गुरुवार, 15 मार्च 2012

होली का मुशायरा काफी उल्‍लास के साथ समाप्‍त हुआ है । श्री राकेश खंडेलवाल जी और श्री तिलक राज कपूर जी की कुछ रचनाएं जो पीडीएफ में शामिल थीं उनके साथ समापन करते हैं हम होली 2012 का ।

होली को लेकर जो कुछ भी सोचा था वो आप सब के सहयोग से पूर्ण हुआ । होली की धमाकेदार टिप्‍पणियों का क्‍या कहूं । मुझे तो लगता है कि रचनाओं पर भारी पड़ गईं टिप्‍पणियां । सबने जिस प्रकार बढ़ चढ़ कर भाग लिया उससे लगता है कि अब ये ब्‍लाग सचमुच ही उन सबका ब्‍लाग हो गया है जो इससे जुड़े हैं । होली और हास्‍य को लेकर कुछ लोग असहज मेहसूस करते हैं,  ये स्‍वभावगत होता है । किन्‍तु मेरे जैसे लोगों को क्‍या किया जाये जो होली और हास्‍य के लिये पागल हैं । हां ये ज़ुरूर कोशिश रहती है कि किसी को ठेस न लगे किसी को चुभे नहीं । फिर भी बात वही है कि चूंकि हास्‍य, मजाक जैसी चीजों को लेकर कुछ लोग सहज नहीं होते हैं तो उनको शिष्‍ट हास्‍य भी चुभ जाता है । यदि पिछले तीन चार अंकों में किसी को भी कुछ भी बुरा लगा हो तो उसके लिये मन से क्षमा । क्षमा बड़न को चाहिये छोटन को उत्‍पान । राकेश खंडेलवाल जी और तिलक राज कपूर जी की कुछ हास्‍य रचनाएं जो होली की पीडीएफ में शामिल थीं उनके साथ आज हम समापन करते हैं ।

016 

श्री एवं श्रीमती राकेश खंडेलवाल जी

मिली धमकी अचानक ही हमें ईमेल के जरिये
जिसे भेजा रूआबों से मियाँ पंकज सिहोरी ने
तरही के वास्ते कुछ तो हमें लिखना पड़ेगा अब
मचायेंगे वो हंगामा,नया इस बार होली में

लगा यूँ छेड़ दी है एक दुखती रग किसी ने आ
उमड़ कर आगये कालेज के दिन फिर बने बादल
उमंगों की रवानी जब बहा करती शिराओं में
नयन हर रोज खड़काते नयन के द्वार की सांकल

गली में एक पनवाड़ी जहाँ महफ़िल सजा करती
सभी सहपाठियों की सांझ की दहलीज पर आकर
जहाँ सब नाजनीनों को दिया करते थे अपना दिल
नये अन्दाज़ से गाने, नई फ़िल्मों के गा गाकर

वहीं इक रोज देखी थी पड़ोसन की ननद हमने
उछल कर आ गया था दिल गले में एक झटके से
मुहब्बत का असर ऐसे अचानक हो गया हम पर
गये रह हम कि जैसे हों किसी खूँटी पे लटके से--

सजा कर तश्तरी में दिल नजर उसकी किया हमने
हजारों स्वप्न इक पल में उसी लम्हे सजाये थे
लगा बस मिल गई है मंज़िले मकसूद अब हमको
तमना जिसकी लेकर के बहुत से गीत गाये थे

वो होली थी लिखा उसको प्रथम खत प्रेम का हमने
नजर मिलते ही खिड़की पर इशारा था किया इसको
बना कर एक गुलदस्ता रखा चौखट पे जा उसकी
लिखा था सांझ ढलते ही मिले तो पूर्ण हर विश हो

उंड़ेली सांझ को अत्तार की दूकान ही खुद पर
नदी के तीर पर जाकर खड़े थे नीम के पीछे
उमीदों के घड़े भर कर कि हो दीदार चन्दा सा
तमन्ना थी कि चुपके से वो आये आंख आ मींचे

हुई कुछ सरसराहट सी उमंगें हो गईं ताजा
पगों की चाप, ढोलक पर लगाता थाप हो कोई
धुंधलके के धुंआसे में कई परछाईयां उभरी
नजर थी पार नदिया के कहीं पर दूर थी खोई

लगीं दोहत्थियां धप से अचानक पीठ पर आकर
किसी ने बाल अपनी मुट्ठियों में भींच कर खींचे
वो टोली आठ दस की थी दबे कदमों से जो आकर
हुई तत्पर हमें अपने शिकंजे में जकड़ भींचे

समझ में एक पल को तो नहीं कुछ भी हमें आया
हमारे होश के कौये गगन की ओर थे भागे
धपाधप थप्पड़ों की बोलियां गूँजी हवाओं में
हमारी पीठ पर थे,दर्द पा हम सोच से जागे

वो आशिक थे पड़ोसन की ननद के बोले धमकाकर
अबे किस खेत की मूली, इशक उससे लड़ाता है
दिखाई बन्द कर देना, गली के मोड़ पर जैसे
गधे के शीश पर दिख सींगकोई भी ना पाता है

हजारों लात घूँसे थप्पड़ो के रंग में भीगे
ठिठुरते काँपते उस रोज हम होली मनाते थे
सभी बरसानियाँ लाठी हमारी पीठ चूमे हैं
पलों की करवटों पर हम यही बस जान पाते थे

बरस बीत मगर होली के आते ही अचानक ही
वही माहौल आकर आँख में डेरा जमाता है
हमें घेरे हुये हुड़दंगियों की है बड़ी टोली
कोई जूता चलाता है कोई चप्पल जमाता है

ये तरही का बहाना ले, असल सीहोरिया साजिश
बड़े ही शान से लाकर यहाँ चौसर बिछाती है
ठठाती फ़ेंक कर पासे-नयन अपने नचा पूछे
कहो क्या चप्पलों की आज तक भी याद आती है

TRK Small[2]

श्री तिलक राज कपूर जी

यह हज़लनुमा रचना मैनें तब कही थी जब ग़ज़ल का अ ब स भी मुझे नहीं आता था। इसे यथावत् 1986 के रूप में प्रस्तुलत कर रहा हूँ।
इसकी पृष्ठा भूमि यह है कि पत्नी मायके गयी हुई थी। उस ज़माने में चैट-इन्ट रनैट तो क्या  फ़ोन पर भी बात करना दूभर था तो इसी रदीफ़, काफि़या और मीटर पर तीन ग़ज़लें पत्र में भेजी थीं। यह अंतिम थी और परिणाम की कल्प ना आप कर ही सकते हैं।

तेरे बारे में भला क्या  सोचता हूँ क्या लिखूँ
रात भर तकिये पे किसको चूमता हूँ क्या लिखूँ।

जब से तू मैके गयी है,  भूलकर खुद का पता
राहगीरों से पता क्यूँ  पूछता हूँ क्या  लिखूँ।

तू जो थी तो दो चपाती भी न खा पाया कभी
अब तेरे पीछे मैं क्या-क्या सूतता हूँ क्या  लिखूँ।

प्याज़ काटूँ जब कभी तो ऑंख से ऑंसू बहें
कितनी मुश्किल से मैं आटा गूँधता हूँ क्यां लिखूँ।

षोडशी बाला कोई जब तंग कपड़ों में दिखे
फ़ाड़कर दीदे उसे क्यूँ घूरता हूँ क्या लिखूँ।

जब पड़ोसन के नयन के बाण संध्याँ को चलें
रात भर फि़र बेवजह क्यूँ  खॉंसता हूँ क्याँ लिखूँ।

मुस्करा कर देख ले गर सुन्दरी महिला मुझे
कितनी उम्मीदें मैं उससे बॉंधता हूँ क्या  लिखूँ।

और एक हास्य  कविता (वास्तविक घटना पर आधारित)

आज शाम
साहब के कुत्ते ने मुझे काट खाया
चूँकि साहब सामने थे,
इसलिये मैं मुस्कराया।
मैं बोला,
साहब, ये कुत्ता कहॉं से पाया है।
वो बोले,
पत्नी के साथ दहेज में आया है।
मैनें कहा,
साहब, इसे अपने संस्कार सिखलाईये।
ये हीरे से कम नहीं है,
इसे ये बात समझाईये;
कि,
भविष्य  में किसी कवि को काटा
तो पागल हो जायेगा।
अभी तक तो सिर्फ़ भौंकता है
फि़र कविता सुनायेगा।

आनंद लीजिये हास्‍य की इन तीनों रचनाओं का और दाद देते रहिये । मिलते हैं अगले अंक में कुछ और जानकारियों के साथ ।

बुधवार, 7 मार्च 2012

बिल्‍कुल टैम नइ है ये फाइनल होली है रइ हेगी । उदर देस भर के किन्‍नर हमारे शहर में आये हैं किन्‍नरों का राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन चल रया है । चा करें चा मर जाएं काम कर कर के ।

सब लोग लुगाइन को चूसित किया जाता है कि भड़भड़ी जान घुस्‍से की भौत तेज है । कोई भी मिजाक विजाक नी करे । भभ्‍भडी़ जान को मिजाक पिसंद नी है।   तो मिजे इस बात पे घुस्‍सा कल से आ रिया था कि । कौन कौन ने मिझे कल किंकौरी मारी, मेरी बीड़ी चुराई । आज एसा कुछ नी होना चइये । सिमझे ।

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अश्विनी रमेश

चों री ऐसे सराफत से चों खडी है । होली पे आई है कि किसी की शोक सभा में आई है । इत्‍ती मोटी गरदन हो गई है बैल जैसी पर अकल कोड़ी की नी आई । अब मेरा मूं चा देख रइ है सुना दे जो सुनाना है । सारे सरोता आ गय हैं । कब सुनायेगी ।
कोई जूते लगाता है कोई चप्पल जमाता है
कोई गाली खिलाता है कोई कीचड़ लगाता है
रंगे होली  रंगों में सभी रंगते यहाँ तो हैं
कोई ढोलक बजाता है कोई गाना सुनाता है
ये पिचकारी है रंगों की बरसतीं झूम कर जब ये 
नहीं मंजर भला किसको सुहाता है लुभाता है
नज़ारा ये अनोखा है निराला है समां रंगीं
रंगों में रंग गये सब हैं खुशी की  रंगशाला है
बहारें हैं बसन्ती शोख ये मौसम अजब ही है 
भला रंगों में रंगने का नहीं दिल किसका करता है
बड़े महंगे से रंगों की वो होली छोड़ देंगे हम
के अब मिट्टी के रंगों का हँसी रंग देख् लगता है
गरीबों संग मना कर देख ये लुत्फे होली तू एक दिन
खुशी का ही खुमारे रंग  कैसे दिल पे चढ़ता है
रंगे होली बसन्ती रंग पहने आई दुल्हन सी 
मज़ा इसकी रंगीनी का बहत दिल शाद करता है !!

अरी ये कां से ले आई । चा सुना रई है किसीको समझ में ही नी आ रिया है । चल हीट तो ले माइक के सामने से । हीट झल्‍दी हीट नइ तो पेले ही दिन किन्‍नर सम्‍मेलन का सत्‍यानाश हो जायेगा । सूचना - किन्‍नर सम्‍मेलन में पधारे सभी लोगों को सूचित किया जाता है कि कोई भी जदी राजनीति छोड़ कर किन्‍नर बनना चाय तो उनका स्‍वागत हेगा, काय कि उनको किन्‍नर बनाने में हमको अधिक मेहनत नइ लगती हेगी, वो तो पेले से ही...। सूचना समाप्‍त भई । चलो कौन है आगे ।

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द्विजेन्‍द्र द्विज और नवीन सी चतुर्वेदी

चों रे तुम दोनों से मैंने कई थी कि दरवाजे पे इ खड़े रेना । तुम यां कां घुसे चले आ रय हो । और ये तलवार कां से लाये । अरे अपना साइज देखो और तलवार का साइज देखो । ए छोटे वाले कमर पे हाथ रख के क्‍या देख रया है तेरे घर में बाप भाई नीं हैं क्‍या । चौं रे तुम दोनों को कई थी कि किन्‍नर सम्‍मेलन में गेट पर खड़े रैने की ड्यूटी है तो अंदर चौं आये । अरी रजिया लगा तो दो इन दोनों को ।  

घड़ी में याँ ठुमकता है घड़ी में वाँ मटकता है
मेरा महबूब है या कोई बे-पैंदे का लोटा है 
वो हथिनी है तो है, पर उस का चेहरा चाँद जैसा है
वो जब साहिल पे चलती है, समंदर भी उछलता है
बहुत सम्मान देता है रिवाजों को मेरा बलमा   
मुहूरत शोध कर ही वो मेरे नज़दीक आता है
बहुत ही ध्यान रखता है सफ़ाई का मेरा चिरकुट 
मुझे मिलने से पहले वो पसीनों से नहाता है
उसे लगता है बस उल्लू पे ही आती हैं लक्ष्मी माँ
बस इस कारन से ही वो बावला 'उल्लू का पट्ठा' है
नया फैशन बयानों का चला है जैसे दुनिया में
"कोई जूते जमाता है कोई चप्पल चलाता है"

चों रे ये किसकी बात कर रया है तू कि घड़ी में यं ठुमकता है, घड़ी में वां ठुमकता है । चौं रे पेले ही बता दी थी कि कोई भी पालीटिक्‍स पे बात नी करेगा । तुझे मालुम है नीं की वो हमारे परदेश का पुराना सीएम है वो यां ठुमके चाये तेरे जूपी में जाके ठुमके तेरे को क्‍या । चल निकल ले । गेट पे खड़ा हो जा जाके ।

द्विजेन्द्र द्विज
पिनक जब भाँग की उसके जनूँ को तूल देती है
उसे लगता है हर लैला उसी को फूल देती है
मियाँ मजनूँ  के सर पर इश्क़ जब-जब दनदनाता है
दुपट्टा देख लैला का दिल उसका  छ्टपटाता है
कि जैसे, क़ैद पिंजरे में परिन्दा फड़फड़ाता है,
खटारा-सी किसी टैक्सी का इंजिन भड़भड़ाता है
दुआएँ मन्नतें करता है वो  कस्में भी खाता है
इशारों से बुलाता है रिझाता है मनाता है
जतन करके भी लाखों बात जब  बनती  नहीं दिखती
कोई लैला उसे जब इस तरह पटती नहीं दिखती
तभी गुलफ़ाम चेहरे पर शरारत मुस्कुराती है
फिर इस अन्दाज़ से मजनूँ की हसरत चैन पाती है
दबी ख़्वाहिश मियाँ  की  एकदम  हाथों पर आती है
चिकोटी काट कर वो इश्क़ का इज़हार करता है
हदें शर्मो-हया की इस तरह वो पार करता है
सड़क पर जब मियाँ मजनूँ का ईमाँ डगमगाता है
तो लैला के किसी भाई का  चेहरा तमतमाता है
यही अंजाम होता है  यही सौग़ात मिलती  है
जुनूँ में बस मियाँ मजनूँ को ये ख़ैरात मिलती है
हर इक होली पे मजनूँ से यूँ मुक्का-लात होती है
जब अपना ही तमाशा यूँ मियाँ मजनूँ बनाता है
कोई जूते लगाता है कोई चप्पल जमाता है
पिनक में भाँग की मजनूँ मियाँ यूँ चैन पाता है

चौंरे तू तो अच्‍छा था रे । गजल वजल लिखता था । तुझे क्‍या हो गया मुन्‍ना जो तू हदें पार करने लगा । सुन रे गुड्डू तेरे को तो चशम विश्‍मा लगा था नी, तेरा चश्‍मा कैसे हीट गया रे । चौं रे बताय नी क्‍या हो गया है । सूचना - किन्‍नर सम्‍मेलन में आये हुए एक किन्‍नर को कोई लड़की सिमझ के भगा ले गया है । इससे पहले की 'सच का सामना' हो वो किन्‍नर को सही सलामत छोड़ जाये । सूचना समाप्‍त भई । चलो कौन है री आगे ।

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नाम  - फरमूद इलाहाबादी
सम्प्रति - दूरदर्शन केन्द्र में इंजीनियर

चौं री तू तो पेली बार आ री हेगी । इससे पेले तो नी दिखी कभी किन्‍नर सम्‍मेलन में । क्‍या अभी बनी है किन्‍नर । किसने बनाया , अच्‍छा इलाहबाद वाली वीनस जान ने बनाया है । देख री उसके साथ जियादा मत रेना । वो एक ऐसी बीमारी है जिसका इलाज ऊपर वाला भी अभी ढूंड ही रया है । चल अब आ गइ है तो सुना । अरी शरमा मत ।

भरस्टाचार नेताओं को ये दिन भी दिखता है
कोंई जूते जमाता है कोंई चप्पल लगता है
मेरा माशूक खूने दिल कि लीपिस्टिक लगता है
तभी तो मक्खियों का झुण्ड मुंह पर भिनभिनाता है
वतन से जो वफादारी की कसमें खूब खाता है
सुना है हमने स्विट्ज़रलैंड में उसका भी खाता है
ये मत समझो कि मच्छर रात दिन हमको सताता है
हकीकत में वो हमसे खून का रिश्ता निभाता है
मियां की वल्दियत जो है वही बीवी कि लिख डाली
चुनाव  आयोग तो वाईफ को भी सिस्टर बताता है
कुड़ी है या कि उसका भाई हो जाता है कन्फ्यूजन
जवां सरदार अपने बाल जब छत पर सुखाता है
मियां फरमूद अब हो जाओ होमो सैक्चुअल तुम भी
किरण लड़की पटाती है मदन लड़का पटाता है

चों री ये मकता किन्‍ने लिखवाया तुझसे ऐसा भयानक । अरी अभी तो  कोर्ट और सरकार में ही जूतम पैजार चल री है इस भिषय में । तू कायको बरैया के छत्‍ते में हाथ दे रई है । चों री तू तो इलाहाबाद की है इधर भोपाल की नी है फिर तेरे में ये गुण किदर से आया री । सूचना - कल्‍लू पठान ने फरमूदा जान के मकते तो तकते हुए सौ रुपये इनाम में हेड़ के दिये हेंगे । कल्‍लू पठान को सारा किन्‍नर मंडली सुकरिया करता हेगा । और कल्‍लू पठान से निभेदन है कि मकता ही ऐसा है, फरमूदा ऐसी नई है । चलो री अब कौन है ।

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गिरीश  पंकज
चौं री तेरा काम एक नाम से नइ चल रया था जो तूने दो दो रख लिये । अब बता कौन से नाम से बुलायें तुझको । छत्‍तीसगढ़ से आई है तो हम चा करें, तेरी जैसी छत्‍तीस देखी हैं भभ्‍भड़ी ने । गिन के छत्‍तीस लगाऊंगी ना तो काली बिलौटी को भूल जायेगी । चल अब सुना क्‍या सुनाना है ।

वो मजनूं का भतीजा है, हमेशा मार खाता है
''कोई जूते लगाता है, कोई चप्पैल जमाता है''
वो होली पर मिला हमसे मगर क्या रंग मैं डालूँ
भला काले पे काला रंग भी कब रास आता है
किसी के हुस्न पर उसकी नज़र अक्सर बुरी देखी
सियासी आदमी से हर कोई दूरी बनाता है
वो रिश्वत खूब लेता है मगर सबको पचाता है
सुना है शख्स रोज़ाना ही त्रिफलाचूर्ण खाता है
बिना खाए बेचारा एक पल भी रह नहीं सकता
न हो रिश्वत का मौक़ा तो सभी की जान खाता है
यहाँ जो भ्रष्ट है जितना वही 'अन्ना' का चेला है
जो 'घपलू' है सभाओं में वही 'पपलू' बिठाता है
वो हीरोइन भी गाँधीवाद के रस्ते पे चलती है
उसे तन पे अधिक कपड़ा नहीं बिलकुल सुहाता है
सुना है उसका सौहर है बड़ा अफसर तभी तो जी
हमेशा घर पे मैडम के मुफ्त का माल आता है
वो बचपन से हमेशा झूठ कहने में ही माहिर था
वो अपनी बस्ती का अब तो बड़ा नेता कहाता है
हमेशा लूटने की इक कला में वो लगा रहता
कभी घर पर कभी इज्ज़त पे डाका डाल आता है
वो है इक 'आदमी' जिसको यहाँ सब 'आम' कहते हैं
मगर वो 'आम' तक भी गर्मियों में खा न पाता है
ये दुनिया मसखरो की है समझ में बस यही आया
यहाँ है दर्द में कोई तो दूजा मुस्कराता है
है पंकज नाम उसका आम है इंसान बेचारा
जो अक्सर टूट जाते हैं वही सपने सजाता है

चौं री ये होली की कविता है कि और कुछ है । आम आदमी, आम आदमी अरी क्‍या कर रई है सब सरोता भगायगी क्‍या । चल निकल ले ।

सूचना : अब आने वाली चार प्रस्‍तुतियां शालीनता से सुनी जाएं । होली को लेकर ये  प्रार्थनाएं हैं जो सुहागन बहनो द्वारा ईश्‍वर से की जा रहीं हैं । हमारा सौभाग्‍य है कि हमारे मंच पे ये आईं हैं । इन प्रस्‍तुतियों तक छिछोरापन रोकते हुए हम भी शालीन हो रहे हैं ।

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रजनी नैय्यर मल्होत्रा

रजनी जी ने कुछ दिनों पहले चुनाव लड़ा था । ऐसा उन्‍होंने मुझे फोन पर बताया था । लेकिन उसके बाद चुनाव का परिणाम क्‍या आया ये नहीं बताया । लेकिन नहीं बताने से ये पता चल गया कि चुनाव परिणाम क्‍या रहा । हालांकि मुझे ये भी नहीं पता कि उन्‍होंने कौन सा चुनाव लड़ा था । किन्‍तु अब पूछने से फायदा भी क्‍या है ।


कोई   जूते  लगाता  है, कोई  चप्पल   जमाता है,
कोई  झाड़ू  ही खाता  है,  कोई  बेलन     खाता  है 
कोई   तो रंग लगाता   है,      कोई   भंगिया   चढ़ाता  है ,
कोई   बिरयानी खाता  है,   कोई  पकवान खाता है 
कोई   गोबर  लगाता  है,  कोई   कीचड़   नहाता है ,
कोई   देशी चढ़ाता    है, कोई    इंग्लिश  चढ़ाता है 
कोई   यूं फाग  गाता  है,    कोई   ठुमका  लगाता  है ,
कोई    कपड़े   फडा़ता है,   कोई    पीट   जाता    है 
भरे    फागुन   कोई बूढ़ा,        मुझे   देवर  बताता  है 
कोई   साली  बुलाता    है,  कोई  भाभी  बुलाता   है,

इस बात को लेकर एक उच्‍च स्‍तरीय समिति बिठा दी गई है कि जो कुछ ऊपर रजनी जी ने सुनाया है उसे क्‍या कहा जाये । क्‍या ये गजल है । क्‍या ये कविता है । क्‍या ये छंदमुक्‍त है । ये क्‍या है । धन्‍यवाद रजनी जी आपने अठहत्‍तर श्रोता मार भगाये हैं ।

इस्‍मत जैदी दीदी

इस्‍मत दीदी का और मेरा इस बात पर झगड़ा हुआ कि वे होली पर कुछ भी नहीं लिख रहीं थीं । पर मैंने अपने भाई होने के अधिकार का उपयोग करते हुए उनसे एक कविता निकलवा ली है ।

है होली रंगों का त्योहार
ये रंग बाँटे हैं सब में प्यार
न इन में द्वेष घोलना
ये सुंदर भावों का संचार
ये इक दूजे की है मनुहार
न इन में द्वेष घोलना
है होली नफ़रत से इंकार
दिलों के बीच न हो व्यापार
न इन में द्वेष घोलना
ये पिचकारी वो प्रेम की धार
गिरा दे नफ़रत की दीवार
न इन में द्वेष घोलना
नहीं हैं केवल ये बौछार
हैं इन रंगों के अर्थ हज़ार
न इन में द्वेष घोलना

एक बार फिर से समिति चक्‍कर में पड़ गई ही कि ऊपर सुनाई गई वस्‍तु को क्‍या कविता कहा जाय या कुछ और । मगर चूंकि एक स्‍थापित शायरा ने ये रचना कही है तो ग़जल कहने पर दो सदस्‍यो की बात सामने आई है । अगली होली तक हम इस बात का फैसला कर लेंगें कि ये क्‍या है । फिलहाल । हे हे हे ।

सूचना - इस्‍मत दीदी और फरमूद भाई का इस मुशायरे में होना इस बात का सुबूत है कि लाठी मारने से पानी नहीं कटता । हमारी संस्‍कृति सांझी है । हमारी विरासत सांझी है । पूरा सदन खड़े होकर इन दोनों के सम्‍मान में तालियां बजा रहा है ।

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लावण्या शाह दीदी साहब

इनके बारे में पहले से ही बता दिया जाता है कि कोई भी इनकी कविता को समझने की कोशिश नहीं करे । क्‍योंकि इनको खुदको ही अपनी कविता समझ में नहीं आती है तो दूसरों की क्‍या कहें । उनका होना हमारे मुशायरों में एक आशीर्वाद की तरह होता है । सो आइये सुनें ।

मनाओ मनाओ जी खेलो रंगों से होली 
सुनाओ सुनाओ जी कोयी  ठिठोली
सुना है कि आजकल के लडके निडर हैं
पर आजकल की कन्या भी बड़ी चतुर हैं
छेड़ोगे कुडीयों को तो क्या पाओगे जी ?
कोयी चप्पल गालों पे जमाता मिलेगा
कोयी गालों को अपने सहलाता दीखेगा
कोयी जूते लगाएगा  बचके रहना जरा 
होली में आपका न बन जाये  जी भुरता
सभी को होली की हार्दिक  शुभकामनाएं

आपको समझ में आई नहीं आई । कोई बात नहीं हम भी अभी समझने की कोशिश कर रहे हैं । जैसे ही हमें समझ में आयेगी हम आप सबकों संदर्भ सहित व्‍याख्‍या कर देंगे ।

shardula di

शार्दूला नोगजी दीदी

परम आलसी बड़ी बहन के आगे छोटे भाइयों की सारी कोशिशें हार जाती हैं । आलस मनुष्‍य का शत्रु है कह कह कर हार गये लेकिन सुनने वाले के कान पर जूं भी नहीं रेंगती है । सिंगापुर को आलसियों का देश बना देने का संकल्‍प लेकर जुटी हुई हैं ।

कभी जब वक्त बन्दे का बड़ा मनहूस आता है
तभी ओले बरसते हैं, मुंडाता जब वो माथा है 
जिधर मेरी उधर तेरी ये लूना काहे जाती है
हुआ ये जैसे मन्नू देश को टो में चलाता है
गिला हो आपसे क्या आप तो वैसे भी टकलू हैं
जहाँ ना केश उपजें  वां कोई अक्कल उगाता है!
अमां वो बात दूजी है झगड़ के ट्रेन में चढ़ना
सिमट के प्लेन चढ़ने में मज़ा क्या ख़ाक आता है!
नवाबों की नज़ाकत "आप", "पहले आप" चलती है
बिहारी झट से खाली सीट पे कब्ज़ा जमाता है
बहुत दिन से रंभायल जा रहा ये प्रश्न कानों में
है कहती भैंस क्या भैंसे से मिलने जब वो आता है
नज़ाकत औ' नफ़ासत उस गधे की देख तो लालू
जो चारा उसका होता है उसी पे मूँ लगाता है
खुली जो पोल नेता की तो देखा एक दिन साहब
कोई जूते लगाता है, कोई चप्पल जमाता है
रसीले होठ तेरे पर कटीली बात तेरी है
कि जैसे रेशमी धागा कलाई काट जाता है
जमाले-हुस्न की चिंता तो नक्को खेलना होली! 
बड़ा जिद्दी सिहोरी रंग महीनों तक न जाता है
नहीं भभ्भड़ सा कोई भूत है बदमाश दुनिया में
लटक कर ढाक से होली में ये हज़लें सुनाता है
जवाबी हाज़िरी तेरी, मेरी हाज़िर जवाबी है
मुझे जो दाद मिलती है तो काहे ख़ार खाता है !

मुच्‍ची बात कहूं तो सुंदर निकाली है गजल तो । जरो सोचिये कि आलस आलस में ऐसी गजल कह दी है तो जदी सच्‍ची में लिखेंगी तो कैसा लिखेंगी । अति सुंदर ।

तो बहनों को भाई दूज के दो दिन पहले प्रणाम करते हैं कि अपना आशीष बनाये रखें । और अब हम वापस अपनी औकात पर आते हैं ।

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नीरज गोस्‍वामी जी  और राकेश खंड़ेलवाल जी

अरी हमीदा जरा ला तो री मेरा सोंटा, अभी बताऊं इन दोनों को । अरी ये किन्‍नरों का सम्‍मेलन चल रिया है कोई शादी ब्‍याह का टैंट नइ है । चों रे तुम दोनों कां से आ रिये हो इदर में । अरी बिब्‍बन मैं तो लुट गई बरबाद हो गई । आज तक ऐसा नहीं हुआ था री कि हमारे समाज में कोई शादी बियाह कर ले । पर दोनों ने तो मेरी नाक ही कटवा दी । अरी कटोरन लगा तो दो झाड़ू दोनों को ।

नीरज गोस्‍वामी जी
हुआ जो सोच में बूढा उसे फागुन सताता है
मगर जो है जवां दिल वो सदा होली मनाता है
अपुन तो टुन्न हो जाते भिडू जब हाथ से अपने
हमें घर वो बुला कर प्यार से पानी पिलाता है
उसे बाज़ार के रंगों से रंगने की ज़रूरत क्या
फ़कत छूते ही मेरे जो  गुलाबी होता जाता है
हमारे देश में कानून तो है इक मदारी सा
तभी वो बेगुनाहों को बंदरिया सा नचाता है
गलत बातों को ठहराने सही हर बार संसद में
कोई जूते लगाता है कोई चप्पल चलाता है
सियासत मुल्क में शायद है इक कंगाल की बेटी
हर इक बूढा उसे पाने को कैसे छटपटाता है
बदल दूंगा मैं इसका रंग कह कर देखिये नेता
बुरे हालात सी हर भैंस पर उबटन लगाता है
बहुत मटका रही हो आज पतली जिस कमरिया को
उसे ही याद रख इक दिन खुदा कमरा बनाता है
दबा लेते हैं दिल में चाह अब तुझसे लिपटने की
करें कितनी भी कोशिश बीच में ये पेट आता है
सुनाई ही नहीं देगा किसी को सच वहां "नीरज"
तू क्यूँ नक्कार खाने में खड़ा तूती बजाता है

हां रे अब तो तूती बजाने की बात करेगा ही करेगा । अरी ममता कां गई री हटा दोनों को मेरे आगे से । अरी ऊपर वाले से डरो री । सूचना - घायल जान के नाच पर जो बीरू पान वाले जी द्वारा सौ सौ के नोट लुटाये गये वे सब नकली निकले हैं । बीरू भाई से निभेदन है कि असली नोट खीसे में नइ हों तो कलटी मार लें ।

राकेश खंडेलवाल जी
ये मौसम मस्तियों का इक बरस के बाद आता है
सुबह होते ही हर कोई बड़ा अन्टा   चढ़ाता है
तमन्ना है  गली में जाके उससे  रंग खेलें हम
मगर कम्बख्त कुत्ता है कि  झट  से काट खाता है
गए सीहोर तो उम्मीद थी हलवा -ए-  गाजर की
वहां हलवाई अब केवल समोसा ही बनाता है
कचहरी का बड़ा मुंसिफ़ बड़ा आलिम है देखो तो
किया जो फ़ैसला, उसपर अंगूठा ही लगाता है
ये संसद है कि बस्ती मोचियों की कोई बतलाये
कोई चप्पल जमाता है कोई जूता चलाता है

सूचना - इनका एक अति लम्‍बा गीत और है जो स्‍थानाभाव के कारण यहां नहीं दिया जा रहा है उसे आप आज जारी होने वाला पत्रिका में पढ़ पाएंगे ।

अरी किन्‍नरों के सम्‍मेलन में गाजर का हलवा की उम्‍मीद लेकर आई है । अरी यां जो समोसा मिल रा है उसे ही भकोस ले । सूचना - कल्‍लो कटारी की जुल्‍फों के चक्‍कर में रम्‍मू ठेले वाले घनचक्‍कर हो गये हैं । रम्‍मू जी से निभेदन है कि कल्‍लो कटारी ने अपना विग निकाल के रख दिया है वे हजार रुपये जमा करवा के कल्‍लो की जुल्‍फें प्राप्‍त कर सकते हैं ।

samer ji tilak ji copy

तिलक राज कपूर जी समीर लाल ’समीर’ जी

अरी आज तो मेरे सम्‍मेलन की जिसे देखो वो इ वाट लगाने पर तुला है । अरी ये कां से आ गई शादी करके । अरी मैंने सबको समझाया था कि अपना काम नाचना गाना है शादी बियाह करना नहीं । सबको सम्‍मेलन में आने से पेले समझाया था पर नी मानो तो भाड़ में जाओ ।

समीर लाल ’समीर’ 
कोई जूते लगाता है, कोई चप्पल जमाता है
मगर दीवानगी देखो वो फिर भी रंग लगाता है...
ये है त्यौहार होली का, अजब है हाल लोगों का
कहीं पर भर भांग की मस्ती, कोई दारु पिलाता है.
जिन्हें छूना नहीं संभव, मय्यसर स्वपन में भी था
उन्हीं को घेर लेता है,  वो खुल के  रंग लगाता है.
निकलती टोलियाँ कितनी, नगाड़ों पर लगा ठुमके
कहीं गुजिया की खुशबू है, कोई मठरी खिलाता है. 
वतन से दूर बैठा मैं, सभी को याद करता हूँ
है होली आज जब सोचूं,  तो पूरा भीग जाता हूँ....

मुच्‍ची कई रे । मुच्‍ची कई । देश से दूर होकर ही पता चलता है कि देश क्‍या है । पर फिकर मती करे । इक दिन सब मिल जाएंगे । सूचना - शिल्‍पा आठकली के नाच पर बिश्‍नू बंजारे ने एक बकरी देने की घोसना की है । घोसना को किन्‍नर लोग नइ मानते, घोसना को केवल जनता मानती हे । बिश्‍नू बंजारे से निभेदन है कि बकरी को लेकर मंच पर आयें और अपने कर कमलों से शिल्‍पा को सौंपे । पुन्‍न प्राप्‍त करें ।

तिलक राज कपूर
तरही हज़ल
नये युग का हरिक मजनूँ, यही ईनाम पाता है
कोई जूते लगाता है, कोई चप्प ल जमाता है।
गली में झॉंकते तेरी, कलेजा मुँह को आता है
जहॉं देखूँ, वहॉं बैठा, तेरा अब्बाह डराता है।
समझता कुछ नहीं लेकिन, हर इक छोरा घुमाता है
सरे बाज़ार सल्लू को तेरा अंकल बताता है।
गुलालों से भरी थाली लिये जब कोई आता है
गले मिलने का मौका फिर कहॉं कोई गँवाता है।
भरा था हर कहीं ज़ुल्फ़ों  भरा ये सर मेरा लेकिन
हज़ामत के समय हज्जाम अब चश्मा लगाता है।
तकाज़ा उम्र का शायद यही होता है शह्रों में
बदन इक ढेर चर्बी का बना बढ़ता ही जाता है।
करो शादी बड़े ही शौक से बेटा मगर सुन लो
ये रिश्ताब उम्र भर फिर बोलने का हक़ छुड़ाता है।
नयी साड़ी की ख्वाहिश गर कभी पूरी न कर पाऊँ
मुझे रोटी मिले सूखी औ कुत्ताश केक खाता है।
सफ़ेदी आ गयी बालों में, गालों की चमक गायब
मगर दिल है जवॉं, आईटम दिखे तो आ ही जाता है।
बुढ़ापे की जवानी का नशा छाया है अफ़सर पर
अगर आये न स्टैननो तो दिन भर कुड़कुड़ाता है।
पड़ोसी के सवालों की शरारत पर कहे 'राही'
कहॉं अब खाट प्या रे बस बदन ही चरमराता है।

तरही हज़ल-2
हुआ मुँह पोपला उसका, बदन भी पिलपिलाया है
मुआ मरदूद लेकिन आज भी सीटी बजाता है।
हुए शादी को पच्चिस साल तब ये होश आया है
करी जिसने भी ये ग़लती, सदा का सुख गँवाता है।
बहुत नाज़ो अदा से फ़ोन पर उसने बताया है
लगी है सेल जिसमें लुट रहा साड़ी-खजाना है।
पहन 'रूपा' के अन्तसर्वस्त्र  वो गदहे पर आया है
कभी सन्नील कभी सलमान बन डौले दिखाता है।
शरारत वो कभी ऐसी करेगी ये न सोचा था
मगर गुझिया में गोला भॉंग का उसने खिलाया है।
किया आगाह पंडित ने, हमेशा, बाद फेरों के
लगे कड़वा लगे मीठा, तुझे बस मुस्काराना है
हुए जब चार दिन शादी किये वो प्यातर से बोली
उठो जानम तुम्हें  ही आज से खाना बनाना है।
कहा बीबी ने होली पर उसे है मायके जाना
मगर हमने न बतलाया कि साली को बुलाया है।
रकीबों औ रफ़ीकों से नहीं रिश्ताल बचा 'राही'
गया वो काम से, दिल आपसे जिसने लगाया है

सूचना इनकी कुछ और रचनाएं भी आपको होली की पत्रिका में मिलेंगीं ।

अरी बस कर बस कर कित्‍ती सुनायेगी । सुनाती ही जायेगी क्‍या । अरी रूपा के अर्न्‍तवस्‍त्र की तो बात ही तूने क्‍या के दी है । अरी कां से लाती है तू ये सब बातें । अरे मैं तो भूली तू भी तो भेपाल में ही रैती है । सूचना - दामोदर दूध वाले की गाय ने इदर हमारे किन्‍नर सम्‍मेलन में पटना से आई पट्टो पटवारिन को सिंगवा मार दिया है । दामोदर दूध वाले अपनी गाय संभाले कर रखें । ई किन्‍नर सम्‍मेलन है हमारा देश नहीं है कि चाहे जो सिंगवा उठाये चला आये ।

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सौरभ पाण्डेय जी

तो ई हाथ बांधने से कुछ नहीं होले वाला है मुनिया । झां पे कविता उविता सुनानी पड़ती है । झां पे इस सबसे नहीं होने वाला । अरी सुसुर तू भी तो ऊ वीनस जान के शहर से आई है । अरी कै रइ हूं तुम सबसे कि दूर रओ उससे । मत मानो हमें क्‍या है ।

कोई जूते लगाता है, कोई चप्पन जमाता है
हुए हम फागुनी वाहन, मगर सीधे न जाना है
बड़ा दिलचस्प फागुन है मताये इस कदर हैं हम
जिसे समझे थे कंठाहार, पैजामे का नाड़ा है
ये जाने प्यास क्या मेरी पिलाओ पर नहीं जाती
भला महुए की जय बोलो वो जाने क्या पिलाना है
सुशीला है, सुमोही है, सुनयना नाम से सुन्दर
हसीं हर खास के आगे सुनो ’सू-सू’ बनाना है
बसंती है फ़िजां चुलबुल, कि मौसम गुदगुदाता है
औ’ उसपे भांग की बूटी करेला-नीम नाता है
लहर उठती है दरिया में, उसे कुछ-कुछ क्यूँ होता है
चढ़ा ऐनक, लगा ली दाँत, जताने क्या नज़ारा है

चों रे तुम इलाहाबाद वोल पजामे के पिच्‍छू भोत पड़ रहते हो अर्ज किया है धोती ने कहा पजामे से हम दोनों बंधे हैं धागे, है फर्क तो केवल इतना है तूपीछे से मैं आगे से । सूचना - अभी नशीली नीलो की नाच पे किसी ने फूल फैंका है । चूसित किया जाता है कि फैंकना है तो गोभी के फूल फैंके ताकि सम्‍मेलन में एक टैम की सब्‍जी बन सके ।

सूचना - किन्‍नर सम्‍मेलन में आये हुए किन्‍नरों के नहाने से जो जल प्राप्‍त हो रहा है उसे नगरपालिका की तरफ से बोतलों में बंद करके बेचने की व्‍यवस्‍था की जा रही है । जिन को प्राप्‍त करना है वे एडवांस बुक करें ।

सूचना - कल जिन लोग लुगाइन ने दाद नहीं दी है वे आज दाद दे जाएं । हम किन्‍नर सम्‍मेलन में ये घोसना करते हैं कि जो भी आज ताली नहीं बजाएंगे वो सब अगले जनम में हमारी तरह घर घर जाके ताली बजाएंगे ।

सूचना - आज रात को यश शाम तक होली का अंक जारी हो जाएगा ।

सूचना - होली की सभीको शुभकामानाएं ।

मंगलवार, 6 मार्च 2012

होली आ री हेगी रे कन्‍हाई रंग छलक रिये हेंगे तू सुना नी रिया हेगा बांसुरी, हो होली आ रइ है, आ रइ है होली आ रइ है ।

चा करें होली आ रइ है तो । होली तो हर साल ही आती है । इस बार हम इस्‍कूल से टुछ्छी करके आई हैं । हमारा नाम है भड़भड़ी कबूतरी भौंचक्‍की । हमारा नाम ई जो भौंचक्‍की है ई की भी एक लम्‍बी कहानी है । काहे के बचपन में जो हमारी शकल देखे रहा ऊ भौंचक्‍का रह जात रहा । काहे कि ऊपर वाले ने हमारी सूरत ही इतनी खबसूरत बनाई है । हमार मताई बप्‍पा ने कई की मोड़ी नीक खबसूरत है तो काजल का ठिढौना लगा दें । तो हमाय नाम में भौंचक्‍की जुड़ गओ । आज हम आईं हैं होली की पंचायत लेके ।  हम कवजित्री भी हैं । हमने एक कविता लिखी थी मिलती है जिन्‍नगी में मोयब्‍बत कदी कदी, और एक वो कदी कदी मेरे दिल में खियाल आता हेगा । तो अब तो आप पैचान गये होंगें । आप सोच रय होंगे कि भड़भड़ी की भाषा मिली जुली चौं है । वो ऐसे कि हमाय बप्‍पा रहिस भोपाल के और अम्‍मा रहिस गांव की । दोनों की भाषा मिली तो हम बनीं, भड़भड़ी । हम भीच भीच में गांव की भासा छोड़ के भोपाली बोलने लगें तो कोन्‍हो अचरज की बात नहीं होनी चइये ।

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सुश्री पिरकाश अश्र

जिनकी भी जिन्‍नगी अब स्‍यादी के बाद बदलने बारी है । इनखों लग रओ है कि लड्डू मिलबे बारो है पर इनखो कोई बताये कि लड्डू नई मिल रओ है  चुइंगगम मिल रयी है । चबाते रओ चबाते रओ । हां नी तो । सगरे लोग सुन लो जब तब भड़भड़ी बैठी है इधर तब तक कोई मस्‍ती नई होनी चइये । अभी जब भड़भड़ी आ रई थी तो पिच्‍छु से किसी ने सीटी मारी, भड़भड़ी को पिच्‍छू से सीटी सुनना पसंद नइ है ।

कोई धानी चुनर ओढे गली से जब भी गुज़रा है !
ग़ुलालों का ये रंग फिर उतरा उतरा फीका फीका है !
रे आया फाग़ का मौसम तू गोरी मत जा पनघट पे,
वहाँ टोली लिये कान्हा हमारी राह तकता है !
मेरी फितरत ही बन जाती है होली में कि क्या कहने,
कोई जूते लगाता है, कोई चप्प्ल जमाता है !
बयारों मे अलग सी गन्ध है ये फाग है या क्या ?
या यूँ कह दूँ तेरी खुश्बू से सारा जग ये महका है !
चले आओ हमारी ज़िन्दगी में इस तरह जैसे,
हज़ारो रेंज लेकर चाँद छ्त पे आज उतरा है !
मेरी सखियों ने मेरा कर दिया दुश्वार जीना अब,
तुम्हरे नाम का जब से दुपट्टा हमने रंगा है !!
मुहब्बत का ये रंग जब से चढा है दोनों पे तब से,
लगे मैं तेरे जैसा हूँ लगे तू मेरे जैसा है !1

इनकी गजल किस मरदूद ने तरही में शामिल करली, नू मानो तो भिल्‍कुल ही दूसरे टाइप की । चांद को छत पर उतार रये हैं । जैसे चांद इनकी सुसराल का पुष्‍पक भिमान हो । अय हय बिन्‍नी देखो तो जरा डुपट्टा रंग रइ है, अरी गुइंया जब रंगा रंगाया मिल रा हो तो काय को रंगवाना । चला बढ़ो आगे । 

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सुसरी रबिकांता पंडियाइन

अय हय, जिरा भाव तो देखो पंडियाइन के, अरी जा री तेरे जैसी भौत देखी । दीदे निकाल के चौं देख रई है । एक चनकटा देऊंगी तो चश्‍मा उश्‍मा सब तोड़ दूंगी । बड़ी आई । खुदा झूठ न बिलवाए जवानी में तेरी जैसियों को नल पे पानी भरती टैम पछीट पछीट के मारती थी । अब तो मुआ घुटने का दर्द, जान हलकान किये जा रया है । चल री चल सुना तू अपनी ।

जूते गिनकर सौ पड़े, चप्प्ल पड़े हजार
लातों की गिनती नहीं, गजब हुआ सत्कार
गजब हुआ सत्कार, बनाया मुझको भुरता
इतना पीटा हाय़! फटा कोट और कुरता
धीर रखो रविकांत, प्रेम-नभ वे ही छूते
लोक-लाज सब छोड़, प्यार में खाते जूते

जूता सबके घर मिले, निर्धन या धनवान
कहीं पांव में तो कहीं, सिर पर मिलत निशान
सिर पर मिलत निशान, गले माला सुखदाई
मिरगी दौरा दूर, करे डाक्टर की नाईं
या से तीनों लोक, नहीं कछु रहे अछूता
समदर्शी विख्यात, क्लेशमोचन यह जूता

सुसरी क्‍या सुना रई है । मुशायरा चल रिया हेगा और जाने क्‍या क्‍य सुना रई हेगी । अरी कमबखत मारी करती क्‍या है तू । क्‍या श्रोता भगायेगी सारे । और सुन री ये गा गा के क्‍यों सुना रई है । खुदा ने गला नी दिया तो गा काय को रई है । ऐ...... से पीछे से मेरी बीड़ी का बंडल कौन उठा के ले गया । भभ्‍भड़ी नइ कर रइ संचालन, करवा लो कोई भी मरदूद से । बीड़ी के बिना किछू न होता है भभ्‍भड़ी से । चल री हट सामने ने आने दे दूसरी को ।

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मुकेश तिवाड़ी

चौं गुड्डू तुम कां से आये, अपने अब्‍बू अम्‍मी को छोड़ के किधर आ गये इधर । जानी ये गजल है बच्‍चों के खेलने की चीज नई है लग जाये तो श्रोता के कान से खून निकल आता है । किसी ने परची भेजी है कि संचालन में गाली नइ बकनी है, सुन लो रे सब भभ्‍भड़ी भोपाल में पैदा हुई है, गाली उसके खून में है । जिसको नई सुनना हो वो अपने कान बंद कर ले । चलसुना रे गुड्डू तू भी सुना ले ।

कोई टूटी हुई खटिया पे ही मैय्यत बनाता है
कोई फूटी हुई ढोलक कोई झंझा बजाता है
किसी का थोबड़ा  काला किसी मूँह सफेदा है
ये होली की है मस्ती  यां तमाशा बन ही जाता है
हदें टूटें न क्यों ऐसे ये मस्ती रंग दिखाती है
रचाके स्वाँग भौंचक्का ये भभ्भड़ छा ही जाता है
खुदाया हाथ उसके भी भला क्योंकर न टूटें जो
गुलाबी गाल पे कालिख को मलके भाग जाता है
तरीकें मान के सम्मान के नायाब हैं निकलें
कोई जूते लगाता है कोई चप्पल जमाता है
फटे कपड़े गले झाडू बढ़ाती शान  है उसकी
सजा बाना गधे पे शान से नखरे दिखाता है
किसी की याद फागुन में भिगोती है जलाती है
कोई भूला हुआ सा शख्स जब भी याद आता है

सुना दिया अब हटो सामने से । कसम से कां कां से आ जाते हैं । दूध के दांत टूटे नइ हैं और गाल पे कालिख मल रय हैं । सुनो रे सब लोग अभी किसी ने फिर से पीछे से आके भभ्‍भड़ी को धप्‍पा मारा है,  नालायकों, जाहिलों, नासपीटों हाथ लग गये तो चमड़ी खिंचवां के जूतियां बनवा लूंगी । चलो रे अगला कौन है सामने आ जाये ।

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सुसरी सुलभ जैसवाल

अरी मेरी पाकीजा की मीना कुमारी, घाघरा तो ऐसे घेरा के बैठी है कि जैसे लोग तेरे घाघरे का घेर ही देखने आये हैं । अरी कलमुंही कुछ सुनायगी भी कि नू ही बैठी रहेगी । सुबू सुबू से कोई ने चा की तो पूछी नइ हेगी उस पे ये चली आ रही है नवाब जादियां घाघरा फैला फैला के । अरी अब सुनायेगी भी कुछ कि नू ही बैठी रहेगी ।

कली बोली कबूतर से तू मुझको आजमाता है 
मोहब्बत तू नहीं करता मेरा दिल तू भुखाता है
समंदर में उतर गहरे किनारे से न जाया कर
ये क्या तू सोच कर बस भेजा अपना खुजाता है 
है कवियों का मोहल्ला ये ज़रा बचके निकलना जी
कोई जूते लगाता है, कोई चप्पल जमाता है
सिखाया था जिसे हमने बहुत भोला समझ कर के
चतुर सुज्‍जान निकला वो, मुझे आँखें दिखाता है
बड़ा इंजीनियर है वो है मेरे वार्ड  का नेता 
सड़क पहले बनाता है वो फिर नाला खुदाता है
वो एक दिन लात खायेगा ये तो मालूम था सबको 
फटे में क्यूँ किसी के टांग वो अपनी अड़ाता है
नशे में तुम नशे में हम नशीला यह ज़माना है
नशा कितना भी गहरा हो सुबह तक टूट जाता है
लगाता है बुझाता है सिखाता है पढाता है
ये धंधा है ठगी का हाथ पर सरसों उगाता है
किया था प्यार मजनू ने कियामत से कियामत तक
मगर लैला की डोली को कोई दूजा ले जाता है
जवानी से बुढापे तक इधर करवट उधर करवट 
लड़कपन याद आता है लड़कपन याद आता है
ये दिल्ली की फ्लैटों में बबुआ रस अधूरा है
जोगीरा भांग शरबत बिन होली सूखा मनाता है
कहीं  गीतों की बरखा है कहीं दोहा ठुमकता है
'ग़ज़ल' में रंग घुलता है 'सुबीरा' जब घुलाता है

चल हट री, इत्‍ती बड़ी गजल लेके आ गई है और पेले जा रइ है, अपने चच्‍चा का माइक समझ रखा है । चल हट तो अब सामने से । सूरत की तो ऐसी नइ लग रइ थी पर हीटी कैसी । इधर करवट, उधर करवट, अरी मरदूदी किसी हकीम को दिखा, कायको करवट बदल रइ है रात भर । चल निकल आने दे अगले को ।

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वीनस केशरी

च्‍यों इनीसपेट्टर साब च्‍यों घुसे चले आ रय हो अंदर । मुशायरा चल रया है, मुजरा नइ कि पुलिस आ जाये । अरे किधर घुसे चले आ रय हो । जनानियां बैठी हैं इधर, चिलमन के इधर टांग धरी तो घुल्‍ले घुल्‍ले कर दूंगी, पठान की बेटी हूं समझ लेना । ऐ सुनो री पुलिस आई है सब अंदर हो जाओ । सुना लो निसपेट्टर साब तुम भी अपनी ।

टुच्ची सामाजिकता, खुडपेंची की साईंस, कुकुरपन्ती वाली फिलासफी के उच्च कोटि मिश्रण से निर्मित, " एक बार इस्तेमाल करो दोबारा इस्तेमाल के लायक नहीं बचोगे" के वादे के साथ माननीय वीनस केसरी जी, जो कि किसी को मुंह दिखने के काबिल नहीं रहे हैं अपनी ग़ज़ल पेल रहे हैं
चम्पू  लोग, ग़ज़ल का रेलै से पाहिले पेलू पंडित वीनस जी महराज के बतावा  गवा मंत्र जपना बहुते जरूरी है
तो चलो मन्त्र के जाप ११ बार करो ....
बुरा मानो तो मानो तुम, हमारा का बिगडता है 
अबे कूकुर के मूते से कहूँ खम्भा उखडता है
मन्त्र जाप के बाद हमार ग़ज़ल रेलों

कभी देखे है मुझको और कभी वो मुस्कुराता है
दिखे है 'आदमी' पर जाने ससुरा किस नसल का है
जो एडा बन के पेडा खा रहा है सीख उनसे कुछ
बनो पगला, करेगा काम अगला ये ज़माना है
मेरे कानों से उल्टी हो न जाए डर मुझे है ये
मेरा माशूक मेरी ही ग़ज़ल मुझको सुनाता है
भरा बैठा हूँ मैं, उस पर मुक़दमा ठोंक ही दूंगा
जरा देखूं तो कैसे बर्थ डे विष भूल जाता है
हजारों रंग हैं उसमें मगर गिरगिट नहीं है वो
मेरे नेता को गिरगिट देख ले तो भाग जाता है
मुझे देसी से नफरत हो गई है जब से पी विस्की
मुझे सपने में अब बस वोदका औ' रम ही दिखता है 
कहाँ हम और कहाँ ग़ालिब मगर तुम लिख के ये ले लो
जिसे अद्धी पीला दो तुम वही ग़ालिब का चाचा है
मैं सपने में घिरा पाता हूँ खुद को और न जाने क्यों
कोंई जूते लगता है कोंई चप्पल जमाता है
मियां 'भभ्भड़' सुधर जाओ नहीं तो हम सुधारेंगे
हमारे  दोस्त की दूकान में कुछ 'खास' बिकता है
अमें 'वीनस' तुम अपनी शाईरी को भाड़ में झोंको
करो तुम चुटकुलेबाजी वही पैसे दिलाता है

सेवा समाप्त, मुन्ना लोग निकल लो पर झार के ...

निकल लो निसपेट्टर साब तुम भी । सुनो रे समाइन होन, अभी जब भभ्‍भड़ी निसपेट्टर से बात कर रइ थी तब भभ्‍भड़ी को सूचना मिली हेगी कि भंतेलाल की पांचवी लड़की छठी बार सांतवे टोरे के साथ भाग गई है । तो ऊपर वाला आपको नेकी दे आप सब भी भंतेलाल को ये सुचना परदान कर दें । चल आओ रे अगले ।

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राजीव भरी भराई

किस बात पे भरी भराई बैठी है तू । गजल सुनाने आई है गाली गलौज करने आई है । हां नइ तो । बशीरन की घरवाली से पूछना एक बार उसने भी गाली गलौज करी थी मेरे संग, मैंने जिस बखत दारी का मूं नोंचा था, आज तक मूं पे निशान बने हैं । अकड़ मत दिखा समझ गई ।

अजी अब पूछिए मत आप हमसे हाल कैसा है,
समझिए दौर-ए-कंगाली में अपना आटा गीला है.
कठिन है राह उल्फत की बस इतना ही समझ लीजै,
वो बेटी है दरोगा की पहलवान उसका मामा है.
तेरी मम्मी, तेरे भाई न जाने क्या करेंगे जब,
तेरे इक पालतू कुत्ते ने ही इतना भगाया है.
कमीने दोस्त, खूसट बॉस, रिश्तेदार लीचड़ से,
मेरे अल्लाह तूने क्यों मुझे इतना नवाज़ा है,
रकीबों के बुलाने पर किया शिकवा तो वो बोले,
नहीं आना तो मत आओ तुम्हें किसने बुलाया है?
अब ऐसा क्या किया है हमने बिन पूछे ही जो हमको,
"कोई जूते लगाता है कोई चप्पल जमाता है.

नू मानो तो गजल तो ठीक कई है री तूने पर सुन ले भभ्‍भड़ी से पंगा मती लीजो भभ्‍भडी़ मारती कम है घसीटती ज्‍यादा है समझी । सुबू से भभ्‍भड़ी आके बैठी है झां पे, मगर कोई तो आके पूछ ले कि भभ्‍भड़ी कुछ चा वा पियेगी, पोया भजिया खायेगी । मगर नइ झां तो वो इ बात हो गई की घर के पूत कुंवारे और पडोसी के फेरे । चल अगला कौन है ।

vinod pandey copy 

भिनोद खुमार भांडे

चों री मुनिया घर से पूछ के आ री है कि बिना पूछे इ आ गी है । सब सामइन को चूसित किया जाता है कि तेल वाली गली के मल्‍थूमल के कुत्‍ते को एक नेता ने काट लिया है सो वो कुत्‍ता पागल भया है, सब लोग लुगाइन अपनी पैंट संभालते हुए मुशायरे से वापस जाएं । सुचना समापत भई । चल रे सुना ।

ये दुश्मन के लिए भी प्रीत की सौगात लाता है,
ये उत्सव प्यार के रंगों में सबको रंग जाता है,
किसी को रंग से नफ़रत,किसी को प्यार है रंग से,
कोई रंगों में खोकर बस, रंगों में डूब जाता है|
सना कीचड़ में पप्पू और रंगों में रंगी मुनियाँ,
बना लंगूर छन्नू हाथ से चेहरा छुपाता है
कोई बनियान,चढ्ढी पर,कबड्डी खेलने निकला,
कोई जूते लगाता है,कोई चप्पल जमाता है,
किसी की फट गई लूँगी,किसी का फट गया कुर्ता,
कोई गाता-बजाता है,कोई हँसता-हँसाता है
शहर में रंग भरे बैलून से है खेलते होली,
उधर गाँवों में गोबर और कीचड़ काम आता है|
चढ़ाकर भाँग नख से सिर, हैं आँखे लाल दारू से,
चवन्नी लाल होकर मस्त,फिल्मी गीत गाता है,
नही रहता है कोई गैर सभी अपने से लगते है,
मुहब्‍बत  की ठंडाई पीके हर मन मुस्कुराता है|
हक़ीकत में जहाँ पैसा है,होली है वहीं हर दिन,
ग़रीबों को तो ये त्योहार भी अक्सर सताता है|
मेरा संदेश है सबसे रहे, रहें खुशहाल हर प्राणी,
सभी हँस कर जिए जीवन हर यही यह दिन बताता है|

क्‍यों मुनिया क्‍या यूपी के चुनाव से आ रइ है । बड़ी ऊंची ऊंची बात कर रइ हेगी । गरीबों की अमीरों की । दुर्र । होली के दिन एतना ऊंचा बात नइ करनी चइये कि लोगों के माथे के ऊपर से हीट पड़े । सूचना - बाखल वाल भौजाइ ने आके शिकायत की है कि उनको कुत्‍ते ने काट लिया है । उनका कहना है कि सूचना में पैंट संभालने की बात कइ थी पन उनने साड़ी पैनी थी । तो सूचना बदली जाती हेगी । साड़ी भी संभालें । चलो कौन है आगे ।

ankit safar copy

डंकित सफर

अरे अरे अरे, अरे यां कां घुसा आ रिया है घोड़े पे बैठ कर इदर कोई ब्‍या शादी हा रइ है क्‍या । इधर तो मुशायरा चल रिया है अरे अरे अरे, अरे बिलकीस के अब्‍बू को बुलाओ कोई, पकड़ के दो लगाएंगे तो घोड़ी ओडी सब भूल जायेगा । अरे निकालो बाहर ।

वो बन्दर की तरह अपने बदन को जब खुजाता है.
समझते लोग हैं सारे कि वो करतब दिखाता है.
चढ़ावे की जगह पहले से है निश्चित यहाँ पर ही,
भले मानुष हैं ऑफिस के, सभी का जोइन्ट खाता है.
ये हिन्दुस्तान की संसद है या अड्डा लफंगों का,
कोई जूते लगाता है, कोई चप्पल जमाता है.
हमें तो दर्द में सुध-बुध नहीं रहती है अपनी ही,
मगर फिल्मों में हीरो कैसे क्लास्सिक गीत गाता है.
लगे मौर्टीन, औडोमौस, कछुआछाप या कुछ भी,
ये रिश्वतखोर मच्छर खून आखिर चूस जाता है.
ये अमबुलंस शायद देर से पहुंचे तेरे घर पर,
ये पिज़्ज़ा बॉय लेकिन ऑन-टाइम पिज़्ज़ा लाता है.

चों रे बच्‍चे घोड़ी पे चढ़ के देश भक्ति कर रिया है । सुन रे अभी उमर देश भक्ति करने की नइ है । और होय भी तो ये टैम नइ है अभी घोड़ी समेत निकल तो ले इदर से । सूचना - भभ्‍भड़ी जब चा पीने के लिये पीछे गइ थी तो किसी ने इंधेरे में छुप के उसको किंकोरी से मारा है, भभ्‍भडी़ का केना है कि अपनी गाय का दूध पिया है तो उजाले में आ के मारे । चलो आओ कौन है आगे ।

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डाग-टर संजय दानी

चौं मियां ये कौन सा भेस बना रखा है । बने क्‍या हो ये तो बता दो । नू लग रया है कि सीधे माभारत से निकल के चले आ रिये हो सीधी सड़क से । किशन बने हो चा, हाथ में बंसुरी तो पकड़ी है, पर जे तो बताओ कि चश्‍मे वाला कन्‍हैया कौन से जुग में हुआ । चलो पेलो तुम भी ।

कोई जूते लगाता है कोई चप्पल जमाता है,
ज़माना बारहा मेरे अहम को आजमाता है।
मुहब्बत के सफ़र का राही है ये कल्ब सदियों से,
मेरा हर रास्ता तेरे ही घर पे थम सा जाता है।
गो तामीरे- समंदर इश्क़ वाले करते हैं यारो,
नज़ारा साहिलों का हुस्न ही अक्सर दिखाता है।
उजालों की गली में मैंने अक्सर धोखा खाया है,
अंधेरा ही मेरे किरदार को अब बेश भाता है।
ज़मीं पर आने में गो चांदनी ही देर करती है,
मगर लोगों के मुख से गालियां तो चांद खाता है।
हमें मालूम है इंसानों को ईश्वर बनाता है,
मगर वो भेद दो इंसानों में क्यूं, कैसे लाता है।
गई है साक़ी जब से छोड़ कर मयखाने को दानी,
मज़ा पीने का मेरे दिल के थोड़ा भी न आता है।

चों खां आप तो ऐसे न थे । मुहब्‍बत, अंधेरा, चांद, साहिल, तामीर, उइ मां ये टोले टोले से लफ्ज़ कां से लाये हो डाग साब । जिनको गजल समझ में आ गइ हो वो ताली ठोंक दें और जिनको नइ समझ में आइ हो वो शायर को ठोंक दें । चलो रे आओ ।

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काना परपात

उइ मां ये कौन है री । हाथ में पेन पकड़े रंग बिरंग कपड़े और ऊपर से गंजी । सूचना बदामीलाल के घर के बाहर किसी का बच्‍चा पड़ा मिला है, जिसे किसी खातून को हो वो बच्‍चे की पैचान बता कर ले आये । सूचना खतम हुई । चल री रंग बिरंगी पेल दे ।

उसे खाने में भाता सिर्फ चटनी और समोसा है
पहनने में पसंद उसकी फकत ललका लंगोटा है
महक उठाता है मेरा आशियाना उसके आने से
सुना है साल में मुश्किल से वो इक दिन नहाता है
मिले जब गाल पर तुमको पड़ाका तब समझ लेना
तुम्हारी प्रेमिका ने अपने फादर से मिलाया है
हमारे गाँव की सरहद में कोई घुस नहीं सकता
यहाँ का बच्चा बच्चा दौडकर कूकुर लुहाता है
कोई मंदिर के बाहर इक रुपैया दान में दे तो
चिपटते हैं भिखारी ऐसे फिर वो लुट ही जाता है
मिसेज शर्मा से सब डरते हैं यारों इस मोहल्ले में
मगर छोटी सी बिस्तुइया ने ही उनको डराया है
सदन अपनी अखाड़ा बन गई है अब यहाँ पर तो
कोई जूते लगता है कोई चप्पल जमाता है
कभी इस शह्र में देखो तो वैलेंटाइनों को जी
कोई लप्पड लगाता है कोई मुर्गा बनाता है

उइ मां महक उठने वला शेर तो मरी ने भोत ही अच्‍छा हेड़ा है । ला री आ के गले तो लग जा । भोत अच्‍छा । चल आगे बढ़ अब दूसरे को आने दे ।

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चुकंदर नासवा अपने पति के साथ

चों री तेरे भी बाल उड़ गये और उड़े तो उड़े तू तो सर पे पल्‍लू रख के छुपा भी नई री है । अरी बिन्‍नो बहू बेटी के लच्‍छन से तो आती । सूचना - चुकंदर जब मंच पे आ रइ थी तो किसी ने पीछे से टकली बोला था । ये मुशायरे की तहजीब के खिलाप है आइंदे से आप सलपट बोलो, गंजी बोलो, उजड़ा चमन बोलो, पर टकली नइ बोलोगे नई तो.........

कोई जूता चलाता है कोई चप्पल जमाता है
तेरा बापू चला के बैंत पिछवाड़ा सुजाता है
कभी कीचड़ कभी गोबर कभी थप्पड़ लगाने को
वो होली के बहाने से मुझे घर पर बुलाता है
तेरा भाई बनाऊंगा जिसे इक रोज मैं साला
सभी कुत्ते गली के वो मेरे पीछे भगाता है
वो रंगों के बहाने से छुए थे गाल जब तेरे
उतर आई थी कितनी मैल मुझको याद आता है 
तेरा आशिक हुवा करता था जो अपना पडोसी है
तभी तो देख के तुझको अभी भी हिनहिनाता है
तेरी चुन्नी उड़ा के ले गया था याद है तुझको
जहां मिलता है वो आशिक अभी भी मार खाता है
गुलाबी लाल पीले रंग से मैं खेलना चाहूँ
मेरा साला मगर हर बार ही चूना लगाता है
कहाँ वो गीत फागुन के कहाँ रंगों की वो टोली
यहाँ परदेस में गुजिया खिलाने कौन आता है

अरी क्‍या कै दिया री। पिछवाड़े सुजाने वाले शेर पर तो भभ्‍भडी लहालोट हो हो के फिदा हो रइ है । मुच्‍ची में क्‍या सुजाया है री तूने तो पिछवाड़ा । भभ्‍भड़ी के पेसे वुसूल हो गये री । चल अब हट सामने से दूसरे को आन दे ।

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धरमेन्‍दर दुर्जन और सौरभ छेकड़

चों रे दोनों लोग लुगाई क्‍या मंडप से ही उठ के चले आ रय हो । चौं तुम दोनों गजल लिखते हो । सूचना - समाइन को चूसित किया जाता है कि पिछले साल दशहरे की राम लीला पर रावण गुस्‍से में भाग गया था और जिस कारण से उसका वध नहीं हो पाया था । अभी रावण गांव में दिखा है तो पटेल साब का केना है कि होली पर ही उसका वध किया जायेगा । सूचना समाप्‍त होती भई ।

धरमेन्‍दर दुर्जन

करे जो नंगई होली में वो बेकार बंदा है
कराओ सैर नाली की उसे यह पाक धंधा है
न उसका कुछ भी बिगड़ेगा तुम्हारा हाल बद होगा
न पंगा लो, करो सम्मान, होली में, वो टकला है
है थानेदारनी पर आ गया ये दिल मुआँ जबसे
बता सकता नहीं है लाल क्या? पीला हुआ क्या है?
हरा हमको लुभाता है सुना जबसे पड़ोसी ने
पड़ोसन की हरी साड़ी को पीला लाल रंगा है
बड़े बालों सफाचट मूँछ दाढ़ी ने दिया धोखा
जिसे रंगा पकड़ हमने मुहल्ले का वो दादा है
खरीदा एक ही दूकान से है बात इतनी सी
पड़ोसन और मेरा रंग यूँ ही एक जैसा है
मिले हैं अबके होली में तो देखें हाल नालों का
यही कहकर विधायक जी को नाले में ढकेला है
हर इक होली में मल कालिख गधे पे हैं बिठाते पर
चढ़ा इक बार तो कब भूत गालिब का उतरता है
‘बुरा मत मानिए होली है’ मंत्री को यही कहकर
कोई जूते लगाता है, कोई चप्पमल जमाता है
वो होली में मुई भीगी सड़क और छत पे भीगी तुम
इसी के बाद बदबूदार नाला याद आता है

सौरभ छेकड़

कोई जूता चलाता है,कोई चप्पल चलाता है
कोई नाले में धकिया के अचानक भाग जाता है .
जिधर मुड़ते हैं हम पिचकारियाँ फुंफकार उठती हैं
गुलाल-ओ-धूल का लश्कर हमें बेहद डराता है
अजी ये भाभियाँ हैं या किसी शैतान की खाला
भला यूँ घोल मैदे का किसी पे डाला जाता है
हजम कर भांग की गुझिया तेरा दर ढूंढ लें कैसे
सरापा रंग में डूबा हुआ हर इक आहाता है
शरीफों की गली है यह यकीं हमको भी था पहले
मगर यूँ देख कर हुल्लड़ यकीं अब डोल जाता है
हमें ऐसे में सच कहते हैं नानी याद आती हैं
मुआ यह जश्न फागुन का हमें कितना रुलाता है
फटे कुरते में इतना ख़ूबसूरत तू लगे जालिम
सिला कुरता बता क्यूँ जेब पर फिर जुल्म ढाता है
सभी बूढों के सिर चढ़ कर जवानी बैठ जाती है
जवां यारों का जैसे फिर लड़कपन लौट आता है
हवा बेशर्मियों से सब दुपट्टे फेंक देती है
लफंगा आसमां यह देख कर सीटी बजाता है
पिया है दूध माँ का तो नज़र के सामने भी आ
निशाना छुप के गुब्बारे का हमको क्यूँ बनाता है?
सुना है सालियों,सलहज की तुमको याद आई थी
अगर ससुराल में हो तो मियां मालिक विधाता है
'ग़ज़ल' जिसके फज़ल से है 'हज़ल' के रूप में आई
खिला है सब दिलों में शख्श वो 'पंकज' कहाता है

चों रे दोनो लोग लुगाई मिल के भी नी कै पाये । खाक डालो दोनों जने गजल उजल पे और अभी तो मनीहून मनाने निकल लो । कम से कम कुछ तो अच्‍छा होगा। चलो रे अब अखिरी वाले को लाओ । आज का काम खतम करो । अब कल की कल देखी जायगी।

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डाग टर आजम

चों रे सरदार गजल केता है । चों मजाक कर रया है रे । मुच्‍ची में गज़ल केगा । नी मानेगा । चल के लेना पर पेले मेरेका सूचना दे देने दे । सूचना - इमरती बाई के घर मेहमान आये हैं सो उनको चूसित किया जाता है कि वो मुशायरे के बाद घर नइ जायें झंइ रुकी रयें । मेहमान खुद ही वापस हो जायंगे ।

ग़ज़ल  अपनी  किसी  स्‍टेज  पर  जब  वो  सुनाता  है
कोई  है  झांकता  बगलें  ,कोई  सर  को  खुजाता  है
ज़लील  उस  को  किया  सब  ने  मगर  कब  बाज़  आता  है
ग़ज़ल  इन  की, ग़ज़ल  उन  की  चुराकर  वो  सुनाता  है
कभी  तो  अपने  पैसों  से  कोई  महफ़िल  सजाता  है
किसी  नेता  को  मेहमान -ए -खुसूसी  वो  बनाता  है
वहां  जो  चाहे  सुनता  है  वो  जो  चाहे  सुनाता  है
कुछ  अपने  जैसे  लोगों  को  खिलाता  है  पिलाता  है
सभी  एहसां  तले  दब  कर  बजाहिर  दाद  देते  हैं
छुपा  कर  मुंह  हर  इक  लेकिन  हंसी  उस  की  उडाता  है
उसे  जब  दाद  देते  हैं  तो  छप्पर  फाड़  देते  हैं
किसी  महफ़िल  में  जाता  है  तो  चमचे  साथ  लाता  है
बड़ा  चालाक  शायर  है  ,सुना  कर  शायरी  अपनी
वो  महफ़िल  छोड़कर  मौक़ा  मिले  तो  भाग  जाता  है
तरन्नुम  लाजवाब  उस  का ,जिसे  लगता  है  ये  सुन  कर
गधा  हो  रेंकता  जैसे  कि  घोडा  हिनहिनाता  है
कभी  बिजली  चली  जाए  तो  मौक़ा  भांप  कर  उस  को
''कोई  जूते  लगता  है  ,कोई  चप्पल  जमता  है  ''
हर  इक  कस्बे  में  हर  इक  शहर  में  ,हर  बज़्म  में  आज़म
ज़रा  सा  ढूँढने  पर  ऐसा  शायर  मिल  ही  जाता  है

अरे वा रे डाग टर हजल तो अच्‍छी हेड़ी है रे । खुद के ही तरन्‍नुम की क्‍या बात कइ है रे । मिजा आ ही गया हेगा । अंदर तक मिजा आ गिया है ।

सूचना - सब लोगों को चूसित किया जाता है कि दाद देना और वो भी लम्‍बी लम्‍बी दाद देना भेत जिरूरी है । जो नइ देंगे उनकी ....... । आगे जो नइ लिखा उसे आप खुदइ समझ लो । भभ्‍भड़ी भोपाल की है कोई ऐसी वैसी जगे की नइ है ।

सूचना - होली की पीड़ी एफ फाइल समाइन के अनुरोध पे होली के बाद जारी होगी । या हो सकता है एन होली के दिन जारी हो । अपने दिल जिगर गुर्दे संभाल के बैठे रें ।

सूचना - भभ्‍भड़ी को अभी किसी ने ईंटा फैंक के मारा है । जिस भी सामाइन ने ये किया है उनको भभ्‍भड़ी की तरफ से केना है कि '' सारी सामाइन -फिलिम लूट का मीका द्वारा गाया गया गाना'' । आप सब सिमझदार है ।

शनिवार, 3 मार्च 2012

3 मार्च उफ़्फ़ यह तो शनिवार आ गया कल की अन्तिम तिथि निश्चित है, ये तरही भेजने से पहले एक बहाने रूपी कविता है श्री राकेश खंडेलवाल जी की ।

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होली आ गई है और बहानेबाज हैं कि धे तेरी  की धे तेरी की कर रहे हैं बहानों की । सुबू से लेकर शाम तलक एक बात ही पेले जा रय हैं कि मियां अपन से नी होने की ये तुमारी तरही फरही । चों मियां तुमको कौन से हकीम ने बोला था कि तुम गज्‍जल फज्‍जल लिखने लगो । और खां लिखने लगे तो लिखने लगे ये कौन ने के दिया था कि अपने आप को शाइर भी मान लो । देखो मियां अब जो तुमने के दी है तो अब तो अपने अंदर से शेर हेड़ हेड़ के एक पूरी गजल हेड़नी ही पड़ेगी । जब तक होली का त्‍यौंहार चल रिया है तब तक पूरी तरे से गजल हेड़ते रहो । हेड़ हेड़ के, हेड़ हेड़ के ढेर लगा दो शेरों के । चचा गालिब और बाबा मीर भी तो ये इ करते रेते थे । बस एक घूंट मारा और एक शेर हेड़ा । होली पे तो वैसे भी घूंट मारने की परमीशन होती है । तो मैं नू के रिया हूं कि भोत बहाने टसने कर लिये आप सब ने अब हेड़ो जल्‍दी से गजल, नी तो मैं झंई पे अनसन करना शिरू कर दूंगा । और आप सबको भी टोपी लगानी पड़ेगी मेरी कि ''मैं भी गन्‍ना हूं '' । तो जिस वास्‍ते ही के रिया हूं कि जिन्‍ने भी नइ भेजी है अपनी ग़जल तुरंत हेड़ कर चुपचाप भेज दें । और हां कल सुबू से जो चचा फुक्‍कन को कल्‍लू पान वाले ने पान खिलाया था उसमें चूना कम लगा था । जिस वास्‍ते चचा फुक्‍कन कल्‍लू पान वाले के पीछे जूती लिये घूम रहे हैं । भोपाली को पान खिलाओ तो चूना कभी कम मती लगाओ । और होली की गज़ल कहो तो मजा कभी भी कम मती करो ।

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भगवान आपको नेकी दे कल सुबू सुबू मैं उठा तो देख क्‍या रिया हूं कि राकेश जी की एक मेल मेरे दड़बे में पडी हेगी । मैंने उसको खोला तो देख क्‍या रिया हूं कि बहाने ही बहाने । मैंने जो देखा कि सबको ही लपेट दिया है उसमें । बहाने भी बना रहे हों और उसमें लपेट लपेट के मार भी रये हो । जे तो गलत बात हेगी । मेरे को इत्‍ता गुस्‍सा, इत्‍ता गुस्‍सा की क्‍या बताऊं । मिझे नूं लगा कि  गुस्‍से में कंइ मेरी टोपी में आग नइ लग जाये । तो मिझे तो लगा कि आपको भी राकेश जी की कविता सुना दूं । चोंकि जो राकेश जी के रय हेंगे वो तो और भी लोग केना चा रय है । तो मैं तो सुबू से चा पी के आया और बैठ गया धपाक से । सब लोग सुन लो कि जे कोई तरही की सुरूआत नई हो रयी है । जे तो बस बहानेबाजी हो रयी है । जे तो बस नू मानो की आप सब के मन की ह्वे रइ है ।


श्री राकेश खंडेलवाल जी का ख़त

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3  मार्च उफ़्फ़
यह तो शनिवार आ गया
कल की अन्तिम तिथि निश्चित है
त्रही पर लिख भेजा जाये
और पृष्ठ ये सारे कोरे पड़े हुये हैं
सुईयां बतलाती हैं आधी
बीत चुकी है रात आज की
अगर नहीं कुछ लिख पाया तो
नाहक बहुत फ़जीते होंगें
नीरज ठेंगा दिखलायेंगे
तिलकराज जी ताली देंगे
पंकज जी हँस कर कह देंगे
तरही हँसी ठिठोली वाली
नाकों तले चने चबवाये
भला आपकी क्या गिनती है
जब समीर भी लिख ना पाये
अंकित अपने कान खुजाये
दूरभाष पर गौतम,
कंचन को तरही का अर्थ बताये
और अर्शजी.........
तरही में क्यों कर के उलझें
उलझाने को और बहुत है

इसीलिये सोचा थोड़ी सी
चहलकदमियां घर के बाहर
करूँ चाँदनी भरी रात में
जरा गुनगुना मूड बना लूँ
और तुरत तरही लिख डालूँ
बाहर जाकर पांच मिनट तक
पूरा लान नाप कर आये
शब्द अचानक लब पर आये
पूनम की सीढ़ी पर चश्ढ़ता
अपने आकारों में बढ़ता
चन्दा जरा लजा जाता है
होली का मौसम है तब ही
मन पर रंग चढ़ा जाता है
पता नहीं था जाने कैसे
ये जो शब्द संवर कर आये
वे थे पंचम सुर के गाये
जो  कितनी खिड़की खुलवाये
जिनसे उछले कई स्वरों को
हम पूरा तो समझ ना पाये
लेकिन जितना पल्ले आया
उसका केवल अर्थ यही था
आधी रात गली में आकर
कौन गधा ये चिल्लाता है

समझ नहीं जो यह पाता है
सांझ ढले पर मुँह पर ताले
रखते रहे गिरस्थी वाले
पेश सफ़ाई हमने कर दी
वज़ह तरही की आगे रख दी
फिर जो हाल हुआ मत पूछो
हम जितना भी कोशिश कर लें
बिल्कुल समझ नहीं आयेगा
केवल इतना आये कहने
खबरदार पंकजजी
आगे
सोच समझ कर विषय बतायें
वरना हमसे तो अब कुछ भी
कविता में ना ढल पायेगा
अगली बार पड़ौसी सारे
तरही में आयेंगे आगे
जूता कोई ले आयेगा
कोई संग चप्पल लायेगा

ज्‍यादा के रये हैं कम समझना पर ऐसा भी क्‍या कि जो रपाटा मारा तो सब को ही लपेट डाला । होली हो रई कि होला हो रिया है । पर उनका क्‍या जाना है 'तेल जले सरकार का मिर्जा खेलें फाग'' । तो खबरदार कर के जा रये हैं कि जिन की भी ग़जल नइ मिली है उनको कल की चेतावनी है । कल संडे के दिन भर ग़जल लिखें और मंडे की सुबू सुबू एन भिनसारे हमारे डब्‍बे में पटक जाएं ।

अंत में होली का एक गीत, इस गीत को मैं, श्री हठीला जी, स्‍वर्गीय मोहन राय जी, श्री हरिओम शर्मा जी मिलकर कोरस में होली के दिन गाते थे । अब तो खैर हमारा कोरस ही अधूरा हो गया । किन्‍तु क्‍या आपने इसे मित्रों के साथ कोरस में गाया है कि नहीं नहीं गाया हो तो इस बार होली के दिन इसको कोरस में दोस्‍तों के साथ जरूर गाएं । आनंद आ जाता है । जब अंतरों में कोरस ऊपर चढ़ता है तो ऐसा लगता है कि होली की रंग रज बरस रही है । सुनिये और लिखिये ग़ज़ल ।

गुरुवार, 1 मार्च 2012

सगरे लोग लुगाइन को सूचना दी जाती हेगी कि होली आ गई हेगी और दिनांक 4 मार्च तक आप सभन को अपनी अपनी घटिया रचनाएं भेजनी हेंगी, थोड़ी कही ज्‍यादा समझियो - भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के

जोन कही सो तोन कही होली आ ही गई है । और होली के इस सुअवसर पर भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के एक हफ्ते पहिले से ही पगलिया जाते हैं । हालांकि पिछला एक सप्‍ताह भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के का बहुत ही टेंशन में गुजरा हेगा । टेंशन बहूत ही ज्‍यदा था । विशेषकर सोमवार और मंगलवार को तो भभ्‍भड़ कवि को लगा कि गई भैंस पानी में, लेकिन ईश्‍वर की कृपा और  आप सब लोगों की शुभकामनाओं से बुधवार की शाम तक भैंस पानी में जाने से बच गई । टेंशन को मिटाने के लिये भभ्‍भड़ कवि ने कई सारे प्रयोग किये इस बीच में । खैर जिंदगी की यही रीत है । तो अब तो खैर होली का हंगामा शुरू करने का समय हो चुका है ।

भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के पेले ही के चुके हेंगे कि सबको 4 मार्च तक अपनी अपनी समस्‍त घटिया रचनाएं भेजनी हेंगी । भगवान आपको नेकी दे । वैसे भी आप सब साल भर जो लिखते हैं वो भी घटिया ही होता हेगा । लेकिन अब अपने घटियापने में जोर का तड़का लगाना है । काहे कि इस बार तो होली का सवाल है । मिसरा तो आप सभन को पता ही हेगा ।

कोई जूते लगाता है, कोई चप्‍पल जमाता है ।

कछु बुद्धिमान टाइप के शायरों ( वैसे शायरों में बुद्धिमान होना, ये अपने आप में एक समग्र चुटकुला है ) ने कई है कि जूते और चप्‍पल के कारण उनके दिमाग में कुछ सूझाई नई पड़ रओ है । सो हमने बिनके या कई है कि जूते और चप्‍पल की जगन पे घूंसे और थप्‍पड़ भी चल सके है । पर लिखो तो सई कछु भी । कछुक भद्र महिलाओं को जो कैनो है कि बिनसे इत्‍ते टुच्‍चे मिसरे पर नई लिखो जा रओ हेगो । सो हमारी उन सारी भद्र महिलाओं से विनरम बीनती हेगी कि आप सब अपने दिमाग़ में ध्‍यान करें कि किस प्रकार आप अपने उनको सुधारती हैं इन्‍हीं सारे हथियारों से और उसके बाद लिख डालें ।

कछु लोग ये भी के रए हेंगे कि टाइम तो भोत ही कम मिला हेगा । बताओ भला टाइम की बात कर रए हेंगे । टाइम तो भोत है । और सोचो तो भिल्‍कुल भी नईं है । भैया लोग आप लिखने तो बैठो टाइम तो आपो आप निकल पड़ेगा । तो आइये आज यहीं पर बैठे बैठे कुछ छिछोर शेर कह जायें । छिछोर शेर पिछले वाले मिसरे पर । चूंकि होली का मूड और माहौल बनाना है सो ये ज़ुरूरी है । माता बहनों से पहले ही छिमा मांग ली जा रही है । क्‍योंकि इस बार काफिया 'ई' है जो स्‍त्री शक्ति का प्रतीक होता है । सो यदि कहीं कोई 'ई' किसी माता बहन को बुरी लगे तो बुरा न माने होली है । छिमा सहित । ये शेर यहीं पर बन रहे हैं और इनको यहीं पर भुला दिया जाये ।

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खूबसूरत उसकी साली है अभी तक गांव में
इसलिये कल्‍लू कसाई है अभी तक गांव में

चों मियां फुक्‍कन तुम्‍हारे घर में कल वो कौन थी ( चों- क्‍यों )
तुम तो कहते थे के बीबी है अभी तक गांव में

लड़कियों का घर से बाहर हीटना तक बंद है ( हीटना - निकलना )
मनचला, दिलफैंक फौजी है अभी तक गांव में ( फौजी - गौतम )

गांव तो जाएं मगर वो काट लेगी फिर हमें
कटखनी, खूंखार, कुत्‍ती है अभी तक गांव में 

मायके जाना है तुझको, गर जो होली पर, तो जा
वो बहन तेरी फुफेरी है अभी तक गांव में

हम न कहते थे, न जाओ और कुछ दिन उस गली
बाक्‍सर उसका वो भाई है अभी तक गांव में

आ रिये हो ख़ां किधर से, बहकी बहकी चाल है
क्‍या वो नखलऊ वाली नचनी है अभी तक गांव में

मजनुओं को शहर में मिलती है बस वार्निंग मगर  
लट्ठ जूतों की पिटाई है अभी तक गांव में

हम सुबू से मूं को धोके बैठे दरवज्‍जे पे हैं ( सुबू- सुबह, मूं - मुंह ) 
है सुना, वो आती जाती है अभी तक गांव में 

आप होली पर शराफत इतनी क्‍यों दिखला रहे
आपकी क्‍या धर्मपत्‍नी है अभी तक गांव में

हुस्‍न बेपरवाह सा है, इश्‍क बेतरतीब सा  
औ' मुहब्‍बत बेवकूफी है अभी तक गांव में

हो रकीबों की ज़ुरूरत आपको क्‍यों कर भला  
आपकी जोरू का भाई है अभी तक गांव में

आजकल देते हैं वो 'भभ्‍भड़' का परिचय इस तरह  
ये पुराना एक पापी है अभी तक गांव में

तो ये तो बस यूं ही था कुछ जो यहीं पर बना दिया गया है । बस इसको हमदर्द का टॉनिक शिंकारा समझ के  पी लें और होली के लिये तैयार हो जाएं । कुछ भी भेजें लेकिन भेजें ज़ुरूर । मुक्‍तक भेजें । गीत भेजें । जो लिख पाएं उसे भेजें । क्‍योंकि ये होली का सवाल है । होली के नाम पर दे दे बाबा ।