‍लाग के मोगरे जिस प्रकार से तसव्‍वुर में गूंथे गये हैं उससे पूरा शेर सुगंधित हो गया है । और फिक्र में चाहतों का घुलना बहुत अच्‍छा प्रयोग है जो शेर को नई ऊंचाइयां दे रहा है । पूरी ग़ज़ल रंग-ए-अंकित से भरी हुई है । बहुत सुंदर बहुत सुंदर ।

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राजीव भरोल

राजीव भरोल की ग़ज़लों में पारंपरिक शैली खूब देखने को मिलती है । और उसी पारंपरिक शैली में नये नये प्रयोग करना राजीव की आदत है ।

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बातें हम दोनों में जो हुई हैं प्रिये,
हो न हो मौसमों ने सुनी हैं प्रिये,

बाग़ में रोज यूं मिलना अच्छा नहीं,
तितलियाँ हमको पहचानती हैं प्रिये.

मैं समझ ही न पाया इन्हें आज तक,
ये नयन आज भी अजनबी हैं प्रिये,

आज जीवन के आँगन में रँगों भरीं,
प्रेम की अल्पनाएं सजी हैं प्रिये.

प्रेम हो और सिवा उसके कुछ भी नहीं,
धड़कने बस यही कह रही हैं प्रिये.

सबसे पहले मतला ही बहुत सुंदर बना है वही जो मैंने कहा था कि राजीव की ग़ज़लों में पारंपरिक शैली अपनी पूरी सुंदरता के साथ दिखाई देती है । और इसके बाद का ही शेर बहुत सुंदर बन पड़ा है तितलियां हमको पहचानती हैं प्रिये बहुत बहुत सुंदर कहा है । अंकित की ही तरह राजीव ने भी अजनबी काफिये का प्रयोग किया है और बहुत सुंदर तरीके से किया है । बहुत बहुत सुंदर ग़ज़ल कही है । आनंद आनंद ।

गुरुवार, 19 जुलाई 2012

तेरी पहली छुअन ने गज़ब ये किया, स्याह रातों मे अब रौशनी है प्रिये, आज की तरही ख़ास है क्‍योंकि आज प्रकाश अर्श की ग़ज़ल स्‍वागत कर रही है माला का दिल्‍ली आगमन पर ।

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प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये

सुना है कि ''नीर भरी सुख की बदली'' इन दिनों दिल्‍ली में बरसा रही है । सुना है कि माला का आगमन बिहार की राजधानी से देश की राजधानी में हो चुका है । सुना है कि दूल्‍हे राजा स्‍वयं स्‍टेशन पर पहुंचे थे स्‍वागत के लिये । खैर सुना तो बहुत कुछ है । तो जैसा कि तरही की भूमिका में कहा गया था कि ये तरही प्रकाश और माला के लिये है । और अब जब माला का आगमन दिल्‍ली में हो चुका है तो ये तरही अब और रंग के साथ आगे जारी रहेगी । जैसा कि हम पहले से जानते हैं कि प्रकाश और माला की शादी में बहुत बड़ा योगदान ब्‍लाग जगत का है । कंचन सिंह चौहान और रंजना सिंह जी ने अपने अपने तरफ के दो रिश्‍तेदारों को जीवन साथी बना दिया  । मुझे लगता है कि ब्‍लाग परिवार भी अब धीरे धीरे एक पूरे परिवार के रूप में विकसित होता जा रहा है । खैर हमारे बीच का एक मोस्‍ट वांटेड बैचलर अब लिस्‍ट से हटा दिया गया है । अब वो नमक, तेल और गैस का भाव याद करने वाली पुरुष जमात में आ चुका है । और इसका एहसास हो भी चुका है उसे क्‍योंकि माला के आगमन की तैयारी में मकान बदलने की बहुत मशक्‍कत हुई । मेरी अपनी व्‍यक्तिगत इस धारणा है कि ''संन्‍यास धर्म का पालन आसान है किन्‍तु गृहस्‍थ धर्म का पालन बहुत मुश्किल है ।'' मेरा मन गौतम बुद्ध को कभी क्षमा नहीं करता जिन्‍होंने अपनी जिम्‍मेदारी ( पत्‍नी ) को रात में सोता छोड़ कर सत्‍य की तलाश की । खैर आज दर्शन शास्‍त्र को छोड़ते हैं और चलते हैं प्रणय शास्‍त्र की ओर ।

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प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये

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प्रकाश अर्श

तो आज प्रकाश की ग़ज़ल की बारी है । दुनिया में प्रतिभाएं दो प्रकार की होती हैं, पहली वो जो जन्‍मजात होती हैं, दूसरी वो जो अपनी जिद से बनती हैं । प्रकाश का प्रकरण दूसरे टाइप का है । प्रकाश अपनी जिद से शायर बना है । जब प्रकाश शुरू में मुझसे जुड़ा था तो मैं सोचता था कि ये कैसे लिख पायेगा । किन्‍तु उसने केवल अपनी जिद से लय पकड़ ली । आज वो जिस प्रकार के शेर कह रहा है वो उसकी जिद का ही परिणाम है । आज की ग़ज़ल में भी प्रकाश ने बहुत सुंदर शेर निकाले हैं ( धर्मेंद्र सिंह सज्‍जन से क्षमा याचना सहित, हमारे यहां शेर निकाले हैं ऐसा ही कहा जाता है, सारा साहित्‍य हमारे मन के गह्वर में ही कहीं छुपा है और प्रयास करके उसे हमें ही निकालना होता है । विचार हमारे ही अंदर हैं बाहर नहीं हैं । कहानी, कविता, ग़ज़ल सब कुछ हमारे ही अंदर है । मेरे विचार में इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि शायर ग़ज़ल कही है कि जगह ग़ज़ल लिखी है कह रहा है । अरे भाई अच्‍छी ग़ज़ल होनी चाहिये अब उसके साथ आप लिखी कहो या कही कहो क्‍या फर्क पड़ता है । मेरा तो मानना है कि धर्म के नियमों का हर 100 साल बाद, जीवन शैली के नियमों का हर 50 साल बाद और साहित्‍य के नियमों का हर 25 साल बाद आकलन होना चाहिये और ये निर्णय लिया जाना चाहिये कि इन नियमों में क्‍या हटाने योग्‍य है और क्‍या नया बढ़ाने योग्‍य है । याद रखें कि सारे नियम तोड़ कर चलने वाला दुष्‍यंत सबसे ज्‍यादा कोट किया जाने वाला हिंदी ग़ज़लकार है 'लीक लीक गाड़ी चले लीके चले कपूत, ये तीनों तिरछे चलें शायर, शेर, सपूत। ) अरे बात लम्‍बी हो गई । तो आइये सुनते हैं प्रकाश की ग़ज़ल ।

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फूल आने लगे हैं चमेली में अब,  तेरे आने से ऐसी ख़ुशी है प्रिये !!

तू नहीं है तो हर पल सदी है प्रिये
तेरे बिन क्या कोई ज़िन्दगी है प्रिये 

रंग सारे धनक के ले आया  हूँ मैं
प्रीत की अल्पना तब सजी है प्रिये

फूल आने लगे हैं चमेली में अब
तेरे आने से ऐसी ख़ुशी है प्रिये 

तुझको पढ़ते हुए सोचता हूँ यही
तू पुरानी मेरी डायरी है प्रिये
 

अपने किस्से सुनहरे लिखे जाएंगे
वर्ण मैं हूँ औ तू वर्तनी है प्रिये 

तुझसे रिश्तों की पूंजी बची रह गई
बन के आई तू जब से कडी़ है प्रिये
 

घर को घर सा बनाना क्या आसान था
ये हुनर ही तो कारीगरी है प्रिये

मैं समन्दर हूँ खारा हूँ ठहरा हुआ
मीठी, कलकल तू  बहती नदी है प्रिये

तेरी पहली छुअन ने गज़ब ये किया
स्याह रातों मे अब रौशनी है प्रिये 

सारे संसार में बांट दे रौशनी
चाँद से चाँदनी कह रही है प्रिये
 

याद की पैरहन थी उधड़ने लगी
प्रीत की डोर से टाँक दी है प्रिये

बेलिबासी के रिश्ते ठहरते कहाँ
ये तो अच्छा है तू ओढनी है प्रिये
 

उम्र भर ख़ाब मे जिसको देखा किया
तू वही, हां वही, बस वही है प्रिये

शराबी  नाम की एक फिल्‍म आई थी जिसमें अमिताभ शायरी करने के शौकीन रहते हैं और उनके उस्‍ताद होते हैं ओमप्रकाश जी । ओमप्रकाश जी पूरी फिल्‍म में यही कहते हैं कि पहले इश्‍क करो, शायरी में खुद ही जान आ जायेगी । तो आज की ये ग़ज़ल बता रही है कि ओमप्रकाश जी कितना सही कहते थे । उसी फिल्‍म में एक अनोखा मतला था जिसमें दोनों मिसरों में केवल एक अक्षर भिन्‍न था बाकी पूरा मिसरा एक समान था

'जिगर का दर्द ऊपर से हीं मालूम होता है ?

जिगर का दर्द ऊपर से हीं मालूम होता है ।

खैर तो आज की ग़ज़ल के बारे में मैं क्‍या कहूं । बच्‍चे ने माला के स्‍वागत में क्‍या क्‍या तो तैयारियां की हैं कहां कहां से क्‍या क्‍या उठा के लाया है । धनक, चमेली, डायरी, चांदनी और जाने क्‍या क्‍या । तेरी पहली छुअन का ग़ज़ब कमाल का है । घर को घर सा बनाने वाला शेर तो अब क्‍या कहूं, देखिये बच्‍चे को गौतम जैसे अनुभवियों ने बता रखा है कि बेलन और चिमटे से बचना हो तो ऐसी बातें करते रहना चाहिये । ये स्‍वीकारोक्ति भी अच्‍छी है कि मैं समंदर हूं खारा भी हूं अच्‍छी बात है सुखी गृहस्‍थ जीवन के लिये भी ये कहते रहना अच्‍छी बात है । बहुत अच्‍छी ग़ज़ल है । बच्‍चा गृहस्‍थ का मूल मंत्र जान गया है 'प्रशंसा करते रहो, सुखी रहो' । ये मंत्र जानने में लोगों को बरसों लग जाते हैं ।

सोमवार, 16 जुलाई 2012

उसकी पायल की छन-छन ये कहती रही कितनी बातें हैं जो अनकही हैं प्रिये, आइये आज सुनते हैं आदरणीया इस्मत ज़ैदी 'शेफा' जी से उनकी सुंदर ग़ज़ल ।

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प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये 

तरही को लेकर पहले तो कम उत्‍साह देखने को मिला था लेकिन जैसे जैसे तरही आगे बढ़ने लगी तो ग़ज़लें आनी शुरू हो गईं । हम लोग अभी भी बचपन में ही जीते हैं । बचपन में मास्‍साब जब कोई काम करने को कहते थे तो हम इस बात की प्रतीक्षा करते थे कि हमारा कोई दोस्‍त पहले उस काम को शुरू करे फिर उसके बाद हम करें । कहते हैं बचपन आपके साथ पूरी उम्र चलता है । आपकी पसंद, नापसंद, आपकी आदतें सब कुछ वही रहती हैं जो बचपन में होती हैं । खैर अब चूंकि बहुत सारी गज़ल़ें मिल गई हैं इसलिये अगले अंक से एक साथ दो शायरों को लेना होगा नहीं तो मुशायरा बहुत लम्‍बा खिंच जायेगा ।

आज हम सुनने जा रहे हैं आदरणीया इस्‍मत ज़ैदी 'शेफा' जी से उनकी एक बहुत ही सुंदर ग़ज़ल । इस बार की तरही में सबसे बड़ा आकर्षण ये था कि जब इस मिसरे पर नारी क़लम चलेगी तो क्‍या भाव आयेंगे । पिछली पोस्‍ट में भी परिधि जी ने बहुत सुंदर ग़ज़ल कही थी और इस्‍मत दीदी की क़लम से तो सुंदर ग़ज़ल निकलनी ही थी । तो आइये सुनते हैं इस्‍मत दीदी से उनकी ये ग़ज़ल ।

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आदरणीया इस्‍मत ज़ैदी 'शेफा'

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''तेरे सन्देश ले कर न आया कोई, द्वार  पर सूनी  आँखें  लगी  हैं  प्रिये''

ग़ज़ल  

भाव  रूपी घटाएँ घिरी हैं प्रिये 
और गीतों की कलियाँ खिली हैं प्रिये

तेरे सन्देश ले कर न आया कोई
द्वार  पर सूनी  आँखें  लगी  हैं  प्रिये

उसकी  पायल की छन-छन ये कहती रही
कितनी बातें हैं जो अनकही हैं प्रिये

आओ रोली के रंगों से  जीवन रंगें
"प्रीत की अल्पनाएँ सजी हैं प्रिये"

गर्म धरती  के दुःख बूँद ने हर लिए
भाप बन कर व्यथाएँ उड़ी हैं प्रिये

तेरे आने से  अंगनाईयां जी उठें
कल्पनाओं की झांझर बजी हैं प्रिये

रब का दरबार है ध्यान में मग्न हूँ
आस की बातियाँ जल रही हैं प्रिये

अहा क्‍या शेर निकाले हैं  ।उसकी पायल की छन छन ये कहती रही कितनी बातें हैं जो अनकही हैं प्रिये, इसमें पायल की छन छन से अनकही बातों का जो संबंध जोड़ा है वो बहुत सुंदर बना है । गर्म धरती के दुख का शेर बहुत दूर तक जाने वाला शेर है । रब के दरबार का क्‍या कहा जाये, इस एक शेर को पढ़ कर मानो समूचा पूजा घर आंखों के सामने तैर गया । और उस पर आस की बातियों का जलना । रब के दरबार में आस की बातियों का जलना शेर को गहरे अर्थ दे रहा है । और तेरे संदेश वाला शेर निर्दोष वाक्‍य का एक उत्‍तम उदाहरण है पूरा शेर सुंदर वाक्‍य में ढल रहा है । बहुत सुंदर ग़ज़ल आनंद ही आनंद । वाह वाह वाह ।

दो दिन बाद पवित्र रमजा़न का महीना शुरू हो रहा है, साथ में पवित्र श्रावण मास तो चल ही रहा है । उसके बाद पन्‍द्रह दिनों के अंतर से रक्षाबंधन और ईद के त्‍यौहार आयेंगे । सभी को शुभकामनाएं । 

शनिवार, 14 जुलाई 2012

ख़्वाब के नर्म एहसास देंगे बता, रात रेशम से मैंने बुनी है प्रिये, तरही मुशायरे के क्रम को आगे बढ़ाते हुए आज सुनते हैं तरही मुशायरे में शायद पहली बार आ रहीं परिधि बडोला से उनकी ग़ज़ल ।

डॉ. आज़म की पुस्‍तक 'आसान अरूज़' का विमोचन बहुत अच्‍छे तरीके से हो गया । ऐन मौके पर कार्यक्रम संचालक के बीमार पड़ जाने से मुझे ही वो जवाबदारी संभालनी पड़ी । मैं चूंकि विशुद्ध हिंदी भाषी हूं, इसलिये सामान्‍यत: उर्दू के कार्यक्रमों का संचालन करने से ज़रा परहेज़ करता हूं । बात वही है कि पिता के स्‍थानांतरण के कारण बपचन प्रदेश के अलग अलग अंचलों में गुज़रा कभी मालवा में आष्‍टा, सुसनेर और उज्‍जैन कभी बुंदेलखंड में मुरैना, मध्‍य भारत में भोपाल और सीहोर । इन सब के कारण भाषा बहुत खिचड़ी टाइप की हो गई है । बात वही है कि हमारी वर्णमाला में क़, ख़, ग़, ज़, फ़ थे ही नहीं सो बचपन की ज़ुबान ने उनका उच्‍चारण ही नहीं सीखा । तिस पर पूरा बचपन मालवा में बीता, जहां उर्दू का दूर दूर तक कोई नामो निशान ही नहीं था और आज भी नहीं है । जब बचपन में हम सुसनेर से भोपाल में आये तो हमने जीवन में पहली बार ग़दर शब्‍द सुना ( मास्‍साब ने स्‍कूल में कहा ग़दर मत करो, तो हम हैरत में डूब गये थे कि ये ग़दर क्‍या होता है ।) अन्‍यथा तो हम धूम या मस्‍ती शब्‍द का प्रयोग  करते थे । इन कारणों से उर्दू कार्यक्रमों का संचालन करने से कुछ दूरी बनाता हूं मगर जितनी दूरी बनाता हूं उतना ही करना पड़ता है । आसान अरूज़ के कार्यक्रम में एक बात और ख़ास थी वो ये कि महामहिम श्री क़ुरैशी मेरे नानाजी के साथ के राजनेता हैं । बपचन में उनका हमारे घर नानाजी के साथ आना जाना रहा है ( वे उन आठ दस राजनेताओं में हैं जिनका मैं बहुत सम्‍मान करता हूं, क्‍योंकि धर्मनिरपेक्षता की असली परिभाषा उनसे सीखी जा सकती है । ) । सो एक प्रकार का अतिरिक्‍त भय और झिझ‍क थी, झिझक इस बात की कि उनको मैं एक परिजन की तरह सम्‍मान दूंगा तो उसे शायद अन्‍यथा लिया जाये । एक और महत्‍वपूर्ण बात ये कि महामहिम स्‍वयं शाइरी के बल्कि अरूज़ के अच्‍छे जानकार हैं ।  इन सब कारणों के चलते संचालन अत्‍यंत कामचलाऊ ( बहुत कमजोर )  हुआ लेकिन कार्यक्रम अच्‍छा हो गया सो सब कसर निकल गई । इस ब्‍लाग परिवार के प्रतिनिधि के रूप में आदरणीय तिलकराज कपूर जी कार्यक्रम में उपस्थित थे  । कार्यक्रम कुछ लम्‍बा खिंच गया सो मुशायरा छोटा हो गया और केवल बाहर से आये शायरों को ही मौका मिला पढ़ने का, सो एक बार फिर मुशायरे में भी अपनी ग़ज़लें महामहिम को सुनानी पड़ीं । कुछ शेर उन्‍होंने पसंद किये ।

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तिलकराज जी कार्यक्रम का समापन होते ही गायब । मैं उनको श्री ज़हीर क़ुरैशी जी से मिलवाना चाहता था जो हिंदी के आज  एक समर्थ ग़ज़लकार हैं । फिर भी समय निकाल कर डॉ विजय बहादुर सिंह जी के साथ एक फोटो तो खिंचवा ही लिया मैं ने और तिलक जी ने । संचालन करने जाते समय मैं तिलक जी को डॉ विजय बहादुर सिंह जी के हवाले सौंप गया था । खैर ।

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तो आइये अब आज तरही का क्रम आगे बढ़ाते हैं और सुनते हैं एक ऐसी रचनाकार से उनकी ग़ज़ल जो मेरे विचार में तरही में शायद पहली बार आ रही हैं । उनका नाम है परिधि बडोला ।  उनके बारे में अधिक जानकारी नहीं मिली और उनका चित्र भी जो यहां लगाया जा रहा है वो गूगल महाराज द्वारा सुझाया गया है, इसलिये हो सकता है चित्र ग़लत हो ।

paridhi badola

परिधि बडोला
आपका ब्लॉग पढ़ा, बहुत ज्ञानवर्धक और अच्छा लगा. थोडा-बहुत लिखती हूँ, उसी समझ से सुबीर संवाद सेवा पर जल्द ही आयोजित होने वाले तरही मुशायरे के लिए अपनी ग़ज़ल भेज रही हूँ. ग़ज़ल एकवचन में कही है - मिसरा "प्रीत की अल्पना जब सजी है प्रिये" पर.परिचय-
लेखन मेरे लिए अहसासों का एक संस्मरण है, जब भी थोडा बहुत वक़्त अपनी दो परियों काव्या और लव्या से बचा के समेट पाती हूँ तो उसे कागज़ पर शब्दमई रंगों में उड़ेल देती हूँ. वर्तमान में मालवीय नगर, दिल्ली में अपनी दो परियों, सास-ससुर और पति के साथ हूँ. घर की जिम्मेदारियों के साथ अपने इन प्रियजनों के साथ एक बहुत ही सुन्दर नज़्म (ज़िन्दगी) लिख और जी रही हूँ

prem

तुम हो गर साथ तो हर ख़ुशी है प्रिये.
मैंने माँगी कहाँ ज़िन्दगी है प्रिये.

ख़्वाब के नर्म एहसास देंगे बता,
रात रेशम से मैंने बुनी है प्रिये.

तुम में खो कर ही मेरा है पाना लिखा,
जैसे सागर से मिलती नदी है प्रिये.

साथ रहना सदा, आसमां हो कोई
डोर तुम से ही मेरी बँधी है प्रिये.

प्यार का रंग चढ़ कर है गहरा हुआ,
हाथ पर जब हिना ये रची है प्रिये.

हम तो किरदार हैं इस कहानी के दो,
जो न जाने कभी से लिखी है प्रिये.

बीते लम्हे उतर आये हैं रंगों में,
प्रीत की अल्पना जब सजी है प्रिये.

बहुत ही सुंदर ग़ज़ल कही है । मुझे विशेष कर इस बार के मिसरे में ये लग रहा था कि इस मिसरे पर जब नारी क़लम चलेगी तो भाव किस प्रकार के आते हैं । लेकिन परिधि जी के शेर बिल्‍कुल नारी मन को अभिव्‍यक्‍त कर रह हैं । तुम में खोकर ही मेरा है पाना लिखा शेर एक ऐसा ही शेर है जिसे पुरुष लिख ही नहीं सकता । मतला ही बहुत सुंदर बन पड़ा है, मतला वास्‍तव में ही जैसे रेशम से बुना गया है । ख्‍वाब के नर्म एहसास और रात के रेशम होने का प्रयोग बहुत सुंदर है । सुंदर ग़ज़ल ।

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

स्वर्ण मंडित प्रथम रश्मि की चेतना मेरे चिर शून्य को भर रही है प्रिये, आज इस बालक वीनस केसरी ने मुझे नि:शब्‍द कर दिया है ।

आज तरही का सिलसिला कुछ और आगे बढ़ाते हैं । आज शाम 7 बजे भोपाल के शहीद भवन में डॉ: आज़म की पुस्‍तक 'आसान अरूज़' का विमोचन है । विमोचन उत्‍तराखंड के राज्‍यपाल महामहिम श्री अज़ीज़ क़ुरैशी साहब के हाथों संपन्‍न होगा । भोपाल में रहने वाले मित्र वैस्‍े तो शहीद भवन से परिचित होंगे फिर भी जो अनभिज्ञ हैं उनके लिये सूचना है कि शहीद भवन एम.एल.ए. क्‍वार्टस के ठीक पास ही है । राजभवन के सामने से ऊपर की ओर जाने पर सामने ही शहीद भवन पड़ता है । तो यदि आप आ सकें तो अवश्‍य आएं डॉ आज़म को शुभकामनाएं देने । आज साहित्‍य जिस दौर से गुज़र रहा है उसमें लेखक को शुभकामनाओं की सबसे अधिक आवश्‍यकता होती है । शायद भारतीय भाषाओं का साहित्‍य अपने अंतिम दौर में है ।

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विमोचन के ठीक बाद एक हिंदी उर्दू की साझी महफिल भी सजनी है । महामहिम ग़ज़ल, कविताओं के शौकीन हैं और बहुत अच्‍छे श्रोता हैं ।

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प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये

आइये आज सुनते हैं वीनस केसरी से एक हिंदी ग़ज़ल । वीनस ने केवल पांच ही शेर कहे हैं किन्‍तु पांचों ही पांच हज़ार पर भारी पड़ रहे हैं । एक बार फिर से सिद्ध हो रहा है कि संख्‍या से अधिक महत्‍व गुणवत्‍ता का होता है । साहित्‍य में संख्‍या का कोई महत्‍व नहीं है । चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने घोषित रूप से साढ़े तीन कहानियां लिखीं । उसमें से लोकप्रियता उनको केवल एक 'उसने कहा था' से मिल गई । अक्षर और शब्‍द तो किफायत से उपयोग किये जाने वाली वस्‍तु हैं । जो काम महाग्रंथ नहीं कर पाते उनको कभी कभी एक वाक्‍य कर देता है ।

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वीनस केसरी

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नेह छवि आज यूं घुल रही है प्रिये
जैसे इक पल से मिलती सदी है प्रिये

तप्त तरुवर सदृश था ये जीवन मेरा
आपका आगमन श्रावणी है प्रिये

मन में मंगल मिलन की मधुर कल्पना
दृग में छवि चांदनी रीतती है प्रिये

स्वर्ण मंडित प्रथम रश्मि की चेतना
मेरे चिर शून्य को भर रही है प्रिये

माधुरी मन सरोवर सुशोभित कुसुम
प्रीत की अल्पना यूं सजी है प्रिये 

स्‍वर्ण मंडित प्रथम रश्मि की चेतना, मेरे चिर शून्‍य को भर रही है प्रिये, ये शायद वो शेर है जिसको सुनकर उस्‍ताद लोग तरही के समापन की घोषणा कर देते । बशीर बद्र साहब ने जब तरही मुशायरे में वो शेर पढ़ा था 'उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो' तो मुशायरे के सदर ने तुरंत तरही मुशायरे को समाप्‍त करने की घोषणा कर दी थी कि जो शेर होना था वो हो चुका । वीनस ने सारे शेर जबरदस्‍त कहे हैं । गिरह में मिसरा उला अहा अहा है । आंखें भर आईं और बच्‍चन,  नेपाली का स्‍वर्ण युग याद आ गया । छवि शब्‍द का दो शेरों में इस्‍तेमाल करके एक चूक ज़ुरूर कर दी है लेकिन वो क्षम्‍य है । 'माधुरी मन सरोवर सुशोभित कुसुम' बहुत सुंदर । आज इस बालक ने मुझे नि:शब्‍द कर दिया । वीनस स्‍वर्ण मंडित शेर के लिये तुम्‍हारी पिछले दिनों की गई बड़ी ग़लती को भी क्षमा किया जाता है । ये वो काम है जो तुमको करना चाहिये, और इसकी जगह तुम कुछ भी कर रहे हो ।

सोमवार, 9 जुलाई 2012

थाल पूजा का हाथों में ले के तू आ प्रीत की अल्पनाएं सजी हैं प्रिये, आइये आज सुनते हैं दिगम्‍बर नासवा से एक नहीं दो ग़ज़लें ।

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प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये

धीरे धीरे मुशायरा अपनी गति पकड़ चुका है । और इधर झूम कर बरसात भी आ गई है । कल भोपाल में आदरणीया चित्रा मुद्गल जी का कहानी पाठ सुन कर जब लौट रहा था तो सारे रास्‍ते मूसलाधार बरसात हो रही थी । बहुत दिनों बाद तेज बारिश में ड्राइव करने का आनंद लिया ।

एक शुभ सूचना

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डॉ. आज़म द्वारा लिखित पुस्‍तक आसान अरूज़ का विमोचन दिनांक 12 जुलाई को भोपाल में होने जा रहा है । विमोचन उत्‍तराखंड के राज्‍यपाल महामहिम श्री अज़ीज़ क़ुरैशी साहब के कर कमलों से सम्‍पन्‍न होगा । वैसे कार्यक्रम को अगस्‍त में करने की कार्ययोजना थी लेकिन महामहिम का समय अचानक मिल जाने के कारण ये कार्यक्रम भोपाल में होने जा रहा है । विमोचन को जो कार्यक्रम सीहोर में होना है वो अपने निर्धारित समय पर अगस्‍त या सितम्‍बर में होगा । तो यदि आप दिनांक 12 जुलाई को भोपाल में हैं ( तिलक जी सुन रहे हैं न आप) तो समय निकाल कर शहीद भवन पर शाम 7 बजे आयोजित होने वाले कार्यक्रम में पधारें । मुझे भी अच्‍छा लगेगा और डॉ आज़म जी को भी । विमोचन के बाद एक छोटा सा मुशायरा भी होगा क्‍योंकि महामहिम राज्‍यपाल महोदय मुशायरों के बहुत बहुत अच्‍छे श्रोता हैं । वे भोपाल की गंगा जमनी संस्‍कृति का प्रतिनिधित्‍व करते हैं ।

तो ये तो हुई शुभ सूचना, चलिये अब आज तरही का क्रम बढ़ाते हैं । आज हम सुनने जा रहे हैं दिगम्‍बर नासवा से उनकी दो सुंदर ग़जल़ें । पहली ग़जल बहुवचन में है और दूसरी  एकवचन में है ।

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दिगम्बर नासवा

प्रेम तो मेरा बहुत ही प्रिय विषय है इसलिए मैंने एक नहीं २ ग़ज़लें लिख डाली हैं ...
दोनों ही ग़ज़लें भेज रहा हूँ ... अगर कोई शेर ठीक न बना हो तो गुणीजनों से
गलती की क्षमा चाहता हूँ ...

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खुशबुएं तुझ को छू कर बही हैं प्रिये
मन के आँगन में कलियां खिली हैं प्रिये

रूठना एक टक देखना मानना
ये अदाएं तो मन में बसी हैं प्रिये

आसमानी दुपट्टा झुकी सी नज़र
देख कर भी न नज़रें भरी हैं प्रिये

थाल पूजा का हाथों में ले के तू आ
प्रीत की अल्पनाएं सजी हैं प्रिये

ये दबी सी हंसी चूडियों की खनक
मन में फिर कल्पनाएं जगी हैं प्रिये

जब से आने का तेरे इशारा हुवा
ये बहारें भी महकी हुयी हैं प्रिये

चाँद माथे पे आ के तेरे रुक गया
घंटियां मंदिरों में बजी हैं प्रिये

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खिलखिलाती हुई तू मिली है प्रिये
उम्र भर रुत सुहानी रही है प्रिये

तुझको देखा था पूजा की थाली लिए
इस मिलन की कहानी यही है प्रिये

दिन तेरे नाम से खिलखिलाता रहा
रात भी मुस्कुराती रही है प्रिये

रात भर क्या हुआ कौन से गुल खिले
सिलवटों ने कहानी कही है प्रिये

आसमानी दुपट्टा झुकी सी नज़र
ये अदा आज तक भी वही है प्रिये

तोलिये से है बालों को झटका जहां
उस तरफ से हवा फिर बही है प्रिये

बाजुओं में मेरी थक के सोई है तू
पल दो पल जिंदगानी अभी है प्रिये

ये दबी सी हंसी चूडियों की खनक
घर के कण कण में तेरी छवि है प्रिये

तू अंगीठी पे रोटी बनाती है जब
मुझको देवी सी हरदम लगी है प्रिये

बहुत ही सुंदर ग़ज़लें कही हैं । चांद माथे पे आके तेरे रुक गया में बहुत सुंदरता के साथ शब्‍दों को गूंथा गया है । गिरह का शेर भी बहुत उम्‍दा तरीके से बांधा गया है । दोनों मिसरे एक दूसरे का पूरक हैं । एक ही प्रकार के भावों को दोनों ग़ज़लों में अलग अलग तरीके से बांधा है । सिलवटों की कहानी में प्रतीकों का अच्‍छा इस्‍तेमाल किया गया है । पूजा की थाली को दोनों ही ग़ज़लों में बहुत अच्‍छे से निभाया है । दोनों ही शेर सुंदर बन पड़े हैं । बहुत सुंदर ग़ज़लें । वाह वाह वाह ।

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

तुम अनाघ्रात कलिका हृदय-कुंज की मान्यता मन-भ्रमर की यही है प्रिये, हिंदी छंदों पर काम करने वाले रविकांत पांडेय से सुनते हैं हिंदी ग़ज़ल ।

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प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये

हिंदी और उर्दू दो समानांतर बहती हुई नदियां हैं जो बहते बहते संगम पर आकर मिल जाती हैं । और संगम के बाद केवल एक ही नदी बचती है जिसे हिन्‍दुस्‍तानी भाषा कहा जाता है । हिन्‍दुस्‍तानी भाषा जिसमें हिंदी भी है, उर्दू भी है, संस्‍कृत भी है, अरबी भी है, फारसी भी है, अंग्रेजी भी है और साथ में बोली के देशज शब्‍द भी हैं । ये हिन्‍दुस्‍तानी भाषा भी हिन्‍दुस्‍तान की ही तरह कई महान संस्‍कृतियों का समागम है । और ये समागम इसलिये संभव हो पाया कि दुनिया भर में केवल और केवल एक हिन्‍दुस्‍तान ही ऐसा देश है जिसने आगे बढ़कर हर सभ्‍यता और संस्‍कृति को गले लगाया । हिटलर और मुसोलिनी दुनिया के दूसरे देशों में हुए जो मरते दम तक बर्बर रहे । किन्‍तु हमारे यहां यदि कोई युद्ध पिपासु अशोक हुआ तो अंत समय में उसके हृदय परिवर्तन करने के लिये कोई बुद्ध यहां थे । कुछ न कुछ तो ऐसा था जो दुनिया भर के लोगों को इस तरफ खींचता रहा और आज भी खींचता है । वो कारण यही है कि ये एक ऐसा समुद्र है जिसमें हर कोई समा जाता है । सभ्‍यताओं, संस्‍कृतियों की विभिन्‍नताओं से पूरित ऐसा शायद ही कोई दूसरा देश होगा । हिंदी और उर्दू के बीच कई प्रकार की मत विभिन्‍नताएं हैं । मगर उसके बाद भी दोनों हाथ में हाथ डाल कर चल रही हैं । शब्‍दों के उच्‍चारण को लेकर, व्‍याकरणीय नियमों को लेकर कई बार विवाद की स्थिति बनती है लेकिन उसक बाद भी सामंजस्‍य बना रहता है । कुछ चीज़ें ऐसी हैं जो अभी भी सुधारी जा सकती हैं । जैसे हिंदी के बड़े कवि सम्‍मेलन के मंचों पर एक या दो शायरों की उपस्थिति होती ही है वो भले मुनव्‍वर राना साहब हों, राहत इंदौरी साहब हों यो अंजुम रहबर जी हों । किन्‍तु अभी भी उर्दू के बड़े मुशायरों में मंचों पर हिंदी के कवि को कोई स्‍थान नहीं मिलता । मुझे लगता है कि जिस खुले दिल से हिंदी आगे बढ़ी गले मिलने उस तरह की पहल करने में उर्दू को अभी भी झिझक हो रही है । जब मैंने ये बात अपने एक शायर मित्र से कही तो उन्‍होंने तुरंत एक मुशायरे में शामिल हिंदू नाम गिना दिये कि ये तो थे । मैंने कहा मेरे भाई तुम हिंदुओं के नाम गिना रहे हो मुझे हिंदियों के नाम चाहिये । बात भाषा की है धर्म की नहीं । रचनाकार किसी मज़हब का नहीं होता वो भाषा का होता है । यदि शायर है तो वो उर्दू का प्रतिनिधित्‍व कर रहा है हिन्‍दु या मुसलमान का नहीं । यदि कवि है तो वो हिंदी का प्रतिनिधित्‍व कर रहा है । कुंवर जावेद हिंदी के कवि हैं तो अशोक मिजाज़ उर्दू के शायर, अब यदि अशोक मिजाज़ किसी मुशायरे के मंच पर हैं तो ये नहीं कहा जा सकता कि वे हिंदी का प्रतिनिधित्‍व कर रहे हैं, वे यकीनन उर्दू का ही प्रतिनिधित्‍व कर रहे हैं । एक कड़वी बात के साथ बात को समाप्‍त करता हूं । मुशायरे के मंचों पर हिंदी के कवि नहीं हैं तो उसके पीछे दोषी भी शायद वही हैं क्‍योंकि वे आजकल कविता कहां पढ़ रहे हैं वे तो चुटकुले आदि सुना कर स्‍टेंड अप कॉमेडी कर रहे हैं । एक लाख रुपये लेकर एक घंटे तक एक सौ चुटकुले सुनाते हैं और लौट आते हैं । अब कहां कोई नेपाली, नीरज, बच्‍चन, बैरागी, ठाकुर, सुमन, हिंदी के मंच तो आज जोकरों के हाथ में हैं । कड़वी सचाई ये भी है कि उर्दू के मुशायरों को भी अब ये रोग लग गया है ।

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हिंदी को लेकर आज इतनी बात इसलिये कही है कि आज एक ऐसे कवि को लिया जा रहा है जो हिंदी में ही काम करता है । छंदों पर, गीतों पर साधिकार काम करता है । हालांकि व्‍यस्‍तताओं के कारण बस यूंही कभी कभी की स्थिति बनी रहती है । फिर भी रविकांत पांडेय को एक गंभीर हिंदी कवि माना जा सकता है ।  तो आइये सुनते हैं रविकांत पांडेय से हिंदी ग़ज़ल ।

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रविकांत पांडेय

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लख तुम्हें बावरी सी हुई है प्रिये
नाचती, झूमती देहरी है प्रिये

गुनगुनायें चलो प्यार के गीत हम
प्रीत की अल्पना ये सजी है प्रिये

तुम अनाघ्रात* कलिका हृदय-कुंज की
मान्यता मन-भ्रमर की यही है प्रिये

तुम प्रणय गीत, तुम, अक्षता, पद्मिनी
राग-नदिया तुम्ही से बही है प्रिये

पार आओ करें प्रेम की नाव ले
तन की सरिता ये गहरी बड़ी है प्रिये

नाम क्या दूं तुम्हारे नवल रूप को
उलझनों में परा*, वैखरी* है प्रिये

रस की रिमझिम फुहारों में आ भींग लें
मदभरी ये मिलन-यामिनी है प्रिये

तुमको छूकर महकने लगी चांदनी
और हवा भी ठुमकने लगी है प्रिये

  रवि ने परा और वेखरी का उपयोग तो किया किन्‍तु उसका अर्थ नहीं लिख कर भेजा ये सोच की कि उनके अर्थ सबको पता ही होंगें । किन्‍तु मुझे लगता है कि इनके अर्थ दिये जाने आवश्‍यक हैं ताकि लोग शेर का आनंद ले सकें । सृष्टि की आदि में शब्द का मूल आधार नाद को माना गया है। वही ब्रह्म के रूप में स्थापित है। परा, पश्यन्ति, मध्यमा और वैखरी ये चारों वाक् की स्थितियाँ अथवा स्वरूप हैं। वाणी चार प्रकार की होती है। नाभि में परावाणी, हृदय में पश्यंति,कंठ में मध्यमा वाणी और मुख में वैखरी वाणी निवास करती है। हम शब्दों की उत्पत्ति परावाणीमें करते हैं, लेकिन जब शब्द स्थूल रूप धारण करता है, तब मुख में स्थित वैखरी वाणी द्वारा बाहर निकलता है। इनमें परा और पश्यंतिसूक्ष्म तथा मध्यमा व वैखरी स्थूल है। अनाघ्रात शब्‍द का अर्थ होता है जिसको सूंघा नहीं गया हो ।

अब ग़ज़ल की बात । पार आओ करें प्रेम की नाव ले, शेर में बहुत बड़ी बात को बहुत आसानी से कह दिया गया है वही बात जिसको सदियों से भारतीय परंपरा में दोहराया जाता जा रहा है । बहुत सुंदर बात । और फिर परा और वेखरी की बात बहुत सुंदर बन पड़ा है उन शब्‍दों के प्रयोग से शेर । तुम अनाघ्रात कलिका हृदय कुंज की में मिसरा सानी बहुत बारीक टांके से जोड़ा गया है मान्‍यता शब्‍द तो मानो रेशम के धागे के समान दोनों मिसरों को जोड़ रहा है । रस की रिमझिम फुहारों में जिस शालीनता के साथ प्रणय की बात कही गई है वो हिंदी गीतों के स्‍वर्ण युग की याद दिला रही है ।  आनंद आनंद ।

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

ऐसे घबराओ मत रोग है ये नहीं प्रेम में रतजगे कुदरती हैं प्रिये, आज गुरू पूर्णिमा के पावन अवसर पर सुनते हैं धर्मेंद्र कुमार सिंह की ग़ज़ल ।

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प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये

आज गुरू पूर्णिमा है । उन सबको प्रणाम जो अभी तक जीवन में किसी न किसी प्रकार से मेरे मार्गदर्शक रहे । जिन्‍होंने रास्‍ता दिखलाने का काम किया । 5 सितंबर और गुरू पूर्णिमा में बड़ा फर्क है । वही फर्क जो शिक्षक और गुरू में होता है । शिक्षक पूर्व निर्धारित पाठ्यक्रम की शिक्षा देने का काम करता है, जबकि गुरू अपने अनुभवों द्वारा बनाये गये पाठ्यक्रम का ज्ञान प्रदान करता है । शिक्षक का महत्‍व कम नहीं है, किन्‍तु गुरू के साथ उसकी तुलना नहीं की जा सकती । याद करता हूं तो कई नाम आते हैं जो गुरू के रूप में मिले और जो अपने अनुभवों के संचित जल से मेरे जीवन को सिंचित करके चले गये । मेरे जीवन के पहले गुरू मेरे शिक्षक ही थे । आज उन सबको नमन करता हूं प्रणाम करता हूं । एक उस्‍ताद द्वारा कही हुई बात याद आती है 'सफल व्‍यक्ति कभी बहुत अच्‍छा गुरू नहीं हो सकता, गुरू बनने के लिये जीवन में संघर्ष जुरूरी हैं क्‍योंकि संघर्षों से ही अनुभव जन्‍म लेते हैं ।''  मैं ये सोचता हूं कि गुरू और शिल्‍पकार में कोई अंतर नहीं होता है । गुरू भी शिल्‍पकार की ही तरह अनगढ़ पत्‍थर को प्रतिमा बनाने का काम करता हैं । मैं भी कभी यूं ही अनगढ़ पत्‍थर था जिसे कई कई शिल्‍पकारों ने गढ़ कर, तराश कर कुछ बना दिया । जितना बन पाया वो सब कुछ उन शिल्‍पकारों के कारण हूं और जो नहीं बन पाया वो अपनी ही ग़लतियों के कारण । उन सब शिल्‍पकारों को ये शेर समर्पित करता हूं ।

मुझमें जो कुछ भी बुरा है, सब है मेरा

और जो कुछ भी है अच्‍छा, आपका है

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गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥

आज इस पावन अवसर पर मैंने धर्मेंद्र कुमार सिंह की ग़ज़ल को मुशायरे के लिये चुना है । इसलिये चुना है कि ये ग़ज़ल उस्‍तादों द्वारा कही गई उस बात को सिद्ध करती है कि ग़ज़ल में कम शेर होना चाहिये । मतले के अलावा केवल पांच शेर और पांचों अत्‍यंत प्रभावशाली शेर  । मुसलसल ग़ज़ल के बारे में उस्‍तादों का कहना है कि ये छोटी होना चाहिये क्‍योंकि एक ही विषय का बार बार देर तक दोहराव श्रोता को थका देता है । वैसे तो उस्‍तादों का ये भी कहना है कि ग़ज़ल कोई भी हो उसमें शेर कम होने चाहिये । हम सब जब ग़ज़ल कहने बैठते हैं तो अक्‍सर 15 से 20 शेर निकाल लेते हैं । उसके बाद किसी बर्बर आलोचक की तरह अपने ही लिखे उन 15 से 20 शेरों में से 5 या 6 शेर छांटना ही मुख्‍य काम है । खैर आइये सुनते हैं धर्मेंद्र कुमार सिंह की ग़ज़ल ।

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धर्मेन्द्र कुमार सिंह

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अनछुए फूल चुनकर रची हैं प्रिये
प्रीत की अल्पनाएँ सजी हैं प्रिये

इनसे कोई ग़ज़ल मैं न कह पाऊँगा
आज के भाव बेहद निजी हैं प्रिये

मन की वंशी पे मेंहदी रची उँगलियाँ
रेशमी आग सी छेड़ती हैं प्रिये

ऐसे घबराओ मत रोग है ये नहीं
प्रेम में रतजगे कुदरती हैं प्रिये

प्यास, सिहरन, जलन, दौड़ती धड़कनें,
ये सभी प्रेम की पावती हैं प्रिये

एक दूजे का आओ पढ़ें हाल-ए-दिल
अब हमारे नयन डॉयरी हैं प्रिये

क्‍या कहूं नि:शब्‍द हूं । आप भी समझ गये होंगे कि क्‍यों मैंने आज के लिये इस ही ग़जल़ को चुना । पांचों शेर ज़बरदस्‍त । मतले में यद्यपि ईता बन रहा है किन्‍तु विशुद्ध हिंदी ग़ज़ल के प्रकरण में वो दोष क्षम्‍य है । तरही के नियमों के हिसाब से मतले में ही मिसरा ए तरह की गिरह बांधना भी ग़लत है । किन्‍तु ये दोनों दोष नीचे के पांच शेरों की रौशनी में क्षम्‍य हो रहे हैं । पहला ही शेर इतना सुंदर बन पड़ा है कि बस 'आज के भाव बेहद निजी हैं प्रिये'  उफ, ये है प्रेम । ऐसे घबराओ मत रोग है ये नहीं में मिसरा सानी यूं आया है मानो कोई आषाढ़ी बादल अचकचा के बरस पड़ा हो । ( अचकचा मालवी शब्‍द है । ) । एक बार फिर उस्‍तादों द्वारा कही गई बात को कोट करना चाहूंगा 'अधिक शेरों की भीड़ में अच्‍छे शेर भी अपना प्रभाव नहीं दिखा पाते ' । इसकी स्‍थापना में एक ही बात कहना चाहूंगा कि यद्यपि ये शे'र है , जंगल के शेर नहीं, फिर भी जंगल के शेर और इसमें ये समानता होती है कि सिंह शावक संख्‍या में कम होते हैं ।   बहुत सुंदर ग़ज़ल ।