सोमवार, 30 जनवरी 2012

नवीन सी चतुर्वेदी और मुस्‍तफा महिर पंतनगरी से आज सुनते हैं कि :- जानते हो क्यूँ तरक़्क़ी गाँव तक पहुँची नहीं, फाइलों में तो तरक्की है अभी तक गाँव में ।

सुकवि रमेश हठीला स्‍मृति तरही मुशायरा

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इक पुराना पेड़ बाक़ी है अभी तक गाँव में
इक पुराना पेड़ बाक़ी है अभी तक गाँव में

वसंत पंचमी को तरही मुशायरे ने छुटकी अनन्‍या की ग़ज़ल के साथ नई ऊंचाइयों को छुआ । और सभी अग्रजों-अग्रजाओं ने जिस प्रकार से अनन्‍या का उत्‍साह बढ़ाया उससे ये पता लगा कि क्‍यों इस ब्‍लाग को एक परिवार माना जाता है । यहां पर एक परिवार की तरह ही सब आपस में जुड़े हैं । और मुझे ऐसा लगता है कि यही सबसे बड़ी सफलता है । और सबसे बड़ी बात ये है कि परिवार अब धीरे धीरे बढ़ता जा रहा है । हर बार तरही में कुछ नये लोग जुड़ते हैं । पिछली पोस्‍ट पर श्री तिलक राज जी द्वारा की गई टिप्‍पणी बहुत महत्‍वपूर्ण है जिसमें उन्‍होंने रदीफ की व्‍याख्‍या की है और मिसरा ए तरह पर भी चर्चा की है । जिन बातों की ओर उन्‍होंने इंगित किया है वो जानना बहुत ज़ुरूरी है । 'अभी तक' को समझे बिना शेर कहा गया तो शेर बेमज़ा हो जायेगा। कुछ लोग कहते हैं आप अपने ब्‍लाग पर अपनी रचनाएं क्‍यों नहीं लगाते हैं । मैं कहता हूं कि एक तो मैं इन गुणीजनों जितना अच्‍छा नहीं लिख पाता हूं । दूसरा मैं आज भी उस मत पर दृढ़ता से कायम हूं कि संपादक को अपने संपादन में निकलने वाली पत्रिका में अपना संपादकीय देना चाहिये केवल, उसे अपनी कहानी या कविता उस पत्रिका में छापने से बचना चाहिये । इसीलिये मैं केवल संपादकीय ही लिखता हूं । तो चलिये आज का संपादकीय खत्‍म करते हैं और श्री नवीन सी चतुर्वेदी 'नवीन' और मुस्‍तफा माहिर पंतनगरी से सुनते हैं उनकी शानदार ग़ज़लें ।

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श्री नवीन सी चतुर्वेदी 'नवीन' 

नवीन जी आज नये वर्ष के इस मुशायरे में एक नये रूप में अवतरित हो रहे हैं । दरअसल में आज वे पहली बार अपने तख़ल्‍लुस के साथ प्रकाशित हो रहे हैं । नवीन को ही अपना तख़ल्‍लुस बनाया है उन्‍होंने । और आज पहली बार इस तख़ल्‍लुस के सा‍थ ये ग़ज़ल कही है । तो अब वे द्विगुणित नवीन हो चुके हैं । आइये सुनते हैं उनकी ये ग़ज़ल ।

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हरक़तों पे टोकाटाकी है अभी तक गाँव में
नस्ल की तीमारदारी है अभी तक गाँव में

आप का कहना बजा है, गाँव में भी है जलन
फिर भी टकसाली तसल्ली है अभी तक गाँव में

जानते हो क्यूँ तरक़्क़ी गाँव तक पहुँची नहीं
वक़्त की रफ़्तार धीमी है अभी तक गाँव में

यूँ तो महँगाई ने रत्ती भर कसर छोड़ी नहीं
फिर भी मस्ती लाख सस्ती है अभी तक गाँव में

जिस में हिम्मत हो बना ले अपने सपनों के महल
कुदरती मज़बूत धरती है अभी तक गाँव में

ये तो पुरखों के पसीने का ही जादू है फकत
हर तरफ सौंधास रहती है अभी तक गाँव में
    

ज़िन्दगी जिसके लिए थी ज़िन्दगी भर इम्तिहाँ
वो "जनक-धरती की बेटी" है अभी तक गाँव में

उस से मिलता हूँ तो बचपन लौट आता है मेरा
"इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गाँव में"

शह्र की तहज़ीब दाख़िल हो चुकी है पर 'नवीन'
एक हद तक फिर भी  नेकी है अभी तक गाँव में

जनक धरती की बेटी, क्‍या प्रयोग किया गया है और मिसरा उला भी उतने सशक्‍त रूप से अपने आपको अभिव्‍यक्‍त कर रहा है । मतले में गांव के मुख्‍य गुण को खूब पकड़ा है गांव में आज भी ये नहीं देखा जाता कि बच्‍चा अपना है कि दूसरे का है, यदि ग़लत कर रहा है तो कोई भी डांट सकता है । वक्‍त की रफ़तार को जिस प्रकार से गांव में धीमा किया है वो भी खूब है मैं तो इस सुस्‍त गति को जानता हूं इसलिये कह सकता हूं कि बहुत खूब । और बचपन के लौट आने की जबरदस्‍त गिरह, वाह वाह वाह । आनंद ला दिया नवीन जी ।

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मुस्‍तफा महिर पंतनगरी

मुस्‍तफा से मैं हर बार कुछ अलग, कुछ खास की उम्‍मीद रखता हूं । पिछले दिनों फेसबुक पर मुस्‍तफा के कुछ कमजोर शेर देखे तो सबसे ज्‍यादा निराश होने वालों में मैं ही था । लेकिन इस ग़ज़ल में कुछ मिसरे तो मुस्‍तफा ने ऐसे गढ़े हैं कि सारी निराशा छू मंतर हो गई है । मुस्‍तफा उस शायर का नाम है जिससे मुझे भविष्‍य में बहुत उम्‍मीदें हैं ।

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मुल्क़  की पहचान बाक़ी है अभी तक गाँव  में  
आदमी हिन्दोस्तानी  है  अभी तक गाँव में 

शहर में तो नफरतें हर दिल पे ग़ालिब हो   गयीं
प्यार की दूकान चलती  है   अभी तक गाँव में
 

मंतरी जी   पांचवां   भी  साल पूरा हो चला
पर सड़क, बिजली न पानी  है अभी तक गाँव में 

फाइलों के आंकड़ों पर गौर मत कीजे  जनाब
फाइलों में तो तरक्की है अभी तक गाँव में

कौन सूरज बनके निगलेगा ग़मों की तीरगी
ये पहेली उलझी उलझी  है अभी तक गाँव में 

छत  पे भी जाती नहीं है   बेदुपट्टा बेटियाँ
शर्म का आँखों में पानी   है अभी तक गाँव में
 

इस ज़माने को गुज़िश्ता दौर से जोड़े हुए,
इक पुराना पेड़ बाक़ी है अभी तक गाँव में

फ़स्ल बोने काटने में गाँव बूढ़ा हो गया,
भूख पर लेकिन जवानी है अभी तक गाँव में.

तुझको ए दिल्ली! मिले फुर्सत तो आ कर  देखना
कितनी मुश्किल  जिंदगानी   है अभी तक गाँव में

किसके इक दीदार की हैं मुन्तजिर तन्हाईयाँ
पारो किसकी राह तकती  है अभी तक गाँव में

आज भी आ जाती हैं यादें तेरी दिल में मेरे,
शाम की चौपाल लगती है अभी तक गाँव में.

छत पे भी जाती नहीं हैं बेदुपट्टा बेटियां, क्‍या कह दिया है मुस्‍तफा । गांव को जीकर लिखा गया है ये शेर । और फिर कहता हूं कि जिसने गांव को स्‍वयं नहीं जिया हो वो फस्‍ल बोने काटने में जैसा मिसरा कह ही नहीं सकता । मतले में भी दोनों बार रदीफ को बेहतरीन तरीके से निभाया है । और गिरह में जिस प्रकार से पिछले दौर को वर्तमान से जोड़ा है आनंद आ गया है । कौन सूरज बने के निगलेगा गमों की तीरगी, गांव की पूरी व्‍यथा को एक ही शेर में पिरो दिया है । वाह वाह वाह । खूब कहा है मुस्‍तफा ।

तो आनंद लीजिये दोनों महत्‍वपूर्ण शायरों का और देते रहिये दाद । अगले अंक में मिलते हैं कुछ और रचनाकारों के साथ ।

शनिवार, 28 जनवरी 2012

या कुन्देन्दु- तुषारहार- धवला या शुभ्र- वस्त्रावृता, आज मां सरस्‍वती का प्राकट्य दिवस है सो आज मां की सबसे छोटी आराधिका अनन्‍या 'हिमांशी' कर रही है मां का शब्‍द पूजन ।

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ऊं एं सरस्‍वत्‍यै नम:
या कुन्देन्दु- तुषारहार- धवला या शुभ्र- वस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमन्डितकरा या श्वेतपद्मासना |
या ब्रह्माच्युत- शंकर- प्रभृतिभिर्देवैः सदा पूजिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा |
शुद्धां ब्रह्मविचारसारपरमा- माद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् |
हस्ते स्पाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् |

हम सब जो जहां कहीं भी हैं वे सब मां सरस्‍वती के साधक हैं आराधक हैं । हम सब पर मां सरस्‍वती की विशेष कृपा हुई है जो हम विशिष्‍ट हुए हैं । हमारे पास शबद की शक्ति है । ये शक्ति केवल और केवल कृपा से ही मिलती है । धन, बल ये सब कमाये जा सकते हैं लेकिन शब्‍द की शक्ति, केवल अनुकंपा से ही मिलती है । मां शारदा की अनुकंपा से । और जिस पर उसकी कृपा हो जाती है उसे फिर और क्‍या चाहिये । आज वसंत पंचमी है । मां सरस्‍वती का प्राकट्य दिवस । आज शब्‍द साधक मां सरस्‍वती का पूजन अर्चन करते हैं । पूजन शब्‍दों से अर्चन विचारों से । आज हम सब शब्‍द साधकों का सबसे बड़ा त्‍यौहार होता है । आज हमारे लिये सबसे बड़े उत्‍सव का दिवस है । आइये आज हम सब मां सरस्‍वती से प्रार्थना करें कि उसने जो शब्‍दों की शक्ति हमारे हाथों में दी है वो हम सब के पास यूं ही बनी रहे । विश्‍व में जो बाज़ार और विचार का युद्ध चल रहा है उसमें अंतत: विचार की विजय हो, शब्‍द की विजय हो । आइये आज हम इस ग़ज़ल गांव की सबसे कम उम्र की शब्‍द साधिका को अवसर देते हैं मां सरस्‍वती के पूजन का । आप सब मां से प्रार्थना करें कि उसका आशीष इस नन्‍हीं साधिका अनन्‍या को मिले ।

सुकवि रमेश हठीला स्‍मृति तरही मुशायरा

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इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गाँव में।
कुछ पुराने पेड़ बाकी हैं अभी तक गाँव में।

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अनन्‍या 'हिमांशी'

अनन्‍या सचमुच चौंका रही है । इसलिये कि इसकी ग़ज़लों में भाव बहुत मुखर होकर उभरते हैं । वो केवल लिखने के लिये नहीं लिख रही है । वो इसलिये लिख रही है कि शब्‍द उसे बेचैन कर रहे हैं । जब शब्‍दों की बेचैनी से रचना पैदा होती है तो वो अपना समग्र प्रभाव छोड़ती है । अनन्‍या की ग़ज़लें आने समय की सुखद आहटें हैं । आहटें इस बात की, कि आने वाला समय भी शब्‍द की ही सत्‍ता का होगा । निराश होने की कोई आवश्‍यकता नहीं है । क्‍योंकि हिमांशी जैसी मां शारदा की साधिकाएं नई पीढ़ी से सामने आ रही हैं । आइये सुनते हैं अनन्‍या से उसकी ये सुंदर ग़ज़ल ।

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( इस ग़ज़ल को इस छुटकी ने खुद ही तकतीई किया है आप भी जांचे इसके काम को )

पनघटों पर भीड़ लगती है अभी तक गाँव मे,
हाथ में गोरी के मटकी  है अभी तक गाँव में।

ईंट से इक घर बनाती, ब्याह गुड़िया का करे,
चुलबुली बच्ची फुदकती है अभी तक गाँव में।

भाग आये सब नगर पर गाँव कब वीरान है,
इक पुराना पेड़ बाकी  है अभी तक गाँव में।

टोटियों में बूँद पानी की इधर दिखती नहीं,
पर नहर इठला के बहती है अभी तक गाँव में।

बटलियों के भात की खुशबू वही है आज भी,
चूल्हे की रोटी महकती है अभी तक गाँव में।

मंद सी आवाज़ में नानी कहानी बाँचती,
और मंगल गीत गाती है, अभी तक गाँव में।

हैं कृषक फाँसी लगाते कर्ज के बोझे तले,
हलकू, होरी की कहानी है अभी तक गाँव में

'बटली' उफ क्‍या याद आई । इस बार का तरही मुशायरे अपने देशज शब्‍दों के प्रयोग के कारण अनूठा होता जा रहा है । इस बार भी छुटकी ने ये जो बटली शब्‍द का प्रयोग किया है ये अनोखा है । जिसने बटली का भात खाया है उसके लिये तो ये आनंद का शेर है । और रोंगटे खडे कर देने वाला शेर है वो जिसमें नानी मंद मंद आवाज में अब तक मंगल गीत गा रही है । एकाकीपन को केवल मंद सी आवाज के प्रयोग से छुटकी ने जबरदस्‍त आकार दिया है । नई पीढ़ी यदि हलकू और होरी के नाम जानती है तो हमें निश्चिंत होना चाहिये कि अंधेरा उतना घना नहीं है जितना हम सोच रहे हैं । मतला खूब कहा है और गिरह भी अलग तरीके से बांधी है । और हां ये ईंट का घर तो बचपन में मैंने भी बनाया है और उसमें खूब साज सजावट की है, याद आ गई उस घरौंदे की, पलकें नम हो गईं । खूब कहा है छुटकी खूब कहा है । वाह वाह वाह ।

और अंत में एक विशेष घोषणा । आज वसंत पंचमी के शुभ दिवस पर स्‍व. रमेश हठीला जी की स्‍मृति में 'सुकवि रमेश हठीला स्‍मृति सम्‍मान ' शिवना प्रकाशन द्वारा स्‍थापित किया जा रहा है । यह सम्‍मान हर वर्ष इसी ब्‍लाग पर  पिछले वर्ष भर में आयोजित विभिन्‍न तरही मुशायरों में प्रकाशित ग़ज़लों तथा शायर की रचनाधर्मिता के आधार पर दिया जायेगा । हर वर्ष सम्‍मानित किये जाने वाले रचनाकार के नाम की  घोषणा वसंत पंचमी पर की जायेगी । और फिर वर्ष भर में सुविधा के अनुसार ये सम्‍मान प्रदान किया जायेगा । ‍

तो आज आनंद लीजिये हिमांशी की शानदार ग़ज़ल का और दाद देते रहिये । मां सरस्‍वती की पूजा में आज कम से एक शेर ज़रूर कहें । कुछ न कुछ ज़रूर लिखिये आज । कोई कविता, कहानी, ग़ज़ल, लेख कुछ भी । आज के दिन कुछ लिखना अपने तरीके से मां सरस्‍वती की पूजन है  । सो अपने हिस्‍से की पूजन अवश्‍य करें ।  

बुधवार, 25 जनवरी 2012

दिगम्‍बर नासवा और निर्मला कपिला जी कह रहे हैं -क्या किया इतने दिनों तक दूर रह के गाँव से, घूमती ये रूह रहती है अभी तक गाँव मे

सुकव‍ि रमेश हठीला स्‍मृति तरही मुशायरा

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इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गाँव में
कुछ पुराने पेड़ बाकी हैं अभी तक गाँव में

कड़ाके की ठंड और  उस पर रह रह कर बारिश हो जाना । मौसम जितना खराब हो सकता है उतना हो रहा है । ऐसे समय में जब भी हठीला जी को फोन लगाता था तो एक ही उत्‍तर मिलता था 'दबे पड़ें हैं भैया अपन तो रजाई में, अभी नहीं निकलने वाले अपन' । मगर जैसे ही कहो कि बसंत पंचमी के कार्यक्रम की तैयारी करनी है, तो दस मिनिट में ही तैयार होकर आ जाते । शायद यही समर्पण था जो उनको समय के साथ क़दम मिला कर चलने की ताक़त देता रहा । वे गुनगुनाते रहे 'मैं हूं बंजारा बादल भटकता हुआ, प्‍यासी धरती दिखी तो बरस जाऊंगा' । तो आइये उसी बंजारे बादल की स्‍मृति में आज सुनते हैं दिगम्‍बर नासवा और निर्मला कपिला जी को ।

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दिगम्‍बर नासवा

इनकी ग़ज़लों में आजकल बहुत सुंदर प्रतीक आ रहे हैं । सबसे अच्‍छी बात ये है कि जितनी सुंदर छंदमुक्‍त कविताएं होती हैं उतनी ही खूबसूरत ग़ज़लें भी इन दिनों आ रही हैं । कभी कभी तो ये भी तय करना मुश्किल होता है कि ग़ज़लें ज्‍यादा सुंदर हैं या कविताएं । खैर आइये सुनते हैं ये ग़ज़ल ।

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इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गाँव में
हाँ वही मेरी निशानी है अभी तक गाँव में

खंडहरों में हो गई तब्दील लेकिन क्या हुवा
इक हवेली तो हमारी है अभी तक गाँव में

रोज आटा गूंथ के सब्जी चढ़ा देती है वो
और तेरी राह तकती है अभी तक गाँव में

चाय तुलसी की, पराठे, मूफली गरमा गरम
धूप सर्दी की बुलाती है अभी तक गाँव में

याद है घुँघरू का बजना रात के चोथे पहर
भूत की क्या वो कहानी है अभी तक गाँव में

क्या किया इतने दिनों तक दूर रह के गाँव से
दास्‍तां अपनी तो ठहरी है अभी तक गाँव में

गीत ऐसे कह गए हैं कुछ हठीला जी यहाँ
रुत सुहानी गुनगुनाती है अभी तक गाँव में

पिछले अंक में राणा ने इखत्‍तर का जोरदार प्रयोग किया था तो आज यहां 'मूफली' का उतना ही सुंदर प्रयोग है । हठीला जी होते तो मूफली पर आनंद लेते । याद है घुंघरू का बजना रात के चौथे पहर ये शेर एकदम से हाथ पकड़ कर स्‍मृतियों के गलियारों में खींच कर ले जा रहा है । और खंडहरों में तब्‍दील हवेली ने तो मानो उस याद को ताजा कर दिया जिसके चलते गांव में इस मिसरे ने जन्‍म लिया था । और हठीला जी को समर्पित शेर तो खूब बन पड़ा है ।  वाह वाह वाह ।

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निर्मला कपिला जी
एक शब्‍द है 'जिजीविषा' मुझे लगता है कि निर्मला दी उस शब्‍द की पर्यायवाची हैं । मुश्किलों से जूझती हैं और हौसले के साथ फिर मैदान में आ जाती हैं । पिछले दिनों काफी बीमारी व्‍याधाओं से लड़ती रहीं, लेकिन खेल भावना के साथ तरही ग़ज़ल लेकर मैदान में आ गईं । शायद निर्मला दी जैसे लोगों के लिये ही कहा जाता है कि 'खेल जीता या हारा उससे कुछ फर्क नहीं पड़ता, फर्क इस बात से पड़ता है कि खेल को खेला कैसे गया । आइये सुनते हैं ये सुंदर ग़ज़ल ।

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इक पुराना पेड बाकी है अभी तक गाँव में
जिस पे चिडिया गीत गाती है अभी तक गाँव में

जब से अपना गाँव  छोड़ा सो न पाई चैन से
गोद दादी की बुलाती है अभी तक गाँव में

बदरिया बरसी, धरा झूमी, पवन महकी चले
सूँघ लो सोंधी सी माटी है अभी तक गाँव में

साथ जिसके खेलती गुडिया, पटोले वो सखी
छुट्टियों मे मिलने आती है अभी तक गाँव में

आँख से आँसू टपक जायें किसी को याद कर
यूं  विरह कोयल सुनाती है अभी तक गाँव में

भेज बेटे को शहर मे धन कमाने के लिये
माँ अकेली रोज रोती है अभी तक गाँव में

खूब बदला हो जमाना आज शहरों मे भले
पर बहू घूँघट में रहती है अभी तक गाँव में

सादगी, ईमानदारी आपके अंदर है तो
आपकी पहचान होती है अभी तक गाँव में

चाहती हूँ आखिरी मैं साँस लूँ जाकर वहां
घूमती ये रूह रहती है अभी तक गाँव में

वाह सुंदर शेर कहे हैं । आंख से आंसू टपक जाएं किसी को याद कर,  उफ क्‍या हांटिंग शेर है, एकदम रोंगटे खड़े कर देने वाला शेर । चाहती हूं आखिरी मैं सांस लूं जाकर वहां, पीड़ा का शेर है ये । पीड़ा जो हम सबके अंदर है । किसी दार्शनिक ने कहा है कि आपके अंदर गांव का बचपन नहीं ठहरा होता, वास्‍तव में वो समय ठहरा होता है । साथ जिसके खेलती गुडि़या पटोले, ये शेर भी वैसा ही है । वाह वाह वाह ।

तो आनंद लेते रहिये दोनों रचनाकारों की सुंदर ग़ज़लों का और देते रहिये दाद । अगले अंक में मिलते हैं दो और रचनाकारों के साथ ।

सोमवार, 23 जनवरी 2012

आज देवी नागरानी जी और राणा प्रताप सिंह के साथ सुनिये - खेलता अब्दुल भी होली है अभी तक गाँव में, जड़ पुरानी सभ्यता की है अभी तक गाँव में ।

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इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गाँव में
कुछ पुराने पेड़ बाकी हैं अभी तक गाँव में

तरही मुशायरा इस बार भी कुछ लम्‍बा चलना है क्‍योंकि इस बार भी काफी ग़ज़लें मिली हैं । हां एक परेशानी जो ब्‍लागर में आ रही है वो ये कि ये बार बार नाट स्‍पैम बरने के बाद भी कुछ टिप्‍पणियों को स्‍पैम में डाल ही रहा है  । इससे उबरने का कोई उपाय बताइये । इस बार तरही में भावनाप्रधान शेर अधिक मिले हैं । जिसके चलते तरही का एक मूड सेट हो गया है । गांव से भावनाओं का जुड़ा होना एक स्‍वाभविक सी प्रकिया है । कुछ ग़ज़लों में कुछ शेर तो चौंकाने की हद तक मिले हैं । आइये आज उन्‍हीं ग़ज़लों में से दो सुंदर ग़ज़लें सुनते हैं । देवी नागरानी जी और राणा प्रताप लेकर आ रहे हैं अपनी ग़ज़लें ।

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राणा प्रताप सिंह

राणा प्रताप सिंह तरही मुशायरों का सुपरिचित नाम हैं । अलग प्रकार के शेर कहना राणा प्रताप की पहचान है । पिछले दिनों जिन शायरों में ग़ज़ल के प्रति समर्पण ने मुझे प्रभावित किया है राणा प्रताप भी उनमें से एक है । तकनीक और विचारों का संतुलन साधना राणा प्रताप को आता है । आइये सुने ये ग़ज़ल ।

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खेलता अब्दुल भी होली है अभी तक गाँव में
मर्सिया जमुना भी गाती है अभी तक गाँव में

जिसके दोनों लाल अमरीका में जाके बस गए
वो ही पगली बूढी काकी है अभी तक गाँव में

बोलता रहता है जाने क्या क्या वो वर्दी पहन
सन इखत्तर का सिपाही है अभी तक गाँव में

नाम जिन पेड़ों पे हमने था उकेरा, उनमे से
इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गाँव में

जो तरक्की का हवाला दे रहे हैं जान लें
भूख, ईमान आजमाती है अभी तक गाँव में

जो हठीले थे समय के साथ हठ करते रहे
उनके गीतों की निशानी है अभी तक गाँव में

आज फिर हठीला जी याद आ गये । याद आ गये 'इखत्‍तर' शब्‍द को सुनते ही । हम दोनों को ही रचनाओं में देशज, भदेस शब्‍दों का प्रयोग करना बहुत पसंद आता था । इखत्‍तर शब्‍द का प्रयोग हठीला जी सुनते तो लोट-पोट होकर दाद देते, जो उनकी आदत थी । मतला बहुत ही सुंदर बंधा है और वैसा ही गिरह का शेर भी है । लेकिन हां इखत्‍तर के सिपाही की तो बात ही अलग है । और सब कुछ तो सुंदर था ही लेकिन इखत्‍तर के प्रयोग ने सुंदरता को दोबाला कर दिया है । वाह वाह वाह ।

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देवी नगरानी

देवी नागरानी जी जैसे रचनाकारों का हमारी तरही में आगमन होना इस बात की आश्‍वस्ति है कि हम सही दिशा में जा रहे हैं । देवी जी हर बार समय निकाल कर तरही का फेरा करने ज़ुरूर आती हैं । और हर बार अपनी एक सुंदर ग़ज़ल के रस में हमें रसाबोर कर जाती हैं । आइये सुनते हैं  उनकी ये ख़ूबसूरत ग़ज़ल ।

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जड़ पुरानी सभ्यता की है अभी तक गाँव में
इक पुराना पेड़ बाक़ी है  अभी तक गाँव में

गुनगुनाती जीस्त बाक़ी है  अभी तक गाँव में
खिलखिलाती,  मुस्कराती  है अभी तक गाँव में

वक़्त के चहरे पे जिसका अक्स उतर के आ गया
याद उसकी झिलमिलाती है अभी तक गाँव में

याद की परछाई बनके जो शजार साया बना
पट्टी उसकी तो हरी सी है अभी तक गाँव में

आपाधापी आजकल है शहर के हर मोड पर
कुछ सुकूँ औ सादगी भी  है अभी तक गाँव में

साग रोटी, साथ में मिर्ची हरी का स्वाद वाह!
पेट भरती खुशबू उसकी है अभी तक गाँव में  

खोए मानवता ने सारे अर्थ आके शहर में
कुछ बची इंसानियत भी   है अभी तक गाँव में

साग रोटी, साथ में मिर्ची हरी का स्‍वाद और उसके बाद होने वाली वाह का आनंद ही अलग है । वक्‍त के चेहरे पर उतरे हुए अक्‍स की झिलमिलाती यादों का तो कहना ही क्‍या है । मतले में पुरानी सभ्‍यता की जड़ों को प्रतीक के रूप में लेकर बड़ी बात कह दी है । और कुछ वैसा ही सुंदर प्रयोग किया गया है खिलखिलाती मुस्‍कुराती में । वाह वाह वाह ।

तो आज के दोनों रचनाकारों की ख़ूबसूरत ग़ज़लों का आनंद लीजिये । और देते रहिये दाद । अलगे अंक में मिलते हैं कुछ और रचनाकारों से ।

शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

श्री उमाशंकर साहित और श्री निर्मल सिद्धू से सुनिये आज ग़ज़लें - यूं बदल तो सब गया है अब वहाँ फिर भी मगर, प्यार और तहज़ीब बाक़ी है अभी तक गाँव में

सुकव‍ि रमेश हठीला स्‍मृति तरही मुशायरा

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इक पुराना पेड़ बाक़ी है अभी तक गांव में
कुछ पुराने पेड़ बाकी़ हैं अभी तक गांव में

तरही में लोगों का आना जाना लाग रहता है । ठीक उसी प्रकार से जैसे जीवन में लोग आते हैं और जाते हैं ।कुछ लोग मिलते हैं कुछ बिछड़ते हैं । आज हम देखते हैं कि कई वो रचनाकार जो पिछले कई मुशायरों में सक्रियता से अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते थे वे अब नहीं आ रहे हैं । जो नहीं आ रहे हैं उनमें से कई ऐसे भी हैं जिनकी अनुपस्थिति हमें खलती है लेकिन क्‍या करें सबकी अपनी अपनी व्‍यस्‍ततताएं हैं । हां ये भी है कि हर मुशायरे में हमें कुछ नये लोग नये साथी मिल जाते हैं । यही सच्‍चाई है जिंदगी की । अपने सर्वकालिक पसंदीदा गीत की दो पंक्तियां उद्धृत करना चाहूंगा 'कुछ पाकर खोना है, कुछ खोकर पाना है, जीवन का मतलब तो आना और जाना है'' ।खैर चलिये आज दो महत्‍वपूर्ण शायरों श्री निर्मल सिद्धू और श्री उमाशंकर साहिल कानपुरी  से उनकी ख़ूबसूरत ग़ज़लें सुनते हैं ।

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निर्मल सिद्धू

निर्मल सिद्धू हमारे तरही मुशायरे के सबसे पुराने साथियों में ये हैं । हर तरही मुशायरे में अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज करवाते हैं । ऐसे समर्पित रचनाकारों के कारण ही ये तरही मुशायरा आज यहां तक पहुंचा है । आइये सुनते हैं उनकी ये ग़ज़ल ।

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ये सुना है, इक दिवानी है अभी तक गांव में
जो मुझे ही याद करती है अभी तक गांव में

हम जहाँ मिलते रहे थे शाम के साये तले
वो सुहानी शाम ढलती है अभी तक गांव में

सात सागर पार करके दूर तो हम आ गये
पर हमारी जान अटकी है अभी तक गांव में

यूं बदल तो सब गया है अब वहाँ फिर भी मगर
इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गांव में

चैन मिलता है वहाँ आराम मिलता है वहाँ
हर ख़ुशी की राह मिलती है अभी तक गांव में

ज़िन्दगी रफ़्तार से चलने लगी है हर तरफ़
फिर भी देखो आस बसती है अभी तक गांव में

बिन हठीला शायरी ग़मगीन है रहने लगी
याद उनकी सबको आती है अभी तक गांव में

वो बिचारा तो जहां की भीड़ में है खो गया
कोई निर्मल को बुलाती है अभी तक गांव में

मिसरा 'ये सुना है इक दीवानी है अभी तक गांव में' बहुत ही गहरे उतरता जाता है, समा जाता है मन के अंदर । सात सागर पार करके दूर तो हम आ गये, शेर बहुत सुंदर बन पड़ा है विशेष कर जान अटकी का प्रयोग बहुत खूब बना है । हम जहां मिलते रहे थे शाम के साये तले बहुत सुंदर रेखाचित्र है जिसे मंज़रकशी कहा जाता है । सुंदर बहुत ख़ूब ।

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डॉ उमाशंकर साहिल कानपुरी

साहिल जी का नाम भी अब हमारे मुशायरों के लिये कोई नया नाम नहीं है । वे बराबर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं । पंतनगर से संबंध रखने वाले साहिल जी की ग़ज़लें हमें मुस्‍तफा माहिर के माध्‍यम से मिलती हैं सो इन सुंदर ग़ज़लों के लिये हमें माहिर का भी आभार व्‍यक्‍त करना चाहिये । 

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इक पुराना पेड़ बाक़ी है अभी तक गाँव में
क्यूँ कि बूढा एक माली है अभी तक गाँव में

झुक पड़े सर आप ही का जब अदब से वो मिलें
प्यार और तहज़ीब बाक़ी है अभी तक गाँव में

शहर में  हैं चाहतें, बस एक शब की रंगतें 
प्रेम की पहचान साँची है अभी तक गाँव में

कल्पना है या हकीक़त गाँव में बिजली- सड़क
सोचती जनता बिचारी है अभी तक गाँव में

देश के मंदिर को खतरा है नहीं तैमूर से,
अन्ना जैसा गर पुजारी है अभी तक गाँव में

रहनुमाओं गाँव आकर पूछिए साहिल का हाल
ज़िन्दगी जिसने  गुजारी है अभी तक गाँव में .

शहर में हैं चाहतें बस एक शब की रंगतें, प्रेम की पहचान को नये सिरे से परिभाषित करता है ये शेर । कल्‍पना है या हक़ीक़त गांव में बिजली में गांव की वस्‍तुस्थिति का खूब चित्रण किया है । झुक पड़े सर आप ही का जब अदब से वो मिलें में गांव की आत्‍मा को स्‍पर्श किया है जहां प्रेम और तहज़ीब अब तक मिलती है । बहुत सुंदर बहुत सुंदर ।

तो आनंद लीजिये इस दोनों सुंदर ग़ज़लों का और दाद देते रहिये । ब्‍लागर की मेहरबानी के चलते कई सारी टिप्‍पणियां स्‍पैम में जा रही हैं और वहां जाकर बार बार नाट स्‍पैम करना पड़ता है । कल रात सुकवि जनार्दन शर्मा सम्‍मान डॉ आज़म को और सुकवि रमेश हठीला सम्‍मान शशिकांत यादव को प्रदान किया गया । कार्यक्रम बहुत अच्‍छा हुआ । विस्‍तृत रपट जल्‍द ही ।

बुधवार, 18 जनवरी 2012

वो मेरे बचपन का साथी है अभी तक गाँव में, प्यार से लबरेज माजी है अभी भी गाँव में, सुकवि रमेश हठीला स्‍मृति तरही मुशायरे में आज सुनते हैं संदीप साहित और सौरभ शेखर को ।

आदरणीय राकेश खंडेलवाल जी के एक बहुत ही सुंदर गीत के साथ बहुत ही शानदार आरंभ हुआ है तरही का । सही कहा कंचन ने कि कार्य को आरंभ करने के पूर्व जिस प्रकार दही खाते हैं उसी प्रकार से राकेश जी का गीत है । यूं ही तो नहीं कहा है हमारे बुजुर्गों ने कि हर अच्‍छा काम प्रारंभ करने से पहले गुणीजनों का आशीष लेना चाहिये । तो बहुत अच्‍छी शुरूआत के बाद आइये आज कुछ और आगे चलते हैं और सुनते हैं दो शायरों से उनकी ग़ज़लें ।

सुकव‍ि रमेश हठीला स्‍मृति तरही मुशायरा

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इक पुराना पेड़ बाक़ी है अभी तक गांव में

कुछ पुराने पेड़ बाक़ी हैं अभी तक गांव में

 

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संदीप 'साहिल'

पिछले साल के तरही में भी  संदीप ने हिस्सा लिया था और इनकी ग़ज़ल को खूब पसंद किया गया था । इनका बचपन चंडीगढ़ में गुज़रा और पूरी पढाई भी वहीं हुई.
आजकल यूएसए में कार्यरत, पेशे से रसायन शास्‍त्र के शोधार्थी  । उभरता साहिल के नाम से अपना ब्‍लाग चलाते हैं ।

ग़ज़ल

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वो मेरे बचपन का साथी है अभी तक गाँव में
"इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गाँव में"

आम कच्चे, जिसके आँगन से चुराते थे कभी
सुनते हैं, वो बूढ़ी नानी है अभी तक गाँव में

एक दिन मैं लौट आऊंगा यक़ीं है ये उसे
रास्ता मेरा वो तकती है अभी तक गाँव में

कागज़ों में हो रही है बस तरक्की गांव की,
आबो-दाना है, न बिजली है, अभी तक गांव में

याद में 'साहिल' तुम्हारी, बावली है वो नदी
पत्थरों पर सर पटकती है अभी तक गाँव में

हूं कम शेर लेकिन प्रभावशाली शेर । हर प्रकार के शेर को गूंथने का प्रयास किया है । गांव के नास्‍टेल्जिया से हट कर काग़ज़ों में हो रही है बस तरक्‍की गांव की जैसा शेर कहना आज के लिये सचमुच बहुत ज़ुरूरी है । सुनते हैं वो बूढ़ी नानी है अभी तक गांव में, ये शेर तो भीगा हुआ शेर है । बहुत सुंदर ग़ज़ल है । 

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सौरभ शेखर

सौरभ शेखर हम सबके लिये जाना पहचाना नाम हैं । सौरभ दिल्‍ली में निवास करते हैं और अपना एक ब्‍लाग मुझे भी कुछ कहना है के नाम से चलाते हैं । उनका कहना है कि लिखता इसलिये हूं कि सीखता रहूं ।

ग़ज़ल

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यारबाशी की निशानी है अभी तक गाँव में
इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गाँव में

पाँव को सीवान पर रखते मेरे जेरे बदन
एक सिहरन दौड़ जाती है अभी तक गाँव में 

तह किये रक्खे हैं जिसमे बालपन के रात-दिन
याद की वो आलमारी है अभी तक गाँव में

वक़्त की मौजें हमें परदेस तो ले आ गईं
पर हमारी खेत-बाड़ी है अभी तक गाँव में

बेमेहर हालात हैं यूँ मौसमों के वास्ते
मौसमों की मेहरबानी है अभी तक गाँव में

घर के पिछवाड़े के उस सूखे कुँए पर दो दिए
रोज काकी बार आती है अभी तक गाँव में

हर तरफ इक हड़बड़ी सी,बेतरह बेचैनियाँ
कुफ्र लेकिन जल्दबाजी है अभी तक गाँव में

नफरतों से तर हमारा आज है तो क्या हुआ
प्यार से लबरेज माज़ी है अभी तक गाँव में .

( श्री रमेश हठीला जी के लिये )

खुशबुएँ जिनकी रहेंगी वो रहें या ना रहें
लोग ऐसे जाफरानी हैं अभी तक गाँव में

अच्‍छी ग़ज़ल । तह किये रक्‍खे हैं जिसमें, एक बहुत ही सुंदर मिसरा । नफरतों से तर हमारा आज है तो क्‍या हुआ, बहुत ही अच्‍छे तरीके से बात को कहा है । हम सबका एक बहुत ही सुंदर अतीत होता है और जो अक्‍सर गांव से ही जुड़ा होता है । घर के पिछवाड़े के सूखे कुंए पर दो दीपक जलाने का शेर मानो पूरा शब्‍द चित्र आंखों के सामने बना रहा है । और हठीला जी को समर्पित शेर भी बहुत सुंदर बना है ।

तो आनंद लीजिये इन दोनों युवा रचनाकारों की सुंदर ग़ज़लों का और मन से दाद दीजिये दोनों को । अगले अंक में मिलते हैं कुछ और रचनाओं के साथ ।

सोमवार, 16 जनवरी 2012

वृक्ष जिनकी छांह थी ममता भरे आँचल सरीखी वृक्ष जिनके बाजुओं से बचपनों ने बात सीखी, गीतकार को श्रद्धांजलि देने के लिये श्री राकेश खंडेलवाल जी के गीत से बेहतर और क्‍या होगा ।

स्‍व. रमेश हठीला स्‍मृति तरही मुशायरा

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कुछ पुराने पेड़ बाकी हैं अभी तक गांव में

इक पुराना पेड़ बाक़ी है अभी तक गांव में

बहुत पीड़ादायी होता है उस व्‍यक्ति की स्‍मृति में आयोजन करना जो कल तक आपके साथ था जो कल तक आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा था । अचानक ही उसे स्‍वर्गीय कह दिया जाये तो मन मानता ही नहीं है  । श्री हठीला जी को तो अभी तक सीहोर शहर स्‍वर्गीय  मान ही नहीं रहा है । कारण ये कि मृत्‍यु से तीन माह पहले हैदराबाद चले गये और फिर किसी भी रूप में सीहोर लौटे ही नहीं । न शरीर और पार्थिव शरीर । शहर मानो अभी भी उनकी प्रतीक्षा कर रहा है कि वे अभी हैदराबाद से लौट कर आएंगे और अपने पेटेंट वाक्‍य ' जै रामजी की साब' के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करवा देंगें । मगर समय जानता है कि अब कोई नहीं है । हठीला जी भी अब समय के पृष्‍ठों पर दर्ज हो गये हैं । अब केवल स्‍मृति शेष है ।

खैर बातें तो बातें हैं उनका क्‍या । तो चलिये शुरू करते हैं आज से ये तरही मुशायरा । जब एक गीतकार की स्‍मृति में आयोजन हो तो शुरूआत के लिये गीतकार से अच्‍छा नाम क्‍या हो सकता है । और गीतकार की बात चले तो श्री राकेश खंडेलवाल जी से अच्‍छा नाम क्‍या हो सकता है । पिछले साल जब राकेश जी सीहोर आये थे तो हठीला जी हैदराबाद में थे और उस दिन वापस सीहोर आने के लिये छटपटा रहे थे । मगर नहीं आ पाये । तो आज श्री राकेश खंडेलवाल जी द्वारा रचे गये इस सुंदर गीत के साथ ही हम शुभारंभ करते हैं हठीला जी की स्‍मृति में आयोजित मुशायरे का । एक ज़रूरी घोषणा है जो जल्‍द ही कर दी जायेगी ।

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कुछ पुराने पेड़ बाकी हों अभी उस गांव में

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श्री राकेश खंडेलवाल जी

हो गया जब एक दिन सहसा मेरा यह मन अकेला
कोई बीता पल लगा देने मुझे उस  पार हेला
दूर छूटे चिह्न पग के फूल बन खिलने लगे तो
सो गये थे वर्ष बीते एक पल को फिर जगे तो
मन हुआ आतुर बुलाऊँ पास मैं फ़िर वो दुपहरी
जो कटी मन्दिर उगे कुछ पीपलों की छांव में
आ चुका है वक्त चाहे दूर फिर भी आस बोले
कुछ पुराने पेड़ बाक़ी हों अभी उस गांव में

वह जहाँ कंचे ढुलक हँसते गली के मोड़ पर थे
वह जहाँ उड़ती पतंगें थीं हवा में होड़ कर के
गिल्लियाँ उछ्ला करीं हर दिन जहाँ पर सांझ ढलते
और उजड़े मन्दिरों में भी जहाँ थे दीप जलते
वह जहाँ मुन्डेर पर उगती रही थी पन्चमी आ
पाहुने बन कर उतरते पंछियों  की कांव में
चाहता मन तय करे फ़िर सिन्धु की गहराईयों को
कुछ पुराने पेड़ बाकी हों अभी उस गांव में

पेड़ वे जिनके तले चौपाल लग जाती निरन्तर
और फिर दरवेश के किस्से निखरते थे संवर कर
चंग पर आल्हा बजाता एक रसिया मग्न होकर
दूसरा था सुर मिलाता राग में आवाज़ बो कर
और वे पगडंडियां कच्ची जिन्हें पग चूमते थे
दौड़ते नजरें बचा कर हार पी कर दाँव में
शेष है संभावना कुछ तो रहा हो बिना बदले
कुछ पुराने पेड़ बाक़ी हों अभी उस गांव में

वृक्ष जिनकी छांह  थी ममता भरे आँचल सरीखी
वृक्ष जिनके बाजुओं से बचपनों ने बात सीखी
वे कि बदले वक्त की परछाई से बदले नहीं थे
और जिनको कर रखें सीमित,कहीं गमले नहीं थे
वे कि जिनकी थपकियाँ उमड़ी हुई हर पीर हरती
ज़िंदगी सान्निध्य में जिनके सदा ही थी संवरती
है समाहित गंध जिनकी धड़कनों, हर सांस में
हाँ  पुराने पेड़ शाश्वत ही रहेंगे गाँव में
वे पुराने पेड़ हर युग में रहेंगे गांव में

स्‍मृति पटल पर अंकित रेखाचित्रों को गीत में ढाल देना और वो भी इतने सुंदर गीत में ढाल देना ये राकेश जी जैसा समर्थ गीतकार ही कर सकता है । चंग पर आल्हा बजाता एक रसिया मग्न होकर दूसरा था सुर मिलाता राग में आवाज़ बो कर, ऐसा लगता है कि यादों के सुनहरे पन्‍ने हौले हौले से खुल रहे हैं और उनमें से झांक रहा है वो जो अतीत है । सुंदर गीत । खूब शुरूआत हुई है मुशायरे की ।

तो आनंद लीजिये गीत का । और देते रहिये दाद ।

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

इक पुराना पेड़ बाकी था अभी तक गांव में, स्‍व. रमेश हठीला की स्‍मृति में ये तरही मुशायरा आज उनकी पुण्‍यतिथि पर उनको श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए ।

कवि अटल बिहारी वाजपेयी की कविता की पंक्तियां हैं ।

एक बरस बीत गया, एक बरस बीत गया, झुलसाता जेठ मास, शरद चांदनी उदास, सिसकी भरते सावन का अंर्तघट रीत गया, एक बरस बीत गया, एक बरस बीत गया ।

और सचमुच ही एक बरस बीत गया । हठीला जी को गये हुए एक बरस बीत गया । एक ऐसी शख्‍़सीयत जो जब तक जिंदा रहे तो पुरी तरह से जिंदा रहे । कहीं कोई मृत्‍यु का भय नहीं रहा । और जब मौत ने दबोचना शुरू किया तो छोड़ कर चले गये शहर को । दूर दकन में हैदराबाद, वहीं अपनी बीमारी का पूरा समय काटा और वहीं देह त्‍याग दी । इस प्रकार की खुद्दारी की यारों के कंधे पर चढ़ कर शहरे ख़मोशां तक जाने का एहसान भी नहीं लिया । जीवन भर जिस शहर को नहीं छोड़ा, उसको छोड़ा तो ऐसे छोड़ा कि फिर मुट्ठी भर राख बन कर ही लौटे उस शहर में । शायद वे भी नहीं चाहते थे कि उनका शहर उनके फक्‍कड़ और अलमस्‍त रूप की जगह बीमार और अशक्‍त रूप को याद रखे । और सच भी यही है कि अब शहर को उनका वही रूप याद है । दूर दकन के शहर हैदराबाद में जाकर देह त्‍याग की और वहीं उस नश्‍वर देह का संस्‍कार हो गया । जोश मलीहाबादी की पंक्तियां शायद उनके लिये ही बनीं थीं ।

हश्र तक रहने न देना तुम दकन की खाक में
दफ़्न करना अपने शाइर को वतन की खाक में
 

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सुकवि स्‍व. रमेश हठीला स्‍मृति तरही मुशायरा

इक पुराना पेड़ बाक़ी है अभी तक गांव में

कुछ पुराने पेड़ बाक़ी हैं अभी तक गांव में

हठीला जी के बारे में बहुत कुछ है यूं तो लिखने को लेकिन बस वही है कि कहां से शुरू किया जाये । उनके कई नाम थे । नाम जो लोग उनको देते थे मगर ठलुआ कवि सीहोर की जनता द्वारा दिया गया उनका सबसे लोकप्रिय नाम था । ये नाम उनके अति लोकप्रिय कुंडली स्‍तंभ 'ठलुआई' के चलते उनको मिला था । स्‍तंभ की लोकप्रियता का अंदाज़ा इससे ही लगाया जा सकता है कि जिस पेपर में उनका स्‍तंभ छपता था उस पेपर को पढ़ने की शुरूआत ही पाठक उस स्‍तंभ के साथ करते थे । सीहोर के कलेक्‍टर, एसपी, विधायक हर कोई को प्रतीक्षा रहती थी की आज की ठलुआई किस पर आने वाली है । ठलुआई भी इतनी मसालेदार कि जिस पर लिख दी जाती थी वो पूरे दिन शहर में कूदता फिरता था और ठलुआ कवि को गालियां बकता फिरता था । मगर फिर भी बात वही होती थी कि उनकी प्रतिबद्धता समाज के प्रति थी सो वे समाज को ही याद रखते थे । ठलुआई लिखने का उनका तरीका ये था कि वे एक दिन पहले का समाचार पत्र उठा कर उसे देखते थे कि आज का कौन सा समाचार प्रमुख था और बस उसे ही काव्‍य कुंडली में ढाल देते थे । दस साल तक रोज़ बिना नागा वे कुंडली लिखते रहे । यहां तक कि बीच में अस्‍पताल में भर्ती रहे, हार्ट सर्जरी हुई तो वहां से भी वे मोबाइल के माध्‍यम से कुंडली भेजते रहे ।

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कविता उनके अंदर थी,  श्री बालकवि बैरागी के अनन्‍य भक्‍त थे वे । बैरागी दादा का लिखा हुआ तू चंदा मैं चांदनी वे बार बार सुनते और आनंद लेते । मूलत- राजस्‍थान के थे और उनके अंदर राजस्‍थान हमेशा धड़कता था । पेशे से दाल बाफले बनाने का काम । और वो भी ख़ालिस राजस्‍थानी टच के दाल बाफले । इतनी प्रसिद्धि कि दिल्‍ली मुम्‍बई तक भी दाल बाफले बनाने जाते थे । दाल बाफले बनाने के साथ कविता कब उनके अंदर आ गई उनको भी नहीं पता चला । होली और बसंत पंचमी जैसे त्‍यौहारों को लेकर विशेष रूप से उत्‍साहित रहते थे । होली पर समाचार पत्र का विशेषांक निकालना, टेपा समारोह का आयोजन करना जैसे उनके प्रिय शगल थे । उनके लिये वे विशेष रूप से उत्‍साहित रहते थे । आप लोगों ने भी देखा होगा कि पिछले एक साल से मेरे सारे कार्यक्रम मानो ठप्‍प से पड़े हैं । उसके पीछे भी वही कारण है कि कार्यक्रम तो वही करवाते थे ।

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तो आज उनकी प्रथम पुण्‍यतिथि पर उनको मेरा नमन और पूरे ब्‍लाग जगत की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि । आज उनको श्रद्धांजलि देकर हम इस मुशायरे को विधिवत रूप से शुरू कर रहे हैं । अगले अंक से ग़ज़लें आनी शुरू हो जाएंगीं । और हां इस मुशायरे की एक और खास बात है जो कार्यक्रम के बीच में कहीं घोषित की जाएगी । हालांकि घोषित तो अभी की जानी थी लेकिन अब वो बाद में घोषित होगी । हां एक कार्यक्रम जो सीहोर में पहले से होता आ रहा है 19 जनवरी को सीहोर में 33 सालों से एक कार्यक्रम होता आ रहा है उसीमें श्री हठीला जी को भी श्रद्धांजलि दी जायेगी और उसमें ही प्रथम सुकव‍ि रमेश हठीला सम्‍मान प्रदान किया जायेगा । सम्‍मान हेतु डॉ पुष्‍पा दुबे की अध्‍यक्षता में एक समिति बना दी गई है ।

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पुण्य स्मरण संध्या का आयोजन इस वर्ष भी 19 जनवरी को रात्रि साढ़े आठ बजे ब्ल्यू बर्ड स्कूल के सभागार में आयोजित किया जा रहा है ।  इस वर्ष कार्यक्रम का स्वरूप और अधिक विस्तृत करते हुए इसमें सुकवि रमेश हठीला के पुण्य स्मरण का भी समावेश किया जा रहा है । साथ ही कार्यक्रम में गीतकार स्व. मोहन राय तथा  वरिष्ठ शायर स्व. कैलाश गुरूस्वामी को भी काव्यांजलि प्रदान की जाएगी । इस वर्ष की यह पुण्य स्मरण संध्या सीहोर के इन चारों साहित्यकारों को समर्पित रहेगी ।  विगत 33 वर्षों से लगातार आयोजित कि ये जा रहे इस काव्यांजलि समारोह में इस वर्ष दो सम्मान प्रदान किये जाएंगे, तैंतीसवा पंडित जनार्दन सम्मान पूर्व की तरह प्रदान किया जायेगा साथ में प्रथम सुकवि रमेश हठीला सम्मान, स्व. रमेश हठीला की स्मृति में प्रदान किया जायेगा । सम्मानों हेतु नाम चयन करने के लिये एक समिति का गठन प्रोफेसर डॉ. पुष्पा दुबे की अध्यक्षता में किया गया है, चयन समिति शीघ्र ही दोनों सम्मानों के लिये नाम की घोषणा करेगी । 

और अंत में ये गीत श्री हठीला जी के लिये