बुधवार, 29 जुलाई 2009

आज समीर लाल जी का जन्‍मदिन है, उनको ढेरों शुभकामनाएं और स्‍व. ओम व्‍यास स्‍मृति तरही मुशायरे में आज सुनिये मेजर संजय चतुर्वेदी और राही ग्‍वालियरी जी को ।

इस बार का तरही मुशायरा हर बार से अलग हो रहा है । अलग इस मायने में कि इस बार बहुत ही अच्‍छी रचनाएं मिल रही हैं । उस्‍तादों की बारी इस बार भी नहीं आ पा रही है क्‍योंकि इस बार संजय चतुर्वेदी जी और राही ग्‍वालियरी जी आ रहे हैं अपनी रचनाओं के साथ । इस बार का मुशायरा स्‍व. ओम व्‍यास जी को समर्पित है इसलिये ही शायद इतनी अच्‍छी रचनाएं  आ रही हैं । एक से बढ़ कर एक रचनाएं आ रही हैं । मेरे विचार में इस बार सबसे जियादह मुश्किल उस व्‍यक्ति की होनी है जिसको इस बार के हासिले मुशायरा शेर का चयन करने का दायित्‍व निर्वाह करना होगा । अपनी बताऊं तो सच कहूं अगर कोई मुझे ये दायित्‍व इतनी सुंदर ग़ज़लों में से छांटने को दे तो मैं तो छोड़ के भाग ही जाऊं । बहुत अच्‍छी रचनाएं आई हैं । अब हम अगली बार जब बहर पर काम करेंगें तो और मजा आना चाहिये ।

अनुरोध- आधारशिला जुलाई 2009 अंक में कहानी महुआ घटवारिन पढ़ें और बताएं आपको कैसी लगी  ।

बधाई  हो बधाई जन्‍मदिन की आपको -

आज समीर लाल जी का जन्‍मदिन है । समीर जी हम सब के चहेते हैं । एक बार सीहोर भी आ चुके हैं और एक कवि सम्‍मेलन में काव्‍य पाठ कर चुके हैं । लोग अब भी उनका काव्‍य पाठ याद करते हैं । इसी साल उनकी एक पुस्‍तक बिखरे मोती शिवना प्रकाशन से प्रकाशित होकर आई है । समीर जी का एक बिल्‍कुल ही अलग रूप उस पुस्‍तक में हैं । दरअसल में समीर जी अचानक ही चौंकाने वाली रचनाएं लिखते हैं । जैसे ये देखिये

कोई अब ऐसा नहीं, हो मेरा हमराज
वह दरवाजा खो गया, जिस पर लौटूँ आज

याद लिए कट जायेगा, जीवन थोड़ा पास
मन पागल कब मानता, पाले रखता आस

राहों को तकते नयन, बन्द हुए किस रोज 
माँ के आँचल के लिये, रीती मेरी खोज

कितने संवेदनशील दोहे हैं ऐसा लगता है कवि ने हर दोहा आंसुओं को सियाही बना कर लिखा है । समीर जी के अंदर एक गहन संवेदनशील कवि है । आज उनका जन्‍म दिन है उनको हम सब की ओर से शुभकामनाएं । इस बार तरही में उनकी ग़ज़ल नहीं मिली है अन्‍यथा उनकी ग़ज़ल आज लगाई जाती  । समीर जी के व्‍यक्तित्‍व को जितना मैंने जाना उस हिसाब से ये गीत उनको आज जन्‍मदिन पर उपहार स्‍वरूप । इस की पंक्तियां बिल्‍कुल उनके व्‍यक्तित्‍व के लिये ही बनी हैं । अनुरोध है कि पूरे गीत को सुनते समय, हर अंतरे को सुनते समय समीर जी का व्‍यक्तित्‍व दिमाग में रखें और बतायें कि मैंने गीत सही चयन किया कि नहीं । हर किसी के लिये जीने वाले व्‍यक्ति के लिये यही गीत हो सकता है सुनिये ये गीत :-

http://www.divshare.com/download/8015470-368 

http://www.archive.org/details/BolIkTareJhanJhan

समूचे ब्‍लाग जगत और ग़ज़ल की पाठशाला की ओर से जन्‍मदिन की शुभकामनाएं

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श्री समीर लाल जी के बचपन के जन्‍मदिन का चित्र बड़ी मुश्किल से मिला है ।

स्‍व. ओम व्‍यास स्‍मृति तरही मुशायरा

तो आज हमारे साथ दो और शायर हैं जो कि अपनी रचनाओं के साथ आये हैं । दोनों ने ही भागते भागत अगले स्‍टेशन पर ट्रेन पकड़ी है । और इनके ट्रेन पकड़ने के कारण हमारे दोनों ही उस्‍ताद शायरों के लिये अब अगले स्‍टेशन तक का इंतजार रहा है । क्‍योंकि अब वे ही शेष हैं । इस बार हमने बहरे रमल मुसमन महजूफ को लिया है । एक राज की बात आपको बताऊं बहरे रमल की एक बहर जो सबसे जियादह काम में आती है और जिस पर काफी काम हुआ है वो है बहरे रमल मुसमन मखबून मुसक्‍कन ।  फाएलातुन-फएलातुन-फएलातुन-फालुन । मदन मोहन साहब ने इस बहर को काफी उपयोग किया है । हुस्‍न हाजिर है मुहब्‍बत की सजा पाने को, रस्‍मे उल्‍फत को निभाएं तो निभाएं कैसे, रंग और नूर की बारात किसे पेश करूं आदि आदि । इसमें लिखने में एक बड़ी परेशानी आती है कि आपको एक साथ दो स्‍थानों पर दो लघु मात्राओं की व्‍यवस्‍था करनी होती है । लघु मात्राएं जो कि स्‍वतंत्र हों । इसमें आखिरी रुक्‍न 112 या 22 कुछ भी हो सकता है । किन्‍तु फएलातनु  में जो दो लघु हैं फए  उसकी व्‍यवस्‍था कुछ कठिन होती है । अक्‍सर यहीं पर लोग मार खा जाते हैं । ग़ज़ल गायकों की ये बहुत ही पसंदीदा बहर है । लताजी और जगजीत जी के सजदा में चार पांच ग़ज़लें इसी बहर पर थीं । इस बहर पर काम करना मतलब लघु और दीर्घ की सटीक पहचान होना । सीखने के लिये सबसे बेहतरीन बहर । एक बात का ध्‍यान रखें कि रमल मुसमन महजूफ और मुसमन मखबून मुसक्‍कन में अंतर करने के लिये आखिरी रुक्‍न को देखना होता है । जैसे हुस्‍न हाजिर है मुहब्‍बत की सजा पा यहां तक तो आप इसे फाएलातुन-फाएलातुन-फाएलातुन 2122-2122-2122  भी कर सकते हैं ओर फाएलातुन-फएलातनु-फएलातुन 2122-1122-1122  भी । उसमें जो है  और  की आ रहा है उसे आप 2 भी कर सकते हैं और 1 भी । लेकिन यदि अंतिम रुक्‍न 212 है तो ये दोनों मात्राएं (है और की ) 2 में गिनी जाएंगी । यदि अंतिम रुक्‍न 112 या 22 है तो दोनों मात्राएं ( है और की) 1 में ही गिनी जाएंगीं । जैसे यदि पाने को  की जगह पर पाने यहां  होता तो इसका वजन 2122-2122-2122-212 हो जाता हुस्‍न हाजिर है मुहब्‍बत की सजा पाने यहां

खैर आज तो हम अपनी बहरे मुसमन महजूफ  की ही बात करते हैं और सुनते हैं आदरणीय जोश मलीहाबादी साहब  की लिखी और ग़ज़ल सम्राट श्री जगजीत सिंह साहब   की गाई ये कहकशां एल्‍बम की ग़ज़ल ।

http://www.archive.org/details/KiskoAatiHaiMasihaai 

http://www.divshare.com/download/8015680-cd9  

तिलक राज कपूर जी उर्फ राही ग्‍वालियरी जी :- तिलक जी के बारे में उतना ही जानता हूं जितना उनके मेल से ज्ञात हुआ है । किन्‍तु मेरे लिये वे सम्‍माननीय हैं क्‍योंकि उनके नाम में मेरी ससुराल का नाम ग्‍वालियर आता है और ससुराल से जुड़ी हर चीज का सम्‍मान करना हर पुरुष का परम धर्म है  । उनका मेल :-एक आकस्मिक संयोग, कुछ हिन्‍दी सामग्री की तलाश में मुझे आज आपके पोर्टल पर ले आया । वर्ष 1982 से 1985 की अवधि में मेरी आगर-मालवा की पदस्‍थापना में कुछ ऐसा संयोग बना कि कुछ कविगण और कुछ शायरो ने मुझे कविता और अशआर लिखने की लत लगादी जो आगर छोड़ते ही छूट गयी । एक हसरत जो दिल में आज भी बनी हुई है वह शायरी के गुर सीखने की है । बहुत कोशिश की मगर ऐसा कोई संदर्भ न मिला जो मार्ग प्रशस्‍त कर सकता । कोशिश में ही कमी रही होगी । बहरहाल आपके पोर्टल ने कोशिश को फिर जिन्‍दा कर दिया है । मैं भोपाल में रहता हूँ और तमाम व्‍यस्‍तताओं के बीच भी फिरसे पुराने शौक को जिन्‍दा करना चाहूँगा ।

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सारी खबरें छानकर, इस माह के अखबार से,
सोचता हूँ क्‍या मिला, हमको नई सरकार से ।

पार लहरों के कराता था कभी पतवार से,
आज डर लगता है उसके हाथ की तलवार से ।

आपने जीता है दिलको प्‍यार से, मनुहार से,
जो सिकंदर कर न पाया तीर से, तलवार से ।

सुब्‍ह से हर शाम तक हर बात की कीमत लगी,
अब तो रिश्‍ते भी हमें लगने लगे व्‍यापार से ।

एक सन्‍नाटा बसा है पर मुझे लगता है क्‍यूँ,
रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से ।

शहर् की सड़कों से मेरे गॉंव की गलियॉं भली,
जो भी मिलता था, वो मिलता था बहुत ही प्‍यार से ।

खेल जो खेला था मैंने, किसलिये जीता नहीं,
सीखने की कोशिशें करता रहा मैं हार से ।

ये सहज रिश्‍ता है जिसकी कोई भी कीमत नहीं,
दोस्‍ती, ऐ दोस्‍तों मिलती नहीं बाज़ार से ।

कोई शिकवा, या शिकायत के बिना हम खुश रहे,
कोई उम्‍मीदें नहीं रक्‍खीं कभी संसार से ।

हमने माना आपमें डसने की फितरत ना रही,
रोकता है कौन लेकिन आपको फुफकार से ।

आप कहते हैं कि ‘राही’ आजकल चुपचाप है,
बात तन्‍हाई में क्‍या करता दरो-दीवार से ।

वाह वाह वाह क्‍या बात है साहब आपने तो गजब के शेर निकाले हैं । मतला, मकता और गिरह वाला शेर तीनों ही जबरदस्‍त हैं । तिस पर हमने माना आपमें डसने की, पार लहरों के ये शेर भी खूब हैं ।

मेजर संजय चतुर्वेदी :  मेजर साहब पिछली बार जब तरही में आये थे तो कैप्‍टन थे किन्‍तु अब मेजर होकर आये हैं । ये अलग बात है कि ग़ज़ल की पाठशाला के बंदे बिना मिठाई के किसी भी खुशखबर को खुशखबर नहीं मानते हैं ।संजय जी बहुत ही बेहतरीन शायर हैं । इनका एक संग्रह चांद पर चांदनी नहीं होती  शिवना प्रकाशन से प्रकाशनाधीन है । संजय जी हिंदी के बेहतरीन प्रयोग करते हैं । फिलहाल देहरादून में पदस्‍थ हैं और गौतम के मित्र हैं ।

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माँ से छत, रिश्तों से चौखट और हद है प्यार से

ईंट गारे से नहीं बनता है घर, परिवार से

आदमी-कुदरत के रिश्ते जब जुडे बाज़ार से

क्यँ चरक लुकमान भी लगते हैं कुछ बीमार से

आपके अहसास की कीमत नहीं कुछ भी यहाँ

गमज़दा हों फिर भी हँस कर बोलिये सरकार से

जब सियाही बन क़लम में ख़ून दिल का आ गया

लफ्ज़ लोहा ले रहे हैं देखिये तलवार से

रौशनी के डर से छुप कर तीरगी के प्यार में

रात भर आवाज देता है कोई उस पार से

हो भले ही खून में डूबी हुई हर इक खबर

चाय में चीनी मिलाते हैं मियाँ अखबार से

क्या जरूरत है हमें हीरे की या तकनीक की

हम तो शीशा काटते हैं रौशनी की धार से

वाह वाह वाह मजा ही आ गया है । बहुत ही सुंदर गिरह बांधी है । कई कई शेर जबरदस्‍त बन पड़े हैं । विशेषकर मतले में घर की परिभाषा बहुत ही सुंदर है । शीशा काटने वाला शेर बहुत बढि़या बना है । मेजर साहब प्रमोशन की मिठाई खिलाइये ।

चलिये तो आनंद लीजिये इन ग़ज़लों का और मुझे आज्ञा दीजिये । मिलते हैं अगले अंक में दोनो उस्‍ताद शायरों के साथ ।

 

शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

अवसर है सबकी प्‍यारी बहना कंचन चौहान का जन्‍मदिन 24 जुलाई और स्‍व. ओम व्‍यास स्‍मृति तरही मुशायरे में आज फौजी भाई गौतम राजरिशी और अनुवादक बहन कंचन चौहान की जुगलबंदी

जन्‍मदिन वो विशेष दिन होता है जिसका हम सबको साल भर इंतजार रहता है । हम कहीं भी रहें किसी भी हाल में हों मगर फिर भी हमकों लगता है कि लोग हमारा जन्‍मदिन याद रखें और अचानक से आ धमक कर या फोन करके हमको चौंका दें । लाल सुनहरी पन्नियों में बंधे हुए वे उपहार खोलना कितना आनंददायक लगता है । उस पर नये कपड़े पहन कर इतराना । ऐसा लगता है मानो आज का दिन केवल हमारा ही है । आज 24 जुलाई को ऐसा ही खास दिन है लखनऊ की कवियित्री और मेरी छोटी बहन कंचन चौहान के लिये । आज कंचन का जन्‍मदिन है । कंचन जो पूरे ब्‍लाग जगत की लाड़ली कवियित्री है । या यूं कहें कि लाड़ली बहना है । कंचन का जन्‍मदिन आज है और आज का ये तरही मुशायरा कंचन और कंचन की फौजी वीर जी गौतम राजरिशी के नाम है । आज ये दोनों मिलकर कर रहे हैं जुगल बंदी । जुगलबंदी कविता की, जुगलबंदी शायरी की । रक्षाबंधन पास में ही है और इस अवसर पर इससे अच्‍छा और कुछ भी नहीं हो सकता था कि भाई और बहन एक साथ ही मंच पर आकर कुछ पढ़ें । मैंने बचपन से ही बहन की कमी को सदा मेहसूस किया है दरअसल में हम दो भाई हैं, बहन कोई नहीं है । चाचाजी की बेटियां जब आ जाती थीं तो हमारा रक्षाबंधन हो जाता था नहीं तो सूनी कलाई लेकर घूमते थे रक्षाबंधन के दिन । बचपन में बहुत टीसता था ये दिन । जब दूसरों के हाथों पर भरी भरी राखियां देखते थे । चाचाजी हर बार राखी पर नहीं आ पाते थे । अभी किसी पत्रिका के लिये रक्षा बंधन विशेषांक के लिये कहानी लिख रहा था शीर्षक था 'मिन्‍नी की चिट्ठी गोलू के नाम' लिखता जा रहा था और रोता जा रहा था, पता नहीं क्‍यों । 

खैर वो बातें बाद में आज तो मिठाई-‍शिठाई, केक-शेक का दिन है । आज तो गुड़ के मीठे गुलगुले बनाने का दिन है और जन्‍मदिन के अवसर पर सिर पर उन गुलगुलों की बरसात करने का दिन है । ब्‍लाग जगत, ग़ज़ल की पाठशाला की ओर से

flower कंचन चौहान को जन्‍मदिन की शुभकामनाएं flower-designer-ignacio-villegas

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स्‍व. ओम व्‍यास स्‍मृति तरही मुशायरा : इस बार का ये मुशायरा बहुत ही कामयाब रहा है इस मायने में कि इस बार कई बहुत अच्‍छी रचनाएं मिली हैं । कई बहुत अच्‍छे शेर मिले हैं ।   अब ऐसा लगता है कि अगली बार कुछ मुश्किल सा मिसरा  देना होगा । इस बार हम हर अंक में बहर रमल मुसमन महजूफ पर कोई गीत या गज़ल भी सुन रहे हैं । इस बार एक बहुत ही प्‍यारी सी ग़ज़ल जिसे गाया है स्‍वर साम्राज्ञी आदरणीया लता मंगेशकर जी ने ये ग़ज़ल सबा अफ़गानी जी  की लिखी हुई है । इसमें एक मिसरे  शायद अब तस्‍कीन का पहलू नज़र आने लगे को पढ़ते समय लता जी ने एक गैप लिया है शायद और अब के बीच में । पहले तो ये बताएं कि क्‍या ये मिसरा बहर में है । और क्‍या लता जी ने गैप उसी कारण से लिया है कि वहां पर बहर की समस्‍या आ रही है । या फिर ऐसा तो नहीं है कि मिसरा तो बहर में है लेकिन संगीतकार ही लताजी को ठीक से नहीं समझा पाया कि इस मिसरे में क्‍या खास है । ये ग़ज़ल जगजीत सिंह साहब और लता जी के अनोखे एल्‍बम सजदा से है ।

 

डाउनलोड लिंक

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और अब मुशायरा जिसकी शुरुआत कर रहे हैं वीर जी ।

गौतम राजरिशी :  गौतम में कुछ ऐसा खास है जो हरेक को अपनी ओर खींचता है । गौतम की ग़ज़लें कुछ नये प्रयोग लिये होती हैं । और ये ग़ज़लें गौतम की संवेदनाओं का परिचय देती हैं । कि ये फौजी अपनी हरी वर्दी के पीछे कितना संवदेनशील सा दिल रखता है । गौतम और कंचन का भाई बहन का रिश्‍ता है  । गौतम पूर्व में देहरादून में पदस्‍थ थे अब कहीं सीमा पर हैं । एक बहुत रोचक जानकारी इनके बारे में ये है कि जब भी ग़ज़ल की पाठशाला में ये डंडे खाते हैं तो सबसे जियादह खुश हमारी बहूरानी होती है और बहूरानी का तो यहां तक कहना है कि जब भी ग़ज़ल की पाठशाला में गौतम को डंडे लगाये जाएं तो एक दो डंडे उनकी ओर से भी लगा दिये जायें ।  इस बार के तरही की ग़ज़ल गौतम ने दो लोगों को समर्पित की है कुछ शेर समर्पित किये हैं अपनी प्‍यारी बहना कंचन चौहान को और कुछ शेर समर्पित किये हैं मेजर स्‍व. ऋषि‍केश रमानी छोटू  को ।

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इसे ही तो कहते हैं फेफड़ा फाड़ हंसी

मतला और पहला शेर अपने छोटु ऋषिकेश रमानी को समर्पित है। शौर्य ने एक नया नाम लिया खुद के लिये- ऋषिकेश रमानी । अपना छोटु था वो। उम्र के 25वें पायदान पर खड़ा आपके-हमारे पड़ोस के नुक्कड़ पर रहने वाला बिल्कुल एक आम नौजवान, फर्क बस इतना कि जहाँ उसके साथी आई.आई.टी., मेडिकल्स, कैट के लिये प्रयत्नशील थे, उसने अपने मुल्क के लिये हरी वर्दी पहनने की ठानी। ...और उसका ये मुल्क जब सात समन्दर पार खेल रही अपनी क्रिकेट-टीम की जीत पर जश्‍न मना रहा था, वो जाबांज बगैर किसी चियरिंग या चियर-लिडर्स के एक अनाम-सी लड़ाई लड़ रहा था। आनेवाले स्वतंत्रता-दिवस पर यही उसका ये मुल्क उसको एक तमगा पकड़ा देगा।

आप तब तक बहादुर नहीं हैं, जब तक आप शहीद नहीं हो जाते

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चीड़ के जंगल खड़े थे देखते लाचार से

गोलियाँ चलती रहीं इस पार से उस पार से

मिट गया इक नौजवां कल फिर वतन के वास्ते

चीख तक उट्ठी नहीं इक भी किसी अखबार से

तरही में हमदोनों भाई-बहन की जोड़ी को इकट्ठा लाकर बड़ा उपकार किया है आपने गुरूदेव...इतने कम दिनों में कंचन से अनूठा रिश्ता हो गया है\ दो शेर जोड़े हैं....अपनी अनुजा कंचन को समर्पित ये दो शेर:-

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पुण्य होगा ये मेरे पिछले जनम का ही कोई

जिंदगी में तू चली आई है जिस अधिकार से

हर खुशी तुझको मिले, सपने तेरे सच हों सभी

माँगता हूँ बस यही मैं सच्चे उस दरबार से

कितने दिन बीते कि हूँ मुस्तैद सीमा पर इधर

बाट जोहे है उधर माँ पिछले ही त्यौहार से

अब शहीदों की चिताओं पर कहां मेले कोई

है कहाँ फुरसत जरा-भी लोगों को घर-बार से

मुट्ठियाँ भींचे हुये कितने दशक बीतेंगे और

क्या सुलझता है कोई मुद्‍दा कभी हथियार से

मुर्तियां बन रह गये वो चौक पर चौराहे पर

खींच लाये थे जो किश्ती मुल्क की मँझधार से

बैठता हूँ जब भी ’गौतम’ दुश्‍मनों की घात में

रात भर आवाज देता है कोई उस पार से

इस ग़ज़ल वाह वाह क्‍या शेर निकाले हैं मेरे विचार में तरही की श्रेष्‍ठ गिरह है ये । जिसमें दो शेड दिखाई दे रहे हैं । कंचन को और छोटू को समर्पित शेर भावनाओं से भरपूर है । मेरे विचार में ये भी अपने ही प्रकार की पहली ग़ज़ल होगी जिसके कुछ शेर किसीकी विदाई पर श्रद्धांजलि दे रहे हैं तो कुछ शेर किसीको जन्‍मदिन की शुभकामनाएं । यही तो है जीवन जिसमें आंसू और हंसी की दो दो चुटकी है ।

कंचन चौहान - और अब आ रही हैं बर्थडे गर्ल । जी हां कंचन चौहान । इस ग़ज़ल के बारे में एक बात बताना चाहूंगा । मेरी नानीजी आई हुईं थीं जब कंचन की ये गज़ल मिली । वे जब भी आती हैं तो उनको मैं कुछ भावनात्‍मक कविताएं ज़रूर सुनाता हूं । जैसे अनु शर्मा सपन की ग़ज़ल अब के सावन में जब बदलियां आएंगी या कबीर का कुछ भी । इस बार मैं कंचन की ग़ज़ल का प्रिंट लेकर घर गया और एक रविवार को घर झूले पर उनके साथ बैठे हुए ये ग़ज़ल उनको सुनाई । आखिरी शेर पर उनकी आंखें सजल हो गईं । मुझे लगा कंचन की ग़ज़ल सफल हो गई । कंचन में चौंका देने वाली संवेदनशीलता है । वे हवा में तैर रही हल्‍की हल्‍की आवाज़ों को पकड़ लेती हैं । आज जन्‍मदिन के अवसर पर सुनिये तरही मुशायरे में उनकी ये ग़ज़ल ।

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करवटें लेते हैं और सुनते हैं बस लाचार से,
रात भर आवाज देता है कोई उस पार से।

देर तक बरसो बरस के जब रुको, फिर से घिरो,
प्यास धरती की कहे बादल से ये अधिकार से।

घिर के आये, झूम कर छाये, मगर फिर गुम हुए,
रूठ बैठी है धरा, बादल के इस व्यवहार से।

बास है नाराज एसी काम क्यों करता नही,
और चपरासी के घर बिजली नही इतवार से।

हाथ में ढोलक थमी है और आँखों में नमी,
घर में नवदीपक की लौ आई समंदर पार से।

धान फिर थोड़ा हुआ अम्मा के घर इस बार भी,
फिर नही आये बिरन लेने हमें ससुरार से।

वाह वाह वाह क्‍या ग़ज़ल है अंतिम दो शेर सुन कर कोई भी रो दे । एक बात और इतवार का प्रयोग बहुत सुंदर किया है । मतले में ही जो जबरदस्‍त गिरह बांधी है वो तो अद्भुत है । इसे कहते हैं एन जन्‍मदिन के दिन ही धमाकेदार प्रस्‍तुति । पिछली बार कंचन ने हासिले मुशायरा का खिताब जीता था ये याद रहे । जीत एक जुनून पैदा करती है ।

चलते चलते ये दो गीत कंचन को जन्‍मदिन के उपहार में आप भी सुनिये इन दोनों गीतों को और बताइये कि कैसा है जन्‍मदिन का ये तोहफा ।

गीत क्रमांक 1

गीत क्रमांक 2

अगले अंक में तैयार रहिये उस्‍तादों की जुगलबंदी के लिये । और हां ऊपर जो प्रश्‍न पूछा है कि उस ग़ज़ल में लता जी ने गैप के साथ क्‍यों गाया है उसका उत्‍तर अवश्‍य दें । और हां यदि परीकथा का ताजा अंक मिले तो उसमें एक कहानी है मेरी अलग शेड की उसे ज़रूर पढ़ें ।

मंगलवार, 21 जुलाई 2009

रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से : स्‍व. ओम व्‍यास स्‍मृति तरही मुशायरे में अब बारी है अभिनव शुक्‍ला और डॉ. मोहम्‍म्‍द आज़म की । और कल का सूर्य ग्रहण ।

कल पूर्ण सूर्य ग्रहण है, एक अद्भुत खगोलीय घटना । जो कि जीवन में एक ही बार होती है । इस बार का सूर्य ग्रहण हमारे सीहोर के लिये खास है क्‍योंकि इस बार सूर्य ग्रहण की ये पट्टी हमारे जिले के ठीक ऊपर से होकर निकल रही है । इसका मतलब ये है कि हमारा शहर और जिला दोनों ही पूर्ण सूर्य ग्रहण का आनंद उठायेंगें । हां ये अलग बात है कि बादल खलनायक बन सकते हैं । यदि सब कुछ ठीक रहा तो कल आपको पूर्ण सूर्य ग्रहण के चित्र तथा वीडियो दिखाये जायेंगें । हां एक अनुरोध है बहुत मेहनत से इस ग्रहण पर एक शोध पत्र तैयार किया है समय निकाल कर उसे मेरे समाचारों के ब्‍लाग कुछ खबरें कुछ बातें पर जाकर जरूर पढ़ें या फिर विकीपीडिया पर जाकर देखें । और पूर्ण सूर्यग्रहण को कहां देखा जाये उसके लिये यहां जाकर देखें । आप देखेंगें तो मुझे ऐसा लगेगा कि मेरी मेहनत सफल हो गई है । बहुत मेहनत से ये शोध पत्र तैयार किया है मैंने ।

स्‍व. ओम व्‍यास स्‍मृति तरही मुशायरा इस बार का तरही मुशायरा बहुत ही जबरदस्‍त जा रहा है । पहली बार ऐसा हो रहा है कि कोई भी शायर बेबहर नहीं हो रहा है और पूरी तरह से जमे हुए शेर कह रहा है । रविकांत और वीनस ने पिछले अंक में राहुल द्रविड़ और सौरव गांगुली की तरह बेटिंग की थी । रविकांत वैसे भी राहुल द्रविड़ की ही तरह कूल कूल हैं । और वीनस का स्‍वभाव भी गांगुली से मिलता है । सचिन कौन है ये अगले अंक में ज्ञात होगा । इस बार हम हर अंक में एक गीत या ग़ज़ल सुनते हैं जो कि उसी बहर पर होता है । इस बार भी एक ग़ज़ल सुनिये ये ग़ज़ल जनाब सैयद फज़लुल हसन 'हसरत मोहानी' साहब  की है । इसमें वैसे तो मतले के साथ बीस से भी जियादह शेर हैं किन्‍तु फिल्‍म निकाह में इसमें से कुछ चुनिंदा लिये गये थे । यहां फिल्‍म निकाह की ग़ज़ल नही दी जा रही है बल्कि परम आदरणीय श्री गुलाम अली साहब द्वारा गाई गई मूल ग़ज़ल है जो लगभग 11 मिनिट की है सुनें और आनंद लें । मुझे ये लगता है कि निकाह में जो शेर लिये गये थो वो इस ग़ज़ल के सबसे कमजोर शेर थे । विशेषकर इस ग़ज़ल का कंगन घुमाने वाला शेर तो जबरदस्‍त है ।

 

डाउनलोड के लिंक

http://www.archive.org/details/ChupkeChupkeRaatDin 

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तरही मुशायरा

अभिनव शुक्‍ला :- अभिनव पूर्व में ग़ज़ल की कक्षाओं के नियमित विद्यार्थी हुआ करते थे लेकिन कुछ ग़मे दौरां और कुछ ग़मे जानां के कारण अभी व्‍यस्‍त हैं । ये बहुत अच्‍छे कवि हैं । आवाज़ बहुत ही मधुर है कविताएं भी बहुत बढि़या तरीके से गाते हैं । अभिनव कुछ दिनों पूर्व एक सुंदर बेटे अथर्व के पिता बने हैं । अथर्व नाम रखने से ही पता चलता है कि अभिनव परदेस जाकर भी किस प्रकार से देश से जुड़े हैं । फिलहाल सिएटल में कार्यरत हैं । संवदेनाओं से भरपूर कविताएं लिखते हैं । आइये सुनें इनकी ग़ज़ल

 

KaviAbhinav_Philadelhia-eKavyaPath

हम ये कहते हैं मना लेंगे उन्हें हम प्यार से,
और वो करते हमें आदाब भी तलवार से,

नींद आती है बहुत पर सो नहीं पाते हैं हम,
रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से,

ये न पूछो क्या हुआ, कैसे हुआ, किसने किया,
बात छोटी सी थी पर उसने कही विस्तार से,

आम लोगों की समस्या एक हो तो कुछ कहें,
आ ही जाती हैं हजारों चीटियाँ दीवार से,

सिर्फ दीवारों की मज़बूती से घर बचता नहीं,
हो अगर मज़बूत तो मज़बूत हो आधार से.

वाह वाह वाह सारे शेर जबरदस्‍त हैं ।ये न पूछो क्‍या हुआ कैसे हुआ किसने किया वाह मजा ही आ गया इसमें तो गिरह भी बहुत अच्‍छी बांधी है । मतले मे तो एक विशेष प्रकार का आनंद है ये आनंद उर्दू के पारंपरिक शायरों में काफी मिलता है । वाह वाह अथर्व के पप्‍पा  मजा ला दिया आपने तो ।

डॉ. मोहम्‍मद आज़म : मेरे बहुत अच्‍छे मित्र और उतने ही अच्‍छे शायर हैं । अलीगढ़ मुस्‍लिम विवि से आपने यूनानी पद्धति से चिकित्‍सा में डिग्री हासिल की है और अभी सीहोर के शासकीय अस्‍पताल में पदस्‍थ हैं । खुले विचारों के धनी डॉ आजम बहुत डूब कर ग़ज़लें लिखतें है और इनकी ग़ज़लें उर्दू की सभी प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में छपती रहती हैं । खूब मुशायरों में शिरकत करते हैं । एक और विशेषता ये है कि ये हिंदी के भी जबरदस्‍त हिमायती हैं । हिंदी में भी ग़ज़लें और कविताएं खूब लिखते हैं । मंच के बेहतरीन संचालक हैं । ये जब भी संचालन के दौरान मुझे ग़ज़ल पढ़ने आमंत्रित करते हैं तो कहते हैं कि अब मैं एक जेनुइन साहित्‍यकार  को बुला रहा हूं । इन दिनों भोपाल में मुशायरों में धूम मचाये हुए हैं । पूर्व में स्‍थानीय चैनल पर समाचार भी पढ़ते रहे हैं । जिन लोगों को वसंत पंचमी का आनलाइन कवि सम्‍मेलन याद हो तो उसमें इन्‍होंने ही मंच संचालन किया था । अब ये हमारे तरही में नियमित आयेंगें । चलिये इनकी ग़ज़ल सुनें

azam ji

मस्‍अले वह भी सुलझ जाते ख़ुलूसो प्‍यार से
जिन को सुलझाने चले हो तेग़ से तलवार से

एक दूजे से हैं दोनों इसलिये बेज़ार से
तुम भी हो तलवार से और हम भी हैं तलवार से

आजकल हम ऊब कर इस मतलबी संसार से
कर रहे हैं गुफ्तगू गूंगे दरो दीवार से

चांद को आग़ोश में लाना पड़ेगा क्‍या हमें
दिल बहलता ही नहीं अब दूर के दीदार से

जानी दुश्‍मन भी जिसे सुनकर हुए हैं शर्मसार
ज़ख्‍़मे दिल ऐसे मिले हैं एक जिगरी यार से

तेरी फ़ुर्क़त ने मिरे चेहरे से छीनी है चमक
सब हैं कहते दिख रहे हो आजकल बीमार से

हां में हां सबकी मिला कर हो गए हैं पस्‍ता क़द
क़द बढ़ाना है हमें अब जुर्रअते इन्‍कार से

मिलने जुलने में भी है सूदोज़यां का ही ख़याल
रिश्‍ते नाते हो गये हैं आजकल व्‍यापार से

जेब में पैसे नहीं और जिंस भी सस्‍ती नहीं
हम भला लाते भी क्‍या 'आज़म' सजे बाज़ार से

(जिंस -अनाज)

वाह वाह वाह कमाल के श्‍ोर निकाले हैं । विशेष कर  हां में हां सबकी मिलाकर हो गये थे पस्‍ता क़द ( बोने), क़द बढ़ाना है हमें अब जुर्रअते इनकार से ( इनकार करने की जुर्रत ) ।  ये शेर बहुत कुछ कह रहा है । चांद को आग़ोश में लाने वाला शेर भी बहुत जबरदस्‍त है । तालियां तालियां तालियां ।

सूचना 1 :-  अगला अंक बहुत खास होने वाला है जिसमे एक जोड़ी आ रही है । जोड़ी है भाई और बहन की जोड़ी । रक्षा बंधन के पूर्व बहन के जन्‍म दिवस के खास मौके पर ये फौजी भाई और अनुवादक बहन की जोड़ी अपनी अपनी ग़ज़लें प्रस्‍तुत करेगें । भाई यदि अपनी बहन को कोई शेर तरही में बढ़ा कर देना चाहता हो तो कल तक दे दें । ये अंक 24 जुलाई को आयेगा । और ये अंक प्‍यारी बहना को समर्पित रहेगा ।

सूचना 2 :-  उसके बाद के अंक में भी एक खास बात है कि उसमें भी एक उस्‍ताद शायर और एक उस्‍ताद शायरा की जुगलबंदी देखने को मिलेगी । तो इन दोनों अंकों की प्रतीक्षा करें ।

रविवार को सीहोर के पास के घने जंगलों में पिकनिक मनाई झरनों में नहाने का आनंद लिया और नदी में तैरने का । जम कर हो हरी बारिश में घने जंगलों में पगडंडी पर मोटर बाइक चलाने का अपना ही आनंद है । सीहोर से 50 किलोमीटर दूर है कालियादेव । ये वो स्‍थान है जहां पर बाज बहादुर ने रूपमती को देखा था । आजकल यहां पर पितृमोक्ष अमावस्‍या को भूतों का मेला लगता है । सुंदर पहाड़ी सीप नदी जब झूम कर पत्‍थरों से गिरती है तो आनंद ही आ जाता है । पहाड़, नदी, जंगल, झरने यदि ईश्‍वर ने नहीं बनाये होते तो होता ही क्‍या जीवन में ।  देखिये कुछ चित्र ।

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शनिवार, 18 जुलाई 2009

रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से - स्‍व. ओम व्‍यास स्‍मृति तरही मुशायरे में आज सुनिये वीनस केसरी और रविकांत पांडे को ।

( सूचना यदि ब्‍लाग इंटरनेट एक्‍सप्‍लोरर में न खुले तो मोजिला फायर फाक्‍स या गूगल क्रोम में खोलें )

कभी कभी बहुत मन व्‍यथित होता है और ये व्‍यथा होती है मोबाइल में फीड किये हुए नंबरों के कारण । दो साल पहले अग्रज कवि श्री मोहन राय का असमायिक निधन हो गया । उनका नंबर वो नंबर था जिससे अमूमन दिन में एक या दो बार फोन आता ही था । उनके जाने के बाद जब एक दिन जब मोबाइल की फोन बुक तलाश कर रहा था तो उनका नंबर सामने आया । बहुत कोशिश की किन्‍तु वो नंबर डिलिट नहीं कर पाया । नंबर जिससे अब कभी फोन नहीं आयेगा । ऐसा ही इन दिनों एक नंबर के साथ हो रहा है । वो नंबर है स्‍व. ओम दादा का नंबर । उनकी व्‍यस्‍तता के चलते उनसे काफी काफी दिनों में बात होती थी लेकिन जब भी होती थी तो लम्‍बी होती थी । आवश्‍यक सूचनाएं वे मुझे एसएमएस करके दे दिया करते थे । अब वो नंबर भी ऐसा हो गया है जिससे कभी फोन नहीं आयेगा । फिर भी उस नंबर को हटाने की हिम्‍मत न आज हो रही है न कल ही हो पायेगी । इंसान कितना कुछ छोड़ जाता है अपने पीछे ।

मुशायरा आज जब ये पोस्‍ट लिख रहा हूं तो आंखें उनींदी हैं । रात तीन बजे मुशायरे से घर लौटा हूं । और सुबह अपनी आदत के अनुसार पांच बजे उठ गया । सो नींद में हूं अभी भी । ऑफिस सात बजे पहुंचना होता है सो चाहे रात को चार बजे तक जागो सुब्‍ह तो पांच बजे उठना ही है । अंजुमन सूफियाना उर्दू अदब की ओर से ये कार्यक्रम आयोजित होता है । बहुत मुहब्‍बतों वाले लोग हैं । विशेषकर हिंदी और हिंदू कवियों तथा शायरों को तो पलकों पर बिठा कर रखते हैं । पहली बार एक ऐसी जगह मुहब्‍बतों की ग़ज़ल 'ये घटाएं तेरी जुल्‍फ से हैं उठीं' पढ़ी जहां श्रोताओं में मेरे हार्डवेयर के आठ दस स्‍टूडेंट्स भी थे । क्‍लास में सख्‍त और अनुशासन प्रिय अपने टीचर को मुहब्‍बतों की ग़ज़ल तरन्‍नुम में पढ़ते देख क्‍या सोचा होगा ये तो वे ही जानें । मुशायरा कामयाब रहा । हमेशा की तरह दूसरा दौर पूरी तरह से विशुद्ध शायरी का रहा । श्री रमेश हठीला मंच लूट कर अपने घर ले गये । जो मैंने कहा कि पूरी तरह से मुस्लिम इलाके में होने वाले इस आयोजन में जिस प्रकार हठीला जी को, मुझे हाथों हाथ लिया जाता है वो अभिभूत कर देता है । कार्यक्रम के संचालक मेरे मित्र डा मोहम्‍मद आजम ने पहले तो हमारे इस तरही मुशायरे का जिक्र किया और फिर इसी मिसरे पर लिखी अपनी ग़ज़ल प्रस्‍तुत की जिसे अगले अंक में आप देख पायेंगें । मेरे जिस शेर ने सबसे जियादह दाद पाई वो था ' अजब जादू है अपने मुल्‍क के थानों में यारों, यहां गूंगा भी आ जाये तो वो भी बोलता है'  मजे की बात ये है कि कार्यक्रम स्‍थल पर तैनात पुलिसकर्मियों ने तीन बार ये शेर सुना मुकर्रर कर करके ।  और इसी ग़ज़ल के इस शेर ने ' भिगाती है मुझे शब भर तेरी यादों की बारिश, न जाने कौन माज़ी के दरीचे खोलता है' को भी खूब पसंद किया गया । 

स्‍व. ओम व्‍यास स्‍मृति तरही मुशायरा :  मुशायरे का पिछला अंक जबरदस्‍त गया है और आज अगले अंक पर जाने से पहले एक नज्‍म सुनें इसी बहर पर । ये नज्‍म टी वी सीरियल कहकशां में श्री जगजीत सिंह साहब ने गाई थी । श्री जलाल आगा सा‍हब ने वो सीरियल बनाया था । अगर आपके पास कहकशां के दोनों कैसेट नहीं हैं तो आपके खजाने में दुर्लभ हीरे नहीं है । सुनिये श्री जोश मलीहाबादी साहब की ये नज्‍म जिसको जब भी सुनता हूं रोता हूं खूब रोता हूं । नज्‍म के बारे में और जानना हो या नज्‍म को पढ़ना हो  तो यहां जाएं ।

चलिये सुनिये अब ये नज्‍म

 

नज्‍म को यहां से भी सुन सकते हैं

http://www.archive.org/details/Alvida_616

वीनस केसरी :  वीनस इलाहाबाद के हैं । इलाहाबाद जो कभी भारत की राजधानी तो नहीं था लेकिन उससे कम भी नहीं था । साहित्यिक रूप से भी बहुत समृद्ध था कभी । वीनस उसी इलाहाबाद के हैं और वहीं रह कर अपनी एक दुकान चलाते हैं पुस्‍तकों की । बहुत अच्‍छी ग़ज़ले लिखते हैं । और कभी कभी अपने ब्‍लाग पर कोई ऐसी पोस्‍ट लगा देते हैं जो किसी को समझ में नहीं आती ।

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क्या मिला है क्या मिलेगा अश्क के व्यापार से
हर घडी जी लो मुहब्बत से,खुशी से,प्यार से

सरहदों से बाँट कर जब ख्वाहिशों के दिन ढले
रात भर आवाज देता है कोई उस पार से

प्यार इक टुकडा, खुशी की कतरनें ले आना तुम
मोल दे कर गर खरीदा जा सके बाज़ार से

आपकी सोहबत ने हमको क्या हसीँ तोहफे दिए
ख्वाहिशें लाचार सी औ ख्वाब कुछ बेजार से

जीतने के सब तरीके सीख कर मैं जब लड़ा
जिन्दगी ने फिर सबक सिखला दिया है हार से

हम किताबे जिन्दगी के उस वरक को क्या पढ़े
जो शुरू हो प्यार से औ ख़त्म हो तकरार से

इक सफ़र पूरा किया है उम्र छोटी है तो क्या
रात काटी मर्सियों से दिन विसाले खार से

वाह वाह वाह क्‍या बात है । अच्‍छे और उस्‍तादाना अंदाज़ के शेर निकाले हैं वीनस बधाई हो । विशेषकर ये शेर तो बहुत बढि़या है जीतने के सब तरीके सीख कर मैं जब लड़ा, जिन्दगी ने फिर सबक सिखला दिया है हार से । इस बार का तरही मुशायरा रंग में है ।

रविकांत पांडेय : रविकांत के बारे में एक महत्‍वपूर्ण बात ये है कि ये भूत देख चुके हैं । खुद तो डरे सो डरे कहानी सुना कर हमें अब भी डरा रहे हैं । आप भी चाहें तो भूत की कहानी यहां ताऊ के ब्‍लाग पर देख सकते हैं । अभी ताजे ताजे शादी शुदा हुए हैं । और शादी तथा शोध एक साथ ही कर रहे हैं । ग़ज़लें अच्‍छी लिखते हैं और इससे पता चलता है कि ग़ज़ल की प्रेरणा ( बहूरानी) बहुत अच्‍छी हैं । सुनिये ग़ज़ल ।

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मुग्ध होना बाद में उसकी मधुर झंकार से
दर्द पहले पूछना वीणा के घायल तार से

देखकर हैरान हूं मैं इस नगर की रीतियां
पांव छू आशीष लेता चोर थानेदार से

उफ़ किये बिन सह गये जो पत्थरों की चोट को
सूरमा वो चित हुये नज़रों के हल्के वार से

आसमां में तय नहीं होते हैं रिश्ते आजकल
थोक में इनको खरीदो चौक से,
बाज़ार से

मैं अनाहत नाद सा सुनता हूं उसको मौन हो
रात भर आवाज देता है कोई उस पार से

जो सहारा तू न दे तो दुख के इस तूफ़ान में
कौन उबारे जिंदगी की नाव को मंझधार से

भक्त को रोका गया जब जन्म के आधार पर
लौटता था देवता भी मंदिरों के द्वार से

वाह वाह क्‍या शेर निकाले हैं । मैं अनाहत नाद सा सुनता हूं उसको मौन हो, रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से । ये सचमुच ही मौन रहकर सुना जाने वाला शेर है । पूरी ग़ज़ल के कई शेर वाह वाह करना मांग रहे हैं लेकिन वो करना आपकी जिम्‍मेदारी है । तीसरे नंबर का उफ़ किये बिन वाला शेर रवि ने बहुरानी को समर्पित किया है ।

संयुक्‍त अक्षर :  रविकांत के ब्‍लाग पर लगी पिछली ग़ज़ल को लेकर वीनस ने कुछ शंका व्‍यक्‍त की थी कि

रवि भाई मक्ता पढने में कुछ अटक रहा है ।

मैंने रवि को कहा था कि शंका का समाधान किया जाये । मकता कुछ यूं है , दर्द से बेहाल जनता द्वार पर कब से खड़ी, किन्‍तु फुरसत है कहां राजा को नाच और गान से

इस पर रवि ने अपना जो उत्‍तर भेजा है वो ये है ।  गुरू जी,  मेरे ख्याल से इसे ऐसे समझाया जा सकता है।
किन्‍तु फुरसत(२१२२) है कहां रा(२१२२) जा को नाच और(२१२२) गान से (२१२)
अब यहां नाच+और =नाचौर हो रहा है जिसका वज्न २२ है। गज़लों में और का वज्न २१ भी होता है ता २ भी मान्य है। यह जो दो शब्दों को जोड़ने की प्रक्रिया है इसे गालिब का निम्न उदाहरण और स्पष्ट करता है-
रमल मुसममन मशकूल 1121 2122 1121 2122  ये न थी हमारी क़िसमत कि विसाले यार होता
अगर और जीते रहते यही इनतिज़ार होता (इसमें अगर+और = अगरौर हुआ है)
दूसरा उदाहरण  रमल मुसममन मख़बून महज़ूफ़ 2122 1122 1122 22 बसकि दुशवार है हर काम का आसां होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इनसां होना, वाए दीवानगी-ए शौक़ कि हर दम मुझ को
आप जाना उधर और आप ही हैरां होना (इस शेर में उधर+और+आप = उधरौराप हुआ है)

अच्‍छा उत्‍तर है रवि, बस ये संशोधन कि वो संयुक्‍त शब्‍द नाच तथा उर ( और का लघु रूप ) का संयुक्‍त है जिसका उच्‍चारण है नाचुर 22, नाचौर में तो 221 हो जायेगा । उदाहरण बहुत अच्‍छे दिये हैं रवि ।

 

मंगलवार, 14 जुलाई 2009

रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से । स्‍व. ओम व्‍यास स्‍मृति तरही मुशायरे में आज सुनिये दो युवाओं को अंकित सफर को और प्रकाश अर्श को ।

( इंटरनेट एक्‍सप्‍लोरर में न खुले तो मोजिला या गूगल क्रोम में खोलें । )

कई सारे फोन आ रहे हैं ओम जी को लेकर । चल मेरी सासू जी का फोन आया । ग्‍व‍ालियर में कवि सम्‍मेलन में उनको मैंने ओम जी से मिलवाया था । वे ओम जी की विनम्रता अभी तक नहीं भूली हैं । बहुत दुखी थीं । कह रहीं थीं कि जिस दिन ओम जी का समाचार सुना उस दिन पूरा दिन मन खराब रहा । ईश्‍वर की सत्‍ता के आगे कौन क्‍या कर सकता है । शायद उसे ओम जी की जियादह ज़रूरत होगी । हम इंसानों के कर्म देख देख कर उसकी भी हंसी खो गई होगी और उसी कारण उसने ओम जी को बुला लिया कि वो भी हंस सके ।

स्‍व. ओम व्‍यास स्‍मृति तरही मुशायरा

आज हम आगे चलते हैं और आगे चलने से पहले बात करते हैं पिछले बार के कन्‍फ्यूजन की । कई लोगों ने प्रकाश सिंह जी को प्रकाश अर्श समझ लिया था । मेरे पास भी उनका कोई चित्र नहीं था सो कुछ नहीं लगा पाया । खैर बाद में पता लगा कि वे प्रकाश पाखी हैं । और अभिव्‍यक्ति के नाम से अपना ब्‍लाग चलाते हैं । ये है उनका चित्र ।

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प्रकाश पाखी

आज तरही मुशायरे के तीसरे अंक में हम ले रहे हैं दो युवा शायरों को । युवा किस माने में । युवा इस माने में कि ये दोनों ही अभी तक कुंवारे हैं । मेरे विचार में युवा होने की सबसे ठीक परिभाषा यही है कि अगला कुंवारा हो । अब ये मत पूछियेगा कि श्री अटल बिहारी वाजपेयी भी इस हिसाब से युवा हुए कि नहीं । तो आज हम ले रहे हैं दो बेचलर शायरों को । अंकित को तो ये शिकायत हमेशा रहती है कि मैं उसकी शादी के पीछे पड़ा रहता हूं । बड़ा भाई हूं इतनी परवाह तो होगी ही । छोटा भाई सुंदर हो स्‍मार्ट हो, मुंबई जैसे शहर में रह रहा हो तिस  पर शायर भी हो तो चिंता तो होगी ही ।प्रकाश की चिंता मुझे इसलिये नहीं है कि वो इतना संकोची है कि कुछ कहने में ही ढाई साल लगा देगा । खैर ये तो मजाक की बात । पिछली बार के दोनों ही शायर सुपरहिट हुए हैं । और आज फिर दो  यूवा तुर्क अपनी ग़ज़लें लेकर महफिल में आ रहे हैं ।

पहले सुनते हैं इसी बहर पर गाई हुई ग़ज़ल गायकी के सम्राट श्री जगजीत सिंह साहब की गाई हुई और हिंदी तथा आम बोलचाल की भाषा  को ग़ज़ल की भाषा बनाने में सबसे जियादह योगदान देने वाले देश के मशहूर शायर तथा मध्‍यप्रदेश उर्दू अकादमी के अध्‍यक्ष श्री बशीर बद्र साहब की लिखी हुई ये ग़ज़ल । बद्र साहब इन दिनों अस्‍वस्‍थ हैं तथा स्‍मृति भ्रम का शिकार हो गये हैं । जिसे शायद अल्‍जाइमर भी कहते हैं । ईश्‍वर उनको स्‍वस्‍थ करे ।

सुनिये एल्‍बम विज़न्‍स से ली गई ये ग़ज़ल । ये एल्‍बम इसी प्रकार की दुर्लभ ग़ज़लों से भरा हुआ डबल कैसेट के सेट में आया था । जिसमें कैफ़ भोपाली साहब की मशहूर और मेरी सबसे पसंदीदा ग़ज़ल कौन आया है यहां भी शामिल थी ।

यदि प्‍लेयर न चले तो यहां जाकर सुनें

http://www.archive.org/details/SarJhukaogeToPathar

या यहां से डाउनलोड करें ।

http://www.divshare.com/download/7897590-55d

अंकित सफर :

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अभी तक इनको केवल चित्रों में ही देखा है और जो देखा है उससे ये पाया है कि ये बहुत मासूम सूरत के धनी हैं । फिलहाल मुम्‍बई में किसी बैंक में सेवारत हैं । पूना से इन्‍होंने एमबीए का कोर्स अभी पूरा किया है और तुरंत ही नौकरी में आ गये हैं । उत्‍तराखंड के रहने वाले हैं और अभी इनकी शादी नहीं हूई । इनके लिये कोई सुंदर सी ग़ज़ल की तलाश जारी है जो इनकी जीवन संगिनी बन सके ।

हौसले रखता जवां हूँ कोशिशों की धार से.
कुछ न कुछ मैं सीखता हूँ अपनी हर इक हार से.

इक नयी उम्मीद लेके आएगी कल की सहर,
रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से.

बात जिसने भी कही ये खूब ही उसने कही,
हो किसी को जीतना तो जीत लेना प्यार से.

तू बहुत पीछे कहीं ना छूट जाये आदमी,
चाहता पाना है सब कुछ तू बड़ी रफ़्तार से.

या तो वादा ना करो या फिर निभाना भी उसे,
बस यही हूं चाहता मैं हिंद की सरकार से.

भीग सारे ही गए कागज़, ग़ज़ल ख़ुद भी "सफ़र",
याद के बादल उमड़ बरसे बहुत बौछार से.

वाह वाह वाह बहुत अच्‍छे शेर निकाले हैं अंकित ने । विशेषकर जो मिसरा ए तरह के साथ गिरह बांधी है वो तो जिस प्रकार से सकारात्‍मक सोच लिये हुए है वो आनंद देने वाली है । मिसरे पर सकारात्‍मक गिरह भी बांधी जा सकती है ये बताने के लिये आभार अंकित की इस ग़ज़ल का । शेर आदमी वाला भी बहुत अच्‍छा है । बहुत अच्‍छी ग़ज़ल, मुशायरे को और ऊंचाइयों पर ले जाने के लिये बधाई ।

प्रकाश अर्श :

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प्रकाश के बारे में क्‍या कहूं । ये मेरे विचार में श्रद्धेय नीरज गोस्‍वामी जी का पाकेट संस्‍करण है । नीरज जी की विनम्रता, उनकी सौम्‍यता सब कुछ प्रकाश ने मानो नीरज जी से प्राप्‍त की है । बस एक ही चीज नहीं ले पाये नीरज जी की तरह खुलकर कहकहे लगाना और गर्मजोशी । उसमें इनका संकोची स्‍वभाव आड़े आ जाता है । खैर बहूरानी आयेगी तो  उसकी जिम्‍मेदारी होगी संकोची प्राणी को सुधारने की  । ग़ज़ल की परम्‍परा भी प्रकाश के पास नीरज जी से ही आ रही है । और इसका उदाहरण है ये ग़ज़ल । सुनिये और आनंद लीजिये ।

ज़िन्दगी भर पाला पोसा जिसको इतने प्यार से ..
कर दिया बूढा बता के बेदखल घर-बार से ...

रतजगों का, सुर्ख आंखों का सबब बतलायें क्‍या

रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से

इश्क के दरिया को सोचा पार कर लूं डूब के
डर गया ग़ालिब के कहने पर इसी मझधार से ..

मेरी धड़कन, मेरी साँसे, मेरी ये तश्नालबी
अब तलक भी दूर हैं बस इक निगाहे यार से ...

वो मेरे कहने पे देखो आगया था बाम पर
है खबर उसको भी  मैं जिंदा हूँ बस दीदार से ...

मेरा कातिल कर रहा है मुन्सफी खुद कत्ल की
फैसला पढ़ लेना ये तुम भी किसी अखबार से ...

वो जवानी भूल बैठा चौकसी सीमा पे कर
और हम सोते रहे निर्भय किसी भी वार से ...

चीखती है अस्मतें और चुप है सारी गोलियां
जनपदों में दर्ज शिकवे है पड़े बेकार से ...

वाह वाह वाह क्‍या श्‍ोर निकाले हैं । विशेषकर कातिल वाला और गालिब साहब को समर्पित शेर तो बहुत उम्‍दा हैं । आज तो दोनों ही युवा तुर्कों ने आनंद ला दिया है । मुशायरा अपनी ऊंचाइयों पर हैं ।

कुछ जानकारी : नीरज जी के ब्‍लाग पर एक मिली जुली ग़ज़ल लगी है । कुछ शेर मैंने लिखे है कुछ नीरज जी ने लिखें हैं । हर नदी में हो रवानी भूल जा, बिन दुखों के जिंदगानी भूल जा । ये बहर हमारी तरही मुशायरे की बहर की छोटी बहन है । ये उससे एक साल छोटी है । इसका नाम है बहरे रमल मुसद्दस महजूफ । ये हमारी बहर की छोटी बहन क्‍यों हुई भला । दरअसल में इसमें एक रुक्‍न कम है इसलिये ये एक साल छोटी हुई । इस बहर का वज्‍न होता है फाएलातुन-फाएलातुन-फाएलुन/या फाएलान 2122-2122-212या2121 ।  आपको कोई गीत या ग़ज़ल याद आती है इस पर । चलिये एक तो मैं ही बता देता हूं । गालिब साहब की लिखी वो ग़ज़ल जो गुलजार साहब के सीरियल गालिब में बहुत लो‍कप्रिय हुई थी । एक फकीर उसको गाता है और उसकी धुन तो जगजीत साहब ने क्‍या बनाई थी । गाया विनोद सहगल जी ने था ।  याद आया आपको चलिये मैं ही बता देता हूं । कोई दिन गर जिंदगानी और है । इस बहरों में दूसरी कुछ मुसद्दस बहरों की तरह मिसरे में एक मात्रा बढा़ने की छूट होती है ।और उस कारण फाएलुन 212 का फाएलान 2121 हो जाता है ।  हो चुकीं ग़ालिब बलाएं सब तमाम  में आखिरी का रुक्‍न 2121 ही हो गया है ।   आपको कोई और गीत या ग़ज़ल याद आता है आता हो तो बतायें ।

रविकांत  ने अपने ब्‍लाग पर एक सुंदर गीत लगाया है जो कि लिखा गया तो छंद पर है जिस छंद पर शिव तांडव स्‍तोत्र की रचना हुई । शिव तांडव स्‍तोत्र को मैं विश्‍व की सबसे प्रभावशाली कविता मानता हूं । उसमें जो कुछ है वो किसी अन्‍य कविता में नहीं हैं । जटाटवी गलज्‍जले प्रवाह पावितस्‍थले ।  कभी मौका मिला तो सस्‍वर भी सुनाऊंगा । ये मुझे पूरी याद है । मेरे जैसे मंदिर नहीं जाने वाले को भी ये कविता केवल उसके प्रभावों के चलते याद है । हालंकि अब कुछ विस्‍मृत हो रही है । वैसे ये मुफाएलुन-मुफाएलुन-मुफाएलुन-मुफाएलुन है । अर्थात 1212-1212-1212-1212 ये बहरे हजज मुसमन मकबूज होती है जटाटवी 1212 गलज्‍जले 1212 प्रवाह पा 1212 वितस्‍थले 1212  इसकी बहरे हजज मुरब्‍बा मकबूज जियादह चलन में है । आपको कोई और गीत या ग़ज़ल या छंद याद आता है इस पर । आए तो बतायें ।

आज का सवाल : सावन चल रहा है और शिव की आराधना भी जोरों से हो रही है । कल तो हमारे यहां रात को खूब बरसात भी हुई दो घंटे तक । खैर तो इन दिनों शिव आराधना के लिये रामचरित मानस में से तुलसीकृत शिवाराधना बहुत गाई जाती है । नमामी शमीशान निर्वाण रूपं । क्‍या आप इसकी बहर बता सकते हैं । और इस बहर पर हिंदी फिल्‍म का बहुत लोकप्रिय गाना सुझा सकते हैं । मिले तो बतायें और अभी तो आनंद लें सावन की ऋतु में दो कुंवारों की ग़ज़लों का । और देखिये यादों के एल्‍बम में से एक पुराना बहुत पुराना चित्र जो है अपनी मनपसंदीदा और आलटाइम फेवरिट बुलेट के साथ ।

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शनिवार, 11 जुलाई 2009

रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से, ये पूरा तरही मुशायरा अब समर्पित है अग्रज कवि, मंच पर शालीन और निष्‍छल हास्‍य के हामी श्री ओम व्‍यास ओम को ।

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ओम जी को जाना था सो वो चले गये बावजूद हम सब की दुआओं और शुभकामनाओं के । कवि श्री संदीप शर्मा ने जैसा मुझे बताया था उस हिसाब से मन में कहीं न कहीं ये डर हमेशा ही लगा रहा पिछले एक माह में कि ओम जी हंसाते हंसाते रुला न जायें । और हुआ भी वही । बहुत सारी यादें हैं, बहुत सारी स्‍मृतियां हैं । यादें जो अच्‍छी होती हैं तो भी रुलाती हैं और बुरी होती हैं तो भी । कहीं किसी ब्‍लाग पर कमेंट में मैंने लिखा कि हम अब हंसने के अधिकारी ही नहीं रहें हैं । हम अपने जीवन में इतना कुछ गलत कर रहे हैं क‍ि अब हंसने जैसी निष्‍छल चीज पर हमारा कोई अधिकार ही नहीं रहा है । और इसीलिये जब ओम जी जैसा कोई आकर हमें हंसाता है तो उस ऊपर वाले को ऐसा लगता है कि ये तो उसके अधिकार क्षेत्र में दखल कर रहा है और बस । ओम जी ने मंचों पर कभी भी फूहड़ता और द्विअर्थी संवादों को सहारा नहीं लिया । उनकी कलावती लीलावती की कहानी में इतना सौम्‍य हास्‍य है कि उसके आगे लाफ्टर जैसे हजारों कार्यक्रम भी बौने दिखाई देते हैं । उनके जाने के बाद कई बार उनकी कलावती लीलावती का वीडियो देखता रहा । उनकी कलावती लीलावती को आज मंच के कई सारे कवि अपने नाम से पढ़ रहें हैं लेकिन दादा का अपना अलग ही अंदाज था कलावती लीलावती पढ़ने का । सीहोर के मंच पर एक बार एक कवि ने एक अत्‍यंत अशालीन चुटकुला पढ़ दिया जिस पर उसको काफी तालियां भी मिलीं  । मंच पर दादा माणिक वर्मा, सांड नरसिंहपुरी, पवन जैन, अशोक भाटी जैसे कवि बैठे थे । ओम जी ने मुझे पास बुलाया और कहा बिठा दूं इसको । मैंने कहा दादा आप संचालक है जो उचित लगे सो करो । ओम जी ने माइक पर ऐसी झाड़ लगाई उस कवि को और कहा ये श्रोता वही खाते हैं जो हम परोसते हैं, आपके पास कविता हो तो पढ़ो नहीं तो बैठ जाओ । और वो कवि बैठ गये । जनता ने तालियां बजा कर ओम जी के निर्णय पर मुहर लगा दी । ऐसे थे ओम जी । मेरी श्रद्धांजलि और इस बार का पूरा तरही मुशायरा ओम जी की स्‍मृतियों को समर्पित ।

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स्‍मृति शेष :- सीहोर का वो कवि सम्‍मेलन जिसका संचालन दादा ओम व्‍यास ने किया था

तरही मुशायरा इस बार का तरही मुशायरा कुछ लम्‍बा चलना है और ये भी कि इस बार काफी अच्‍छी ग़ज़लें मिली हैं और इन ग़ज़लों में बहुत कुछ ऐसा है जो मन को छू लेने वाला है ।

बहर :   इस बार हमने जो बहर ली थी वो बहुत ही आसान सी बहर थी । आसान लेकिन बहुत ही लोकप्रिय बहर है ये । कई अच्‍छी ग़ज़लें इस बहर पर लिखी गई हैं । मुनव्‍वर राना साहब की मशहूर ग़ज़ल का मशहूर शेर तो आपको याद ही होगा ।

लौटने में कम पड़ेगी उम्र की पूंजी हमें, आप तक आने में ही हमको ज़माने लग गये

मुनव्‍वर भाई ने जिन बहरों पर जियादह काम किया है उनमें ये बहर भी है ।

एक क़ैदी की तरह मेरी अना बेबस रही, ख्‍वाहिशें घेरे रहीं मकड़ी के जाले तरह

तो ये है बहरे रमल की एक मुजाहिफ बहर जिसमें चार रुक्‍न हैं । चार में से तीन रुक्‍न तो स्‍थायी रुक्‍न हैं । बहरे रमल यानि कि जिसका स्‍थाई रुक्‍न है फाएलातनु या 2122 । अब इस बहर में भी प्रारंभ्‍ा के तीन रुक्‍न तो बिना किसी मिलावट के हैं अर्थात कहीं कोई परिवर्तन नहीं हैं सालिम रुक्‍न हैं । किन्‍तु अंतिम रुक्‍न में से एक पूरा दीर्घ कम हो गया है और वो 2122 के स्‍थान पर केवल 212 ही रह गया है । चूंकि हम  जानते हैं कि जब भी किसी बहर के किसी रुक्‍न में कहीं कोई परिवर्तन होता है ( मात्राओं का कम या जियादह हो जाना) तो उस रुक्‍न का एक खास नाम हो जाता है । अब यहां पर इस बहर में 212 या  फाएलुन  रुक्‍न का नाम है महजूफ़ । जाहिर सी बात है कि इस मुजाहिफ बहर के नाम में अब ये शब्‍द भी आयेगा । तो ये हुई बहरे रमल मुसमन महजूफ़ । तोड़ कर कहें तो ये कि चूंकि स्‍थायी रुक्‍न है फाएलातुन  सो ये है बहरे रमल , चार रुक्‍न हैं इस कारण ये है मुसमन  और फाएलुन  भाइजान इसमें हैं सो ये मुजाहिफ बहर हो गई है जिसके नाम में  महजूफ़  भी शामिल होगा । आइये इस बहर पर मदन मोहन जी की कम्‍पोज़ की हुई, लता जी की गई हुई और नक्‍शलायलपुरी साहब की लिखी हुई ये शानदार ग़ज़ल सुनें । जो फिल्‍म दिल की राहें से है । अगले अंक में इस बहर पर सुनाने के लिये गीत या ग़ज़ल आप को सुझाना है । कई बार फ्लेश प्‍लेयर नहीं मिलने के कारण ये गाने का लिंक नहीं दिखता है ।

 

गीत यदि सुनाई नहीं दे रहा है तो सीधे इस लिंक पर जाकर सुन लें । http://www.archive.org/details/AapKiBatenKaren 

या  यहां से डाउनलोड करें ।

http://www.divshare.com/download/7880870-47c

आज हम तरही मुशायरे में दो शायरों को ले रहे हैं । मुशायरे का आगाज़ बहुत ही धमाकेदार हुआ है । आदरणीय सुधा ढींगरा जी की कविता ने समां बांध दिया है । कविता सचमुच ही ऐसी थी जिसे रात के सन्‍नाटे में सुन लो तो आंख से आंसू कब बहने लगेंगें पता ही नहीं चलेगा । सुधा जी का बड़प्‍पन है कि वे हमारे इस छोटे से आयोजन में शामिल हुईं और हमारा मान बढ़ाया । आशा है आगे भी उनका नेह हमें मिलता रहेगा । मेरे लिये भी सौभाग्‍य है कि सावन के माह में एक बड़ी बहन मिलीं ।

दिगम्‍बर नासवा : दिगम्‍बर की विशेषता उनकी वे छोटी छोटी प्रेम कविताएं हैं जो मन को छूती हुई गुजरती हैं । दिगम्‍बर नासवा दुबई में रहते हैं और उनकी कविताएं पढ़ कर ऐसा लगता है कि वहां रह कर वे अधिकांश समय प्रेम ही करते हैं । बहुत सुंदर प्रेम कविताएं लिखने वाले दिगम्‍बर तरही मुशायरे में ग़ज़ल का आग़ाज़ कर रहे हैं क्‍योंकि मुशायरे का धमाकेदार आगाज़ तो सुधा जी कविता से कर चुकी हैं । सुनिये दिगम्‍बर को । पहले यो फोटो देखें और जाने दिगम्‍बर की प्रेम कविताओं का राज ।

DN-Anita

रोज़ जो नीलाम होता है सरे बाज़ार से

हाँ वही नायाब गुंचा है तेरे गुलज़ार से

होंसला हो दिल में तो कश्ती उतारो लहर में

ये समुन्दर पार होता है नहीं पतवार से

अपनी यादों के उजाले छोड़ कर क्यों आ गए

रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से

जागते में सो रहा या सोये में जागा हूँ मैं

प्रेम का इकरार आया है निगाहे यार से

तू नहीं जाने दिगम्‍बर प्‍यार की भाषा अभी

आरजू, अरमान से,  अन्‍जान है तू प्यार से

वाह वाह वाह बहुत अच्‍छे शेर निकाले हैं जागते में सो रहा या सोये में जागा हूं मैं प्रेम का इकरार आया है निगाहे यार से, खूब कहा है विशेषकर मिसरा उला तो बहुत ही बेहतरीन है । जागते में सो रहा या सोये में जागा हूं मैं । समां बांध दिया बधाई हो ।

प्रकाश सिंह :  ये प्रकाश अर्श नहीं हैं बल्कि प्रकाश सिंह है । पहली बार मुशायरे में आ रहे हैं । इनके बारे में जानने की कोशिश की तथा  चित्र भी तलाशा किन्‍तु नहीं मिला । ये पाठशाला में अभी आये हैं तथा आते ही इन्‍होंने तरही में शामिल होने का शानदार प्रयास किया है । इनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली सो इनका एक मेल ही लगा रहा हूं जो इन्‍होंने मुझे भेजा था ।

मैंने ब्लॉग के बारे में दो तीन महीने पहले ही जानना शुरू किया था...कभी कभी कविता लिखने का प्रयास भी किया..छंद के बारे में बहुत कम जानकारी थी...जो भी भाव आते थे कागज पर रख देता था...कभी कभी मात्राओ और वज्न के बारे में जानने का प्रयास किया पर एक गणित का विद्यार्थी हिंदी में कम कुशल ही होता है...फिर गौतम राजरिशी जी के ब्लॉग पर बहुत सुदर छंद में गजले पढ़ी..वहीं आपके बारे में जानकारी मिली...सुबीर संवाद सेवा ब्लॉग पर गया तो दिल बैठ गया ...आपने २००७ में गजल की कक्षाएं शुरू की थी और में बहु पीछे छूट गया था...खेर मैंने हिम्मत नहीं हारी और पिछले एक माह से आपकी पुराणिक पोस्ट्स पढ़ी..बस मोटा मोटा समझ पाया कि रदीफ़ काफिया,मात्राएँ,वज्न,रुक्न,और बहर और मिसरा से शेर और फिर गजल बनती है.. दोनों हाथ सामने रखकर आपके दे दनादन छडिया खाने को को तैयार हूँ...आप कहेंगे तो उड़नतश्तरी को उठा कर मैदान के चार चक्कर लगालूँगा....और अगर आपका नाम डुबो रहा हूँ तो माफ़ कर दीजियेगा...


रात भर आवाज देता है कोई उस पार से
साथ दे अब और भी चाहा नहीं संसार से

आज जाने दे मुझे क्यूँ रोकता तकरार पे
प्रेम के दो बोल काफी क्या मिलेगा खार से

देख के उनको नजर भर प्यार का दरिया बहा
ज्यूँ घटाएं रातभर जल जल हुईं मल्हार से

आज आजादी कहाँ है ये कहाँ की बंदगी
आँख के आगे जफा तो जी रहे लाचार से

जीत के सारा जहाँ वो रो पड़ा था बाखुदा
हाथ खाली थे, सिकंदर जब गया संसार से

जाम थामे हाथ में साकी पिलाती बारहा
राज पाखी तू बता चढ़ता नशा क्यूँ हार से

बहुत बढि़या अंदाज और आगाज है प्रकाश जी, आपको उड़नतश्‍तरी को उठाकर मैदान के चक्‍कर लगाने की ज़रूरत बिल्‍कुल नहीं हैं । जीत के सारा वो रो पड़ा था बाखुदा, हाथ खाली थे सिकंदर जब गया संसार से  एक सिकंदर के साथ बहुत अच्‍छी गिरह बांधी है । आनंद आ गया । मुहावरे और कहावतों को किसी ग़ज़ल के शेर में लेना बहुत मुश्‍किल काम होता है । मेरे एक मित्र हैं रियाज मोहम्‍मद रियाज उनका मतला है  देश का हम क्‍या हाल सुनाएं, अंधे पीसें कुत्‍ते खाएं ।  उसी प्रकार की गिरह बांधी है आपने सिकंदर के साथ । बहुत अच्‍छा है । अब हमारे पास दो प्रकाश हैं एक प्रकाश अर्श और दूसरे प्रकाश सिंह ।

चलिये आनंद लीजिये दोनों ग़ज़लों का और मुझे इजाजत दीजिये । अगले अंक में मिलते हैं दो और शायरों से । जो लोग अभी भी ग़ज़लें भेजना चाहें भेज सकते हैं । अभी एडमीशन चालू हैं । और हां बहर पर फिल्‍मी ये गैर फिलमी गीत ग़ज़ल अवश्‍य सुझायें ।

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

सभी गुरुओं और विद्वजनों को प्रणाम करते हुए आज गुरू पूर्णिमा के अवसर पर हम प्रारंभ करते हैं तरही मुशायरा -रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से ।

( नोट अब ये ब्‍लाग इंटरनेट एक्‍सप्‍लोरर में बिल्‍कुल नहीं खुल रहा है यदि आपके साथ भी ऐसा हो तो इसे मोजिला फायर फाक्‍स या गूगल क्रोम में खोलें । )

सभी गुरुओं को मेरी और से विनयां‍जलि पोस्‍ट पढ़ने से पहले इसे ज़रूर सुनें

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पर्वतों से भी ऊंचे होते हैं गुरू जिनकी तलहटी में हम सुमन बनकर खिलते हैं और उनके ज्ञान की सुवास को फैलाते हैं ।

गुरू पूर्णिमा का स्‍थान आजकल शिक्षक दिवस ने ले लिया है । मेरे विचार में वो सही भी हुआ क्‍योंकि आजकल गुरू रहे ही कहां हैं, आजकल तो शिक्षक ही हैं । जो ज्ञान दे वो गुरू होता है और जो शिक्षा दे वो शिक्षक होता है । पहले ये दोनों काम एक ही व्‍यक्ति करता था, शिक्षा भी वहीं देता था और ज्ञान भी वही देता था । इसीलिये तब एक ही दिन होता था गुरूपूर्णिमा का । किन्‍तु धीरे धीरे हुआ ये कि गुरू कम होते गये और शिक्षक बढ़ते गये ।और इसी कारण ये हुआ कि गुरू पूर्णिमा के अलग एक और दिन आ गया जिसे शिक्षक दिवस कहा गया । शिक्षा जो कि निर्धारित पुस्‍तकों में लिखे हुए कुछ पूर्व ये तय किये हुए पाठ हैं जिनको निर्धारित समय में निर्धारित तरीके से ही पढ़ाना है । ज्ञान, जिसमें कुछ निर्धारित नहीं है, जिसकी कोई सीमा नहीं है, जिसको कहीं किसी किताब ये पुस्‍तक में नहीं लिखा गया । वो असीम है, वो अनंत है, उसकी कोई सीमा नहीं होती । तो क्‍या एक बहुत अच्‍छा प्रवचनकार भी गुरू होगा ? मेरे विचार में नहीं हो सकता । एक प्रवचनकार जो कि रेशम के वस्‍त्र पहन कर, गले में सोने की मोटी मोटी मालाएं पहन कर हमें मोह माया से दूर रहने के प्रवचन दे रहा हो, वो किस प्रकार हमारा गुरू हो सकता है । उसकी तो स्‍वयं की ही कथनी और करनी में फर्क है । धर्म पर आधारित प्रवचनकारों को हमारे देश के प्राचीन इतिहास में कभी भी गुरू या संत का दर्जा नहीं दिया गया, उनका एक अलग नाम था कथा वाचक या प्रवचनकार । इनको हम शिक्षक की श्रेणी में ले सकते हैं । जिस प्रकार एक शिक्षक जो रसायन शास्‍त्र का बहुत अच्‍छा ज्ञाता है वो रसायन शास्‍त्र बहुत अच्‍छे से समझाता है उसी प्रकार ये प्रवचनकार भी किसी न किसी धर्मग्रंथ के बहुत अच्‍छे ज्ञाता हैं और इसी कारण ये उस विषय को बहुत अच्‍छे से समझाते हैं और उसी कारण ये भी शिक्षक हैं । शिक्षक के लिये आवश्‍यक नहीं होता कि वो जो कुछ कहे उस पर स्‍वयं भी अमल करे, किन्‍तु गुरू के लिये होता है । इसी कारण ये प्रवचनकार जो विषय विशेषज्ञ हैं ये भी यदि प्रवचन में ये कह रहे हैं कि मोह माया त्‍यागो, और स्‍वयं गले में सोने की मोटी सांकलें डाले हैं, तो भी ये दोषी नहीं हैं । क्‍योंकि ये तो आपको केवल वो बता रहे हैं जो कि किसी ग्रंथ में लिखा है । जिस प्रकार रसायन शास्‍त्र का शिक्षक पोटेशियम साइनाइड के जहरीलेपन का बताते समय उसे चाट कर नहीं बतायेगा, उसी प्रकार ये प्रवचनकार भी हैं । इसके विपरीत गुरू वो होता है जो कुछ कहने से पहले स्‍वयं उस पर अमल करता है । उसकी कथनी और करनी एक ही होती है । वो पुस्‍तकों से ज्ञान लेता है और उस ज्ञान पर आधारित अपनी ही एक धारा तैयार करता है । संत की परिभाषा और भी ऊपर है और वहां तक पहुंचना एक बहुत ही दुष्‍कर कार्य है । कुल मिलाकर बात ये कि शिक्षक वो होता है हमें पूर्व से बने हुए रास्‍तों पर चलने की शिक्षा प्रदान करता है, गुरू वो होता है जो हमें नये रास्‍ते स्‍वयं बनाने का ज्ञान देता है और संत वो होता है जो कि न तो पूर्व से बने रास्‍तों पर चलता है न ही नये बनाता है, वो तो चलता जाता है और उसके पद चिह्न ही आगे चलकर रास्‍ते बन जाते हैं ।

मेरे जीवन में कई सारे शिक्षक आये और कुछ गुरू भी आये । पहले गुरू जिनका मैं आज स्‍मरण करना चाहता हूं वो थे स्‍वर्गीय श्री मुरलीधर जी जोशी । ये वास्‍तव में तो शिक्षक थे और मुझे पढ़ाते थे । लेकिन ये वास्‍तव में गुरू थे । वे बहुत ही अलग तरह के थे । ग़रीब होने के बाद भी एक विचित्र प्रकार के स्‍वाभिमान से ठसाठस । गाते बहुत अच्‍छा थे । उनकी आवाज़ में 'आंसू भरी हैं ये जीवन की राहें सुनने का एक अलग ही आनंद था । एक बार मैंने देखा कि उनकी शर्ट पर एक खटमल चल रहा है । मैंने कहा मास्‍साब हाथ सीधा करें मैं उसको मार देता हूं । वे मुस्‍कुराये और एक काग़ज फाड़ा उस पर उस छोटे से जीव को बिठाया और बाहर पेड़ों पर छोड़ दिया । मैंने कहा मास्‍साब ये क्‍यों किया तो बोले दया करने से अच्‍छा आनंद कोई नहीं हैं । उनसे बहुत कुछ सीखा । किन्‍तु असमय ही एक रात वे सोये तो उठे ही नहीं । मेरे अंदर करुणा का बीजारोपण करने वाले वही थे । मेरे पिता जो कि आज भी कर्म करते हैं रिटायरमेंट के लगभग बारह साल बाद भी, उनसे मैंने सीखा कि कर्म ही प्रधान है, उनसे एक बात और सीखी कि पैर उतने ही फैलाओ जितनी चादर हो । वे कभी भी कर्ज पर कोई चीज लेने की वकालत नहीं करते । फिर मेरी मां जिन्‍होंने मुझे स्थिर चित्‍त रहना सिखाया और प्रतिक्रिया देने के बजाय सहज रहने के गुण दिये । फिर काफी लोग मिले । जैसे श्री नारायण कासट जी जिन्‍होंने मुझे कविता के बारे में काफी ज्ञान दिया । श्री रमेश हठीला जी जिन्‍होंने गीत की रचना करना सिखाया और पुस्‍तकों से सीखा गया बहुत सारा ज्ञान जो उन रचनाकारों के कारण सीख पाया । जिनकी वे पुस्‍तकें थीं । रेणु जी, गुलशन नंदा जी, मन्‍‍टो जी, कमलेश्‍वर जी, रविन्‍द्र कालिया जी ये वो कहानीकार हैं जिन्‍होंने मुझे कहानी से परिचय करवाया, मैं एकलव्‍य की तरह इनसे बिना मिले ही इनके साहित्‍य को गुरू बना कर साधना करता रहा । लता मंगेशकर जी की आवाज़ को भी मैं अपना गुरू मानता हूं क्‍योंकि उसी आवाज़ ने मुझे बताया कि जीवन में सुरीला होना कितना ज़रूरी है ।  आज गुरू पूर्णिमा के अवसर पर सभी गुरुओं को मेरी विनयांजलि, मैं जहां भी आज हूं वहां कतई नहीं होता यदि ये सब नहीं होते । मुझे जो कुछ बनाया है वो मेरे गुरुओं ने बनाया है ।

तरही मुशायरा इस बार का काफी रोचक होना है । इस बार जो ग़ज़लें प्राप्‍त हुई हैं उनमें कुछ शेर तो बस ऐसे हैं कि मन को छूते हुए गुजर जाते हैं । इस बार का मिसरा था रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से  । कई लोगों ने मिसरे को खूब सराहा । हकीकत ये है कि बरसों पहले डायरी में अटकाया ये मिसरा जिस पर कभी मिसरे से आगे कुछ नहीं कर पाया उस पर लोगों ने इतनी सुंदर ग़ज़लें लिख दीं कि अपने पर शर्म आती है । कंचन ने आज फोन लगाया तो बड़ी अच्‍छी बात कही गुरूजी आवाज़ तो कोई सबको ही देता है रात भर लेकिन कवि उस आवाज़ को  पहचान लेता है और उसे शब्‍दों में ढाल देता है ।  कंचन ने मानों मिसरे को पूरा खोल कर रख दिया ।

एक दिन मोबाइल पर अचानक एक बहुत ही सुरीली आवाज़ सुनाई दी पहले तो मैं हलो से आगे ही कुछ नहीं कह पाया क्‍योंकि आवाज़ का सुरीलापन ही कुछ नहीं कहने दे रहा था । फिर आवाज़ ने अपना परिचय दिया मैं सुधा ढींगरा बोल रही हूं। हिंदी की जानी मानी कथाकार जिनकी कहानियां हिंदी की लगभग हर पुस्‍तक में मैंने तब पढ़ीं जब मैं लिखना सीख रहा था, एक क्षण को मैं स्‍तब्‍ध सा रहा ही कुछ बोल पाया । सुधा दीदी ने कहा कि  आप ने एक पंक्ति अपने ब्लाग पर डाली थी, मैं ग़ज़ल तो नहीं लिखती पर एक छंदमुक्त कविता पढ़ने के लिए भेज रही हूँ. वह पंक्ति मुझे बहुत पसंद आई और कुछ लिखा गया, पंजाब के चर्चित प्रेमियों पर ।

ये हमारा सौभाग्‍य है कि हिंदी की इतनी दिग्‍गज कथाकार डॉ. सुधा ओम ढींगरा जी की एक बहुत ही सुंदर कविता हमें आर्शिवाद के रूप में प्राप्‍त हुई है । आज गुरू पूर्णिमा के अवसर पर ये सुंदर कविता समर्पित है सभी गुरुजनों को । एक बात जिन दिनों में कहानी लिखना सीखने के दौर में था तब जिन लेखिकाओं की कहानियां मुझे खूब भाती थीं उनमें सुधा जी भी हैं, मालती जोशी जी, ममता कालिया जी, नूर जहीर दीदी और सुधा जी ।

पहले सुधा जी का परिचय डॉ. सुधा ओम ढींगरा,कवयित्री, कहानीकार, उपन्यासकार, पत्रकार, रंगमंच, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन कलाकार, समाज सेवी और हिन्दी के प्रचार-प्रसार की अनथक सिपाही।हिन्दी, उर्दू और पंजाबी की चर्चित पत्रकार हैं। जालन्धर रंगमंच, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन की कलाकार रही हैं। मेरा दावा है (अमेरिका के हिन्दी कवियों का काव्य संग्रह), तलाश पहचान की (काव्य संग्रह), माँ ने कहा था (काव्य कैसेट), परिक्रमा (पंजाबी से हिन्दी में अनुवादित उपन्यास), सफर यादों का (काव्य संग्रह प्रकाशनाधीन), वसूली (कहनी संग्रह प्रकाशनाधीन), और गंगा बहती रही (उपन्यास प्रकाशनाधीन), मेरा दावा है (भाग दो) -कार्य चल रहा है। काव्य सहयोग विश्वा तेरे - काव्य सुमन (सम्पादक गिरीश जौहरी), प्रवासी हस्ताक्षर (सम्पादक डॉ. अंजना संधीर), सात समन्दर पार से (सम्पादक डॉ. अंजना संधीर), पश्चिम की पुरवाई (सम्पादक डॉ. प्रेम जनमेजय, सत्यनारायण मौर्य ’बाबा’) पत्रकारिता : संवाददाता -प्रवासी टाइम्स (यू.के.) स्तंभ लेखिका - शेरे-ए-पंजाब (पंजाबी) विदेशी प्रतिनिधी - पंजाब केसरी, जगवाणी, हिन्द समाचार सम्मान : 21 सितम्बर, 1996 अमेरिका में हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं सामाजिक काय… के लिए वाशिंगटन डी.सी. में एम्बैसेडर नरेश चन्द्र से सम्मानित। हिन्दी साहित्य की सेवाओं के लिए नार्थ कैरोलाईना में नागरिक अभिनंदन। ’हैरिटेज सोसाइटी (नार्थ कैरोलाइना)’ द्वारा "प्रतिष्ठित कवियत्री, वर्ष 2005" से सम्मानित। सम्पर्क : ceddlt@yahoo.com

Sudha_Om_Dhingra

रात भर आवाज़ देता है
कोई उस पार से......

सुन सोहणी उसे
उठा माटी का घड़ा
तैर जाती है
चनाव के पानियों में
मिलने अपने महिवाल को
खड़ा है जो नदी के उस पार.....

सस्सी भटकती है थलों में
सूनी काली रातों में
छोड़ गया था पुन्नू सोती सस्सी को
पुन्नू पुन्नू है पुकारती
शायद सुन ले वह उसकी पुकार
खड़ा है जो मरू के उस पार......

फ़रहाद तोड़ता है पहाड़
नदी दूध की निकालने
शर्त प्यार की पूरी करने
तड़प रहा है मिलने शीरी से
पहुँच न पाया उस तक
खड़ी है जो पहाड़ों के उस पार......

साहिबा ने छोड़ा घर- बार
छोड़े भाई और परिवार
भाग निकली मिर्ज़ा संग
गीत में हेक जब लगाई उसने
खड़ा है जो झाड़ियों के उस पार......

हीर ने झाँझर की आवाज़ दबा
ओढ़नी से मुँह छुपा
चुपके से मिलने निकल पड़ी
मधुर स्वर राँझे का उभरा जब
खड़ा है दूर जो घरों के उस पार.........

तरही मुशायरे का इससे अच्‍छा आगाज़ कुछ नहीं हो सकता था । सुधा जी हिंदी की जिस प्रकार सेवा कर रहीं हैं वो अद्भुत हैं । उनके कार्यों को देखकर लगता है कि हां हिंदी की लड़ाई हम हारेंगें नहीं आखिर जीत हमारी ही होगी । आनंद लीजिये इस बहुत ही सुंदर कविता का । सभी गुरुजनों को पुन: पुन: प्रणाम ।