मंगलवार, 14 सितंबर 2010

सरकारी हिसाब से आज हिंदी का दिन है, अपनी मातृभाषा का एक दिन । भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के जनता की फरमाइश पर अपनी ये विचित्र किन्‍तु सत्‍य वस्‍तु लेकर आ रहे हैं ।

वर्षा मंगल तरही मुशायरा

फ़लक पे झूम रहीं सांवली घटाएं हैं  

इस बार का तरही मुशायरा समापन का नाम ही नहीं ले रहा है । जून के अंत से इसकी सुगबुगाहट प्रारंभ हुई तो सितम्‍बर के मध्‍य तक तो हम आ ही पहुंचे हैं । आज हिंदी दिवस है । वैसे तो अपनी ही मातृभाषा का एक अलग दिवस मनाने का कोई औचित्‍य नहीं हैं । जिसे हम रोज ही बोल रहे हैं व्‍यवहार में ला रहे हैं उसके लिये एक अलग दिन ? खैर सरकारी औपचारिकताओं की तरह ही हिंदी दिवस भी एक ऐसी औपचारिकता है जिसमें सरकारी कार्यालय एक हिंदी के साहित्‍यकार को ढूंढ़ते हैं ताकि उसको सम्‍मान कर सकें । आज भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के अपनी एक रचना के साथ तरही को हिंदी दिवस पर समापन कर रहे हैं । हिंदी दिवस इसके लिये मुफ़ीद दिन इसलिये है क्‍योंकि इस पूरी रचना ( श्री रमेश जी द्वारा खारिज किये जाने के बाद इसे ग़ज़ल कहने की हिम्‍मत नहीं हो रही ) में हिंदी का बोलबाला है । लगभग सारे काफिये हिंदी के हैं । और इसी अनुरूप पूरी रचना ढली हुई है । कई सारे शेर अभी भी काम मांग रहे थे लेकिन उसके लिये समय नहीं मिला सो आज जो है जैसी है वैसी ही प्रस्‍तुत है ये रचना । आप सबसे पहले ही कह दिया था कि दिमाग़ को सिरे से अनुपस्थित मान कर इसे पढ़ें और केवल काफिये के उपयोग को देखें ।

श्री श्री 103 भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के 

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मतला
ख़ता करो न करो तय मगर सज़ाएँ हैं
ये कूए यार की उल्‍टी परम्‍पराएँ हैं
1
ये ख्‍़वाब ख्‍़वाब फि़ज़ा दिलनशीं नज़ारे ये
जिधर भी देखिये बस धुंध की रिदाएँ हैं
2
सवाले वस्‍ल पे इन्‍कार तो किया उसने
कुछ और कह रहीं पर भाव भंगिमाएँ हैं
3
तुम अपनी ख़ैर मनाओ हमारी मत सोचो
''हमारे साथ तो मां बाप की दुआएँ हैं''
4
कथा नहीं है किसी एक ही अहिल्‍या की
कई हैं इन्‍द्र यहां, और कई शिलाएँ हैं
5
महक हवा में यकायक जो घुल गई है ये
वो आ रहे हैं हवाओं की सूचनाएँ हैं
6
हरे दुपट्टे से छनती हुईं वो दो आंखें
ख़मोशियों की चमकती हुई सदाएँ हैं
7
झटकना, तोड़ना, पैरों तले मसल देना
ये मेरे यार की कुछ दिलनशीं अदाएँ हैं
8
यहां न ढूंढिये मां को, बहन को, बेटी को
बहिश्‍त है ये, यहां सिर्फ अप्‍सराएँ हैं
9
कुल्‍हाड़ी पैर पे मारो ख़ुद अपने हाथों से
नये समय की ये ग्‍लोबल सी मूर्खताएँ हैं
10
जहां से लौट के आने की कोई राह नहीं
ये शहरे इश्‍क की पुरपेंच वो गुफ़ाएँ हैं
11
लिखा है साफ़ यहां सिर्फ जिस्‍म हैं आते 
वो जाएं और कहीं जिनकी आत्‍माएँ हैं
12
पिघल रहा है धड़कनों में जो ये लावा सा
ये भावनाएँ हैं या सिर्फ वासनाएँ हैं
13
ये शायरी, ये सुख़न, गीत और ग़ज़ल ये सब
लहू से लिक्‍खी हुई चंद याचिकाएँ हैं
14
बिगड़ रहे हैं जो बच्‍चे तो घर में झांको ज़रा
वहीं से मिलतीं इन्‍हें सारी प्रेरणाएँ हैं
15
सुफ़ेद खादी में बैठे हैं वो सिंहासन पर
गुनाहगार सभी उनके दाएँ बाएँ हैं
16
ये पत्‍थरों पे शहीदों के नाम जो हैं लिखे
हमारे दौर के वेदों की ये ऋचाएँ हैं
17
मैं जिस्‍म हूं मुझे फितरत मिली है बादल की
बरस ही जाउंगा प्‍यासी जहां ख़लाएँ हैं
18
वो आ गए कभी छत पर कभी नहीं आए
कभी बहार का मौसम, कभी खिज़ाएँ हैं
19
बस एक बार इन्‍हें छू लो अपने पैरों से
लहू से दिल के बनाई ये अल्‍पनाएँ हैं
20
मुहब्‍बतों के शजर तो तमाम सूख गये
घृणा की शेष मगर विष भरी लताएँ हैं
21
उमर जवानी की जिद्दी बड़ी ये होती है
उधर ही जाती है जिस ओर वर्जनाएँ हैं
22
हैं बिखरे गेसुए जाना हमारे शानों पर
ये ख्‍़वाब है, के भरम है, के कल्‍पनाएँ हैं
23
ये बेकली, ये तड़पना, ये जागना, रोना
वो कह रहे हैं ये सब आपकी जफ़ाएँ हैं
24
नज़र किसी की जो फिसले तो क्‍यों नहीं फिसले
है चांदनी का बदन, रेशमी कबाएँ हैं
25
सहर है दूर अभी और चराग़ थकने लगे
उठो के मांग रहीं ख़ून वर्तिकाएँ हैं
26
जो साधता है जगत को उसी को साध लिया
ये गोपिकाएँ नहीं ये तो साधिकाएँ हैं
27
है पास कुछ भी नहीं अब सिवाए यादों के
अंधेरी राह में ये ही प्रदीपिकाएँ हैं
28
ज़रा सुरूर में आ जाएं पहले मंत्री जी
फिर उसके बाद सुनेंगे जो इल्तिजाएँ हैं
29
यहां न चांद है कोई, न चांदनी कोई
यहां युगों से मुसल्‍सल अमा निशाएँ हैं
30
किया न वादा कोई आज तक कभी पूरा
तुम्‍हारे वादे तो सरकारी घोषणाएँ हैं
31
सफ़र शुरू भी हुआ और सफ़र ख़तम भी हुआ
सभी की एक ही जैसी तो पटकथाएँ हैं
32
तिरंगा हाथ में लेकर के गाओ जन गण मन
हमारे वास्‍ते इतनी ही भूमिकाएँ हैं
33
बरस रहा है आसमान खुल के धरती पर
प्रणय के रंग में डूबी हुई दिशाएँ हैं
34
दिखा रहे हैं ये टीवी पे आज के चैनल
कि नारियां सभी भारत की, मंथराएँ हैं
35
ये चिलमनें ये नक़ाब आग लगा दो सबमें
हमें सताने की सारी ये योजनाएँ हैं
36
न हीर है, न है लैला, न कोई है शीरीं
न जाने खोईं कहां सारी प्रेमिकाएँ हैं
37
गली है हुस्‍न की ऐ दिल संभल के चलना यहां
क़दम क़दम पे यहां टूटतीं बलाएँ हैं
38
प्रतीक बेटियां होतीं हैं ख़ुशनसीबी का
जो देवताओं ने सुन लीं वो प्रार्थनाएँ हैं
39
वही धनक में, घटा, फूल, चांद, तारों में
उसी के नूर की फैली हुईं शुआएँ हैं
40
तबीयत उनकी है नासाज़ ख़ुदा ख़ैर करे
उन्‍हीं के पास तो हर मर्ज की दवाएँ हैं
41
मिज़ाज पुर्सी को आए हैं ख़ूब सज धज कर
लगे है बख्‍़श दीं पिछली सभी ख़ताएँ हैं
42
निगाहे नाज़, तबस्‍सुम, हया, अदा, शोख़ी
है एक दिल ये मगर कितनी शासिकाएँ हैं
43
ये इन्‍तेहा है मुहब्‍बत की, इन्‍तज़ार की हद
कलिन्‍दी तट पे खड़ीं अब भी गोपिकाएँ हैं
44
सियासी दल हैं ये जितने भी अपने भारत में 
वतन को लूट के खाने की संस्‍थाएँ हैं
45 
भुला दिया जिसे बेटों ने है उसी मां के
लबों पे बेटों के मंगल की कामनाएँ हैं
46
छुएंगीं जिसको भी उसको हरा ये कर देंगीं
भरी भरी सी ये बादल की तूलिकाएँ हैं
47
प्रणय को भोग के दुष्‍यंत भूल जाता है
प्रणय के पाप को ढोतीं शकुन्‍तलाएँ हैं
48
लगे जो भूख तो चूहों को भून कर खाओ
ये कैसा दौर है कैसी विभीषिकाएँ हैं
49
तुम्‍हारे जिस्‍म के कोने हैं छू लिये जबसे
नशे में डूबी हुईं तब से ये फिज़ाएँ हैं
50
चुनाव जीत के डाकू यहां पे हैं आते
निज़ामे मुल्‍क चलाने की ये सभाएँ हैं
51
शिखा को छू के, झुलस के शलभ ने ये जाना
यहां वफ़ाओं के बदले में यातनाएँ हैं
52
अगस्‍त आई है पन्‍द्रह, सभी के हाथ में फिर
सफ़ेद, लाल, हरी बांझ आस्‍थाएँ हैं
53
अधूरे ख्‍़वाब कई साथ में जले उनके
जलीं शहीद जवानों की जब चिताएँ हैं
54
कभी तो थम के पलट के कहीं वो देखेंगे
के उनके पीछे मेरी बेज़ुबां वफ़ाएँ हैं
55
उठा के सर को ज़रा गर्व से इन्‍हें गाओ
भगत, सुभाष, तिलक की ये वंदनाएँ हैं
56
हरेक युग में तपस्‍या को भंग होना है
हरेक युग की यहां अपनी मेनकाएँ हैं

57

तुम्‍हारी याद ये शैतान की भी है ख़ाला
इसे तो आतीं सताने की सब कलाएँ हैं
58
उतार लाये जो धरती पे स्‍वर्ग से गंगा
कहां वो तप है, कहां अब वो साधनाएँ हैं
59
वही अंगूठा, वही द्रोण, एकलव्‍य वही
न जाने कब से यही चल रहीं प्रथाएँ हैं
60
अरे ! सुनो तो ज़रा ! एक पल ठहर जाओ
ग़रीब दिल की ये मासूम याचनाएँ हैं
61
मचल गया जो कहीं दिल तो फिर न संभलेगा
फिज़ा की शह से बग़ावत पे भावनाएँ हैं
62
न जाने धूप को बंदी किया गया है कहां
न जाने क़ैद कहां सारी पूर्णिमाएँ हैं
63
वो जिनका कृष्‍ण कभी लौट कर नहीं आया
तमाम उम्र भटकतीं वो राधिकाएँ हैं
64
मिला के ख़ून ग़रीबों का इसमें पीते हैं
ये देवलोक से उतरी हुईं सुराएँ हैं
65
उमीद इनसे बग़ावत की मत करो, इनका
है इतना सर्द लहू, जम गईं शिराएँ हैं
66
वो कैसी होती हैं बेटी के दिल से पूछो तुम
जो घर को छोड़ के जाने की वेदनाएँ हैं
67
ये कौंध कैसी हुई कोई तो बताओ ज़रा
वो घर से निकले के चमकीं ये क्षणप्रभाएँ हैं
68
उदास वो हैं तो मेहसूस हो रहा है ये
के जैसे चांद की फीकी हुईं विभाएँ हैं
69
वो झूठ है जो पहन के खड़ा है जयमाला
ये सच है जिसको मिलीं बस प्रताड़नाएँ हैं
70
चमन में कौन है आया कि जिसके स्‍वागत में
कुहुक रहीं ये मगन हो के कोकिलाएँ हैं
71
दिखा चुके हैं उन्‍हें चीर के भी दिल अपना
मगर बदल न सकीं उनकी धारणाएँ हैं
72
हरी से होने लगी स्‍याह ये धरती कैसे
हवा में, जल में घुलीं कैसी कालिमाएँ हैं
73
हमारी नस्‍ल को मारोगे गर्भ में कब तक
सवाल पूछ रहीं हमसे बालिकाएँ हैं
74
बदन की क़ैद से निकले हैं रूह बन कर हम
हमारी राहगुज़र अब निहारिकाएँ हैं
75 
अभी भी सोने की सीता महल में रहती है
अभी भी वन में भटकतीं जनकसुताएँ हैं
76
जो झूठी राह पकड़ ली तो ऐशो इशरत है
चले जो सच की राह पर तो कर्बलाएँ हैं
77
कुछ इनके बारे में भी सोचिये हुजूर के ये
हैं भेड़ बकरी नहीं, आपकी प्रजाएँ हैं
78
ख़ुदा के वास्‍ते तुम तो ठहर के सुन लो इन्‍हें
जिन्‍हें सुना न किसीने ये वो व्‍यथाएँ हैं
79
बुढ़ापा आया तो विकलांग हो गये वो ही
जो कहते थे मेरे बेटे मेरी भुजाएँ हैं
80
जनकदुलारियों वनवास उम्र भर का है
हरेक घर में यहां शोक वाटिकाएँ हैं
81
ये मुल्‍क वो जहां नायक हैं चंद्रशेखर से
जहां पे झांसी की रानी सी नायिकाएँ हैं
82 
कहें तो कैसे नगरपालिकाएँ इनको हम
है सच तो ये के ये सब नर्क पालिकाएँ हैं
83
जिन्‍होंने खून है चूसा बहुत ग़रीबों का
उन्‍हीं के गालों पे सूरज की लालिमाएँ हैं
84
वली अहद ही संभालेगा देश की गद्दी
जम्‍हूरियत में भी वो ही विडम्‍बनाएँ हैं
85
अंधेरी शब में उजाला कहां से फैला ये
ये किस हसीन के चेहरे की चन्द्रिकाएँ हैं
86
गुरू बना के सबक हौसलों का लो इनसे
हवा से लड़ रहे दीपों की ये शिखाएँ हैं
87
कहीं न उम्र से लम्‍बी ये रात हो जाये
चले भी आओ के अब बुझ रहीं शमाएँ हैं
88
जो तुम कहो तो चलें, तुम कहो तो रुक जाएं
ये धड़कनें तो तुम्‍हारी ही सेविकाएँ हैं
89
मिलन की रात में बरसात जैसा आलम है
कहीं चमक तो कहीं घोर गर्जनाएँ हैं
90
न जाने कितने ही सिद्धार्थ घर को छोड़ गये
न जाने कितनी ही विरहन यशोधराएँ हैं
91
बदन में मुल्‍क के नासूर बन के फैल रहीं
धरम की, प्रान्‍त की, भाषा की भिन्‍नताएँ हैं
92
डरो ज़रा भी न इनसे, हो तुम तो अपराधी
नहीं तुम्‍हारे लिये दंड संहिताएँ हैं
93
यक़ीं है ख़ुद से भी ज्‍यादा शनी पे मंगल पर 
ये उंगलियों में तभी इतनी मुद्रिकाएँ हैं
94
ख़तम हुई है कहां अब भी जंगे आज़ादी
अभी भी क़ैद में लोगों की चेतनाएँ हैं
95
इन्‍हें दिखाए न डर कोई राहू केतू का
ये लोग फाड़ चुके जन्‍म पत्रिकाएँ हैं
96
है प्रेम के ही लिये जिन्‍दगी बहुत छोटी
निकाल फैंकिये सब दिल में जो घृणाएँ हैं
97
कहा है नज्‍़म किसी ने, किसी ने गीत कहा
है बात एक ही, कविता की सब विधाएँ हैं
98
उतर भी आइये धरती पे आस्‍मां से अब
धरा पे पाप की हर सिम्‍त इन्‍तेहाएँ हैं
99
बसी है यादों में अब तक जो सांवली लड़की
उसी के नाम मेरी सारी सर्जनाएँ हैं 
100
न गीत है, न है कविता, ग़ज़ल, न छंद कोई
ये वीणा पाणी के चरणों की अर्चनाएँ हैं

101
प्रचार मिलता है सीता को सारे ग्रंथों में
ख़मोश रह के विरह सहती उर्मिलाएँ हैं
102
है जानती ये नई नस्‍ल प्‍यार को बेहतर
न इनमें है कोई चंदर न ही सुधाएँ हैं
103
यकीन जानिये है राज अब भी आपका ही
ये आपकी ही तो कुर्सी पे पादुकाएँ हैं
104
करेंगे हम भी मुहब्‍बत, लगाएंगे दिल भी
बताओ हमको भी क्‍या उसकी अर्हताएँ हैं
105
वो जिन की छांव से बनते थे रंक भी राजा
न जाने उड़ गईं किस देश वो हुमाएँ हैं


गिरह का शेर
ये ज़ुल्‍फ़े जाना के हैं पेंचो ख़म हसीं या फिर
''फ़लक पे झूम रहीं सांवली घटाएँ हैं''
 
मकता
कहे हैं तुमने, रहो मत 'सुबीर' ग़फ़लत में
ग़ज़ल के शे'र तो भगवान की कृपाएँ हैं
 

(105 शेर + मतला + मकता  + गिरह का शेर = 108 इस प्रकार भभ्‍भड़ कवि होते हैं श्री श्री 108 )

और इस प्रकार आज हम करते हैं अपने वर्षा मंगल तरही मुशायरे का औपचारिक समापन । और जल्‍द ही अगले दीपावली के मुशायरे के साथ मिलते हैं ( इन्‍शा अल्‍लाह ) ।

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

पवित्र रमज़ान माह के समापन पर आया है ये त्‍यौहार ईद का, पूरे रमज़ान माह में हमने तरही मुशायरा जारी रखा । ये भी तो एक सुखद संयोग ही है कि गणपति जी ईद के दिन पधार रहे हैं ।

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ईद मुबारक, ईद मुबारक, ईद मुबारक । सबको ईद की बहुत बहुत मुबारकबाद  । ईद को लेकर बचपन की बहुत सी यादें जुड़ी हुईं हैं । तबकी यादें जब लोग हिंदू और मुसलमान नहीं हुआ करते थे । या शायद जहां मैं रहता था वहां के लोग हिंदू और मुसलमान नहीं हुआ करते थे । मुझे याद है कि मेरे सबसे अच्‍छे दोस्‍त कमर हसन पर सबसे पहले होली का रंग चढ़ता था । जिस सरकारी क्‍वार्टर में हम रहते थे उसके दोनों तरफ मुस्लिम परिवार रहते थे । एक तरफ थे बहुत ही गुणी और ज्ञानी ज़हीर हसन ड्रायवर साहब ( जिनका बेटा कमर हसन था ) और दूसरी तरफ बहुत ममतामयी नफीसा सिस्‍टर ( मेरे पिताजी डॉक्‍टर हैं ) । कमर की और मेरी ऐसी दांत काटी दोस्‍ती थी कि बस पूछिये मत । उधर नफीसा सिस्‍टर के घर से मेरे लिये एक सेंवई का कटोरा हर साल आता था । बाद में जब हमने वो शहर छोड़ दिया और सीहोर आ गये तब भी वे किसी भी प्रकार से कटोरा भेजती रहीं और फिर वे भी सीहोर रहने आ गईं और मेरी सेंवई फिर से रेगुलर हो गई । बीते साल वे नहीं रहीं और उनके बिना ये साल है उनका वो सेंवई का कटोरा बहुत याद आयेगा इस साल ईद पर । उनका बेटा हमारे परिवार के सदस्‍य के समान ही है और कह सकता हूं कि जब भी कोई परेशानी होती है तो उसे हम हमेशा अपने पास पाते हैं, हमारे अपनों के आने से भी पहले वो आ जाता है । ये रिश्‍ते शायद राजनैतिक लोग नहीं समझ पायेंगे क्‍योंकि ईश्‍वर ने उनको इस लायक समझा ही नहीं है । ज़हीर हसन साहब भी अब नहीं रहे और कमर हसन तो अब जाने कहां है । लेकिन याद सबकी बहुत आती है । कहां गये वो दिन जब ज़हीर हसन साहब की बेटियां गणेश उत्‍सव में सीता, राधा और दुर्गा बन कर झांकियों में बैठती थीं । जब ज़हीर हसन साहब नये तकनीक की झांकिया बनाते थे जिनमें उबलते हुए तेल में जिंदा विक्रमादित्‍य को बैठाना, रावण के सर कट कर वापस आना और लक्ष्‍मण को आकाश से शक्ति लगना जैसी झांकिया होती थीं । वे बहुत गुणी थे तकनीक से सारी झांकियां बनाते थे । कहां गये वे दिन जब ईद पर हम भी झगड़ कर नये कपड़ पहनते थे और निकल पड़ते थे जहीर हसन साहब से ईदी लेने  । कहां गये वो दिन .... । ज़रूर ज़रूर सुनियेगा लता मंगेशकर जी की आवाज़ में अल्‍लाह से की गई ये प्रार्थना जो शायद आपने पहले नहीं सुनी हो । फिर अनुरोध है कि ज़रूर ज़रूर सुनियेगा ।

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खैर ये तो सब संवेदना की बातें हैं दुनिया में ये सब तो चलता ही है । इस बार ईद और गणेश स्‍थापना का दिन एक ही है । कैसा सुखद संयोग है ये या फिर ये ईश्‍वर का संकेत है कि देखो मैं तो तुम से कह रहा हूं कि कुछ अलग नहीं है सब एक ही सत्‍ता है । मगर इन्‍सान यदि ईश्‍वर के संकेतों को ही मानने लगे तो फिर तो दुनिया रहने के लायक हो ही जाये । हम तो ब्‍लाग जगत के लोग हैं कम से कम हमें तो दुनिया के सामने ये उदाहरण प्रस्‍तुत करना ही चाहिये लेकिन हम भी ये नहीं कर पा रहे हैं । देखें कब क्‍या होता है । लता जी के ही स्‍वर में भगवान गणपति की ये वंदना भी सुनिये

bhabhd श्री श्री 103 भभ्‍भड़ कवि भौचक्‍के

भकभौं 103 ( शारदुला दीदी का दिया हुआ नाम ) उर्फ श्री श्री 103 भभ्‍भड़ कवि भौचक्‍के आज केवल ये बता रहे हैं कि पहली बात तो ये कि जो ग़ज़ल वे लेकर अगले अंक में आ रहे हैं ( इन्‍शाअल्‍लाह ) उसे ग़ज़ल नहीं माना जाये बल्कि उसे कुछ तो भी प्रयोग ही माना जाये । जिस प्रकार कहा जाता है ना कि डेविड धवन, प्रियदर्शन की फिल्‍में देखने जाते समय अपना दिमाग सर से निकाला कर खूंटी पर घर पर ही टांग जाएं ( अत्‍यंत बेहूदी फिल्‍म बड़े मियां छोटे मियां को मैं लगभग 50 बार देख चुका हूं ) । उसी प्रकार से भकभौं103 का भी ये कहना है कि उनकी ग़ज़ल को पढ़ते समय दिमाग का उपयोग नहीं किया जाये । इसलिये भी नहीं किया जाये कि ये जो ग़ज़लनुमा जो कुछ है ये केवल एक आज़माइश के तौर पर लिखी गई है जिसे की हम काफियों की आज़माइश कह सकते हैं ।

इस बार की तरही में जो तकनीकी बात थी वो ये थी कि हमारा काफिया स्‍त्रीलिंग में था । अर्थात ये कि आपको मिसरा सानी पर आकर अपनी बात को पूरी तरह से स्‍त्रीलिंग आधारित हो जाना था । तिस पर ये कि बहुवचन में बात होना थी क्‍योंकि एं  लगा हुआ था । मतलब ये कि स्‍त्रीलिंग में बहुवचन के काफिये तलाश करने थे । क्रियाओं के काफियों को यदि कहें तो ग़ज़ल में एकाध उपयोग करना ठीक था लेकिन यदि आपने अधिकांश शेरों में क्रिया के काफिये लगा दिये तो उससे ग़ज़ल का सौंदर्य कम हो रहा था । तो भभ्‍भड़ कवि ने सोचा कि वे क्रियाओं के काफिये उपयोग ही नहीं करेंगें । अब समस्‍या ये कि उर्दू में गिनती के काफिये मिल रहे थे । सो हिंदी की शरण में जाना पड़ा और हिंदी ने निराश नहीं किया । जब काफिये खूब हो गये तो उन काफियों के हिसाब से शेर बनाये गये । ये चूंकि ग़लत तरीका था इसलिये शेर प्रभावशाली नहीं बने । लेकिन भकभौं 103 को शेरों के प्रभाव से कुछ नहीं लेना था उनको केवल काफियों का प्रयोग देखना था कि कैसे किया जा सकता है ।

ये पूरी ग़ज़ल डेविड धवन की फिल्‍म की तरह से इसी कारण सुननी है कि इसमें कहन को खूंटी पर टांग कर ग़ज़ल लिखी गई है । केवल नाप के मिसरों में उचित काफिये को बिठा कर शेर बना दिये गये हैं । भकभौं 103   ने किसी भी काफिये को किसी रूप में दोहराया नहीं है । जैसे यदि दुआएं ले लिये तो अब बद्दुआएं नहीं लिया जायेगा, यदि वफाएं ले लिया तो बेवफाएं नहीं लिया जायेगा । इसको आप ग़ज़ल नहीं कह कर  कसरत-ए-काफिया कह सकते हैं । केवल काफियों को साधने के लिये लिखी गई ग़ज़ल । दिमाग से पढेंगे तो भकभौं 103   की ये ग़ज़ल आपको बहुत ही घटिया टाइप की लगेगी । लेकिन भकभौं 103   का ये कहना है ये केवल कठिन काफियों को साधने की तुकबंदियां हैं । तो ये तय हुआ कि भकभौं 103   केवल इस शर्त पर उस ग़ज़लनुमा शै: को लगाएंगे कि आप उसे दिमाग को हाजिर नाजिर मान कर नहीं बल्कि दिमाग को गैरहाजिर मान कर पढ़ेंगे । श्री रमेश हठीला जी ने दिमाग की उपस्थिति में इसे सुनकर इसको पूरी तरह से खारिज कर दिया है, भकभौं 103   वो रिस्‍क फिर नहीं लेगा चाहते ।

और ये प्रार्थना   आज ये दोनों गीत बहुत मेहनत से छांट कर निकाले हैं । लता जी की अल्‍लाह से प्रार्थनाएं तो बहुत सी हैं लेकिन ये दोनों आपने कम सुनी होंगीं । दोनों को सुनें और बताएं कि कैसी लगीं ।

इस सप्‍ताह (15 सितम्‍बर) की इंडिया टुडे ( हिंदी) में श्री अरुण नारायण जी ने ईस्‍ट इंडिया कम्‍पनी की बहुत अच्‍छी समीक्षा दी है । समय निकाल कर पढ़ें और यदि किसी के पास श्री अरुण का संपर्क नंबर हो तो मुझे बताने का कष्‍ट करें उनको धन्‍यवाद देना है ।

अगले अंक में भभौंक 103  की विचित्र किन्‍तु सत्‍य वस्‍तु आयेगी लेकिन तब जब आप इस पोस्‍ट पर दिमाग को गैरहाजिर करने का वादा करें । फिर से सबको ईद मुबारक ईद मुबारक ईद मुबारक ।

 

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

आज सुधा दीदी का जन्‍मदिन है सो आज की ये विशेष पोस्‍ट उनके लिये, और एक पाती भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के की आम जनता के नाम ।

तरही मुशायरा समाप्‍त होने के बाद ऐसा लग रहा है कि जैसे घर में चल रहा कोई मांगलिक कार्य संपन्‍न हो गया हो । और उसके बाद की शांति छा गई हो । बचपन में ऐसा ही एहसास होता था जब गणपति की प्रतिमा का विसर्जन करके घर लौटते थे । इस बार तरही को इतना लम्‍बा चलना भी एक कारण रहा है कि उससे जुड़ाव हो गया था । जल्‍द ही एक विशेष पोस्‍ट में तरही की विस्‍तृत समीक्षा की जायेगी । और सभी पहलुओं पर विचार किया जायेगा । आज की ये पोस्‍ट लगाने का एक खास कारण ये है कि आज सुधा दीदी का जन्‍मदिन है । पिछले साल बरसात की तरही में ही पहली बार सुधा दीदी से संपर्क हुआ था जब तरही का मिसरा रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से को पढ़कर उन्‍होंने फोन किया था । उसके बाद अब जब एक साल बीत गया है तो ऐसा लगता ही नहीं है कि उनसे पिछले वर्ष ही संपर्क हुआ है । मूल रूप से वे कहानीकार हैं तथा कहानी के क्षेत्र में एक जाना पहचाना नाम हैं । उनकी कहानियों में मानवीय संवेदनाओं की झलक देखते ही बनती है । आज यानि 7 सितम्‍बर को उनका जन्‍मदिन है सो आज उनको हम सब की ओर से जन्‍मदिन की शुभकामनाएं ।

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जन्‍मदिन की बहुत बहुत शुभकामनाएं

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चलो बधाई शधाई तो हो गईं अब पार्टी शार्टी की बात कर ली जाये कि कहां पर है आयोजन और सबसे बड़ी बात ये कि मीनू क्‍या है । अपन तो पहले ही बता देते हैं कि अपन तो प्‍योर वेज वाले हैं सो पार्टी में इस बात का विशेष ध्‍यान रखा जाये । दूसरा ये कि अपन चटपटे आइटमों के विशेष शौकीन हैं । अत: किसी चाट वाले को विशेष रूप से बुलाया जाये । मीठा तो खैर खाते ही हैं और उसमें भी हलवे शलवे टाइप की चीजों के शौकीन हैं । एक और विशेष बात ये है कि हम चूंकि छोटे हैं इसलिये रिटर्न गिफ्ट प्राप्‍त करने का भी अधिकार बनता है उसकी व्‍यवस्‍था पहले से कर के रखी जाए । हमारी तरफ से ये गीत गिफ्ट में दिया जा रहा है ।

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भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के लोगों की प्रतिक्रियाएं देख कर अभिभूत हैं तथा कोशिश कर रहे हैं कि वे जल्‍द ही अपनी ग़ज़ल ( ग़ज़ल..... ? ) के साथ उपस्थित हो सकें । दिक्‍कत ये हो गई है कि भभ्‍भड़ कवि को कुछ अलग करने की आदत हो चुकी है और वे समझ नहीं पा रहे हैं कि इस बार क्‍या अलग करें । वैसे नीरज जी ने सही सलाह दी है कि आरती के साथ समापन होना चाहिये, तो भभ्‍भड़ कवि हो सकता है ग़ज़लनुमा आरती के साथ ही आएं । या हो सकता है और कुछ हो । भभ्‍भड़ कवि को धमाके करने का बहुत शौक है ( ये अलग बात है कि उनके बम फुस्‍सी निकल जाते हैं )। दूसरा ये कि भभ्‍भड़ कवि का नाम अब श्री श्री 103 भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के हो चुका है । ये उपाधि ( 108 नहीं 103 ) उन्‍होंने स्‍वयं को खुद ही प्रदान कर ली है ।  क्‍यों की है ये बात आप उनकी प्रस्‍तुति से जान जाएंगें ।

अंत में एक बार फिर से श्री श्री 103 भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के की ओर से भी सुधा दीदी को जन्‍मदिन की शुभकामनाएं । सब कुछ ठीक रहा तो अगले अंक में भभ्‍भड़ कवि ईद का धमाका कर सकते हैं ( इन्‍शा अल्‍लाह ) ।  और जितना सुधा दीदी को जाना है इस एक साल में, उनके जन्‍मदिन पर इससे अच्‍छा कोई गाना नहीं हो सकता  है जो ऐसा लगता है कि उनके लिये ही बना है । ये गीत भभ्‍भड़ कवि की ओर से दीदी के लिये ।

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शनिवार, 4 सितंबर 2010

दो नये शायरों के साथ आज हम समापन करते हैं वर्षा मंगल तरही मुशायरे का । के के (के. द लियो ) और विनोद कुमार पांडे को सुनिये पहली बार तरही में ।

बहुत लम्‍बा हो गया इस बार का तरही मुशायरा । इतना लम्‍बा कि जुलाई के प्रारंभ से शुरू हुआ तो सितम्‍बर के प्रारंभ तक आ पहुंचा । इस बार इतना लम्‍बा होने के पीछे कई कारण रहे लेकिन सबसे बड़ा कारण तो वही है कि लिखने वालों का जो उत्‍साह मुशायरे को लेकर था उसने इसे विस्‍तार दे दिया । और सबसे बड़ी बात ये है कि इस बार सारी ग़ज़लें एक से बढ़ कर एक मिलीं । काफियों के बहुत ही सुंदर प्रयोग इस बार सामने आये हैं । आज जब हम समापन कर रहे हैं तो ऐसा लग रहा है कि अब बहुत सूना लगेगा कुछ दिनों तक । तब तक जब तक कि हम दीपावली के मुशायरे का मिसरा तय नहीं कर लेते हैं । इस बार तो इतने लोग नये जुड़े हैं कि लगता है कि दीपावली का मुशायरा कुछ दिनों पूर्व ही प्रारंभ करना होगा । खैर आज तो विधिवत समापन करते हैं वर्षा मंगल तरही मुशायरे का  । भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के अपने जीवन के एक कठिन समय से गुज़र रहे हैं इसलिये ग़ज़ल लिखी होने के बाद भी अभी वे ग़ज़ल को प्रस्‍तुत करने की मन:स्थिति में नहीं हैं । यदि सब कुछ ठीक ठाक रहा तो आगे कभी भभ्‍भड़ कवि अपनी तरही को लेकर लिखी हुई ग़ज़ल प्रस्‍तुत कर देंगें । किन्‍तु आज इन दोनों शायरों के के  और विनोद पांडे  की ग़ज़लों के साथ मुशायरे को विधिवत समाप्‍त माना जाये ।

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फ़लक पे झूम रहीं सांवली घटाएं हैं

वर्षा मंगल तरही मुशायरा

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के.के. ( के  द लिओ )

आत्‍म कथन :- मैं आपकी महफ़िल और जमात का नहीं हूं, पर सुन्दर माहौल और मिसरे की लय में बह कर एक कोशिश कर रहा हूं! आशा है,मेरी तुकबन्दी भी आप लोगों को कम से कम पढने योग्य तो अवश्य लगेगी।आशा है,प्रयास को इसका due अवश्य देगें!आपकी प्रतिक्रिया एवं सुधारात्मक निर्देशों का इंतेज़ार रहेगा!

फ़लक पे झूम रही सांवली घटायें हैं
ये बदलियां हैं कि ये ज़ुल्फ़ की अदायें हैं

बुला रहा है मुझे पार कोई नदिया के
है ये कशिश के मेरे यार की सदायें हैं

नज़र तू आने लगा मुझको बूटे बूटे में   
दीवानगी है मेरी, या तेरी वफ़ायें हैं

मुझे दीवाना बनाये है याद तेरी ये
ये ही इश्क कि ये इश्क की अदायें हैं

हूं अच्‍छे शेर निकाले हैं । नये लिखने वाले के लिये इस बहर तथा काफिये रदीफ के काम्बिनेशन पर काम करना बहुत मुश्किल होता है । ऐसे में जो शेर निकाले गये हैं वे बहुत अच्‍छे हैं तथा भविष्‍य को लेकर संभावनाएं जता रहे हैं ।

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विनोद कुमार पांडेय

आत्‍म कथन :-  आज तरही मुशायरे के लिए मैं भी एक नये शायरके रुप में आप सब से रूबरू होने जा रहा हूँ, मुझे यह पता नही कि मेरी ग़ज़ल कैसी बनी है पर आप सब की परखी नज़रें और हौसला-आफजाई मुझे आगे बढ़ने में मदद करेगी......पिछले मुशायरे में देर हो गई थी सो इस बार यह मौका गँवाना नही चाहता हूँ....आप लोगों का आशीर्वाद मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है.नया रचनाकार हूँ अगर कुछ ग़लतियाँ हो तो माफ़ कीजिएगा..आपका आशीर्वाद रहेगा तो धीरे धीरे सुधर जाऊँगा..

फ़लक पे झूम रही सांवली घटायें हैं
हवाएं कानों में चुपके से गुनगुनाएँ हैं

फुहार गाने लगी गीत हसीं रिमझिम के
ठुमक ठुमक के थिरकती हुईं हवाएं हैं

उड़ेलने लगे बादल गरज के जलधारा  
चमक-चमक के हमें बिजलियाँ  डराएँ हैं

पड़े फुहार तो हलचल सी मचे तन-मन में
हज़ारों ख्वाइशें पल भर में मचल जाएँ हैं

उठे लहर जो कभी दिल में हसीं लम्हों की
खुदी से बात करें,खुद से ही शरमाएँ हैं

खिली खिली सी ज़मीं हैं हसीन है मौसम
धुली धुली है हवा खुशनुमा फि़जाएं हैं

हूं विनोद का कहना है कि वे नये शायर हैं लेकिन लिखने का अंदाज़ कह रहा है कि वे काफी समय से लिखते आ रहे हैं । वैसे विनोद ने कई सारे शेर भेजे थे लेकिन जिन शेरों में क्रियाओं के काफिये ठीक नहीं बने थे उनको न लेकर ये शेर तरही के लिये चयनित किये हैं । नये शायर के लिये इस प्रकार के शेर कह लेना बड़ी बात होती है ।

तो अब इजाज़त दीजिये । आनंद लीजिये इन दोनों की शायरी का । जब सब कुछ ठीक ठाक हो जायेगा तो भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के  अपनी रचना प्रस्‍तुत करने आ जाएंगें ।

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

वर्षा ऋतु अब धीरे धीरे अपने उतार पर आ रही है और हम भी तरही के समापन की ओर बढ़ रहे हैं । आज दिगम्‍बार नासवा और सुलभ सतरंगी तथा अगले अंक में समापन ।

अब धीरे धीरे समापन की तरफ बढ़ रहा है ये मुशायरा । कितने ही रंग बिखेरने के बाद कितनी ही नई ग़ज़लों के सा‍थ श्रोताओं को रस विभोर करने के बाद । पीछे मुड़ के देखते हैं तो पाते हैं कि बहुत ही सुंदर सुंदर अशआर पिछले दिनों मुशायरे में सुनने को मिले हैं । लेकिन जैसा कि प्रकृति का नियम है कि जो कुछ भी शुरू होता है उसे कभी न कभी समाप्‍त भी होना होता है । यदि वो समाप्‍त नहीं होगा तो किसी नये के आरंभ की भूमिका कैसे बनेगी । और इसी भूमिका के गर्भ में छिपे होते हैं आने वाले समय के बीज । बीज जो पुष्पित होते हैं पल्‍लवित होते हैं नई पौध के रूप में । जैसे अब तरही मुशायरे में नई पौध की आवक दिखाई दे रही है । पुराने और परिचित नाम अब श्रोताओं में कभी कभार केवल टहलने और अपनी उपस्थिति दर्ज करने आते हैं । ठीक वैसे ही जैसे कभी कभी हम अपने छूटे हुए कॉलेज या स्‍कूल में टहलते हुए चले जाते हैं और टटोलते हैं उन दीवारों को, उन मेजों को कि कहीं से कोई कह दे कि अरे तुम तो वही हो ना । यही नियम है और इसी नियम का पालन हर किसी को करना होता है । नये की तलाश का नाम ही जीवन है । खैर आज का ये अंक और इसके बाद का समापन अंक आज भी दो शायर तथा समापन अंक में भी दो शायर ।  लेकिन उससे पहले............

एक दिन की देरी से जन्‍मदिन की शुभकामनाएं शार्दूला दीदी को  ( जन्‍मदिन 1 सितम्‍बर )

हालांकि विश्‍व के कुछ हिस्‍सों में तो इस समय भी 1 सितम्‍बर ही है ।

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फूलों का तारों का सबका कहना है, एक हज़ारों में मेरी बहना है

वर्षा मंगल तरही मुशायरा

फ़लक पे झूम रहीं सांवली घटाएं हैं

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दिगम्‍बर नासवा

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दिगम्‍बर की गिनती भी ग़ज़ल की कक्षाओं के सबसे प्रारंभिक विद्यार्थियों में होती है । वैसे मैं स्‍वयं दिगम्‍बर की छंद मुक्‍त कविताओं का प्रशंसक हूं । दिगम्‍बर ने इस बार दो छोटी छोटी अलग अलग ग़ज़लें भेजी हैं अलग अलग इसलिये क्‍योंकि दोनों का मूड अलग अलग है । एक ग़ज़ल प्रेम पर है तो दूसरी सामयिक है ।

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फलक पे झूम रही साँवलीं घटाएं हैं
ये काले मेघ नही आपकी अदाएं हैं

तू सोहनी है, के लैला, के हीर या शीरीं
तमाम लोग तेरे दर पे सर झुकाएं हैं

ये कायनात का जादू के है जमाल तेरा  
महक रही ये ज़मीं आसमाँ दिशाएं हैं

वो बेवफा जो मेरी ज़िंदगी को लूट गया
उसी के ख्वाब मुझे रात भर रुलाएं हैं

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बिखर रहे ये नियम युग परंपराएं हैं
ये मीडिया का असर, पश्चिमी हवाएं हैं

कहीं पे बर्फ बिछी है कहीं बढ़ा पारा
बदल रही ये ज़मीं आसमाँ दिशाएं हैं

बढ़ा हुआ है प्रदूषण गिरे न राख कहीं  
फलक पे झूम रही साँवलीं घटाएं हैं

कहीं पे बाढ़, सुनामी कहीं पड़ा सूखा 
ये खौफनाक से मंज़र हमें डराएं हैं

अच्‍छे शेर निकाले हैं दोनो ही ग़ज़लों में और दोनों ही ग़ज़लें अपने अपने तरीके से अपनी भावनाओं को व्‍यक्‍त करने में पूरी तरह से सफल रहीं हैं । दोनों ही ग़जलों में जमीं आसमां दिशाएं वाला शेर बहुत ही अच्‍छा बन पड़ा है ।


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कुछ देरी से जन्‍मदिन की शुभकामनाएं ( जन्‍मदिन 31 अगस्‍त )

सुलभ जायसवाल 'सतरंगी'

सुलभ से हम सभी परिचित हैं सुलभ की ग़ज़लें  पूर्व के मुशायरों में भी आपने सुनी हैं । पेशे से साफ्टवेयर इंजीनियर सुलभ अभी बहर सीखने की प्रारंभिक अवस्‍था में है । लेकिन सच यही है कि सब कभी न कभी प्रारंभिक अवस्‍था में होते हैं । सीखने की लगन होना सबसे ज़रूरी है बाकी तो बाद की चीजें हैं । सुलभ का जन्‍मदिन 31 अगस्‍त को कुछ दिन पहले ही गया है सो कुछ देरी के साथ जन्‍मदिन की शुभकामनाएं ।

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महकते गेसू हवा में जो वो उड़ाएं हैं
हमारा होश उड़ाने की सब अदाएं हैं

यकीं न हो तो सुनो कृष्‍ण द्रोपदी की कथा
ये राखियों की पुरानी परम्पराएं हैं

ये स्‍वर है, गीत है, कविता है, राग है क्‍या है  
मगन सी हो के जिसे गा रहीं दिशाएं हैं

सजन के गाँव से आई बदरिया भीगी हुई 
उसी को छू के ठुमकने लगीं हवाएं हैं

'सुलभ' बनाएं चलो नाव हम भी कागज़ की
फलक पे झूम रहीं सांवली घटाएं हैं

सजन के गांव से आई बदरिया भीगी हुई, ये मिसरा आनंद का मिसरा है । ये पूरा का पूरा शब्‍द चित्र बनाने वाला मिसरा है । मकते में गिरह  भी जबरदस्‍त तरीके से बांधी गई है । जनमदिन की खुशी में बहुत ही सुंदर ग़ज़ल बन गई है ये । सभी शेर सुंदर हैं मगर सजन के गांव की बदरिया का क्‍या कहना ।

चलिये आनंद लीजिये इन दोनों शायरों की रचनाओं का और प्रतीक्षा कीजिये अगले समापन अंक की जिसमें दो नये शायरों की ग़ज़लों के साथ हम तरही का समापन करेंगें ।