शनिवार, 30 जून 2012

देह चंदन महक , सांस में मोगरा भीनी गंधें प्रणय रच रही हैं प्रिये, आइये आज प्रीत के तरही मुशायरे को आगे बढ़ाते हुए सुनते हैं श्री राजेंद्र स्‍वर्णकार से उनकी ग़ज़ल ।

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प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये

शब्‍दों को लेकर जो बहस चल रही थी वो किसी मुकाम पर पहुंच गई और ये ज्ञात हुआ कि कई सारे शब्‍दों को लेकर किसी भी प्रकार की शुचिता का कोई पालन करना आवश्‍यक नहीं है । जहां पर जैसी मात्रिक आवश्‍यश्‍कता हो शब्‍द को उस हिसाब से तोड़ मरोड़ कर ग़ज़ल में फिट किया जा सकता है । यदि आपको 222 चाहिये तो दीवाना कह लो और यदि 122 चाहिये तो दिवाना कर लो । यदि आपको 21 चाहिये तो और कहो तथा यदि केवल 2 चाहिये तो उर कर लो । मतलब ये कि हिंदी कविता में शब्‍दों की शुचिता तथा शुद्धता का जैसा ध्‍यान रखा जाता है वैसा उर्दू ग़ज़ल में नहीं है । यहां सुविधाभोगी स्थिति है । जैसी आपकी सुविधा हो शब्‍द का वज्‍़न वैसा कर लो । यदि आपको आसमान चाहिये तो आसमान करो और कम चाहिये तो आसमां कर लो । इस मामले में उर्दू ग़ज़ल, हिंदी कविता से कमज़ोर हो जाती है । क्‍योंकि यहां शब्‍दों को मात्रिक वज्‍न के हिसाब से परिवर्तित किया जा सकता है । बात दफा तो ऐसे ऐसे शब्‍दों में मात्राओं को दीर्घ से से गिरा कर लघु कर लिया जाता है जिनमें सुनने में ही अटपटा लगता है मगर जब उस्‍तादों की सलाह लो तो पता चलता है कि हां ये मात्रा गिराई जा सकती है । जैसे 'कोई' एक पूरा पूरा 22 मात्रिक शब्‍द है जिसमें दोनों मात्राएं दीर्घ हैं । लेकिन यही शब्‍द जहां 11 की आवश्‍यकता होती है वहां 11 हो जाता है । ये सुविधाभोगी स्थिति है । यदि शब्‍दों के साथ ये छेड़छाड़ जायज़ है तो फिर  ऐसे शब्‍द जिन को लेकर सबसे ज्‍यादा बवाल मचता है 'सुबह' तथा 'शहर' का हिंदी रूप क्‍यों नहीं स्‍वीकार किया जाता । हिंदी के पूरे पट्टे में हिंदीभाषी 'शहर' ही बोलता है 'शह्र' नहीं बोलता और उसी प्रकार 'सुबह' ही बोलता है 'सुब्‍ह' नहीं बोलता । तो फिर क्‍यों इस रूप में भी इन शब्‍दों को स्‍वीकार नहीं किया जाता है । अभी डॉ श्‍याम सखा श्‍याम का ग़ज़ल संग्रह शुक्रिया जिंदगी मिला । वो संग्रह एक नई बहस को जन्‍म दे रहा है । उसमें कहीं भी नुक्‍तों का प्रयोग नहीं किया गया है । उनका कहना है कि हिंदी वर्णमाला में कहीं भी क़, ख़, ग़, ज़, फ़ नहीं हैं, यदि नहीं हैं तो देवनागरी में लिखते समय इनका उपयोग क्‍यों किया जाये । ये प्रश्‍न भी महत्‍वपूर्ण है । ये सारे प्रश्‍न बहस की मांग करते हैं । लेकिन हमारे यहां समस्‍या ये है कि ये बहस अक्‍सर ग़लत दिशा ( सांप्रदायिक ) में मुड़ जाती है । लोग हिंदी और उर्दू की बहस को हिंदू और मुस्‍लमान की बहस मान कर चलने लगते हैं । आवश्‍यकता है सारे प्रश्‍नों के बिना किसी चश्‍मे के देखा जाये । और शुद्ध रूप से बहस की जाये ।

LOVE 33 (1)

खैर ये तो हुई विचारों की बात । आइये आज तरही मुशायरे को कुछ और आगे बढ़ाते हैं । आज श्री राजेंद्र स्‍वर्णकार एक सुंदर सी ग़ज़ल लेकर आ रहे हैं । ये ग़ज़ल न केवल प्रीत के रस में पगी है बल्कि इसमें हिंदी के परिमल शब्‍दों का बहुत सुंदरता के साथ प्रयोग किया गया है । राजेंद्र जी पूर्व में नियमित रूप से मुशायरों में आते थे किन्‍तु अब बहुत दिनों बात वे मुशायरे में आये हैं ।

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राजेन्द्र स्वर्णकार

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धड़कनें सुरमयी-सुरमयी हैं प्रिये !
सामने कल्पनाएं खड़ी हैं प्रिये !

मुस्कुराती मदिर मन में मेंहदी मधुर
प्रीत की अल्पनाएं सजी हैं प्रिये !

कामनाएं गुलाबी-गुलाबी हुईं
वीथियां स्वप्न की सुनहरी हैं प्रिये !

नेह का रंग गहरा निखर आएगा
मन जुड़े , आत्माएं जुड़ी हैं प्रिये !

तुम निहारो हमें , हम निहारें तुम्हें
भाग्य से चंद्र-रातें मिली हैं प्रिये !

इन क्षणों को बनादें मधुर से मधुर
जन्मों की अर्चनाएं फली हैं प्रिये !

मेघ छाए , छुपा चंद्र , तारे हंसे
चंद्र-किरणें छुपी झांकती हैं प्रिये !

बिजलियों से डरो मत ; हमें स्वर्ग से
अप्सराएं मुदित देखती हैं प्रिये !

मौन निःशब्द नीरव थमा है समय
सांस और धड़कनें गा रही हैं प्रिये !

बंध क्षण-क्षण कसे जाएं भुजपाश के
प्रिय-मिलन की ये घड़ियां बड़ी हैं प्रिये !

देह चंदन महक , सांस में मोगरा
भीनी गंधें प्रणय रच रही हैं प्रिये !

भोजपत्रक हुए तन , अधर लेखनी
भावमय गीतिकाएं लिखी हैं प्रिये !

अनवरत बुझ रहीं , अनवरत बढ़ रहीं
कामनाएं बहुत बावली हैं प्रिये !

लौ प्रणय-यज्ञ की लपलपाती लगे
देह आहूतियां सौंपती हैं प्रिये !

उच्चरित-प्रस्फुटित मंत्र अधरों से कुछ
सांस से कुछ ॠचाएं पढ़ी हैं प्रिये !

रैन बीती , उषा मुस्कुराने लगी
और तृष्णाएं सिर पर चढ़ी हैं प्रिये !

मन में राजेन्द्र सम्मोहिनी-शक्तियां
इन दिनों डेरा डाले हुई हैं प्रिये !

बहुत सुंदर ग़ज़ल । प्रीत के दोनों रूपों को अभिव्‍यक्‍त करती हुई ग़ज़ल । जिसमें आत्मिक प्रेम भी है और दैहिक प्रेम भी है । 'लौ प्रणय यज्ञ की लपलपाती लगे, शेर में प्रेम की उसी दूसरी अवस्‍था का बहुत सुंदर चित्रण प्रतीकों के माध्‍यम से किया गया है । याद आ गई बचपन में किसी उस्‍ताद या गुरू से सुनी हुई बात कि कवि वो होता है जो प्रतीको की नींव पर काव्‍य का भवन बनाता है । तुम निहारो हमें हम निहारें तुम्‍हें में खूब शब्‍द चित्र बनाया गया है जो पूरी बात कह रहा है । बहुत सुंदर ग़ज़ल । आनंद लीजिये इस ग़ज़ल का ।

एक सूचना

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डॉ आज़म द्वारा लिखित व्‍याकरण पुस्‍तक आसान अरूज़ प्रकाशित होकर आ गई है । इसको लेकर कुछ दुविधा थी । दरअसल प्रूफ जांच करने वाले ने अपना कमाल दिखा दिया जिसके चलते शब्‍दों की कुछ अशुद्धताएं चली गईं थीं ( अधिकांश नुक्‍तों को लेकर )। इस बात पर विचार किया जा रहा था कि क्‍या किया जाये । पुन:मुद्रण एक खर्चीली प्रक्रिया थी इसलिये अब यथारूप ही रखा जा रहा है । अगले संस्‍करण में सुधार कर लिया जायेगा । वैसे भी ये पुस्‍तक बहुत सीमित प्रकाशित करवाई गई है । जिन लोगों ने पुस्‍तक को लेकर संपर्क किया था उनसे निवेदन है कि shivna.prakashan@gmail.com पर एक बार पुन: मेल कर दें, ताकि उनको पुस्‍तक प्राप्ति की प्रक्रिया बताई जा सके । जिन लोगों ने पूर्व में औपचारिकताएं पूरी कर दी थीं उनको स्‍पीड पोस्‍ट से पुस्‍तक भेजी जा चुकी है ।

मंगलवार, 26 जून 2012

एक लाख ब्‍लाग पेज हिट्स का आज आनंद उत्‍सव मनाया जाये । ये ब्‍लाग एक साझा मंच है इसलिये ये उत्‍सव सभी का है । तो आइये आज केवल उत्‍सव का आनंद लिया जाये ।

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प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये

देखते ही देखते ब्‍लाग पेज हिट्स एक लाख का आंकडा़ पार गये । यूं लगता है जैसे ये कल की ही बात हो कि पांच साल पहले अगस्‍त 2007 में किसी मित्र के कहने पर ब्‍लाग शुरू किया था । ब्‍लाग पर पांच साल में एक लाख हिट्स आये इसका मतलब लगभग बीस हज़ार हिट्स प्रति वर्ष के हिसाब से या लगभग 70 हिट्स प्रतिदिन के हिसाब से । इस ब्‍लाग के संयोजन में मैंने अपने पत्रकारिता के गुरू स्‍व. ऋषभ गांधी द्वारा सिखाई गई एक बात पर हमेशा ध्‍यान रखा । वे कहा करते थे कि संपादक अपने समाचार पत्र या पत्रिका में अपनी ही रचनाएं छापने से सदैव बचना चाहिये । वे तो ये कहते थे कि बचना नहीं चाहिये बल्कि छापना ही नहीं चाहिये । यही कमेंट मैंने एक बार एक पत्रिका के संपादक को दे दिया था तो हंगामा हो गया था संपादक ने अपने समर्थन में ढेरों पत्र छपवा दिये थे । ऋषभ गांधी जी अपने समाचार पत्र में कभी अपना नाम कहीं किसी रूप में नहीं छापते थे । वे कहते थे कि प्रधान संपादक के रूप में मेरा नाम जा ही रहा है । आपने अपने संपादन में निकलने वाली पत्रिका में अपनी ही कहानी या ग़ज़ल को छाप लिया तो उसमें संपादन कहां हुआ, आपने लिखी, आपने भेजी, आपने चयनित की और आपने ही छाप ली । शायद यही कारण था कि भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के को अवतरित होना पड़ा ।

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पिछली पोस्‍ट पर काफी बहस हुई । और बहस के दौरान ये बात सामने आई कि 'भाई' जैसे शब्‍द को जब बहुवचन किया जाता है तो ई की मात्रा को छोटा कर दिया जाता है । हिंदी के लब्‍ध प्रतिष्ठित आलोचक तथा वागर्थ के पूर्व संपादक डॉ विजय बहादुर सिंह की आदत है कि जब भी बाज़ार से पैदल निकलते हैं तो दवा की दुकान देख कर रुक जाते हैं और दुकान मालिक के पास जाकर कहते हैं कि भाई आपने जो 'दवाईयां' लिख रखा है ये ग़लत है इसे दवाइयां कर लीजिये । अमूमन हर दवा की दुकान पर दवाईयां ही लिखा होता है । एक बार उन्‍होंने सीहोर में घूमते समय जब तीन चार दुकानदारों को टोका तो मैंने कहा भाई साहब वे नहीं बदलने वाले । इस पर उन्‍होंने उत्‍तर दिया कि न बदलें, मगर मैंने उनके मन में ये चोर तो छोड़ ही दिया कि उन्‍होंने जो लिखा है वो ग़लत है । अगली बार जब दुकान का बोर्ड बनवाएंगे तो वे दवाइयां ही लिखवाएंगे । और मैंने देखा कि ऐसा हुआ भी । सौरभ पांडे जी ने जो प्रश्‍न उठाया वो हिंदी व्‍याकरण के हिसाब से बिल्‍कुल ठीक है । किन्‍तु मैंने देखा कि आरजू को बहुवचन के रूप में ग़ज़ल में आरजूओं ही प्रयोग किया जाता है बहुत कम आरजुओं को प्रयोग होता है । यहां तक की ग़ालिब 

खमोशी में निहाँ खूंगश्ता लाखों आरजूएं हैं,
चिरागे - मुर्दा हूँ मैं, बेजुबाँ गोरे-गरीबाँ का।

और हसरत मोहानी

वस्ल की बनती है इन बातों से तदबीरें कहीं ?
आरज़ूओं से फिरा करतीं हैं, तक़दीरें कहीं ?

जैसे दिग्‍गजों ने भी आरजूओं का ही प्रयोग किया । जबकि ग़ज़ल में बाजू के बहुवचन में बाजुओं ही प्रयोग में आता है बाजूओं नहीं ।  मैंने जब शब्‍द के ध्‍वनि विज्ञान पर गौर किया तो पाया कि आरजुओं शब्‍द का उच्‍चारण टंग ट्विस्‍ट करता  है आपको 'र' पर रुक कर ही पढ़ना होता है । और ग़ज़ल में टंग ट्विस्‍ट करने वाले विन्‍यास को ऐब माना जाता है । उसके मुकाबले में आरजूओं शब्‍द प्रवाह में आता है । प्रश्‍न ये उठता है कि जब बाजुओं में बाधा नहीं है तो फिर ये आरजुओं में क्‍यों आ रही है । दरअसल बाजू सीधा 22 मात्रिक है जिसे बाजुओं में 212 करने में दिक्‍कत नहीं है । आरजू 212 है और आरजुओं 2112 होगा जिसमें कहीं बीच के जो दो लघु हैं वो अवरोध उत्‍पन्‍न करेंगे । आप कहेंगे कि बीच के दो 11 तो मिल कर 2 हो रहे हैं । तो मेरे विचार में बाधा वहीं आ रही है । ये बात मैं केवल शब्‍दो के ध्‍वनि विज्ञान के आधार पर कह रहा हूं । आरजुओं में बीच के दो 11 बहुत परफेक्‍ट तरीके से बांडिंग करके 2 नहीं हो पा रहे हैं । और जब हम उनको 2 में पढ़ने की कोशिश करेंगे तो टंग ट्विस्‍ट हो जायेगी । ( ये बातें मैं केवल ध्‍वनि विज्ञान के आधार पर कह रहा हूं इसका आधार अरूज़ नहीं है । ) दवाई को जब दवाइयों किया जाता है तो 122 का 1212 होता है दोनों लघु मात्राएं अलग अलग आ रही हैं । हो सकता है कि ध्‍वनि विज्ञान के इसी पेंच को देखते हुए विद्वानों ने आरजूओं के उपयोग पर सहमति जताई हो । वैसे भी आरजू हिंदी का नहीं है सो इस पर हिंदी का व्‍याकरण चले ये ज़ुरूरी नहीं है ।

धर्मेंद्र कुमार सिंह ने शेर की परिभाषा में ये जोड़ने को कहा था कि ये भी जोड़ें की वो कविता हो । तो मेरा कहना ये है कि शेर का कविता होना आवश्‍यक नहीं है । वो तो जितना ज्‍यादा बातचीत के लहज़े के समीप होगा उतना प्रभावशाली होगा । इसलिये मेरे विचार में शेर का कविता होना कोई अनिवार्य शर्त नहीं है । हो तो भी ठीक न हो तो भी ठीक । शेर का एक मुकम्‍मल वाक्‍य होना बहुत ज़रूरी है । एक मुकम्‍मल वाक्‍य जिसे ठीक बीचों बीच से एक अर्द्ध विराम लगा कर दो हिस्‍सों में बांट दिया गया है । रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल, जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्‍या है, ये एक बहुत सुगठित वाक्‍य है । वाक्‍य की सारी परिभाषाओं को पूरा करता हुआ ।

आज पूर्व निर्धारित ग़ज़ल कोई दूसरी थी लेकिन कल एक लाख ब्‍लाग हिट्स होने पर श्री राकेश खंडेलवाल जी की ये ''डायनिंग टेबल ग़ज़ल'' मिली तो लगा मिठाई की मांग करने वालों के लिये इससे बेहतर नाश्‍ते की प्‍लेट कोई दूसरी नहीं हो सकती । वैसे प्रेम के रस में पगी राकेश जी की ग़ज़ल अभी आगे आने के लिये सुरक्षित रखी है ।

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श्री राकेश खंडेलवाल जी

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सुब्‍ह आओगी तुम  रात भर की जगी
इसलिये ये कचौड़ी  तली है  प्रिये

ये जलेबी अधर के रँगों से रँगी
प्रीत की चाशनी में पगी है प्रिये

चाय पीलो कि लस्सी नहीं बन सकी
आजकल कुछ दही की कमी है प्रिये

दाँत में तुम  दबा मठरियाँ तोड़ती
ये नजर बस वहीं पर थमी है प्रिये

ये गज़ल भाई नीरज नहीं कह सके
सोच पर लग गई  चटखनी है प्रिये

हलवा गाजर का सौरभ हड़प कर गये 
मेज पर प्‍लेट ख़ाली रखी है प्रिये

देखना अब तिलक जी कहें क्या नया
खुर्दबीनी के वे तो धनी हैं प्रिये 

अब क्‍या कहूं मैं इस ग़ज़ल पर । बेहतर होगा कि जिनके नाम ले लेकर उत्‍सव के मौके पर  बाकायदा छेड़ की गई है वे लक्ष्‍मीकांत प्‍यारेलाल..... क्षमा करें जुगलकिशोर तिलकराज..... क्षमा करें नीरज गोस्‍वामी तिलक राज कपूर जी ही उत्‍तर दें । बाकी जो नाश्‍ते की डिमांड लोगों की थी वो तो ग़ज़ल में पूरी हो ही रही है । तो आज उत्‍सव का आनंद लें और अगले अंक में पुन: रेगुलर ।

शनिवार, 23 जून 2012

भेज दो आगमन की सहर भेज दो रात काटे नहीं कट रही है प्रिये, आज प्रेम तरही मुशायरे में सुनते हैं सौरभ शेखर की एक लम्‍बी और ख़ूबसूरत ग़ज़ल ।

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प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये

सुलभ ने मुशायरे की बहुत सुंदर शुरूआत की है । राकेश जी ने एक बहुत ही दिलचस्‍प प्रश्‍न उठाया । ये तो सच है कि ग़ज़ल में हर शेर को स्‍वतंत्र माना जाता है । हर शेर दूसरे शेर से कोई रिश्‍ता नहीं रखता । रिश्‍ता बस एक ही होता है पूंछ का । पूंछ का रिश्‍ता अर्थात रदीफ और क़ाफिया का रिश्‍ता । इसके अलावा और कोई रिश्‍ता दो शेरों में नहीं होता है । और उस्‍तादों का ऐसा भी कहना है कि दो शेरों में ये रिश्‍ता होना भी नहीं चाहिये जब तक कि मुसल‍सल ग़ज़ल न कही जा रही हो । उस्‍तादों का कहना है कि यदि एक शेर के भाव ग़ज़ल के किसी दूसरे शेर में भी आ रहे हैं तो उसका मतलब है कि आप एक शेर में अपनी बात पूरी नहीं कर पाये और आपको उसके लिये एक और शेर भी कहना पड़ा । ये दोष है । हां यदि आप मुसल्‍सल ग़ज़ल कह रहे हैं तो वहां तो आपने पहले ही विषय से अपने आप को बांध लिया है गीत की तरह । यहां आप पर ये बंदिश हो जाती है कि आपको अब किसी भी शेर में विषय को छोड़ना भी नहीं है । कुछ उस्‍तादों की राय में मुसल‍सल ग़ज़ल उतनी प्रभावी नहीं होती है जितनी कि सामान्‍य ग़ज़ल होती है । उस्‍तादों की राय में ग़ज़ल वही है जिसका हर शेर किसी अलग विषय को लेकर बात कर रहा हो और उस बात को उसी शेर में पूरा भी कर रहा हो । इस हिसाब से हिंदी में मैंने शेर की जा परिभाषा गढ़ी है वो कुछ यूं है

'पहले से निश्चित किये गये मात्रिक भार ( वज्‍न) तथा पूर्व निर्धारित वाक्‍यांत ( रदीफ काफिया ) पर लिखा गया वो वाक्‍य जिसे दो टुकड़ों ( मिसरों ) में पढ़ा जायेगा । इस वाक्‍य में कोई भी अतिरिक्‍त शब्‍द मात्रिक भार को साधने के लिये रखा हुआ नहीं होना चाहिये, साथ ही वाक्‍य को व्‍याकरणीय दृष्टि से समग्र तथा निर्दोष बनाने के लिये आवश्‍यक हर शब्‍द को उपस्थित होना चाहिये । ऐसा न हो कि मात्रिक भार को साधने के लिये किसी ऐसे आवश्यक शब्‍द को नहीं रखा जाये जिसके बिना वाक्‍य अधूरा लगे । ये एक ऐसा वाक्‍य है जिसे बीच में एक विश्राम के साथ पढ़ा जायेगा, विश्राम के पहले तथा बाद के वाक्‍य खंडों को मिसरा कहा जायेगा । चूंकि यह एक ही वाक्‍य है अत: पहले वाक्‍य खंड तथा दूसरे वाक्‍य खंड को एक दूसरे का पूरक होना आवश्‍यक है । साथ ही ये भी कि चूंकि वाक्‍य है अत: बात पूर्ण विराम आने तक पूरी हो जानी चाहिये, ऐसा नहीं होना चाहिये कि बात को पूरा करने के लिये आपको एक और वाक्‍य कहना पड़े । कुल मिलाकर शेर एक ऐसा पूर्ण वाक्‍य है जिसका भार तथा अंत पूर्व निर्धारित है ।'

राकेश जी ने जो गंभीर प्रश्‍न उठाया है वो विचारणीय है । इसलिये कि मुसलसल ग़ज़ल में विषय को पूरी ग़ज़ल में मुसलसल रखा जा रहा है । हर शेर एक ही विषय पर बात कर रहा है । इसलिये इसमें संबोधन की एकरूपता होना आवश्‍यक है गीत की तरह । हालांकि इसको लेकर मत विभिन्‍नता हो सकती है, किन्‍तु उन्‍हीं मत विभिन्‍नताओं पर की गई बहस से कुछ न कुछ सामने आयेगा । बहस यदि सकारात्‍मक हो तो उससे अच्‍छा कोई तरीका नहीं है ज्ञान बढ़ाने का । शुतुरगुरबा का दोष कहता है कि एक ही शेर में अलग अलग संबोधन ( तू तुम आप ) या अलग अलग कालखंड ( था, है ) नहीं होने चाहिये । ये बंदिश केवल एक ही शेर के लिये है । अब मुसलसल ग़ज़ल को लेकर क्‍या किया जाये इसको लेकर कहीं कोई स्‍पष्‍ट मत नहीं मिलता । उस्‍तादों से विमर्श किया जायेगा इस विषय को लेकर ।

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चलिये ये तो हुई बहस की बात अब चलते हैं आज के शायर की ओर सुनते हैं उनसे एनकी ग़ज़ल । आज सौरभ शेखर अपनी एक लम्‍बी और सुंदर ग़ज़ल लेकर आ रहे हैं ।

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सौरभ शेखर

सौरभ हमारे मुशायरों के अब पुराने और लोकप्रिय शायर हो गये हैं । उनकी ग़ज़लों में कुछ एक अलग तरह के भाव देखने को मिलते हैं जो उनको भीड़ से अलग करते हैं । और एक बात जो अच्‍छी है वो ये कि वे दिन ब दिन बेहतर हो रहे हैं । 'यदि आप अपने आप से बेहतर नहीं लिख रहे तो लिखना बंद कर दें ।' ये साहित्‍य का ध्‍येय वाक्‍य है । और सौरभ इस चुनौती को पूरा कर रहे हैं । हर नई ग़ज़ल पिछली से बेहतर कह कर ।

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द्वार पलकों की झालर टंगी है प्रिये
प्रीत की अल्पना भी सजी है प्रिये

दो महावर रचे पैरों की मुन्तजिर
आरजूओं की इक पालकी है प्रिये

ये तुम्हारी प्रतीक्षा के भीगे पहर
जैसे रिमझिम की कोई झड़ी है प्रिये

दिन की समिधा हृदय के हवन कुंड में
शाम क्‍या है प्रणय आरती है प्रिये

मेरी नींदें न जाने कहाँ उड़ गईं
रहगुजर पे लगी टकटकी है प्रिये

इक परिंदे ने यूँ शोर बरपा दिया
हर किसी को खबर हो चुकी है प्रिये

खुद महकती हवा ने बताया मुझे
छू के वो तुमको ही आ रही है प्रिये

दिल की दहलीज पर दीप जलने लगे
जह्नो-जाँ में हुई रौशनी है प्रिये

हर घड़ी हर पहर याद करना तुम्हें
काम इसके सिवा कुछ नहीं है प्रिये

कुछ जियादा ही मसरूफ हूँ इनदिनों
मसअला हर अभी मुल्तवी है प्रिये

चैन पड़ता कहाँ है मुझे एक पल
रूह तक में मची खलबली है प्रिये

धडकनों पे नियंत्रण में कैसे रखूं
पास आई मिलन की घड़ी है प्रिये

भेज दो आगमन की सहर भेज दो
रात काटे नहीं कट रही है प्रिये

बहुत सुंदर ग़ज़ल कही है । गीत के भावों को ग़ज़ल में बहुत ही सुंदरता के साथ गूंथा गया है । दो महावर रचे पैरों की मुंतजिर, इस शेर में मानो हिंदी गीतों के स्‍वर्ण युग की ध्‍वनियों को चांदी की घंटियों में बसा कर टांक दिया गया है । दिन की समिधा हृदय की हवन कुंड में ये शेर भी बहुत सुंदर भाव लिये हुए है । और अंतिम शेर में मिसरा सानी 'रात काटे नहीं कट रही है प्रिये' इतना कसा हुआ है कि अहा अहा करने की इच्‍छा हो रही है । ये वही मुकम्‍मल वाक्‍य है जिसकी चर्चा हमने ऊपर की है । बहुत सुंदर ग़ज़ल । बधाई ।

और एक सूचना । यदि आप भोपाल में हो तो आयें ।

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मंगलवार, 19 जून 2012

फर्श से 'अर्श' तक व्योम के पार तक "प्रीत ही प्रीत की माधुरी है प्रिये " तरही मुशायरा कुछ देर से शुरू हो रहा है सुलभ जायसवाल के साथ ।

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इस बार का मुशायरा अर्श और माला को समर्पित है और साथ में प्रेम को भी । आज की ये पोस्‍ट कंचन के लिये क्‍योंकि आज उसके लिये बड़ा दिन है । आज वो एक और पड़ाव पर मुम्‍बई में क़दम रखने जा रही है । अनंत शुभकामनाएं कंचन को आज के लिये । जाओ अपने हौसलों से उड़नपरी बन कर दिखाओ ।

इस बार का तरही मिसरा देने के बाद यूं लगा कि लोगों के मन में इस शुद्ध हिंदी के मिसरे के प्रति वो उत्‍साह नहीं देखने को मिला जो सामान्‍य रूप से देखा जाता है । हालांकि मिसरा उतना कठिन नहीं था । एक बहुत लोकप्रिय बहर पर लिखा जाना था । बाद में भी मिसरे को लेकर लोगों ने उतना उत्‍साह नहीं दिखाया । जब ये लगा कि मिसरे को लेकर उलझनें हैं तो जितनी ग़जलें आईं उनके ही साथ मुशायरा शुरू करने की सोच ली । हालांकि अभी भी मौसम खुशगवार नहीं हो पाया है । गर्मी उतनी ही पड़ रही है । और प्रतीक्षा चल रही है कि कब घन गहन गरज के बरसेंगे ।

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प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये

इस बार की ये तरही जैसा कि आप सबको पता है कि अर्श और माला को समर्पित है । दोनों ने कुछ ही दिनों पूर्व अपना दांपत्‍य सफर प्रारंभ किया है । और अब दिल्‍ली में पड़ रही सड़ी हुई गर्मी इस बात की प्रतीक्षा कर रही है कि कब पटना की तरफ से कोई बदली ठंडी फुहार लेकर आये और दिल्‍ली के मौसम को खुशगवार कर दे । अभी हालांकि पटना की तरफ से आने वाले बादलों के स्‍वागत की तैयारियां दिल्‍ली में चल रही हैं । और जैसी की सूचना मिल रही है कि तैयारियां जोरों शोरों पर हैं ।

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तो आइये प्रीत की बांसुरी से निकल रहे स्‍वरों को हम भी सुनते हैं । जिंदगी के कठिन समय में ये प्रीत ही होती है जो लड़ने का हौसला और जीतने का विश्‍वास प्रदान करती है । समय की शिला पर अपने निशान छोड़ते हुए ये प्रीत बरसों बरस से किसी नदी की तरह बह रही है । जिसको लेकर गुलजार ने कहा 'नूर की बूंद है सदियों से बहा करती है ' । इसी प्रीत को कुछ शायर यहां अपने अपने ढंग से ग़ज़लों में बांध कर लाएंगे । आइये सुनते हैं ये प्रीत भरी ग़ज़ल ।

सुलभ जायसवाल

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सुलभी की ग़ज़ल से शुरूआत करने के पीछे भी एक कारण है । कारण ये कि सुलभ की ग़ज़ल ने मुझे चौंका दिया । चौंकने का कारण भी ये कि सुलभ के शेरों से ये पता चल रहा है कि जनाब अब कहन के साथ कहना सीख गये हैं । कहन के साथ कहना सबसे ज़रूरी परिवर्तन होता है किसी शायर के जीवन में । और ये परिवर्तन जितनी जल्‍दी हो जाये उतना ही ज़ुरूरी है । आइये सुनते हैं सुलभ से प्रीत भरी ग़ज़ल ।

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जिंदगी कब हमारी थमी  है प्रिये
आपके नाम की संगिनी है प्रिये

हो खड़ी संग तुम और क्या चाहिये
चाँद से चांदनी मिल रही है प्रिये

हर नगर हर गली प्रेम की जीत हो
नेह की बांसुरी बज रही है प्रिये

दो कदम तुम चलो दो कदम मैं चलूँ
राह ये दूर तक  शबनमी है प्रिये

अधखुले होठ हैं दरमयां फासले
धड़कनों  में मगर खलबली है प्रिये

फर्श से 'अर्श' तक व्योम के पार तक
"प्रीत ही प्रीत की माधुरी है प्रिये "

आसुरी शक्तियां नष्ट हो जायेंगी
आरती की महक उठ रही है प्रिये

सिलसिला चाहतों का रहे उम्र भर
बस यही कामना पल रही है प्रिये

फर्श से अर्श तक व्‍योम के पार तक, सुंदर प्रयोग किया गया है इसमें । व्‍योम के पार का बहुत खूब इस्‍तेमाल है । और उस पर एकवचन का तरही मिसरा अपने हिसाब से जो बनाया है वो भी सुंदर बन पड़ा है । हर नगर हर गली प्रेम की जीत के लिये बज रही नेह की बांसुरी का भी जवाब नहीं है । बहुत सुंदर बन पड़ी है । कुछ और प्रयोग भी अच्‍छे बने हैं जैसे धड़कनों की खलबली और आरती की महक । आरती की महक का प्रयोग इसलिये सुंदर है कि आरती के दीपक की चमक को तो प्रयोग में लाया गया है, यहां शुद्ध घी के दीपक या कर्पूर की आरती की महक की बात की गई है जिसकी अपनी सुवास है । सुंदर ग़ज़ल । बधाई ।

जिन आलसी लोगों ने किसी कारण ये ग़ज़ल नहीं भेजी है उनसे अनुरोध है कि आलस छोड़ें और ग़ज़ल भेज दें ।