मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

कवि सम्‍मेलन की सफलता की खुशी, जिस्‍म में लगते इंजेक्‍शनों का दर्द और तरही मुशायरे का परिणाम

जाने कैसे हिम्‍मत करके ये पोस्‍ट लगाने आया हूं । आपको बताया था कि सीहोर में एक अखिल भारतीय कवि सम्‍मेलन का आयोजन किया जा रहा है  । आप सब की दुआओं से वो सम्‍मेलन शानदार रहा और ये भी कि सेना को समर्पित इस कवि सम्‍मेलन में सब ने खूब शानदार काव्‍य पाठ किया । विशेषकर विनीत चौहान तो अपने रंग के अपने ही कवि हैं । कड़कड़ाती ठंड में सुबह के चार बजे तक लगभग आठ से दस हजार श्रोता कवियों को सुनते रहे और सेना के जय जय कारे लगाते रहे ।

अपनी कहूं तो सूत्रधार होना और काम का बोझ होना दोनों ने ही 26 की रात को अंतत: बिस्‍तर पर डाल दिया । कुछ तनाव था और कुछ अचानक बढ़ गयी ठंड का परिणाम हुआ ये कि जबरदस्‍त बुखार ने चपेट लिया । ऐसा लग रहा था कि कवि सम्‍मेलन में ही नहीं जा पाऊंगा मगर फिर काफी इंजेक्‍शनों और दवाइयों के दम पर वहां गया और पूरे कवि सम्‍मेलन में रहा भी काव्‍य पाठ भी किया । मगर उस हिम्‍मत का परिणाम ये रहा कि उस दिन से ही बिस्‍तर पर हूं । आज कुछ ठीक लगा तो आपसे बात कर रहा हूं ।

तरही मुशायरा हो चुका है और परिणाम नीरज जी ने दे दिये हैं आज उनकी केवल घोषणा ही होनी है । नीरज जी के ही शब्‍दों में आज हम परिणाम घोषित करते हैं ।

नीरज गोस्‍वामी जी :

neerajgoswami

गुरुदेव आपने फंसा दिया...जब शेर उम्दा हों शायर कमाल के हों ऐसे में हासिल ग़ज़ल शेर निकलना कितना मुश्किल काम है आप तो जानते ही हैं....फ़िर भी जब जिम्मेदारी दी है तो निभानी ही पड़ेगी...मेरी नजर में इस मुशायरे का हासिल ग़ज़ल शेर है:
सिंहासन हिल उठ्ठेगा जब
लावा बन फूटेगी जनता

इस शेर में जनता की ताकत को बहुत खूबसूरत अंदाज में पेश किया है...ये सच है की हम जनता को लाचार मानते आए हैं जबकि ऐसा नहीं है...जब जब जनता के गुस्से के लावा फूटा है तब तब सत्ता धारियों के होश उड़ गए हैं...ईमर्जेंसी के बाद देश की सबसे ताक़तवर नेता स्व.इन्द्राजी का जनता ने जो हश्र किया वो आज भी याद किया जाता है...
मेरी ढेरों बधाईयाँ मेजर गौतम जी को.
इसका अर्थ ये नहीं की बाकि शायरों ने जो कहा है वो उन्नीस है...सभी अपनी जगह अव्वल हैं...इसलिए मेरे निर्णय को अन्यथा न लें...मुझे युवाओं के जो तेवर इस मुशायरे में नजर आए हैं वो बहुत हिम्मत बंधाने वाले हैं... बेमिसाल है...
नीरज

नीरज जी ने अपना काम बखूबी किया है । उनका आभार गौतम को बधाइयां ।

अगले मुशायरे के लिये मिसरा आज दिया जा रहा है ।

मुहब्‍बत करने वाले ख़ूबसूरत लोग होते हैं

काफिया : होते

रदीफ : हैं

अनुरोध वही है कि ग़ज़लों को कमेंट के रूप में नहीं लगायें । subeerin@gmail.com पर मेल करें ।

शनिवार, 27 दिसंबर 2008

मुंबई के शहीदों और भारतीय सेना को समर्पित रहेगा आज का कवि सम्मेलन

हिंदू उत्सव समिति सीहोर द्वारा  27 दिसम्बर शनिवार को स्थानीय बस स्टैंड परिसर में  आयोजित होने वाले  अखिल भारतीय कवि सम्मेलन को एक माह पूर्व ठीक 27 नवम्बर को मुंबई में हुए आतंकी हमले में शहीद हुए भारत के जांबाज सैनिकों तथा समूची भारतीय सेना को समर्पित किया गया है । इस कवि सम्मेलन में देश भर के शीर्ष कवि और कवियित्रियां काव्य पाठ करने के लिये पधार रहे हैं । हिंदू उत्सव समिति के मीडिया प्रभारी  प्रदीप समाधिया ने जानकारी देते हुए बताया कि मुंबई में आतंकवादियों के साथ वीरता के साथ लड़ते हुए शहीद हुए भरतीय सेना के जाबांज वीर शहीदों को समर्पित इस अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में क्षेत्रीय विधायक श्री रमेश सक्सेना उपस्थित रहेंगें । कवियों में श्री विनीत चौहान , श्री वेदव्रत वाजपेयी, हास्य कवि श्री अलबेला खत्री,  गीतकार श्री कुंवर जावेद, हास्य कवि श्री सांड नरंसिहपुरी, श्री रमेश शर्मा,  सुश्री अनु शर्मा सपन, मदन मोहन चौधरी समर,  श्री हजारीलाल हवालदार, कवि जलाल मयकश, मंच संचालक श्री संदीप शर्मा, शामिल हैं । सूत्रधार कवि  पंकज सुबीर  हैं ।

सोमवार, 22 दिसंबर 2008

तरही मुशायरे ने जितना इंतेजार करवाया उतना ही आनंद भी आया है । और आज प्रस्‍तुत हैं अंतिम तीन प्रस्‍तुतियां जिनमें शामिल हैं एक कवियित्री भी ।

तरही मुशायरे को लेकर जिस प्रकार लोग प्रतिक्षा कर रहे थे उसको देख कर मुझे अपनी भूल का एहसास हुआ कि वास्‍तव में मैंने जो इंतेजार करवाया वो कुछ ज्‍याद ही हो गया है । खैर कहा जाता है ना कि देर आयद दुरुस्‍त आयद । और पिछले अंकों को लोगों ने हाथों हाथ लिया है ये अच्‍छी बात है । चलिये आज हम चलते हैं अपने समापन अंक की ओर जिसमें आज दो कवि और एक कवियित्री शामिल हैं । आज के अंक में जैसा कि मैंने पहले कहा था कि एक भारी भरकम कवि भी  शामिल हैं जो कि विशेष रूप से कनाडा से इंडिया इसी कार्यक्रम के लिये पधारे हैं । तो चलिये हम प्रारंभ करते हैं आज का ।

माड़साब : आज सबसे पहले आ रहे हैं तरुण गोयल । तरुण पहली बार हमारे तरही मुशायरे में आ रहे हैं इसलिये जोरदार  तालियां इनके लिये ।

तरुण गोयल -

गूंगी बहरी अंधी जनता,
लड़ती और झगड़ती जनता|

अंधियारों में खोई खोई,
गलियारों में उलझी जनता|

माया के आँचल से लिपटी,
लुटी हुई बेचैन सी जनता|

क्यूँ सर के ही बल दौडे है,
पागल और बेचारी जनता|

हर एक आहट पे  घबराती,
डरी हुई और सहमी  जनता|

क्यूँ न बदले रोज ये पासा,
वादों से न चलती जनता|

माड़साब : भई तरुण ने बहुत अच्‍छे शेर निकाले हैं । विशेषकर वो शेर जिसमें कहा है हर एक आहट पर घबराती डरी हुई और सहमी जनता बहुत अच्‍छा कहा है । तालियां तालियां तालियां । और तरुण के बाद आ रही हैं मुशायरे की दूसरी कवियित्री । पहले दौर में कंचन ने अपनी ग़ज़ल पढ़ी थी और आज पारुल आ रही हैं अपनी ग़ज़ल को लेकर पारुल एक अच्‍व्‍छी कवियित्री हैं और ग़ज़ल की कक्षाओं से कुछ दिनों पूर्व ही जुड़ी हैं । इन दिनों ग़ज़लें भी लिख रही हैं । तो तालियों के साथ स्‍वागत कीजिये पारुल का ।

पारुल :

गूंगी बहरी अन्धी जनता
भोली कभी सयानी जनता

शहर फूंक कर हाथ तापती
मन्द मन्द मुस्काती जनता

मुँह मे राम बगल में छूरी
नित चरि्तार्थ कराती जनता

नेकी कर दरिया मे डालो
ऐसा पाठ पढ़ाती जनता

उगते सूर्य को पीठ दिखाकर
तमस तमस चिल्लाती जनता

माड़साब : अच्‍छा प्रयास है पहला ही प्रयास । हालंकि बहर की कुछ समस्‍याएं कहीं कहीं दिखाई दे रहीं हैं मगर फिर भी चूंकि पहला प्रयास है इसलिये साधुवाद और ये भी कि करत करत अभ्‍यास के सब हो जाता है । और अब आ रहे हैं वो जिनका हम सब को इंतेजार है वो जो कि कनाडा से केवल हमारे तरही मूशायरे के लिये भारत पधारे हैं और जिनका हम सब को बेसब्री से इंतेजार है । चलिये तालियों के साथ स्‍वागत कीजिये उड़न तश्‍तरी उर्फ समीर लाल जी का ।

समीर लाल :

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ऊप्‍स मुशायरा प्रारंभ भी हो गया चलिये बस ये एक डिश और बाकी रह गई है होटल की इसको नहीं खाया तो होटल वाले भी बुरा मानेंगें और डिश को भी बुरा लगेगा कि आखिर मुझसे ही क्‍यों दूरी । बस आता हूं ।

लो मैं आ गया भरे पेट कविता पेलने का आनंद ही कुछ और है क्षमा करें मैं दूर से आया हूं इसलिये तीन ग़ज़लें पेलूंगा अगर आप बुरा न मानें तो । और बुरा मानें तो भी मुझे तो तीन पेलना है ।

तकलीफों को सहती जनता
उम्मीदों पर पलती जनता

दुश्मन की पहचान नहीं है
अपनों को ही छलती जनता.

खाते पीते महलों वाले
मछली उनकी तलती जनता.

सुनने वाला कोई नहीं है
गज़ल भला क्यूँ लिखती जनता.

गाँवों में अब काम नही है
शहरों में जा बसती जनता.

बाढ़ों में जब सपने बहते
अनुदानों को तकती जनता.

ग़ज़ल बदले काफिये के साथ

जख्मों को दिखलाती जनता
अपना हाल सुनाती जनता

झोली उनकी भरती जाती
कर्जा माफ कराती जनता

धोखा देते नेता सारे
चुनती उनको जाती जनता

रोते रोते आंसू सूखे
बेबस हो चिल्लाती जनता

( (मजाकिया (5))

नेताओं की पोल खुली जब
उनको धूल चटाती जनता

अपने वोटों की लालच दे
उनसे पैर छुलाती जनता

साईकिल से दफ्तर जाने
पंचर ठीक कराती जनता.

मोटर से इम्प्रेशन पड़ता
डीज़ल खूब भराती जनता.

( यूपी स्पेशल)
अपने घर में बिजली लाने
कटिया रोज फसाती जनता.

माड़साब : वाह वाह वाह । लगता है कि खा पीकर कोसने का आनंद ही कुछ और है । धोखा देते नेता सारे चुनती उनको जाती जनता । काफी अच्‍छे तेवर हैं समीर जी । तो श्रोताओं समीर जी के इस धांसू प्रदर्शन के साथ ही हम तरही का समापन करते हैं । अब श्री नीरज जी गोस्‍वामी के पाले में गेंद है कि कब वे इस तरही मुशायरे का हासिले मुशायरा शेर घोषित करते हैं । जै राम जी की ।

शनिवार, 20 दिसंबर 2008

अंकित और वीनस की ही तरह से दो और प्रतिभावान युवा हैं और इन दोनों ने ही बहुत प्रभावित किया है गौतम और रविकांत ।

तरही मुशायरे के दो दौर हो चुके हैं और अजा तीसरे दौर में हम दो और युवाओं को लेने जा रहे हैं । ये दोनों हैं मेजर गौतम राजरिशी और रविकांत । दोनों ही ग़ज़ल को लेकर बहुत गंभीरता से काम  कर रहे हैं और अच्‍छे शेर कह रहे हैं । इन दिनों सीहोर में होने वाले कवि सम्‍मेलन की तैयारियों में भी व्‍यस्‍त हूं । आगामी 27 दिसंबर को होने वाले कवि सम्‍मेलन में श्री वेदव्रत वाजपेयी, श्री कुंवर जावेद, श्री रमेश शर्मा, श्री सांड नरसिंहपुरी, श्रीमती अनु शर्मा सपन, श्री अलबेला खत्री, श्री जलाल मयकश, श्री मदन मोहन चौधरी समर और श्री संदीप शर्मा पधार रहे हैं । आप सब भी आमंत्रित हैं आइये और कवि सम्‍मेलन का आनंद लीजिये । चलिये आज दो और युवा कवियों की बात करते हैं जो कि बहुत अच्‍छा काम कर रहे हैं । गौतम राजरिशी को एक बार फिर बधाई कि उनकी एक ग़ज़ल कादम्बिनी में प्रकाशित हुई है । आज तरही मुशायरे का तीसरा दिन है । और आज के दो कवियों के बाद अब हमारे पास तीन और कवि शेष हैं जिनमें एक कवियित्री भी हैं । साथ ही एक वरिष्‍ठ तमतमातम भी शेष हैं । तमतमातम इसलिये कि वे हैं ही ऐसे । उनके लिये केवल वरिष्‍ठ तम लिखने से काम चलने ही नहीं वाला है ।

माड़साब : आज के तरही मुशायरे के प्रारंभ में आ हरे हैं मेजर गौतम राजरिशी । मेजर सेना में हैं देहरादून में पदस्‍थ हैं । और सेना के रूखे माहौल में रह कर भी ग़ज़ल की खेती कर रहे हैं । बल्कि ये कहा जाये कि शानदार तरीके से कर रहे हैं । इनकी जिस बात ने मुझे प्रभावित किया वो ये है कि इन्‍होंने बहर के बारे में मेरे द्वारा बताई गई प्रारंभिक जानकारी के आधार पर कई फिल्‍मी गानों की बहर निकाल के मुझे भेजी हैं । जैसा मैंने पहले बतायो कि कादम्‍िबिनी में इनकी एक ग़ज़लनुमा ग़ज़ल प्रकाशित हुई है । एक बात जो मुझे अच्‍छी लगी है कि सारे ही शायरों ने तीखे तेवरों के साथ ग़ज़लें लिखीं हैं और जो आज के दौर की सबसे बड़ी ज़रूरत है

मेजर गौतम राजरिशी :

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सब कुछ चुप रह सहती जनता
आखिर कब बोलेगी जनता
करतूतें गद्‍दी की देखे
अंधी बहरी गूंगी जनता

सिंहासन हिल उठ्‍ठेगा जब
लावा बन फूटेगी जनता
खादी पहनें,आ चल लूटें
अपनी भोली-भाली जनता

बंदूकों संग ईदी खाये
बम से खेले होली जनता
मंहगाई जब पीसे आटा
कैसे बेले रोटी जनता
परवत ऊँचे सेंसक्सों पर
चिथडे़ में है लिपटी जनता
नारों से क्या हासिल होगा
अपना हाकिम अपनी जनता
रिश्ते-नाते सारी भूली
गाँवों से आ शहरी जनता
स्यासत की शतरंजों पर है
फर्जी,प्यादा,किश्ती जनता

माड़साब : तालियां तालियां तालियां । भई गौतम ने बहुत खूब काम किया है । विशेषकर सिंहासन हिल उट्ठेगा जब लावा बन फूटेगी जनता तो अद्भुत है । गौतम ये शेर आप जानते ही नहीं है कि सरस्‍वती ने आपसे क्‍या लिखवा दिया है । ये तो उस तरह का शेर है जो नारा बन जायेगा । आप जानते हैं कि आज जो नारे मजदूर संघ लगाते हैं उनमें से अधिकांश सुकवि स्‍व शैलेन्‍द्र ने लिखे थे । आपका ये शेर भी वैसा ही है । आपने एक शेर में जो कमाल कर दिया है वो कायम रहने वाला है । और अब आ रहे हैं कुछ शर्मीले से रविकांत  शर्मीले इसलिये की इनका चित्र वैसा ही है । तालियों से स्‍वागत करें रविकांत का जो कहते हैं अपने बारे में कि एक मुसाफ़िर जो खुद अपनी तलाश में है। व्यवसाय- शोध-छात्र, आई आई टी कानपुर
संपर्क- laconicravi@gmail.com । इन्‍होंने पिछले चार सप्‍ताह से अपने ब्‍लाग पर कोई पोस्‍ट नहीं लगाई है इसलिये माड़साब इनसे नाराज हैं ।

रविकांत : इसबार लिखने में काफ़ी मशक्क्त करनी पड़ी। जो हो पाया वो सामने रखता हूँ-

Picture 029



मुश्किल में बेचारी जनता
सौ-सौ आँसू रोती जनता
जो आए इज्जत से खेले
कैसी किस्मतवाली जनता
दिल्ली दुल्हन सी सजती है
तरसे पाई पाई जनता
उनकी साजिश का ये आलम
आपस में लड़ मरती जनता
सौदा होता बिक जाती है
अंधी बहरी गूंगी जनता
झूठे वादों से क्या होगा
रोटी खोजे भूखी जनता
शोले बरसें सब जल जाए
रो-रो आहें भरती जनता
सहने की भी हद होती है
कब तक चुप बैठेगी जनता
क्यों नेताओं के हाथों की
केवल है कठपुतली जनता
तकदीरों के ठेकेदारों
अब भी चेतो कहती जनता
जुड़ता है कुछ इतिहासों में
अपने पर जब आती जनता
जिसका जूता उसका ही सर
बढ़िया खेल मदारी जनता

काँटे पर आटा रखते वो
मछली सी फंस जाती जनता

दो रूप्ये में किस्मत अपनी
तोतों से पढ़वाती जनता

माड़साब : वाह वाह वाह । क्‍या शेर निकाले हैं रविकांत ने विशेषकर जुड़ता है कुछ इतिहासों में अपने पर जब आती जनता में बहुत अच्‍छे तेवर हैं । आनंद आ गया इस शेर में । एक बात में प्रारंभ से ही कह रहा हूं कि शायर सीधे कुछ न कह कर जब गोपन रख कर कहता है तो अधिक आनंद आता है । जैसे रवि न किया जुड़ता है कुछ इतिहासों में । अब इसमें जो कुछ शब्‍द आया है वो ही आनंद दे रहा है । क्‍योंकि शायर ने केवल कुछ लिखा है । वाह भई वाह । हां एक बात और इस बार के तरही मुशायरे का हासिले मुशायरा शेर का चयन माड़साब नहीं कर रहे हैं बल्कि इस बार श्री नीरज गोस्‍वामी जी को ये जवाब दारी दी जा रही है कि वे ही हासिले मुशायरा शेर का चयन करें और अपनी विशेष टिप्‍पणी भी दें के क्‍यों चुना उन्‍होंने इस शेर को हासिले मुशायरा शेर । तो मिलते हैं अगले दौर में दो कवियों और एक कवियित्री के साथ । तब तक जै राम जी की ।

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2008

आज का दिन मैं चाहता हूं कि इस युवा पीढ़ी के नाम रहे जिसका प्रतिनिधित्‍व ये दोनों युवा शायर कर रहे हैं , वीनस और सफर ।

तरही मुशायरा बहुत दिनों से यूं रुका था जैसे कोई बात कहीं पर रुक जाये और फिर लाख कोशिशों के बाद भी हो न पा रही हो । ख़ैर कहते हैं न कि जब जब जो जो होना है तब तब सो सो होता है । तो हम तरही मुशायरे से होकर गुज़र रहे हैं तीन शायरों का बेहतरीन प्रदर्शन कल देखा और आज  दो शायर आ रहे हैं । मैं अपनी कहूं तो चूंकि मैं रामधारी सिंह दिनकर जी का बहुत बड़ा प्रशंसक हूं इसलिये मैं ये मानता हूं कि जो कविता आज के दौर को चित्रित नहीं कर रही है वो कविता कहीं नहीं पहुंच पा रही है । इसीलिये मुझे तीखें तेवरों वाली ग़ज़लें भी पसंद आती हैं । जाने क्‍यों मुझे ऐसा लगता है कि ग़ज़ल को भी अब मुकाबले में उतरना ही होगा आम आदमी के पक्ष में व्‍यवस्‍था के खिलाफ़ । अब ग़ज़ल को भी उसी भाषा में बात करना होगा कि सिंहासन खाली करो के जनता आती है । हमारे पहले दौर के तीनों ही शायरों कंचन, अभिनव और संजय ने काफी तीखे तेवरों में जनता की बात की है । कवि यही तो होता है कि वो दोनों ही पक्षों को निशाने पर रखे और हमारे तीनों ही शायरों ने व्‍यवस्‍‍था के साथ्‍ा जनता को भी नहीं बख्‍शा । एक बार फिर तालियां । और चलते हैं दूसरे दौर के शायरों के साथ ।

माड़साब : सबसे पहले आ रहे हैं हमारे एक शायद सबसे कम उम्र के प्रतियोगी । अंकित सफर की एक विशेषता ये है कि उनकी तस्‍वीरें बहुत सुंदर आती हैं । और ग़ज़लें भी उत्‍साह में लिखते हैं । अंकित का पता ठिकाना ये है अंकित जोशी "सफ़र" १७७२/६, ट कालोनी, पंतनगर, उधम सिंह नगर उत्तराखंड-२६३१४५ मोबाइल:- ०९९२१९४१७८४

अंकित जोशी "सफ़र"

2

अच्छी हो या गन्दी जनता.
हम सब से ही  बनती जनता.

नेताओं को चुनती जनता.
अंधी बहरी गूंगी जनता.

बीच सड़क पे खून हुआ एक,
बोले कुछ न गूंगी जनता.

है ग़म फ़िर भी हँसता जोकर
ताली पीटे अंधी जनता.

छोटे से मुद्दे पे दंगा,
आग बनी चिंगारी जनता.

मुफ्त बटी वोटों की खातिर,
दारु, लाइट, साड़ी जनता.

अपनी ताकत ख़ुद ना जाने,
मूरख पागल कैसी जनता.

कल कुछ बम फटने के कारन,
दिखती है सहमी सी जनता.

तनहा जो करना है मुश्किल,
आसा है कर सकती जनता.

माड़साब : मैंने कहा था कि अंकित उत्‍सा‍ह में लिखतें हैं और अच्‍छी बात ये है कि इन्‍होंने मुशायरे के तेवर को बनाये रखा है । मतला अच्‍छा है और अपने पर भी सवाल उठाने का साहस किया गया है जो कवि का पहला गुण होता है । तालियां छोटे बच्‍चे के लिये और हम चलते हैं एक और कम उम्र के प्रतियोगी की तरफ आ रहे हैं वीनस केसरी । ये कुछ गुमे हुए से प्रतियोगी हैं । गुमे हुए से का मतलब है कि ये अक्‍सर खो जाते हैं और फिर अचानक प्रगट हो जाते हैं । सबसे अच्‍छी बात ये है कि इनके पास सवाल हैं जो हर जिंदा आदमी के पास होने चाहिये ।

वीनस केसरी :

venus

जब सोते से जागी जनता
फ़िर तूफां औ आंधी जनता
नेता जी मन ही मन सोंचे
कब किसकी महतारी जनता
गांधी जी के तीनों बन्दर
अंधी बाहरी गूंगी जनता
गणतंत्र  दिवस हर चौराहे
जन गण मन दुहराती जनता
नवमी पूजन ईद दशहरा
कब बम से भय खाती जनता

अब भारत में हक के खातिर
घिस घिस कर फट जाती जनता
लूली लंगडी टेढी बाकुल
अंधी बहरी गूंगी जनता
कोसी हो या यमुना देखो
सब में बहती जाती जनता
अंधी नगरी चौपट  राजा
क्या कर ले व्यापारी जनता
कहने को सब कुछ मिलता है
पर कब कुछ है पाती जनता
नेता जी की टोपी में है
अगड़म बगड़म ठूसी जनता
अब संसद के हर खंभे को
अपना दुःख बतलाती जनता
जब चारा भी नेता खालें
तब क्या खाए भूखी जनता
मुर्गा बकरा नेता खाते
ईंटा पत्थर खाती जनता
सरकारी काली पन्नों में
जीती औ मर जाती जनता

माड़साब : हूं अच्‍छे शेर निकाले हैं । कुछ शेर बहर से इधर उधर हो रहे हैं । लेकिन तरही मुशायरे का नियम है कि जो कुछ जैसा हो वैसा ही प्रस्‍तुत किया जायेगा । कुछ शेर अच्‍छे तेवरों में हैं । विशेषकर सरकारी काले पन्‍नों में जीती औ मर जाती जनता तो बहुत अच्‍छा निकाला है । हिंदुस्‍तान की आम जनता का मानो पूरा चित्र की खींच कर रख दिया है वीनस ने । तालियां तालियां और तालियां । आज केवल ये दो ही क्‍योंकि आज का दिन मैं चाहता हूं कि इस युवा पीढ़ी के नाम रहे जिसका प्रतिनिधित्‍व ये दोनों युवा शायर कर रहे हैं । वीनस और सफर । दोनों पर हमें आने वाले कल की उम्‍मीदें हैं । और दोनों ही अपने शेरों में हमें निराश नहीं कर रहे हैं । तो स्‍वागत करें हमारी आने वाले कल की कविता का । मन से पढ़ें इन दोनों को और खूद दाद दें । जै राम जी की ।

गुरुवार, 18 दिसंबर 2008

बहुत दिनों से रुका हुआ था ये तरही मशायरा । ऐसा लग रहा है जैसे कि इसी के कारण बाकी का सब भी रुका है तो चलिये आज आयोजित करते हैं इसे ।

काफी पहले से हम एक तरही मुशायरे पर स्‍थगित से बैठे हैं । और दरअस्‍ल में कुछ कारण नहीं भी हो तो भी बस कभी कभी ऐसा ही कुछ होता है ना कि कुछ नहीं हो फिर भी कुछ नहीं होता । गौतम की उत्‍सुकता वाजिब है और होनी भी चाहिये क्‍योंकि ये तो वही बात होती है कि बच्‍चा हो तो गया है लेकिन पिता को उसका चेहरा नहीं देखने को मिल रहा है । बच्‍चे से याद आया हमारी कक्षा के होनहार छात्र अभिनव शुक्‍ला अब बच्‍चे नहीं रहे हैं । क्‍यों, क्‍योंकि वे अब पिता बन गये हैं । पिछले माह उनके यहां पर एक बेटे का आगमन हो गया है । पूरी ग़ज़ल की कक्षा की ओर से उनको बधाई, हम यही कामना करते है कि ये बच्‍चा अपने पिता से भी बड़ा कवि हो और अपने पिता की ही तरह से हिंदी की सेवा करे । बच्‍चे का नाम जैसा कि अभिनव ने बताया कि अथर्व रखा गया है । बहुत अच्‍छा नाम है इसी से पता लगता है कि किस प्रकार वे आज भी अपने देश की संस्‍कृति और सभ्‍यता से जुड़े हैं । पुन: बधाई और आज का ये तरही मुशायरा इसी खुशी में ।

चूंकि बात नये मेहमान की हो रही है इसलिये हम आज के मुशायरे का प्रारंभ भी एक नये मेहमान के साथ ही करेंगें । ये पहली बार हमारी कक्षा में आये हैं । और कक्षा में आने वाले दूसरे सेना के अधिकारी हैं । गौतम पहले से हैं और ये भी सेना में केप्‍टन हैं ।  कैप्‍टन संजय चतुर्वेदी जी भी सोच रहे होंगें कि कहां के तरही मुशायरे में फंसा जहां पर दो महा से अधिक हो गये हैं लेकिन अभी भी कुछ नहीं हो पा रहा है । खैर चलिये आज का प्रारंभ करते हैं कैप्‍टन के साथ

कैप्टन सँजय चतुर्वेदी पहली बार कक्षा में हाजिर हूँ इस आशा के साथ के देरी के बावज़ूद आप मुझे कक्षा में बैठने देँगे .शेष विस्तार से बातें करूंगा.प्रणाम .
छूती  रोज  बुलन्दी  जनता
फिर औन्धे मूँ गिरती जनता

गर्मी का मौसम है फिर भी
ताप रही  है बस्ती जनता

ना  मँडप ना  ही  बाराती
मल कर बैठी हल्दी जनता

खुश्बू  होने  की चाहत  में
रोज हवा में  घुलती जनता

अन्धी  नगरी  चौपट  राजा
चन्द टकों में बिकती जनता

कौन   बन्सरी  बजा रहा है
चूहों  जैसी  चल दी जनता

इक  दूजे  का  रस्ता  रोकें
चौडी  राहें   सँकरी  जनता

धन्वन्तरि  को  ढूँढ  रही  है
बहरी  गूँगी   अन्धी  जनता

खुद ही  बनती  खेल तमाशा
खुद पर ही फिर हँसती जनता

माड़साब : भई वाह इसको कहते हैं कि पहली ही पारी में शतक मार देना । बहुत अच्‍छा । संजय जी आपकी कहन में बात है आप गौतम से नेट पर हिंदी की ट्रेनिंग लें और नियमित रूप से जुड़ें । तालियां संजय जी के लिये । और अब संजय जी के बाद आ रहे हैं नये नये पिता बनने का सुख उठा रहे अभिनव । अभिनव ग़ज़ल की कक्षाओं के सबसे पुराने छात्र हैं । और तभी से नियमित कभी अनियमित रूप से आते रहे हैं । आज दूसरे नंबर  पर वे ही आ रहे हैं ।

अभिनव शुक्‍ला -

abhinav_shukla

लगती ठहरी ठहरी जनता
सागर जैसी गहरी जनता
जून, बर्फ का पानी, बच्चे
तपती एक दोपहरी जनता
गांधीजी के बन्दर जैसी
अंधी गूंगी बहरी जनता
ईंटा लेकर तवा मांजती
रामधुनी सी महरी जनता
दुनिया का खूं पीते साहब
साहब की मसहरी जनता
मज़हब, दौलत, भूख, गरीबी,
तेरी जनता मेरी जनता

माड़साब : अभिनव लगता है अथर्व का आगमन आपके लेखन में भी नया रंग भर गया है । भई खूब बहुत खूब । सारे शेर बात कर रहे हैं । ईंटा लेकर तवा मांजती रामधुनी सी महरी जनता में तो कमाल का काम किया है । हां एक बात यहां पर मैं स्‍पष्‍ट कर देना चाहता हूं कि उर्दू में एक काफिया का दोष होता है जिसमें काफिया से मात्रा को हटाने के बाद उसका स्‍वरूप देखा जाता है । उसे हिंदी में अमान्‍य किया जाता है । अत: वो दोष जो यहां पर भी काफी सारे शेरों में उर्दू के हिसाब से होरहा है उसे हम अभी नजरअंदाज कर रहे हैं हां मगर उस पर मुशायरे के सम अप में बात करेंगें । और अब आ रही हैं कंचन ।

कंचन -

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बैसाखी पर दौड़ी जाती,
अंधी, गूँगी, बहरी जनता।
खिलते लब पर भारी छाती,
मुस्कानो में सिहरी जनता।
मरने वाले मेरे ना थे,
शुकर मनाए, ठहरी जनता।
आज खड़े भाषण देते हो,
कल तुम भी थे हम सी जनता।
तुम पहले कपड़े तो बदलो,
बाहर बिखरे बिखरी जनता।
लेकिन देखो यू ना होवे,
तुम्हे बदल दे, बिफरी जनता।

माड़साब : भई वाह कंचन आपने एक शेर तुम पहले कपड़े तो बदला बाहर बिखरे बिखरी जनता में जो बारीक सा इशारा देश के पूर्व गृहमंत्री पर किया है वो लाजवाब है । यही तो कवि या शायर की विशेषता होती है कि वो कभी भी कुछ सीधे नहीं कहता वो तो कविता की भाषा में ही बात करता है । आपने अच्‍छे प्रयोग किये हैं । बधाई । चलिये आज के लिये इतना है आज हमने तीन शायरों को लिया है कल हम कुछ और को लेंगें ।

सोमवार, 1 दिसंबर 2008

हवा से फड़फड़ाते हुए हिंदुस्‍तान के नक्‍शे पर गाय ने गोबर कर दिया है

लगभग एक माह से आप सबसे दूर हूं । 8 नवंबर को पूज्‍यनीय दादीजी का स्‍वर्गलोक गमन हो गया । वैसे तो काफी समय से वे बीमार थीं किन्‍तु 8 नवंबर को अंतत: ईश्‍वर ने उनको बुला ही लिया । दादा-दादी के साथ बहुत कुछ चला जाता है । वो लाड़ वो दुलार वो सब कुछ चला जाता है । हुलस हुलस कर खिलाने का भाव दादी और नानी के पास ही होता है । दादी और नानी को अपना नाती या पोता हमेशा ही दूबरा लगता है । और हमेशा ही बहू को उलाहना कि कुछ खिलाती नहीं है बच्‍चे सींक समान हो रहे हैं । वो सब चला गया दादी के साथ ही । कई सारे मित्रों की संवेदनायें मिलीं सबको धन्‍यवाद । एक माह दूर रहा ब्‍लाग से नेट से और कम्‍प्‍यूटर से भी । एक अनोखी पुस्‍तक पढ़ी ''तुरपाई उधड़ते रिश्‍तों की''  श्री आलोक सेठी जी की ये पुस्‍तक पढ़ते समय कितनी बार रोया याद नहीं । माता और पिता के साथ बच्‍चों के संवेदनहीन रिश्‍तों पर लिखी किताब अपने आप में अनूठी है । ज़रूर ज़रूर पढ़ें ये किताब । ( इस किताब को पढ़वा कर कैसे मैंने एक मित्र का नजरिया बदला वो कहानी भी बताऊंगा )

मुंबई को दो दिन तक देखता रहा, मौन होकर देखता रहा ना तो अमिताभ बच्‍चन की तरह रिवाल्‍वर निकाली और ना आदरणीय लता जी की तरह रोया । किन्‍तु बस मौन होकर देखता रहा । मन में धूमिल की एक कविता गूंजती रही । गूंजती रही ऐसे मानो हर दिशा में बस वही कविता हो और कुछ भी न हो ।

बीस साल बाद ( धूमिल)

बीस साल बाद

मेरे चेहरे में

वे आंखें वापस लौट आईं हैं

जिनसे मैंने पहली बार जंगल देखा है

हरे रंग का एक ठोस सैलाब जिसमें सभी पेड़ डूब गये हैं

और जहां हर चेतावनी

खतरे को टालने के बाद

एक हरी आंख बनकर रह गई है

बीस साल बाद

मैं अपने आप से एक सवाल करता हूं

जानवर बनने के लिये कितने सब्र की ज़रूरत होती है ?

और बिना किसी उत्‍तर के चुपचाप

आगे बढ़ जाता हूं

क्‍योंकि आजकल मौसम का मिजाज यूं है

कि खून में उड़ने वाली पत्तियों का पीछा करना

लगभग बेमानी है

दोपहर हो चुकी है

हर तरफ ताले लटक रहे हैं

दीवारों से चिपके गोली के छर्रों

और सड़कों पर बिखरे जूतों की भाषा में

एक दुर्घटना लिखी गई है

हवा से फड़फड़ाते हुए हिंदुस्‍तान के नक्‍शे पर

गाय ने गोबर कर दिया है

मगर यह वक्‍त घबराए हुए लोगों की शर्म

आंकने का नहीं है

और न यह पूछने का-

कि  संत और राजनीति में

देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्‍य कौन है ?

आह ! वापस लौटकर

छूटे हुए जूतों में पैर

डालने का वक्‍त यह नहीं है

बीस साल बाद और इस शरीर में

सुनसान गलियों से चोरों की तरह गुजरते हुए

अपने आप से सवाल करता हूं -

क्‍या आज़ादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है

जिन्‍हें एक पहिया ढोता है

या इसका कोई खास मतलब होता है

और बिना किसी उत्‍तर के आगे बढ़ जाता हूं

चुपचाप ।

( कविता का एक शब्‍द बदला गया है )