शनिवार, 19 मार्च 2011

होली है भाई होली है तरही वाली होली है , कुल नौ शायर आये हैं अबके अपनी तरही में । आओ इनके संग चलें हम ग़जलों की महफिल में । होली है भई होली है ग़ज़लों वाली होली है ।

होली के मुशायरे को लेकर जितनी बहस इस बार हुई है उतनी तो सिर्फ कला फिल्‍मों के समीक्षक ही करते हैं, और जिस प्रकार से कला फिल्‍मों के साथ होता है कि लोग उसको देखते हुए डर जाते हैं कि पता नहीं समझ में नहीं पड़े तो क्‍या होगा ठीक उसी प्रकार से इस बार तरही में लोग ग़ज़ल लिखते हुए डर गये कि ये जो लोग बहस कर रहे हैं न जाने क्‍या बात है । तो खैर होली का त्‍यौंहार सर पर आ ही गया । इस बार की तरही को लेकर होली पर एक पत्रिका निकालने का मन था जो पीडीएफ के रूप में बांटी जाती लेकिन तरही को लेकर ग़ज़लें इतनी कम आईं कि पीडीएफ का विचार ड्राप हो गया । खैर ये तजुरबे खाते में लिख लिया गया है कि होली के समय ना तो कठिन बहर ही देना है ना ही कठिन मिसरा । क्‍योंकि होली के समय आदमी का दिमाग कुछ भन्‍नाया रहता है । चलिये अब होली के मुशायरे की ओर चलते हैं ।

इस बार कुल 9 ग़ज़लें मिली थीं जो सारी ही आज के अंक में लगी हैं ।

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वे सभी जो इस बार तरही में नहीं आये तथा बाहर खड़े होकर तरही देख रहे हैं सुन रहे हैं ( ये आपको हर शायर के आस पास नज़र आएंगें, कृपया फोटो पहचान कर बताएं कि किस किस शायर के साथ कौन कौन सा श्रोता है । )

होली का तरही मुशायरा

भटकती नज़र, अटकती नज़र, खटकती नज़र, सटकती नज़र

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गौतम राजरिशी

बचचे का नाम गौतम राजरिशी है फौज में है और ग़लतफहमी ये है कि विश्‍व की हर कोमलांगी इस समय जिस एक मात्र शख्‍सियत पे मर रही है वो शख्‍सियत इनकी ही है । ग़लतफहमी पालने पर यदि सरकार टैक्‍स लगाने लगे तो अगले को भर भर के परेशानी होने लगे । पिछले दिनों एक पत्रिका में अत्‍यंत फूहड़ सी कहानी छपने के बाद अपने को कहानीकार समझ लेने कि अतिरिक्‍त ग़लतफहमी और पाल चुके हैं । भली करे करतार ।

है जादू अजब, या टोना ग़ज़ब, गुमाए है सुध तिलस्मी नज़र

मिला हो धतूरा, भंग में जैसे, ऐसी है वो नशीली नज़र

भुलाए इसे, हटाए उसे, फंसाए किसे, सटाए जिसे

भटकती नज़र, अटकती नज़र, खटकती नज़र, सटकती नज़र

उफनती हुई लहर है कोई, धधकती हुई या है कोई आग

भिगोये कभी, जलाए कभी, मुझे ये तेरी शराबी नज़र

कभी ये लगे है सुब्ह की चाय और कभी ये जूस लगे

थके हुये रतजगों में कभी, ये आती है बन के कॉफी नज़र

गुलाल उड़े, अबीर उड़े, उड़े है जो रंग चार दिशा

तो डोरे ये लाल-लाल लिए लुभाती है हमको तेरी नज़र

वाह वाह वाह क्‍या नये प्रयोग किये है अपनी ग़ज़ल को बदतर से बदतरीन बनाने में । उफ कितनी घटिया है ये समग्र गजल जैसे कि हम रितिक रोशन की फिलम काईट्स का सिक्‍वल देख रहे हों । सच में हमारी भारतीय फौज इस समय सही हाथों में है ।

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नवीन सी चतुर्वेदी

मुम्‍बई में निवास करते हुए मुम्‍बई को बदलने की कोशिश कर रहे हैं । हिंदी को लेकर बहुत काम कर रहे हैं । राज ठाकरे को इनका पता बताना ही पड़ेगा कि आपकी मुम्‍बई में एक और आदमी ऐसा है जो हिंदी हिंदी चिल्‍ला रहा है कपड़े फाड़ के । पिछले दिनों इन्‍होंने लगभग ब्‍लैकमेल करके मुझे जैसे लगभग शरीफ आदमी ( ? ) से गंदे गंदे दोहे लिखवा लिये जिस पर ब्‍लाग जगत की सारी महिलाएं मुझसे नाराज हैं ( साजिश किसकी थी । )

खली सा बदन, अली सा वदन, नली सी है नाक, टेढ़ी नज़र|

तमाम जहान ढूँढा मगर, न तुझ सी हसीन आई नज़र|१|

थी दूर खड़ी, तो ऐसा लगा, वो हुस्न परी, जमालेजहाँ|

करीब से जो, निहारा उसे, तो पाया, वहाँ - जमीँ थी न जर|२|

करूँ क्या तरीफ, तेरी भला, गजब की तेरी मटकती नज़र|

भटकती नज़र, अटकती नज़र, खटकती नज़र, सटकती नज़र|३|

वसन्ती पवन, महकता चमन, दिलों का मिलन, मिटाए अगन|

ये होली सा पर्व जिसने दिया, करूँ मैं उसे खुदाई नज़र|४|

निहायत ही टुच्‍ची और छिछोरी ग़ज़ल । ऐसी ग़ज़ल जिसमें न सर है और न स्‍वाद । ऐसा लगता है कि जैसे ग़ज़ल न होकर किसी नामाकूल से कव्‍वाल द्वारा रात दो बजे के बाद की जा रही शायरी हो । क्‍यों लिखते हो भैया ग़ज़ल किसी डाक्‍टर ने कहा है क्‍या ।

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रविकांत पांडेय

गौतम की केटेगिरी में शामिल इस खरगोश को भी एक बड़ी ग़लतफहमी इन दिनों पली हुई है और वो गलतफहमी ये है कि ईश्‍वर ने विश्‍व का सबसे सुरीला गला इनको ही दिया है । हालांकि इस गलतफहमी को सबसे पहले घर में ही बाकायदा घोषणा कर कर के इनकी धर्मपत्‍नी खंडित करती रहती हैं और मंच पर इनके श्रोता भी टमाटरों तथ अंडों से खंडित करने में देर नहीं लगाते हैं । मगर फिर भी गलतफहमी के दूर होने के अभी कोई आसार नहीं हैं ।

निकालने पर तुली है ये जान तेरी चुड़ैल जैसी नज़र
भटकती नज़र, अटकती नज़र, खटकती नज़र, सटकती नज़र
कमाल है जी कमाल है ये, धमाल है जी धमाल है ये
कड़ाह में प्यार वाली मुझे पकौड़ा समझ के तलती नज़र
है मिलती वो "भैंस" जब "किसी राह में किसी मोड़ पर" तो वहां
उपाय कई करूं तो क्या मेरी अक्ल की घास चरती नज़र

उफ मेरे छंद शास्‍त्र के प्रकांड पंडित, उफ मेरे छंद विधान के विश्‍व के एकमात्र बचे जानकार क्‍या ग़ज़ल लिखी है । जहां तक चुड़ैल का प्रश्‍न है वो तो ये सीहोर में मुझे बता चुके हैं कि चुड़ैल कौन है । जाहिर सी बात है जो खून चूसने का जो काम करे वही चुड़ैल है ।

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राणा प्रताप सिंह

भारतीय वायु सेना को लेकर इन दिनों मुझे जो चिंता रहने लगी थी वो इनके ही कारण अब दूर हो गई है । आकाश में उड़ते हुए जब दुश्‍मन के हवाई जहाज को बम से उड़ाना होगा तो उसकी जगह ये अपना कोई बहुत ही घटिया सा शेर ( जो इनके पास बहुत से हैं ) सुना देंगें, वो बिचारा सुनते ही अपना हवाई जहाज खुद अपने हाथ से ज़मीन पर गिरा देगा । देश का कितना भला होगा बम की भी बचत होगी और दम की भी ।

गधों से बचा के नज़रें चलो वगरना तुम्हारी होगी नज़र

भटकती नज़र अटकती नज़र, खटकती नज़र,सटकती नज़र

नज़र ही नज़र से पीछा किया उठाई नज़र गिराई नज़र

नसीब हमारे फूट गए जो उसने मिलाई भेंगी नज़र

जो झाडू लगा के पोछा लगा के चाय बना के पेश किया

प्रसन्न हो श्रीमती जी अगर मिलेगी बहुत ही प्यारी नज़र

लगा के खिजाब मूछों पे भी जवान दिखें हैं बूढ़े सभी

मोहल्ले में एक हुस्न परी ने जब से उठाई अपनी नजर

मियाँ ये जो हैं ये कीड़े तलें औ पेश करें ये गुझिया हमें

इन्हें न पता हमें है खबर इन्होने जहां बचाई नज़र

जुगाड किया, उधार लिया, पसारे है कर, न काम बना

ये लफ्ज़ कहाँ छुपे है भला तलाश रही हमारी नज़र

मियां एकाधा श्‍ोर तो ऐसा कह देते कि जिसको कोट किया जा सके । मगर नहीं आपने तो क़सम खा रखी है कि जब भी तरही में आऊंगा तो ऐसी ग़ज़ल कहूंगा कि संचालक एक भी शेर को कोट न कर सके । क्‍यों भैया क्‍या संचालक से पिछले जनम का कोई पंगा है क्‍या ।

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वीनस केशरी

उफ .... ये कौन आ गया । गालिब और मीर के बाद यदि कोई शायर हुआ है तो यही है । अमिताभ बच्‍चन के बाद यदि इलाहाबाद में कोई पीस ठीक ठाक पैदा हुआ है तो यही है । आपके गले की क़सम कैसे कैसे दर्दनाक शेर निकाल रहा है इन दिनों की क्‍या बताएं । हालांकि अभी भी कन्‍फ्यूज है । मगर फिर भी बात यही है कि जब इतना कनफुजियाआ हुआ है तब गालिब जैसा है, ठीक हो गया तो क्‍या होगा ।

मेरा तो नसीब फूट गया जो पड़ गई मुझ पे उसकी नज़र

भटकती नज़र अटकती नज़र खटकती नज़र सटकती नज़र

कभी तो मुझे गले से लगा कभी तो मुझे भी रंग लगा

ये क्या की मुझे बुला के करीब डांटे तेरी मटकती नज़र

झिंझोड मुझे, उछाल मुझे, उठा के मुझे पटक दे मगर

बिखर जो गया, समेत सकेंगी क्या तेरी सिसकती नज़र ?

आय हाय मेरे गालिबो मीर दो शेर में ही फूंक निकल गई । क्‍यों इलाहाबाद में इस बार अमरूद कम आये थे क्‍या । मियां अभी तो कुंवारे हो अभी ही अगर दो लिख पा रहे हो तो शादी के बाद तो केवल मिसरे से ही काम चलाओगे ।

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निर्मला कपिला दी

लो ये भी आ गईं । ये तीन महासागरों से घिरे भारतीय भूमंडल की अकेली तथा पहली महिला हैं जो रिटायरमेंट के बाद भजन लिखने के बजाय ग़ज़ल लिख रहीं हैं । ग़ज़ल के साथ काफी प्रयोग करने की ये शौकीन हैं । सबसे अच्‍छा प्रयोग इन्‍होने जो किया है वो ये है कि बजाय एक ही बहर पर पूरी ग़ज़ल लिखने के ग़ज़ल के हर मिसरे में अलग बहर लाने का काम किया है । इनसे ग़ज़ल को काफी उम्‍मीद है ।

शिवेशवरी महेशवरी करे तु अगर कृपा की नज़र
न हीन रहूँ न दीन रहूँ मिले तुझ से रहमती नज़र
रही मचली,मगर उलझी न प्यार किया जला ये जिगर
न रंग गिरा न भंग मिली मिली मुझको दहकती नज़र

उसे दिल ने सवाल किया उठा पलकें न तीर चला
कभी उठती कभी झुकती रही छलती सुलगती नज़र
सवाल करूँ जवाब नही अकड करती खडी पनघट
जनाब कहे मुझे मत तू बुला चल जा खटकती नज़र
कफूर हुया मुहब्बत का नशा मिल कर रहा पछता
कभी कुढती कभी सहती कभी बहती छलकती नज़र

मतले में धर्म कर्म की बात करके आपने अपनी उमर बता ही दी । बताओ ग़ज़ल में भी भगवान । ये बुढ़ापा शै: ही ऐसी है कि आदमी को उठते बैठते हर जगह भगवान ही दिखाई देता है । हर बात पर भगवान के पास प्रार्थना पत्र देना ही बुढा़पे की असली पहचान है ।

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दिगंबर नासवा

नाम से ही जो दिगंबर हो उससे कोई क्‍या कहे । दुबई में रहते रहते इनको भी ग़ज़ले लिखने का शौक तब लगा जब पता चला कि दुबई के शेखों को ऐसी ग़ज़लें सुनने का बहुत शौक है जो उनको समझ में बिल्‍कुल ही नहीं आये । और ऊपर वाले के फजल से इनके पास तो इस प्रकार की ग़ज़लों की इफरात है जो शेखों की तो छोडि़ये इनको खुद ही समझ में नहीं आतीं हैं । इन दिनों किसी सही शेख की तलाश में हैं ।

भटकती नज़र अटकती नज़र ख़टकती नज़र सटकती नज़र

तुझे न लगे ए जान जिगर फिसलती हुई ये मेरी नज़र

तू शोर मचा, धमाल मचा, अबीर उड़ा, गुलाल लगा

न अपने बदन पे रंग लगा न अटके कहीं छिछोरी नज़र

है चारों तरफ अजीब सी जंग न होली का रंग न मस्त उमंग

तू तीर चला, कटार चला, दिलों पे चला दे तिरछी नज़र

ये गाल रंगूँ, ये हाथ रंगूँ, है चाह मेरी ये माँग रंगूँ

जो बाप तेरा न थाने गया तुझी से चुरा लूँ तेरी नज़र

सुनो पप्‍पू, पहले तो बताओ कि कौन कौन सा शेर किस किस बहर पर लिखा गया है । मेरे विचार में तो तुम यदि मुशायरा पढ़ोगे तो कुछ इस प्रकार पढ़ोगे '' इस शेर पर ध्‍यान चाहूंगा इसका एक मिसरा रजज पर है और दूसरा हजज पर है ''।

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प्रकाश पाखी

क्‍या आपने कोई ऐसा बैंक मैनेजर देखा है जो कि ग़ज़लें भी लिखता हो, नहीं देखा हो ता ऊपर की तस्‍वीर को देख लीजिये । ये विश्‍व का एक मात्र बैंक मेनेजर है जो ग़ज़लें भी लिखता है । इसके कई फायदे हैं जैसे लोन लेने के लिये यदि कोई आया है तो उसे लोन का फार्म भरवाते भरवाते चार आठ ग़ज़लें पेल दो । उस समय तो उसकी हालत कीचड़ में फंसे शेर की ही तरह होती है ।

भटकती नजर अटकती नजर खटकती नजर सटकती नजर

ये हुस्न औ शबाब रंग औ जिस्म मिल गए तो फिसलती नजर

ये बढती उमर, लटकते है पाँव कब्र में, है जवानी बड़ी

खराब मन की जो ढूंढती है फिर लख्ते जिगर,शराबी नजर

महंगा है प्याज लहसुन मिलती ज्वेलरी की दुकान पे अब

फटे है नयन हमारे आई तिजोरी में फूल गोभी नजर

हुए गिर कर कमीने औ चोर हम तो शबाब पर न गयी

न ही धन पर गयी बस प्याज पर थी हमारी लोभी नजर

सी डब्लू जी टू जी कुछ तो मैं ले लू जी बड़ी भरी सेल लगी

मिले सब सस्ता लूट का माल अपना ये दिखता बोली नजर

आपको भी लगता है कि मुझे मेरे बचपन के कस्‍बे इछावर का एक मुशायरा पढवाना ही पड़ेगा जहां पर श्रोता जब बहुत गुस्‍से में आ जाते हैं तो शायर को एक बड़े बोरे में भर कर मंच के पीछे ले जाकर पूरे भक्ति भाव से उसकी धुलाई करते हैं ।

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संजय दानी

इनके बारे में क्‍या कहा जाये । इन्‍होंने अपनी ग़ज़ल के साथ जो अपनी मुखछवि ( फोटो) भेजी वो इतनी छोटी सी थी मानो फोटो के भी पैसे लग रहे हों । किसी ग्राफिक डिजायनर  की यदि हत्‍या करनी हो तो इनका ये वाला फोटो उसको भेज दो कि यार इस फोटो पर कुछ काम कर दों । फोटो का साइज ही देख कर अगला आत्‍महत्‍या कर लेगा । जहां तक ग़ज़ल का प्रश्‍न है तो वो तो आप देख ही लेंगें की वो क्‍या है ।

भटकती नज़र अटकती नज़र खटकती नज़र सटकती नज़र,
ख़ज़ाने में होली के हैं तरह तरह के कई हटेली नज़र।
रगों का पहाड़ डोल रहा है भांग की मस्ती की दुआ से
खटाक से अर्श नापे, धड़ाम से ज़मीं फिर पकड़ती नज़र।
निकाह अमीर लड़की से करके पैसा तो आया , लड़की की पर
कमर बड़ी है ,दिमाग़ है खाली ,कांपते बोल, भैंगी नज़र।
तमीज़ो-हवस की गाड़ी का ब्रेक फ़ेल हुआ मरेंगे सभी,
ये देख मुहल्ले वालों की ख़ौफ़ से डरी अटकी सटकी नज़र।
मुहब्बतों के फ़लक पे अमीरी देता नहीं किसी को ख़ुदा
हसीनों के मुल्क में रहे हर अमीर की भी भिखारी नज़र।
लहू है तेरी जबीं को अजीज़ और क़बाब है ज़ुबां को,
ख़ुदा के करम से सिर्फ़ हसीनों को मिली है शिकारी नज़र।
अकेले चला है दानी तुझे गुलाल लगाने होली में पर,
अजीज़ है तुमको सैकड़ों मर्दों की ख़ता -ओ- हरामी नज़र।

आपसे तो कुछ इसलिये नहीं कहा जा सकता कि आपके तो नाम में ही दानी लगा हुआ है । वर्तमान में हर दानी आदमी वो है जो अपना कूड़ा कबाड़ दूसरों को दान देकर पुण्‍य कमाता है । आप तो दानी नहीं महादानी हो जो अपने दिमाग़ का कूड़ा कबाड़ श्रोताओं को दान कर रहे हो । जय हो ।

और अंत में सबको होली की शुभकामनाएं, रंग डालें अपने हर दोस्‍त को अपनेपन के रंग में, हर दुश्‍मन को दोस्‍ती के रंग में और जिंदगी को इस प्रकार जियें कि कहीं कोई दुश्‍मन ही नहीं हो ।

जय हो होली की ।

सोमवार, 7 मार्च 2011

सौती मुशायरे को लेकर या यूं कहें कि होली के मुशायरे को लेकर काफी विचार विमर्श हुआ । और मुझे ऐसा लगता है कि काफी ज्ञानवर्द्धक रहा ये पूरा सत्र । और आज भभ्‍भड़ कवि के द्वारा प्रस्‍तुत कई सारे मिसरा-ए-तरह ।

होली का मुशायरा एक ऐसा अवसर होता है जिसको लेकर मैं काफी दिनों पहले से ही रोमांचित होता रहता हूं । होली मेंरा सबसे पसंदीदा त्‍यौहार जो ठहरा । होली को लेकर मेरे मन में एक विशेष उमंग होती है । उसके पीछे कारण बचपन की काफी सारी यादों का है । वे यादे जो किसी खास जगह और किसी खास के साथ जुड़ी हैं । खैर इस बार तो होली का ये मुशायरा काफी सारी चर्चाओं को लेकर आया है । सौती मुशायरे को लेकर कहीं से कुछ भी बहुत साफ जानकारी नहीं मिल पा रही है । दो तरह के विचार सामने आ  रहे हैं । पहले तरह के विचारों में अश्‍क साहब के लेख का समर्थन हो रहा है तो दूसरे तरह के विचार वही हैं जो श्री धीर ने कमेंट में व्‍यक्‍त किये हैं । दरअसल में सौती शब्‍द से ही मायने निकाले जा रहे हैं क्‍योंकि उसके अलावा प्रमाणिक रूप से कहीं कुछ नहीं मिल रहा है । सौत ( ध्‍वनि) सौती ( ध्‍वनि संबंधी) जैसे शब्‍दों से ही अनुमान निकाले जा सकते हैं । कहीं न कहीं कोई ऐसी कड़ी है जो छूट रही है । खैर उसकी तलाश जब तक नहीं होती है तब तक हम सौती का आयोजन लंबित करते हैं तथा फिलहाल होली पर मज़ाहिया मुशायरे से ही काम चलाते हैं ।

बहरे वाफर -  जब मैंने इस पर काम करना शुरू किया तो पहले तो लगा कि बहुत मुश्किल होगी ये बहर तभी तो इस पर काम नहीं हुआ है । लेकिन जब कुछ काम किया तो लगा कि उतनी मुश्किल नहीं है जितना समझा जा रहा था । जो बीच में दो स्‍वतंत्र लघु आने हैं वे अतने मुश्किल नहीं हैं जितने कामिल में थे । क्‍योंकि कामिल में वो रुक्‍न के शुरू में ही आ रहे थे । यहां पर बीच में आ रहे हैं इसलिये आपको ये स्‍वतंत्रता है कि आप एक शब्‍द जो कि लघु पर समाप्‍त हो रहा है के बाद दूसरा शब्‍द जो लघु से शुरू हो रहा है  को लेकर रुक्‍न बना सकते हैं । कहीं कुछ रवानगी की कमी इस बहर में मुझे लग रही है । शायद यही कारण है कि इस पर काम कम हुआ है । लेकिन रवानगी की कमी के पीछे एक कारण ये भी हो सकता है कि हमको अभी तक बहरे हजज पर गाने की आदत है तथा ये बहर उस प्रकार प्रवाह में नहीं है , हालांकि उसकी जुड़वां बहर है फिर भी । बीच में जहां पर दो लघु आते हैं वहां पर रवानगी में कुछ हल्‍की सी कमी दिखाई देती है । हो सकता है ये कमी अरबी में नहीं आती हो और इसीलिये इस पर वहीं ज्‍यादा काम हुआ हो । खैर ।

मिसरा-ए-तरह  तो बात हो रही है मिसरा-ए-तरह की । क्‍या लिया जाये मिसरा ये काफी दिनों से चर्चा चल रही है । मुझे भी लगा कि कुछ ऐसा हो जो कि होली की बात कहता हो, कहीं कुछ हल्‍का सा हास्‍य का पुट हो और बाकी जैसा होता है ग़ज़ल का मिसरा वैसा तो हो ही सही । होली शब्‍द हमारी बहर में कैसे भी उपयोग नहीं हो सकता है क्‍योंकि होली में न तो हो  गिर कर लघु हो सकता है और ना ही ली  । तथा बहर में कहीं भी दो दीर्घ एक साथ नहीं आ रहे हैं जो होली कि मात्रिक मांग को पूरा कर सकें । यही हालत फागुन की भी है क्‍योंकि उसमें भी दो दीर्घ हैं । मगर फिर भी हम रंग  जैसे शब्‍दों का तो उपयोग कर ही सकते हैं । 

भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के द्वारा प्रस्‍तु कुछ मिसरा-ए-तरह 

उठा के नज़र, मिला के नज़र, कभी तो हमें, शराब पिला
कुटे भी बहुत, पिटे भी बहुत, ठुके भी बहुत, गली में तेरी
सनम की गली, में रंग लिये, हैं हम भी खड़े, उमंग लिये
ये खूने जिगर, लगे जो अगर, तो गाल तिरे, गुलाब लगें   
ये रंग मिरा, लगे जो अगर, तो गाल तिरे, गुलाब लगें
दिमाग़ मेरा, बना के दही, सनम ने कहा, लो हम तो चले
भटक के मिला, वो मिल के जुला, जुला तो खिला, खिला तो फटा
चढ़ा जो नशा, तो दिल ने कहा, जिगर को जला, नज़र से पिला
भटकती नज़र, अटकती नज़र, खटकती नज़र, सटकती नज़र
तू है कि नहीं, पता तो चले, कहीं से मुझे, झलक तो दिखा
न छत पे सनम, यूं बाल सुखा, न रूठे कहीं, सलोनी घटा
ये हंस के कहा, सनम ने मिरे, मुझे न सता, तू भाड़ में जा
कमर पे है तिल, है तिल में लचक, लचक में कसक, कसक में मसक
दही में बड़ा, बड़े में दही, दही है बड़ा, बड़ा है दही
चली है हवा, उठी है घटा, मिलन के लिये, सुहानी फ़ज़ा
बदल के नज़र, कहे है सनम, तू कौन भला, बता तो ज़रा
झटक भी दिया, झिड़क भी दिया, कभी तो हमें, गले भी लगा
उड़ो न सनम, हवाओं में यूं, ख़ुदा के लिये, ज़मीं पे चलो
लगा के नमक, मसल के ज़रा, तू दिल का मेरे, अचार बना
इंधेरी बहुत, है रात घुपक, जुलफ को हटा, मुखड़वा दिखा
जिगर का मेरे, तू भुरता बना, बना के उसे, अदू को खिला
न रंग लगा, न अंग लगा, अदू को मेरे, गधे पे बिठा 
ये सारे मिसरे हैं जिनमें से जनमत संग्रह के द्वारा परसों शाम अर्थात बुधवार शाम तक मिसरा तय करना है ताकि काम शुरू हो सके । जनमत का अर्थ टिप्‍पणियों में अपने मिसरे को पसंद करें और उसके पक्ष में वोट करें । एक व्‍यक्ति एक ही मिसरा पसंद करे । एक से ज्‍यादा नहीं करें । क्‍योंकि उस स्थिति में और दुश्‍वारियां हो जाएंगीं । दो दिन का समय है अत: दो दिन में आप लोग मिसरा ए तरह तय कर लें क्‍योंकि उसके बाद फिर तरही मुशायरे पर काम शुरू होना है ।
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और हां एक और जनमत संग्रह में वे सभी जो साथ देना चाहें वे दें, आदरणीया नुसरत मेहदी दीदी को प्रदेश के प्रमुख समाचार पत्र नईदुनिया ने नायिका अवार्ड 2011 के लिये नामांकित किया है यदि आप भी उनको वोट देना चाहें तो SMS में NVB26 टाइप करके 53434 पर भेज दें अंतिम तिथि 11 मार्च है ।
 

गुरुवार, 3 मार्च 2011

एक बहुत ही सार्थक चर्चा हो चुकी है होली के सौती मुशायरे को लेकर । इसीसे पता लगता है कि होली को लेकर इस बार सौती मुशायरे का कैसा रंग जमना है ।

जब सौती को लेकर पोस्‍ट लगा रहा था तब भी नहीं पता था कि ये पोस्‍ट कैसा धमाल मचाने वाली है । लेकिन हो गया धमाल भी । धमाल विचारों का । विचारों के आदान प्रदान का जो धमाल पिछले दिनों से चल रहा था उसने कई सारी बातों को स्‍पष्‍ट कर दिया है । इस्‍मत दीदी से इस बीच कई बार बात हुई और कई सारी बातों का उनसे ही पता चला । जैसे उन्‍होंने बताया कि सौत शब्‍द का अर्थ होता है ध्‍वनि और सौती का अर्थ होता है ध्‍वनि से संबंधित । तो इससे ये तो समझ में आया कि एक ऐसी ग़ज़ल जो कि ध्‍वन‍ि पर चलती हो उसको हम सौती ग़ज़ल कहेंगें । लेकिन फिर ये ध्‍वनि पर आधारित ग़ज़ल हो क्‍या । सभी ग़ज़लें तो ध्‍वनि पर ही आधारित होकर चलती हैं । हालांकि अभी इस मामले में मेरे पास उस पुस्‍तक में छपे वो अंश ही हैं और ये अंश परम आदरणीय उपेन्‍द्रनाथ अश्‍क साहब ने परम आदरणीय फ़ैज़ एहमद फ़ैज़ साहब के बारे में लिखे अपने एक संस्‍मरण में लिखे हैं । उसमें लिखा है कि '' सौती मुशायरे का मतलब ये था कि कवि उसमें जो कविताएं पढ़े उनमें आवाज़ और लहजा तो कवि का अपना अपना हो, पर उनके किसी अक्षर समूह का कोई अर्थ न हो । राशिद ने मुझे भी कविता लिखने को कहा, फ़ैज़ को भी, चिराग़ हसरत और शायद अख्‍़तरुल ईमान को भी । मैंने निराला की प्रसिद्ध कविता 'तुम और मैं' की पैराडी की जो बाद में हिंदी साहित्‍य सम्‍मेलन अबोहर के कव‍ि सम्‍मेलन में बहुत पसंद की गई और स्‍वयं निराला ने उसकी दाद दी । फ़ैज़ ने भी अपने रंग में कविता लिखी, जिसमें फ़ैज़ के काव्‍य की रोमानियत और प्रगति‍शीलता दोनों झलकते थे, लेकिन कविता का कोई अर्थ नहीं था । ज़ाहिर है यारों ने उसे फ़ैज़ से बार बार सुना और ख़ूब दाद दी । ''  इसी अंश को लेकर मैंने जब कुछ इधर उधर के सूत्र टटोले तो पहले तो कुछ विशेष नहीं मिला । लेकिन मुझे दो बातें कह रही थीं कि कहीं न कहीं कुछ तो है । पहला तो ये कि अश्‍क जी ने लिखा है और दूसरा ये कि फ़ैज़ साहब के बारे में लिखा है । कहीं से कहीं तक ग़लत होने की गुंजाइश तो है ही नहीं । जिन बातों ने मुझे उद्वेलित किया वो थीं 'किसी अक्षर समूह ( रुक्‍न ) का कोई अर्थ न हो ''  और '' लेकिन कविता का कोई अर्थ नहीं था '' ।

धीरे धीरे कुछ पता चलना शुरु हुआ कि हां ऐसा कुछ होता तो था लेकिन अब उसके बारे में कुछ बहुत ज्‍यादा जानकारी नहीं है । कुछ उस्‍तादों ने बताया कि सौती का मतलब ये होगा कि ग़ज़ल कहन को छोड़कर केवल ध्‍वनि  का पालन करे । ये बात मेरे भी दिमाग़ में बैठ गई । क्‍योंकि अश्‍क साहब ने लिखा भी यही था कि 'किसी अक्षर समूह का कोई अर्थ न हो ।' सौती काफिये के बारे में तो पता था कि जो काफिया नियम को तोड़कर उपयोग में लाया जा रहा हो तथा जो कि ध्‍वनि की शर्तों का पालन कर रहा हो । मुझे लगा कि ऐसा ही कुछ हो सकता है । फिर एक दो लोगों ने जब बात को पुष्‍ट कर दिया तो बात को और बल मिल गया । एक उस्‍ताद ने वही कहा जो कि मेरे मन में था कि ' ऐसी ग़ज़ल जो बहर में तो सौ टंच खरी उतरती हो लेकिन कहन में जीरो टंच हो' ( उन्‍हीं के शब्‍द हैं, हमारे यहां सोने को टंच से परखते हैं । ) मुझे इनकी बात ने भी उत्‍साहित कर दिया और अश्‍क साहब का संस्‍मरण तो था ही । और बस मुझे लगा कि ये प्रयोग होली पर किया जा सकता है ।

पिछली पोस्‍ट पर जो कमेंट आये हैं वे बहुत ज्ञानवर्द्धक हैं । विचारों का आदान प्रदान ऐसे ही होता है । मेरे विचार इस मामले में ज़रा मिश्रित हैं । मैं लोक पर ज्‍यादा विश्‍वास करता हूं । लोक अर्थात जनता । मैंने भाषा के इतिहास को पढ़ते समय देखा कि संस्‍कृत अपनी क्लिष्‍टता के कारण लुप्‍त हो गई और उसके स्‍थान पर भाषा ( भाखा ) आ गई ( संस्‍कीरत है कूप जल भाखा बहता नीर - कबीर ) । यही ये भाषा जो कि बाद में हमारी हिंदी बनी ( आचार्य रामविलास शर्मा जी इस स्‍थापना के विरोधी हैं, वे कहते हैं कि संस्‍कृत, हिंदी, मराठी आद‍ि भाषाओं का सह अस्‍तित्‍व था । ) संस्‍कृत के लुप्‍त होने का कारण था उसकी रिजिडता । संस्‍कृत के विद्वान आज भी इधर उधर आपको टोकते मिल जाएंगें कि श्‍लोक अशुद्ध तरीके से पढ़ा जा रहा है । खड़ी बोली में बात गा गा कर होती थी । ऐसा प्रतीत होता था कि बात नहीं हो रही है गाया जा रहा है । आप आज भी लखनऊ के पुराने लोगों की हिंदी सुनेंगें तो ऐसा ही लगेगा कि गा रहे हैं ( कंचन की माताजी से बात करते समय मुझे भी यही लगा था । )  फिर आई उर्दू, जिसको लाना मजबूरी थी । क्‍योंकि मुगल शासकों तथा भारतीय सैनिकों के बीच संवाद का कोई सेतु ही नहीं था । तो लश्‍कर के लिये लाई गई ये लश्‍करी भाषा । भाषा जिसने अपने सारे संस्‍कार अरबी और फारसी से लिये यहां तक कि लिपि भी । लेकिन उसको भारतीयता के हिसाब से गढ़ा गया । मगर फिर भी उर्दू और संस्‍कृत में एक साम्‍यता ये थी कि ये दोनों ही नियम क़ायदों पर बहुत रिजिड रहीं । संस्‍कृत अपने कठिन शब्‍दों के कारण अलोकप्रिय हो गई तो उर्दू भी अरबी फारसी के शब्‍दों के कारण । आज हालत ये है कि उर्दू से कठिन अरबी फारसी के शब्‍द लुप्‍त प्राय हो गये हैं । पूर्व से प्रचलित भाषा ने नई आई उर्दू से कुछ बातें लीं और अपने को धीरे धीरे और बदलते हुए वर्तमान की हिंदी में परिवर्तित कर लिया ( याद रखें कि हिंदी,  हिंदुस्‍तान जैसे शब्‍द भारत में मध्‍य पूर्व एशिया से आये हैं, इनका सीधा संबंध सिंध नदी से है । स अक्षर को ह उच्‍चारित करने के कारण ये सब हुआ, आज भी गुजरात के कुछ हिस्‍सों में स को ह ही उच्‍चारित करते हैं ।) कुछ शब्‍द ऐसे थे जो  लोकभाषा में पूर्व से प्रचलित थे तथा उर्दू के आने के बाद उनका रूप कुछ और आया । जैसे जाति  शब्‍द पुराना है, जाति का अपभ्रंश चला  जात ( जात न पूछो साधु की, पानी केरा बुदबुदा अस मानस की जात ) । अब ये जो जात है इसमें नुक्‍ता नहीं लगा है जबकि उर्दू में ये ज़ात है । तो फिर सही कौन है कबीर या कि उर्दू का व्‍याकरण । ये एक ऐसा प्रश्‍न है जिसका उत्‍तर तलाशने में बहुत बहस होंगीं और परिणाम ढाक के तीन पात ही होगा । हां एक बात ये तो स्‍थापित है कि भाखा ( भाषा)  के होने के प्रमाण सातवीं सदी के आस पास से मिलने लगते हैं जबकि उर्दू बारहवीं सदी के आसपास संकेत के रूप में मिलती है तथा तेरहवीं सदी में विकसित होती है । मेरे विचार में भाषा के व्‍याकरण तय करने का अधिकार जनता के पास होता है । जनता ही तय करती है कि कौन सा शब्‍द कैसे उपयोग में आयेगा । पूरी हिंदी पट्टी में आज भी जात  हो उपयोग में आता है ज़ात  नहीं । एक दूसरा शब्‍द जिस पर सबसे ज्‍यादा बहस होती है वो है शहर  । बहस का कारण ये है कि वास्‍तव में शब्‍द का वज्‍न 21 है तथा हिंदी पट्टी मे उसे 12 उच्‍चारित किया जाता है ( बहस तो   और ना  को लेकर भी है ) । मेरे विचार में हमें कबीर के बताये मार्ग पर ही उसका हल मिलेगा भाखा बहता नीर ।

सौती  को लेकर कई सारे कमेंट मिले हैं तिलक राज जी ने इस मुशायरे को ही  सौतन मुशायरे का नाम दिया है । उन्‍होंने एक बात कही है जो मुझे किसी और ने भी कही है कि वाफर को कहीं कहीं पर 12112 के स्‍थान पर 121, 12 की तरह भी उपयोग किया जाता है । तिलक जी ने अपने मेल में भी यहीं लिखा है कि ''

मफायलतुन् (12112) वाली बह्र-ए-वाफिर का शेर दो और तरह से कहा जा सकता है:

फऊलु मफ़ा, फऊलु मफ़ा, फऊलु मफ़ा, फऊलु मफ़ा 121 12, 121 12, 121 12, 121 12

मफ़ा फयलुन्, मफ़ा फयलुन्, मफ़ा फयलुन्, मफ़ा फयलुन्, 12 112, 12 112, 12 112, 12 112, 12 112''

तिलक जी ने जो कहा है उसकी पुष्टि कुछ और लोगों ने भी की है । यदि हम रुक्‍न की बात करें तो वाफर का रुक्‍न जो है वो दो प्रकार के जुज़ से बना है । 12 और 112,  अर्थात वतद मजमुआ और फासला-ए-सुगरा । वतद मजमुआ ( 12 जब तीन हर्फी व्‍यवस्‍था में पहले दो हर्फ स्‍वतंत्र हों तथा तीसरा संयुक्‍त हो ) फासला-ए-सुगरा ( 112 जब चार हर्फी व्‍यवस्‍था में पहले तीन हर्फ स्‍वतंत्र हों तथा चौथा संयुक्‍त हो । ) से मिलकर बनता है बहरे वाफर   का रुक्‍न । इसलिये कह सकते हैं कि रुक्‍न के जुज के आधार पर भी लिख सकते हैं ग़ज़ल । और लिखी भी जाती हैं । हर रुक्‍न में दो शब्‍द हों पहला 12 के वज्‍न पर हो दूसरा 112 पर । और इस प्रकार से हम वाफर का ही रुक्‍न बनायेंगें ।

लेकिन अभी कुछ लोगों का ये मानना है कि यदि कुछ अर्थ ही नहीं होगा तो ग़ज़ल का मतलब क्‍या होगा । तो मेरे विचार में कुछ ऐसा कर सकते हैं कि अर्थ हो तो लेकिन वो अनर्थ के रूप में ही हो । अर्थात उसके होने से तो ना होना ही अच्‍छा । वज़न में हम 12,112 भी ले सकते हैं और 12112 भी ।

और हां यदि आपको ऐसा लगता है कि वाफर पर सौती की जगह मज़ाहिया मुशायरा करना है तो वैसा कर लेते हैं । जो करना है जल्‍द करें । कयोंकि लोगों को लिखने में भी समय लगेगा ।

भाषा की चर्चा को फिलहाल विराम देकर केवल मुशायरे के स्‍वरूप पर इस बार बात करें ताकि हम किसी निष्‍कर्ष पर पहुंचें ।